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रविवार, 28 सितंबर 2014

मेरे स्कूटर पर दूल्हे राजा.....!

         बात उन दिनों की है..तब मैं इंटर का छात्र हुआ करता था..भविष्य की चिंता से मुक्त एक प्रकार की निश्चिन्तता और मस्ती भरे दिन गुजर रहे थे..! मैं..कभी-कभी अपने विजय-सुपर स्कूटर से विद्यालय चला जाया करता था...कालेज के मित्रों के बीच कभी मेरे स्कूटर से कालेज आने की आलोचना होती..तो..कभी मेरी इस बात पर आलोचना होती कि...मैं अकसर अपने स्कूटर पर पीछे उस छात्र को बैठाकर क्यों चलता था जो गरीब होने के साथ ही तथाकथित ऊँची जाति का नहीं था...लेकिन मैं..इन आलोचनाओं पर न तो ध्यान देता और न ही इन बातों की परवाह करता...
          मेरी ऐसी ही आलोचनाओं में अग्रणी भूमिका निभाने वाले मेरे एक मित्र की शादी तय हो गयी...उस दिन उन्होंने बड़ी ही प्रसन्नता से बताया था, “यार मेरी शादी तय हो गयी है..! मई में बारात चलना होगा..और हाँ अपने स्कूटर से चलना..” उस समय मुझे प्रतीत हुआ कि जैसे वे मुझे नहीं मेरे स्कूटर को अपने बारात में चलने का निमंत्रण दे रहे हों...! खैर..जो भी रहा हो..मैंने उनकी बारात में चलने के लिए हामी भर लिया था..., हाँ..उन्होंने हम दोनों के बीच के एक कॉमन मित्र को भी उसी समय निमंत्रित किया और मुझे इस बात के लिए ताकीद किया कि इन्हें भी अपने साथ लाना होगा..हम दोनों उनकी बारात में चलने के लिए उत्साहित भी थे। 
        मित्र के विवाह का दिन आ गया...किसी तरह.…घर से अनुमति लेकर..हम दोनों बारात में शामिल होने के लिए स्कूटर से निकल पड़े। करीब पचीस किलोमीटर की दूरी तय करते हुए हम उस स्थान पर पहुँचे जिसके आस-पास के ही किसी गाँव में बारात को पहुँचना था। मैंने स्कूटर रोक दिया..और.…सिर घुमाते हुए कॉमन मित्र से पूँछा, “यार किस गाँव में चलना है..?” उन्होंने जवाब दिया, “मुझे तो नहीं मालुम..!” मैं भी अजीब बुद्धू निकला...मार्कंडेय को भी नहीं पता...! उस समय मैं कुछ-कुछ यही सोचने लगा था..। हाँ.. मेरे कॉमन मित्र का नाम मार्कंडेय ही था...! घर से चलते समय मैंने बारात के गंतव्य स्थल के बारे में इसलिए विशेष जानने की कोशिश नहीं की थी कि मार्कंडेय को पता मालुम होगा। खैर, अब हम दोनों थोड़ा सा परेशान हो गए थे...। फिर हमने तय किया कि आगे इस रास्ते पर बढ़ते हुए यदि कहीं कोई बारात आयी हो या आनेवाली हो तो पूँछ लिया जाये...। 
       हम थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि एक सजा-धजा घर दिखाई दे गया.., पूँछने पर बताया गया कि यहाँ बारात तो आनेवाली है..! पर वह हम लोगों वाली बारात नहीं थी..। फिर हम लोग लगभग एक किमी आगे बढ़ गये...यहाँ तो सड़क के किनारे कोई बस्ती ही नहीं थी.…! जो बस्ती या गाँव दिखाई पड़ रहे थे वे उस सड़क के दोनों ओर आधा से एक किलोमीटर की दूरी पर थे...हम वहाँ स्कूटर रोक कर खड़े हो गए थे और सड़क के दोनों ओर दूर स्थित बस्तियों पर निगाहें दौड़ाने लगे..दूर..कई जगहों पर लाइटें टिमटिमा रही थी...! हम दोनों सोचने लगे कि क्या किया जाए..फिर हमने तय किया कि उन प्रकाश-स्थलों पर चलकर पता किया जाए शायद हमारी वाली बारात मिल जाए..क्योंकि..उस दिन की लगन बहुत तेज थी कई स्थलों पर बारात आई हुई लग रही थी..। पुनः स्कूटर स्टार्ट कर हम एक निकट के स्थल की ओर चल पड़े लेकिन वहाँ बताया गया कि यहाँ किसी और की बारात आने वाली थी...। अब शाम का धुंधलका छाने लगा था...मायूस हो हम वहाँ से लौट पड़े..और दूर दिखाई पड़ रहे रोशनी स्थल तक जाने का निर्णय लिया गया..। हालाकि वहाँ की दूरी लगभग एक से डेढ़ किमी की रही होगी..किसी तरह वहाँ पहुँचे तो गाँव के बाहर ही बारात मिली और बाराती शायद द्वारचार के लिए वहाँ तैयार हो रहे थे...लेकिन वहाँ भी वही..! वह बारात भी हमारी वाली नहीं थी...! अब हम लोग पूरी तरह से निराश हो चुके थे। कारण...एक तो किसी नजदीक स्थल पर कोई रोशनी नहीं दिखाई दे रहा था कि वहाँ चल कर पता किया जाता और दूसरा सबसे बड़ा डर मुझे इस बात का सता रहा था कि मेरे स्कूटर में स्टेपनी भी नहीं थी..! यदि पहिया पंचर हो गया तो मैं क्या करूँगा...! क्योंकि जिस स्थल पर हम लोग थे वह किसी छोटी-मोटी नदी का क्षेत्र था जहाँ बबूल के पेड़ की बहुतायत थी और बने हुए खोरी में चलते हुए उनके काँटों से स्कूटर पंचर हो जाने का डर इस अँधेरे में गहरा गया था..। मैंने मित्र मार्कंडेय से सामने दिखाई दे रहे एक टीले पर चढ़ कर रोशनी तलाश करने के लिए कहा...। इसी बीच एक बाराती गहराती रात का हवाला देते हुए हमारे पास इस अनुरोध के साथ आया कि हम चाहें तो उसके बारात में शामिल हो सकते हैं..उसकी भी इज्जत थोड़ी बढ़ जाएगी...! हाँ उस दौर में दो-पहिया वाहन भी कम ही होते थे..किसी बारात में दो-चार ऐसे वाहन होने पर शान की बात समझा जाता था। 
        एक बारगी तो मेरे मन में आया कि उस बारात में शामिल होने के लिए हाँ कह दूँ..क्योंकि अगर बिना बारात किए ही घर लौटा तो घर वालों को क्या उत्तर दूँगा कि क्यों लौट आया...और.…यदि यह कारण बताया तो अपनी बेवकूफी सिद्ध कर दूँगा। इसी बीच मेरे मित्र टीले पर चढ़ कर लौट आये थे...आते ही उन्होंने बताया कि काफी दूर उस ओर एक रोशनी दिखाई तो दे रही है..! लेकिन तमाम आशंकाओं के बीच मैं थोड़ा परेशान सा हो गया था.…इसलिए मार्कंडेय भी वहाँ चलने का जोर नहीं दे पा रहे थे। उसी समय साईकिल से एक राहगीर गुजरा..वह हम लोगों को देखकर रुक गया..शायद वह निमंत्रण दे कर लौट रहा था और उसी इलाके का भी था। उसने हम लोगों से मित्र द्वारा टीले पर चढ़ कर देखी गयी रोशनी की ओर इशारा करते हुए कहा कि शायद वह बारात आप ही लोगों की तरफ से आई है..! एक बार आप लोग वहाँ जाकर पता कर लीजिए...। अब हम लोगों के लिए उस राहगीर की बात में एक आशा की किरण झलकी...वहाँ तक चलने का निश्चय किया गया। 
       हम वहाँ पहुचे ही थे की एक परिचित दिखाई दे गए और वे हमे देखते ही पूँछ बैठे, “अरे भाई..आप लोग कहाँ रह गए थे...राकेश आप लोगों का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं...” अब हमारे जान में जान आई और साथ में ही बेवकूफियों पर पटाक्षेप भी हो गया। जनवासे में देखा...राकेश जी आराम से मसनद पर पीठ टेके हुए दूल्हे की वेशभूषा में बैठे हुए थे...! हम लोगों को देखते ही वे जैसे उछल पड़े..कुछ देर उनके पास बैठा गया उनकी शिकायत आई कि द्वारचार के समय हम लोग क्यों नहीं पहुँच पाए, बीच में मार्कंडेय ने सारी कहानी बताई..। थोड़ी हँसी हुई फिर हम लोग सामान्य हो गए...इस समय बारात को खाना खिलाने की तैयारी हो रही थी..क्योंकि अब तक रात के लगभग साढ़े दस बज चुके थे…! खाने की व्यवस्था लड़की वालों के दरवाजे पर ही था...आजकल के बफर सिस्टम जैसा नहीं था। खाना खाने के बाद मैं जनवासे में आ गया था और राकेश विवाह मंडप में चले गए थे...विवाह की रस्में पूरी होने के बाद ही उन्हें खाना था। 
         जनवासे में आते ही मुझे गहरी नींद आ गयी...आधी रात के बाद किसी ने मुझे जगाया...जगाने वाले ने बताया कि कार का ड्राइवर कहीं चला गया है इसलिए मुझे ही अपनी स्कूटर से दूल्हे को विवाह मंडप से ले आना है। मैं उनींदे ही स्कूटर लेकर लड़की वालों के दरवाजे पर पहुँच गया...! गरमी के दिन थे ही उस समय आंधी आने की सम्भावना बन रही थी...और हवाएँ तेज चल रही थी...! दूल्हे के लिबास (तब जोड़ा-जामा प्रचालन में था) में राकेश मेरा इंतजार कर रहे थे...मैं वहाँ पहुँचा..मैं स्कूटर पर उन्हें बैठा कर गाँव के किनारे के रास्ते से निकलने लगा..उस कच्चे रास्ते के एक ओर घर थे तो दूसरी ओर लोगों के खेत फैले हुए थे...और घरों से पानी निकालने की नाली उस कच्चे रास्ते को जगह-जगह से काट रही थी। ऐसी ही एक-दो नालियों को मैं क्रास किया..उस समय धूल भरी आँधी चलने लगा था..और.…तेज धूल भरी हवाओं से बचने के प्रयास में मैं ऐसी ही एक नाली को नहीं देख पाया..! मेरा स्कूटर जोर से उछल गया.…! किसी तरह मैं उसे संभालते हुए आगे बढ़ गया...
       कुछ आगे मैं बढ़ा ही था कि मुझे आवाज सुनाई दी, “अरे भाई...विनय..!” आवाज जानी-पहचानी थी..मैंने पीछे मुड़ कर देखा..मैं हतप्रभ..! दूल्हे राजा मेरे स्कूटर पर नहीं थे...! हाँ..वह उसी नाली के पास स्कूटर उछलने और स्टेपनी न होने के कारण गिर पड़े थे...! जैसे-तैसे मैंने स्कूटर रोकी मुझे चिंता हुई कि दूल्हे बने राकेश को कहीं चोट तो नहीं आई...मैं उनकी ओर बढ़ा...! मेरे उनके पास पहुंचते-पहुंचते वे पता नहीं क्यों...चकरोड के किनारे के खेतों की ओर दौड़ पड़े....मैं कुछ समझ पाता उसके पहले ही मैंने देखा कि वे हवा में उछल-उछल कर जैसे कुछ पकड़ रहे थे...और बोलते जा रहे थे.. “विनय भाई ये उड़ा...देखिए...उधर गया...” तब तक एक पचास रूपए का लहराता हुआ नोट हवा में मेरे आगे से गुजरा...मैं लपक कर उसे पकड़ लिया...आँधी वाली हवा तेज थी...इसी बीच उन्होंने बताया कि गिरने से, उनके नोट जो शगुन आदि में मिले थे, हाथ से छूट गए थे...! वही हवा में उड़ रहे थे...फिर मैंने कई उड़ते नोटों को पकड़ा...! अब हम दोनों दूर-दूर तक खेतों में नोट ढूंढ रहे थे....मैंने सोचा कि नोट खोजते और इस तरह उछल-कूद करते कोई घराती न देख ले...अँधेरा था...लेकिन चन्द्रमा के प्रकाश की सहायता से लगभग सारे नोटों को हम लोग खोज लिए थे...! मैंने मित्र दूल्हे से पूँछा, “देखो पूरे हुए कि नहीं..” उन्होंने हाथ में लिए नोटों को मुट्ठी में मोड़ते हुए कहा. “हाँ इतना ही मोटा तो था...” मुझे थोड़ी हँसी आ गयी..और पूँछ बैठा, “गिने थे कि नहीं...?” “अरे यार गिनने का मौका कहाँ था...” आगे उन्होंने फिर कहा.. “तुम भी तो सो गए थे...!”
     तभी एक टार्च की रोशनी हम लोगों पर पड़ी..! वे हमारे पास आये बोले “क्या बात है..?” वह घराती थे..! तब-तक हम सामान्य हो चुके थे...मैं लगभग इस अंदाज में यह सोचकर बोला कि हम लोगों के साथ क्या घटी है वह भांप न पाए, “भई आपके यहाँ बारात आ रही है और आप लोगों में इतनी भी सभ्यता नहीं कि कम से कम रास्ते की इन नालियों को आज के लिए ही समतल कर दें बच गए नहीं तो हम गिर पड़ते...!” यह कह मैं दूल्हे का मुँह देखने लगा..तभी उन्होंने टार्च की रोशनी नाली की ओर मारी..वहाँ उन्हें कुछ दिखा..पचास रुपये का एक नोट उन्हें वहाँ गिरा पड़ा मिला..! इस पर मैंने उन्हें बताया कि स्कूटर उछलने से मेरा पर्स जेब से गिर गया था..शायद यह नोट पर्स से गिर पड़ा था...मैं घराती महोदय को यह समझा ही रहा था कि बीच में ही दुल्हे जी बोल उठे... “अरे टार्च है...! हो सकता है आपके पर्स के और नोट खेतों की ओर न उड़ गए हों..” मित्र बने दूल्हे की ओर देख मैं हलके से मुस्कुरा दिया और उन सज्जन से खेत की ओर इशारा करते हुए बोला, “हाँ..हाँ..जरा अपनी टार्च से थोड़ा खेतों में भी देख लें कहीं कोई और नोट हवा में उड़ यहाँ तक तो नहीं आ गया है..?” फिर हम तीनों टार्च की रोशनी में उड़े हुए नोट खोजने लगे...इस प्रयास में शायद एक-दो नोट और मिले थे। फिर वापस आकर हम स्कूटर स्टार्ट कर जनवासे की ओर चल पड़े.. मेरे कान के पास मुँह लाकर मित्र दूल्हे ने कहा, “चलो यार कम से कम सभी मिल गए..”
     मुझे अब हँसी आने लगी थी..किसी तरह मैं अपनी हँसी रोके हुए था.....
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रविवार, 3 अगस्त 2014

ये 'तथाकथित' क्यों हो गए हैं...!

      आजकल एक विवाद छिड़ा हुआ है...लाउडस्पीकर को लेकर...तथाकथित हिन्दू और तथाकथित मुसलामानों के बीच में...! यहाँ ‘तथाकथित’ शब्द का प्रयोग मैंने जानबूझ कर किया है...कारण..! वास्तव में न कोई हिन्दू हिन्दू है..! और न कोई मुसलमान मुसलमान है..! जो स्वयं को तथाकथित हिन्दू कहता है वह असल में तथाकथित मुसलामानों के सामने ही ऐसा कहता है..और तथाकथित मुसलमान भी तथाकथित हिन्दुओं के सामने ही अपने को मुसलमान कहते हैं...इसी में तथाकथित सारे विवादों का रहस्य छिपा हुआ है... यह नया-नया लाउडस्पीकर का विवाद भी इस तथाकथित में उलझ गया है...!
        बचपन के स्कूली दिनों में दादाजी के बगल में ही मेरी भी चारपाई होती थी... चूँकि दादा जी लगभग पचास साल के रहे होंगे जब मेरी दादी का देहावसान हो गया था...मैं उस समय लगभग पाँच वर्ष का रहा होऊँगा...वह मुझे अपने पास ही सुलाते थे...वह अकसर राम, कृष्ण, अकासुर-बकासुर आदि से संबंधित और ऐसी ही अन्य पौराणिक कहानियां सोने के समय मुझे सुनाया करते थे...जिसे सुनते-सुनते मुझे नींद आ जाया करती थी...मैं ही उनके अकेलेपन का साथी भी था...उनका मुझसे बेहद लगाव था...मुझे लगता..जैसे उनका हर क्षण मेरे केयर में ही बीत रहा था... खैर..जब प्रातः के लगभग चार बजनेवाले होते थे तो वह मुझे पढ़ने के लिए जगा दिया करते थे..और मैं भी चारपाई के सिरहाने पर रखी कुर्सी पर लालटेन जलाकर रख लिया करता था...और पढ़ने बैठ जाया करता था...हालाँकि पढ़ता कम था सोता अधिक था..अकसर पढ़ते-पढ़ते नींद आ जाया करती थी और उसी कुर्सी के हत्थे पर सिर टेक कर सो जाया करता और लालटेन जलती रहती..! और जब किसी कारण नींद खुलती तो दादा जी की ओर देख लेता कि कहीं दादा जी ने सोते हुए तो नहीं देख लिया..! क्योंकि उनका अनुशासन भी बहुत कड़ा था... और..जब वे कभी मुझे सोते हुए पकड़ लेते तो कहते, “का हो..नन्हकउ..सोवत हया का...सोवई क होय त लालटेन बुझाय द...” और मुझे लगता उनके यह कहने में भी मुझे पढ़ने की बात कहने का भाव छिपा होता था...खैर मैं यह कहते फिर पढ़ने बैठ जाता था...कि “नाहीं बाबू पढ़त हई...” हाँ मैं अपने दादा जी को बाबू ही कहता था|
       मेरे इस पढ़ने और सोने के बीच दादाजी का भय एक ऊहापोह बनाए रखता था...जिसके कारण यदि मुझे नींद आती तो एक छोटे से खटके में जाग जाता था...यह क्रम कुछ देर तक चलता रहता था...लेकिन स्थाई रूप से जगाने का काम दूर कस्बे के मन्दिर और मस्जिद में लगे लाउडस्पीकर की आवाज से होता था...मंदिर के लाउडस्पीकर से भजन की आवाजें आने लगती थी तो उसके कुछ देर बाद ही मस्जिद के लाउडस्पीकर से अजान की आवाजें सुनाई देने लगती थी..उसके बाद तो मैं चैतान्यावस्था में पहुँच जाता था...न जाने क्यों दूर कस्बे से आने वाली वे आवाजें बहुत प्यारी लगती थी...और मैं पढ़ता रहता था...हाँ बाद में जब मैं शहर पढ़ने गया तो मस्जिद के लाउडस्पीकर से आनेवाली अजान की उन आवाजों को मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ.. “सुबह के पांच बजने वाले है..” फिर “अल्लाह हो अकबर..” यही सुनकर मेरी नींद खुल जाया करती थी...और मैं भी सोचता था.. “पढ़ाई का समय हो गया है...”

       लेकिन न जाने क्यों आज ये “तथाकथित वाले” लाउडस्पीकर का झगड़ा ले बैठे हैं...जिसके शोर में वे प्यारी ध्वनियाँ कैसे सुनाई देंगी जिसे सुनकर कोई बच्चा बिना अपने दादा जी के भी सुबह-सुबह उठ बैठे और “पढ़ने का समय हो गया है..” सोचते हुए पढ़ने बैठ जाए..! सोचता हूँ..! इन तथाकथितों को मेरे दादा जी जैसा प्यार देने वाला कोई नहीं मिला था...शायद तभी तो.. ये 'तथाकथित’ हो गए हैं...! .....आमीन...!                   

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

पहुँचे हुए बाबा जी....!

         आजकल मित्र महोदय का व्यवहार कुछ-कुछ बदला सा है...कर्मकांड जैसी धार्मिकता की झलक उनमें दिखाई देने लगी है...कभी-कभी गुरु और ज्ञान की बातें भी करने लगते हैं...बातों ही बातों में उनके मुख से निकल पड़ता है कि गुरु ज्ञान देने के साथ ही साथ लोगों को दुःख और संकटों से भी मुक्ति देते हैं... खैर...ज्ञान देने की उनकी बात से तो मैं सहमत था...लेकिन गुरू दुःख और सकटों को दूर करता है या कर सकता है मेरे गले के नीचे नहीं उतरता है...हाल ही में वे घर से लौट कर आए थे...मैं उनसे मिलने पहुँच गया...बातों ही बातों में मेरी निगाह उनके दाहिने हाथ की कलाई में बंधी सतरंगे धागों पर पड़ी... यह क्या...उन्होंने नीले रंग का पत्थर जड़ित अंगूठी भी पहन रखी थी...! फिर मेरी दृष्टि आलमारी में रखी सफेद दाढ़ियों वाले बाबा जैसे लगने वाले किसी व्यक्ति की तस्वीर पर पड़ी...मैंने छूटते ही पूँछा कि यार तुम कबसे एक तार्किक से अतार्किक बन गए...! मतलब पूँछने पर मैंने इन चीजों की ओर इशारा करते हुए उनके अन्दर आए इस परिवर्तन का कारण जानना चाहा...
      मित्र महोदय के कथनानुसार...विगत दिनों जब वे गाँव गए थे तो उनके घर यही बाबा जी आ गए थे...उनके भूत और वर्तमान के बारे में कुछ ऐसी बातें बतायी कि वे आश्चर्य में पड़ गए कि बाबा जी के पास कौन सी दिव्य दृष्टि है…! इतना कुछ उनके बारे में जान गए..! फिर भविष्य में उनके परिवार पर आने वाले कष्टों की भविष्यवाणी भी की..उनके चिंतित होने पर उन्होंने कुछ धार्मिक अनुष्ठान करवाए तथा यही नीले रंग के रत्न जड़ित अंगूठी और हाथ में कलेवा धारण करने के लिए कहा और अपना यह फोटो देते हुए कहा कि दिन में एक बार इस फोटो की ओर जरूर निहार लिया करें क्योंकि बाबा जी उनके आगामी कष्टों के लिए एक जाप कर रहे होंगे..और फोटो देखने से बाबा जी की पराशक्ति उनमें परावर्तित होकर उनका कल्याण करेगी...फिर उन्होंने मुझसे कहा कि यार वाकई बाबा जी बहुत पहुँचे हुए लगे....
         मैंने कुछ सोचते हुए अनुष्ठान के बारे में पूँछा तो उन्होंने बताया कि बाबा जी स्वयं अनुष्ठान नहीं करना चाहते थे..उन्होंने यह कहते हुए विधि और सामग्री बता दी थी कि किसी पुरोहित को बुलाकर अनुष्ठान करा लेना...लेकिन बाबा जी की बताई सामग्री प्राप्त करने की दुरुहता को सोचकर उन्होंने बाबा जी से स्वयं अनुष्ठान कार्य संपन्न कराने का अनुरोध किया था तब बाबा जी सहर्ष तैयार हो गए थे.. फिर मित्र ने आगे बताया कि दो-चार हजार तो खर्च होना ही था...लेकिन उन्हें इस खर्च की परवाह नहीं...बाबा से अनुष्ठान करवा दिए|
     मित्र महोदय की ‘इन्नोसेंट टाइप’ बातें सुन मेरे चेहरे पर मुस्कराहट तिर आई..इसे देख वे मेरे मुस्कुराहट का कारण पूँछने लगे तो मैं अन्यथा न लेने की शर्त पर मुस्कुराहट का कारण बताने लगा जो इस प्रकार है...        
        मैंने मित्र महोदय से कहानी कहने के अंदाज में बताना शुरू किया...देखो यार मैं भी हाल ही में घर यानी गाँव गया था वहाँ मेरे चचा जी मिल गए उन्होंने एक घटना सुनायी जो उनके किसी रिश्तेदार के साथ घटी थी..बात यह थी कि चचा के रिश्तेदार का नौजवान लड़का बाल-बाल किसी तरह जेल जाने से बचा था...! कारण... ऐसे ही आपके बाबा जी की तरह एक बाबा थे...! मेरे इतना कहने पर जब मित्र महोदय ने मुझे घूरना शुरू किया तो अपने शर्त की याद दिलाते हुए उन्हें पूरी कहानी सुनने का अनुरोध किया...मैंने आगे कहना प्रारंभ किया..ऐसा था कि उस नौजवान लड़के का एक ग्रुप था..जो दूर इलाकों का भ्रमण करते थे और किसी को भनक न लगे किसी तरह उस क्षेत्र के परिवारों के मुखिया और उसके सदस्यों की स्थिति पता कर लेते थे तथा उसे एक कागज में नोट कर अपने गैग के सरगना को दे दिया करते थे जो बाबा वेशधारी होता था... बाद में वही बाबा उन परिवारों में जाता और उनके भूत तथा वर्तमान की बात कर उनमें भविष्य का डर पैदा करता था...लोग उसके प्रभाव में आकर उससे तरह-तरह के अनुष्ठान करवाते और यदा-कदा दक्षिणा भी दे दिया करते थे..फिर वह बाबा अपने गैंग के सदस्यों में भी इस कमाई का हिस्सा बांटा करता था...अरे वह तो उस दिन की घटना थी जब उसकी पोल खुल गयी थी...!
     हाँ सवेरे ही बाबा उस परिवार में पहुंचा था.... “जय हो..जय हो..अरे भाई श्यामलाल का घर यही है...” बाबा की बात सुन घर वाले अचकचा गए कि इस बाबा को कैसे नाम का पता चला...कारण पूँछने पर बाबा ने कहा कि यह प्रभु की माया है बच्चा लोग...! तुम नहीं समझ पाओगे...! फिर श्यामलाल की घरवाली..घर से यह कहते हुए निकली कि बाबा जी वो घर पर नहीं हैं तो बाबा जी श्यामलाल की घरवाली पर अपना प्रभाव ज़माने के अंदाज में यह कहते हुए बोले कि देवी कोई बात नहीं..आप बड़ी भाग्यशाली हैं, आपके पति इतने साल पहले बीमार हुए लेकिन प्रभु की कृपा से ठीक हो गए...अरे हाँ आपका बड़ा बच्चा बहुत नाम कमाएगा उसे तो बहुत बड़ा आफिसर होना चाहिए...बोलो बेटी सत्य है या नहीं..श्यामलाल की पत्नी ने जैसे ही स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया तो बाबा आगे बोल पड़े...लेकिन पुत्री तुम्हारा दूसरा बेटा थोड़ा कष्ट पायेगा उसका ग्रह उसे चैन से जीने नहीं देगा...एक कष्ट निवारण अनुष्ठान करना होगा...!
       मित्र की निगाहें मेरे ऊपर जमीं हुई थी...आगे मैं अपनी बात पूरी करने लगा.. इसके बाद श्यामलाल की पत्नी बाबा जी से प्रभावित होकर अनुष्ठान के बारे में पूँछ-ताछ करने लगी.. मैंने मित्र की देखते हुए कहा कि उस बाबा ने पूजा के लिए ऐसी सामग्री लिखवाई कि जब उस सामग्री के मिलने की कठिनाई बताई गई तो वह स्वयं सामग्री उपलब्ध कराकर अनुष्ठान पूर्ण करने पर सहमत हो गया...और जानते हो वह बाबा पूजा की ऐसी सामग्री बताता जो लोगों को और कहीं न मिले जिससे लोग विवश हो उसी से अनुष्ठान कराएं... फिर क्या हुआ..ठीक उसी समय श्यामलाल की एक मरकही गाय खूँटे से तुड़ा कर बड़ी तेजी से बाबा की ओर भागी और बाबा को लगा की कहीं वह इस गाय की चपेट में न आ जाए और इसी बचने में वे हड़बड़ा कर गिर पड़े...उनके हाथ में लिया कमंडल छूट गया..उसी कमंडल में रखी कुछ कागज की पर्चियां छिटक कर जमीन पर आ गिरी और श्यामलाल के एक पढ़े लिखे भतीजे के हाथ लग गई..उनके भतीजे ने पढ़ा तो उसमें लिखा था... “श्यामलाल..दो लड़के बड़ा लड़का सरकारी विभाग में..छोटा कुछ-कुछ अवारागर्दी करता है..श्यामलाल एक बार वीमार पड़े थे मरते-मरते बचे थे..आदि-आदि..” इसी तरह से अन्य पर्चियों में भी गाँव के अन्य लोगों के बारे में जानकारी थी...फिर क्या था श्यामलाल के घरवालों को समझते देर न लगी तब-तक गाँव के भी दो-चार लोग आ गए थे...सबको माजरा समझते देर न लगी...और बाबा जी की जम कर धुनाई शुरू हो गयी..तब बाबा जी ने अपने गैंग के बारे में बताया..उनके गैंग में कई लोग थे उन्हीं में चचा के रिश्तेदार का वह नौजवान लड़का भी था जो परिवारों की रेकी करने में शामिल होता था...और बाबा अपनी कमाई में सबको हिस्सा दिया करता था... चचा ने बताया कि खैर किसी तरह रिश्तेदार ने भविष्य में ऐसी गलती न होने देने की शर्त पर अपने लड़के को पुलिस के शिकंजे से बचाया था....!                                        
     मैंने अपनी बात समाप्त कर दी थी और मित्र की प्रतिक्रिया का इन्तजार था...आचानक मित्र महोदय के मुख से निकला.. “धत्त तेरे की..!”
    और मेरी कहानी समाप्त थी...!

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गुरुवार, 12 जून 2014

धुरिया...

       सुखई को बीडीओ साहब से कई बार बुलावा आ चुका था.…! आज हरखू परधान बीडीओ का सन्देश लेकर स्वयं उसे बुलाने आए थे.…! 
      लेकिन…! सुखई को किसी चीज से जैसे कोई मतलब ही न हो..! उसके लिए यह दुनिया जैसे शून्य हो चुकी थी..!
       
      अरे.…! यह क्या.…! धुरिया उसे देख हँस क्यों रही.…! अरे.… देखो-देखो.....! धुरिया उसे डाट भी रही है.… मैं निठल्ला… नहीं धुरिया....ऐसा न कह.… अरे..! धुरिया छटपटा रही...मुझे चिढ़ाते हुए..! यह कहाँ चली जा रही…यह आग.…! इतनी ऊँची लपटें…इन लपटों के बीच कौन.… चित्तू तू....! बड़ा फरेबी है रे तू.…लपटें तुझे जला क्यों नहीं रही.…अरे तू हँस रहा है.…लपटों के बीच.… नहीं अपनी धुरी हँस रही.…नहीं यह चित्तू हँस रहा.…लपटें…! लपटें कहाँ गयीं..! लपटों के बीच चित्तू… नही-नहीं लपटें नहीं… यह तो.…दरोगा जी.…अरे देखो-देखो ओ अपने नेता जी.…बीडीओ साहब…अरे..! बड़का साहब भी..सभी गोल-गोल चित्तू को घेरे घूम रहे...उनके बीच चित्तू...! सब हँस रहे.…सभी के घेरे में खड़ा वह चित्तू.....सबसे ऊपर.…! वह भी हँस रहा.....हे धुरी.…तू तो बड़ी बेदर्द निकली रे.…! देख कैसे सब हँस रहे.…और तू भी हँस रही.…मुझे रोने भी नहीं देती.…!
       
       तभी हरखू की आवाज उसे सुनाई दी,
       "पराना बिटिया ! पास-बुकवा मिला…।"
      "हाँ चाचा ये लो…।" कहते हुए पराना ने उस बैंक पास-बुक को खटोले पर बैठे अपने पिता सुखई के सामने रख दिया।
       पास-बुक का पहला पन्ना खुल गया…! आचानक… सुखई की निगाह पास-बुक में अंकित नाम 'धुरिया पत्नी सुखई' पर टिक गई.… एक-टक.…! हाँ एक-टक.…!! वह उस पर लिखे नाम को देखे जा रहा था...! आकस्मात दो बूंद आँसू उसकी आँखों ढुलकी और...टप...टप...'धुरिया' पर गिर पड़ी…! लिखी धुरिया मिट गयी.…लेकिन उसकी यादों से भी क्या वह मिट पाएगी..... 
        
       ‘अरे धुरिया...! अरे भाई...! सुनती हो...!                        
       तब-तक धुरिया मिट्टी-सने हाथ ले कर सुखई के सामने हाजिर हो गयी, सुखई उसका पति है उम्र लगभग यही कोई पैंतीस-चालीस के बीच होगी लेकिन चेहरे और शरीर से लगता है कि जैसे वृद्धावस्था झलकने लगी हो...! धुरिया जो उसकी पत्नी है, उसकी उम्र भी यही कोई पैंतीस वर्ष के आस-पास होगी लेकिन चेहरे पर परिश्रम जनित ढुलकी पसीनें की बूदें एक अजीब सा आकर्षण पैदा कर रही थी.…शायद इसी परिश्रम के कारण उसके सुगठित देह के आगे उसका पति बूढ़ा नजर आता था। 
       थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए वह अपने पति से बोली,
       “हाँ...तो...बोलो क्या बात है...इतना जोर-जोर से चिल्ला रहे हो...।”
      “अरे...नाराज क्यों होती हो...मैं तुम्हें एक बात बताने के लिए बुला रहा था...” सुखई जैसे पत्नी से चापलूसी के अंदाज में बोला।
       “अरे..सुनूँ तो...अब कौन सा जग जीते हो....?” धुरिया माथे पर ढुलक आई पसीने की बूंदों को मिट्टी सने अपने दाहिने बाँह से पोंछते हुए पूँछा।
      
       लेकिन सुखई इस बीच खैनी मलने में मशगूल हो चुका था..इधर धुरिया को पति से अपना उत्तर पाने में कुछ क्षण का बिलम्ब लगा तो वह पुनः बोली,
       “जल्दी बोलो...झोपड़ी में मिट्टी लगा रही हूँ..ठीक से टाटी भी तो नहीं बांधे हो...बाहर से सब दिखाई देता है...उसी टाटी पर अब मिट्टी लीप रही हूँ..।” 
       धुरिया ने जैसे एक ही सांस में सारी बातें कह डाली।
       
       खैनी को अपने होठों और दाँतों के बीच दबा कर हाथ झाड़ते हुए सुखई थोड़ा गर्वित भाव से बोला,
       “अरे..मेरी मालकिन...! अब हाथ धो लो...मिट्टी नहीं पोतना पड़ेगा..।”
       “ऊ काहे...! का कोनऊ महल बनवा दिहे हो का...जो इतना इतराई के बोल रहे हो..!” 
        वहीँ पास पड़ी बाल्टी में हाथ धोते धुरिया ने कहा। 
       
        “हां..समझो महलई बनवाय दिहे...” सुखई ने चेहरे पर थोड़ा मुस्कान लाते हुए कहा। 
       “अच्छा सुनो...बुझाओ मति...हम तुम्हारी तरह निठल्ली नहीं हैं...हमें काम पूरा करना है..।” यह कहते हुए धुरिया दिखावटी ही सही लेकिन जाने के लिए मुड़ी।
        तभी सुखई झिंलगे से खटोले पर बैठे हुए ही घुरिया की कलाई को पकड़ कर अपनी ओर खींचते हुए बोला,
       “पूरी बात तो सुनती नहीं..! पहले ही हमको निठल्ला बना दिया...!” धुरिया को खटोले के पायताने पर बैठाने का असफल प्रयास करते हुए सुखई ने कहा। 
       “छोड़ो मेरा हाथ..मैं बैठती हूँ...सुनाओ पूरी बात...” इधर-उधर देखते हुए वहीँ खटोले के पास ही जमीन पर बैठते हुए धुरिया ने कहा। 
       “खटोलवा पर तो बैठो..काहे भूँयी बैठ गयी...”
      “बड़े आए पलंग पर बैठाने वाले...! तीन महीने से इसकी पाटी टूटी रही तब नाहीं बनवाई दिहा..कैसौ हम पाटी बदलवाए..! और हाँ...अभी तक मूँज खरीद के नाहीं लाए कि ठीक से बिनि उठै..।”
       धुरिया जब अपनी यह बात पूरी कर रही थी तो सुखई उसको घूरे जा रहा था...फिर बोल उठी,
     “जल्दी बताओ का बतावत रहा...आज कलेवा भी नहीं बचा था..और दिन चढ़ा आवत हैं..चूल्हा भी जलाना है।"
     
      सुखई ने जमीन पर बैठी धुरिया के और करीब अपने खटोले को खींच लिया..फिर बात करने का ऐसा अंदाज बनाया जैसे पत्नी से किसी गंभीर मंत्रणा में लीन हो गया हो...! और उधर उसकी टूटी-फूटी झोपड़ी के सामने वह छोटा सा नीम का पेड़ और उसकी छाया में बैठे वे दोनों... उस नीम के पेड़ से झरती सूर्य की किरणे उन दोनों पर पड़ रही थी...मानो वह नीम का पेड़ उन दोनों को छाया देने के अपने भरसक प्रयास में हो.…लेकिन असफल..! ...वहीँ पास में ही खूंटे से बधी गाय सामने पड़ी हरी घास को चबाये जा रही थी.... दूर से उन सब को देखने से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई चित्र खिंचा हो और किसी ने उस चित्र को एक फ्रेम में जड़ दिया हो..! दोनों आपस में बातें करते जा रहे थे..। 

      “हे धुरी, सुनो तो..., अबकी बार आपन कालोनी पक्की होई गई..”
      सुखई ने जैसे पत्नी के कान में कहा हो..जब सुखई को पत्नी के प्रति प्यार उमड़ता था तो वह उसे ‘धुरी’ कह कर सम्बोधित करता था। 
      पति-पत्नी के इस वार्तालाप में कालोनी शब्द का प्रयोग सरकारी योजना में गरीबों को मिलने वाले इंदिरा आवास के लिए किया जा रहा था...
     “देखो हमका भरमाओ मत..कई बार कह चुके हो ई बात..लेकिन अभी तक कुछ पता नाहीं चला..और हाँ.…अब अपनी पराना भी सयान हो रही है।" धुरिया ने धीमे स्वर में थोड़ा गंभीर होते हुए कहा। 
        “देख धुरी...हमको भी यही चिंता है..अपनी पराना की शादी तक कम से कम हमारी कालोनी बन जाय..दुवरा के समय शोभा बन जाई..! हाँ अपने टीन्कुआ का चिंता नहीं है...बड़ा होई त कमाई खा लेई...।” मुँह में लिए खैनी को थूकते हुए सुखई ने कहा। 
        “लेकिन ई बताओ कहाँ हमरे सब के पास पांच हजार रुपिया है कि कालोनी मिलि जाई..!और हाँ..उस चित्तू परधान के धोखे में मत पड़ा...वह बड़ा फरेबी है.…रजनी और कैलासी हमसे बतावत रही कि परु के अषाढ़ में ऊ चित्तू परधान उनसे पांच-पांच हजार रुपिया कालोनी बदे लेहे रहा लेकिन आज तक उनका कालोनी नाहीं मिली...।” धुरिया ने पति को सलाह देने के अंदाज में अपनी बात पूरी की। 
        “देख...! सब बात झूठ है...! परधान के चचेरे भाई इसकी शिकायत बीडीओ साहब से तो केहे रहे..! मुला जाँच के समय सब एफैडेविट भी तो दिहिन कि परधान हमसे पईसा नाहीं लिए हैं...शिकायत झूँठ है और...सब राजनीति है..., चुनाव हारे क शिकायत है..।” सुखई ने धुरिया की ओर देखते हुए कहा। 
       “सुना...कौन आपन सिर फोड़ाई..! अच्छा ई..बताओ कैसे कहते हो कि कालोनी पक्की हो गयी..।” धुरिया ने पति के हाथों पर अपने हाथ रखते हुए बोली। 

          *                                           *                                              *                                            *
        
        हाँ.. सुखई एक मजदूर ही तो था... लेकिन परिश्रम वाले काम से भागने की कोशिश करता था...उससे कोई भी लगातार दो घंटे फावड़े चलाने का काम नहीं ले सकता.. और वह करता भी नहीं था..! गाँव के कुछ बड़े लोगों के यहाँ वह अकसर ही पहुँच जाया करता था और उनके छोटे-बड़े काम जिसमें शारीरिक श्रम की आवश्यकता कम होती थी, कर दिया करता था...बदले में उसे कुछ मिल भी जाता था। इसी से उसका जेब खर्च चलता रहता था..., इधर धुरिया खेतों में मजदूरी कर घर का खर्च चलाती थी.., और उधर सुखई को पीने की आदत भी लग चुकी थी इसके लिए वह धुरिया से कभी-कभी पैसे माँगता था।
      ....लेकिन आजकल उसे परिवार की ज़िम्मेदारी का अहसास हो रहा था.., क्योंकि जब से उसने चित्तू परधान के मुँह से गाँव में कालोनी आने की बात सुनी थी तबसे वह इसी उधेड़बुन में पड़ा रहता कि कैसे कालोनी की चयन-सूची में उसका नाम सम्मिलित हो जाय...
      ....अकसर सबेरे-सबेरे ही वह चित्तू प्रधान के घर पहुँचने लगा था...उनके छोटे-मोटे काम करता और उनका मुँह ताकते इस इन्तजार में उनके घर दिन चढ़े तक बैठा रहता कि कब चित्तू प्रधान उससे कोई काम के लिए कहें और वह दौड़ कर उसे करे....खैर वह अपनी कालोनी के लिए किसी तरह से चित्तू प्रधान को प्रभावित करना चाहता था...चित्तू वास्तव में प्रधान तो नहीं थे लेकिन आज भी इस गाँव की प्रधानी वही करते हैं.…प्रधान तो उनका पुराना हलवाहा हैं.…हाँ.…कई वर्षों बाद अबकी बार वह प्रधानी का चुनाव आरक्षण की वजह से नहीं लड़ पाए थे.…! खैर इससे उनको कोई फर्क नहीं पड़ता...प्रधानी तो अब भी वही कर रहे थे...! शायद इसी कारण गाँव वाले उन्हें परधान कह कर अब भी पुकारते हैं.…। 
      .....अभी हाल ही में चित्तू प्रधान के लड़के का तिलक था...बहुत बड़े भोज का आयोजन किया गया था...कैसे सुखई ने दौड़-दौड़ कर जूठे पत्तलों को उठाया था..और तो और उसने अपने टिंकू को भी इस काम में लगा लिया था..और पत्तलों को उठाते समय अपने टिंकू पर इसलिए चिल्ला पड़ता था कि यह सब काम करते समय चित्तू प्रधान की नजर उस पर पड़ जाए....एक इंदिरा आवास के लिए वह प्रधान को हर तरीके से प्रभावित करना चाहता था...!
      ......दो दिन पहले ही चित्तू प्रधान के लड़के की शादी हुई थी.. उस शादी में भी तो उसने खूब काम किया था..!

     आज प्रधान ने सुखई को अपने घर बुलाया था..! सुखई मुँह अँधेरे ही उनके घर पहूँच गया था..जानवरों को चारा-पानी देने के बाद वह वहीँ चबूतरे पर बैठ कर चित्तू प्रधान का इंतजार करने लगा था...वह अपने कालोनी के सपनों में खोया हुआ था...तभी उसके कानों में चित्तू की आवाज पड़ी,
     “क्यों रे सुखइया.. इतना तिलक-बियाह हुआ लेकिन तुम्हारी लुगाई नहीं दिखाई पड़ी...तुम भी बड़े आदमी बन रहे हो का.…!” चित्तू प्रधान वहीँ बड़ी सी चारपाई पर बैठ सरौते से सोपाड़ी कतरते हुए बोले। 
     “नाहीं परधान जी...अइसन बात नाही है.. बात ई है कि धुरिया बिमार पड़ गयी थी...” अचानक इस अप्रत्याशित प्रश्न पर सुखई चबूतरे पर से उतर कर एक ईंट ले चित्तू परधान की चारपाई के पास जमीन पर बैठते हुए बोला। 
      “अभी तो चार दिन पहले मैंने उसे विक्रम के खेत में गेहूं काटते हुए देखा था..! तुम कहते हो बिमार हो गयी थी..! तुम ससुरों को हर बात में झूठ बोलने की आदत होती है..!” प्रधान ने स्वर में बनावटी तल्खी लाते हुए कहा। 
     “अरे...नाहीं परधान जी..घर में उस दिन कुछ नहीं था..इसीलिए मजदूरी करने चली गयी थी..।” इतना कह वह चुप हो गया और चित्तू परधान का मुँह देखने लगा। 
     “त का हम बेगार कराते हैं...? हम तो इसलिए पूँछ रहे हैं कि वह आती तो परजौटी धोती-वोती पा जाती...उस दिन खेत में हमने उसे काम करते हुए देखा था..! पीठ पर उसकी धोती फटी थी...मैं तो इसीलिए कह रहा था..।”
      इस वाक्य को पूरा करते ही चित्तू प्रधान सुखई की ओर देखने लगे जैसे सुखई के चेहरे का भाव पढ़ रहे हों..और इधर सुखई चित्तू प्रधान की बात सुन अपने निचले होठ को दांतों से दबाने लगा.. ‘पीठ पर उसकी धोती फटी थी..’ यह वाक्य उसके कानों में गरम शीशे की तरह पिघल रहा था...! लेकिन वह मौन था कुछ बोला नहीं। 
     
     “अरे..! क्या सोच रहे हो सुखई...!” चित्तू की आवाज उसके कानों में पड़ी.…। 
     “आज आप बुलाए रहे परधान जी..?” उसने धीमें और दबे स्वर में पूँछा। 
     “हाँ..अच्छा याद दिलाया..बात यह है कि तुम कई दिन से कालोनी के लिए कह रहे थे न! उसी के लिए तुमसे बात करनी थी।” चित्तू प्रधान ने उससे कहा। 
       वह आशंकित मनोभाव से प्रधान की ओर देख रहा था...
      “तुम तो जानते हो ऊपर कुछ लिए-दिए बिना काम नहीं होता...! कम से कम पाँच हजार तो देना ही होगा..” “और हमीं को ऊपर जाकर कालोनी-फालोनी पास कराना पड़ता है, बीडीओ बिना कुछ लिए तुम्हारी कालोनी पास ही नहीं करेंगे...!” चित्तू प्रधान इतना कह कर चुप हो गए। 

        इधर सुखई सोच में पड़ गया...वह पाँच हजार कहाँ से लाए...! वह एक अजीब उधेड़बुन में फंस सा गया था...बाप रे..! पाँच हजार..!! उसके आँखों के सामने जैसा अँधेरा छाने लगा था...तभी उसे हरखू परधान दिखाई दिए...

       हाँ...वह हरखू को हरखू परधान ही कहता है...हरखू वास्तव में इस गाँव का प्रधान है...लेकिन गाँव वाले उसे केवल हरखू के नाम से पुकारते हैं...सुखई ही केवल ऐसा है कि उसे ‘हरखू परधान’ कह कर सम्बोधित करता है...कारण सुखई की हरखू से छनती खूब है..! दोनों अकसर शाम को ठेके पर भी चले जाते हैं...और पिनक में हरखू अकसर सुखई से यह जताना नहीं भूलता कि वह इस गाँव का परधान है....शायद इसी कारण सुखई उसे ‘हरखू परधान’ कह कर ही बुलाता है..बाकी गाँव के लोग ‘हरखू’ या फिर ‘हरखुआ’ ही पुकारते हैं.. 
        हरखू को देखते ही सुखई ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा,
    “राम-राम हरखू परधान...” कहते हुए उसकी निगाह चित्तू प्रधान की ओर घूम गयी...इधर चित्तू उसे आग्नेय नेत्रों से घूरे जा रहे थे...हरखू भी सुखई के द्वारा किए गए इस आकस्मिक अभिवादन पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न कर सका..! सुखई को अब तक अपनी गलती का अहसास हो चुका था...उसने अपना सिर झुका लिया...तभी कानों में उसे चित्तू की आवाज सुनाई पड़ी,
    “अरे...हरखुआ..! तू..त..हरखू परधान हो गया है रे..! ई सुखइया को एक ठो कालोनी चाहे तो दे दो...!”
     चित्तू प्रधान ने तीव्र व्यंग्यात्मक लहज़े से कहा। 
    “अरे मालिक काहे हमका शर्मिंदा कर रहे हैं..” हरखू ने दोनों हाथ जोड़ा और लगभग मिमियाते हुए कहा। 
       “नाहीं...ई सुखइया आज कल राजनीति कुछ ज्यादै सीखि गवा है।” चित्तू अब भी सुखई को घूरे जा रहे थे। 
      
      सुखई को वहाँ का वातावरण अब बोझिल सा प्रतीत होने लगा था...इतनी समझ उसमें थी ही...लेकिन एक बार अपनी आशा को पुनर्जीवन देते हुए उसने कहा,
      “परधान पाँच हजार हमसे बाद में ले लिहा...हमार कालोनिया पास कराय दो..हम आप का बहुत सेवा करेंगे।” कातर भाव ले सुखई ने कहा। 
         चित्तू ने एक बार फिर सुखई को घूरते हुए देखा...सुखई अपनी नजरे नीची किए रहा...जैसे उसने कोई अपराध किया हो...
      “पाँच हजार बाद में ले लिहा...! का कहूँ सेंध फोरबे का..कि बाद में ले लिहा...!!” इधर सुखई के लटके चेहरे को देख कर चित्तू फिर बोला,
       “अच्छा चलो..तुम्हारे लिए इतनी छूट मैं दे देता हूँ....बताओ मानोगे...?” कहते हुए गूढ़ निगाहों से चित्तू ने सुखई की ओर देखा...|

      “अरे परधान...! बतावा काहे नहीं मानेंगे..! आज तक आपने जो कहा..का..नहीं माना...!” मरता क्या न करता वाली स्थिति में चित्तू को ज़बानी ही सही पालिश लगाते हुए सुखई ने कहा..| ..उसके चेहरे पर थोड़ी चमक अवश्य लौट आई थी...!

     वास्तव में जो काम-चोर और परिश्रम से भागने वाले मुफ्तखोर होते हैं उनकी मानसिक स्थिति ऐसी ही होती है वे शायद इन्हीं मनःस्थितियों में ही अपना विजयोल्लास मना लेते हैं...

     “चल बड़ा आया मानने वाला...ऊ तुम्हार घरवाली हरदम ऐंठी ही रहती है...” कहते हुए चित्तू की रहस्यमयी निगाहें जैसे सुखई के चेहरे को टटोल रही हो। 

    सुखई चित्तू के कहे इस अप्रत्याशित वाक्य के लिए तैयार नहीं था...सुखई की असहजता उसके चेहरे से झलक रही थी...

     चित्तू खिलाडी था...सुखई की असहजता को भांपते हुए बोला,
     “तिलकिया के पहले गेहूं झारइ के लिए तुम्हरे लुगाई के बुलवावा रहा...बहाना बनाइ के कहा दिया कि हम खाली नहीं हैं...तुम अहसान करने लायक मनई तो हो नहीं..! लेकिन चलो तुम बहुत मेहनत किए रहे तिलक में! इसलिए तुम्हारे लिए कुछ तो करना ही पड़ेगा..” चित्तू ने सुखई को जैसे अपने अहसान के बोझ तले दबा दिया हो। 

      “अरे परधान आपका ई किरपा हम कभी न भूलेंगे...” सुखई ने अपनी बात अभी पूरी भी नहीं की थी कि चित्तू ने कहा,

       “किरपा-उरपा नहीं...तुम्हारे लिए बस हम इतनी छूट दे रहे हैं कि...” कहते हुए चित्तू अचानक चुप हो गया...और हरखू.., जो उन दोनों की बाते चुपचाप बैठे हुए सुन रहा था उसकी ओर मुखातिब होते हुए बोला,
      
       “का..हरखुआ..! यहाँ बैठे का राजनीति बूझ रहे हो...! जाव नहरा आई गया है..बेहन के लिए खेत तैयार कर...बैठे-बैठे बात सुन रहा है...!” कतरे हुए सुपाड़ी को मूँह में डालते हुए चित्तू ने कहा|

       “सुनो सुखई..! तुम्हारे लिए छूट ई है कि तुमसे पांच हजार रुपिया कालोनी का पैसा आ जाए के बाद लेंगे...और हाँ...वहीँ बैंकई में ले लेब...तब आनाकानी तो नहीं करोगे..”
       और चित्तू ने अपने इस वाक्य को पूरा करने के साथ ही हरखू को पुकारा जो अब-तक उन दोनों से कुछ दूर जा चुका था..
       “हे हरखू..इधर लौट आव..याद आई गा..पतरौल बताए थे..नहरा तो काल्हि आए..”
       इधर सुखई चित्तू की बात पूरी होता इसके पूर्व ही अपने दोनों हाथ चित्तू की जाँघों पर रख उसे दबाते हुए बोला,
        “अरे परधान...! ई कौन बड़ी बात..हम तुरंत निकालि के दे देब..”
        “चलो-चलो हटो ज्यादा चापलूसी मत करो...हम समझते हैं..!” चित्तू ने सुखई को अपने से परे हटाते हुए कहा|

       इस बीच वहां हरखू लौट आया था...उससे मुखातिब होते हुए चित्तू परधन बोले, “हरखू पिंकू की अम्मा से एक-ठो परजौटी जनानी धोती त माँग लियावा..” पिंकू की अम्मा शायद चित्तू की पत्नी थी..|
     
       “सुनो सुखई..तुम्हार नाम.. हम कालोनी के लिस्ट में डलवाई दिए हैं..और बीडीओ साहब के यहाँ से मंजूर भी होई गया है..बस..ऊ अपने लुगाई के नाम से एक-ठो खाता खुलवाय लो और हाँ..एक-दो दिन में ई खाता जरूर खुलि जाय..” चित्तू सुखई को जैसे समझा रहा हो और सुखई सिर हिला-हिला कर अपनी मौन स्वीकृतियाँ देता जा रहा था..
       
      वास्तव में व्यक्ति जब परिश्रमी नहीं होता तो उसकी संवेदनशीलता की शक्ति सीमित हो जाती है... और... चीजों को वह ठीक से समझ ही नहीं पाता... ऐसा व्यक्ति यदि स्वार्थी भी हो तो उसकी सीमित-बुद्धि सामने वाले व्यक्ति को ही मूर्ख समझने लगती है...और सामने खड़े व्यक्ति को वह पहचानने में भूल कर बैठता है...यहाँ सुखई की मनोदशा कुछ ऐसी ही है...उसकी सीमित-बुद्धि चित्तू को नहीं समझ पा रही है...!

     हरखू अब तक परजौटी धोती लेकर आ चुका था.. “ई लेव मालिक...” कहते हुए हरखू ने थैले को चित्तू के सामने रख दिया..और तखत पर जाकर बैठ गया...कभी-कभी उसे अपने असली परधान होने का बोध भी हो जाता है...हालाँकि चित्तू के सामने वह तखत पर नहीं बैठता...चित्तू ने उसे घूरा...बोला कुछ नहीं...! सुखई अब भी वहीँ भूमि पर ईट पर ही बैठा था...उसकी नज़र थैले पर जम गयी थी...! तभी उसके कानों में चित्तू परधान की आवाज सुनायी पड़ी..
      “देखो तुम्हारी घरवाली पर यह साड़ी खूबे जंचेगी...लई जाव...कह देना यही पहन कर पास-बुक में लागै वाली फोटू खिंचाने जायेगी...समझे...!” चित्तू ने जैसे ‘समझे’ शब्द पर अधिक बल देते हुए कहा हो..|
       आदमी की आँखों पर चाहे जिस चीज का पर्दा पड़ा हो..और चीजों को देखने का उसका जो भी नजरिया हो लेकिन उसकी अंतरात्मा एक क्षण के लिए ही सही उसे सही पक्ष दिखाने का प्रयास अवश्य करती है...बस..! उसे हम समझ नहीं पाते..और...वह पल गुजर जाता है..!
      
       सुखई के लिए वैसे तो यह पल खुश होने के लिए था...क्योंकि उसकी कालोनी मंजूर हो गयी है...लेकिन यह साड़ी ले या न ले यह सोचते हुए वह पशोपेश में पड़ गया...क्योंकि..धुरिया ने एक बार बातों ही बातों में उससे कहा था,
       “हमैं किहू का अहसान न चाहे...और फिर ये बड़े लोगों के अहसान के पीछे बड़इ राज रहता है...जानते हो...ये अहसानइ इसीलिए करते हैं कि हम इनके चंगुल में फसे रहे और ए आपन मनमानी कर सकें..”
       “अरे..,का सोच रहे हो सुखई...!” कहते हुए चित्तू ने जैसे सुखई को झिझोड़ा..!
       “कुछ नहीं परधान...!” सुखई ने कहा...और यह सोचते हुए साड़ी लेने के लिए हाथ बढ़ा दिया कहीं साड़ी न लेने से चित्तू नाराज न हो जाए और उसे कालोनी मिलना फिर से खटाई में पड़ जाए..!

             *                *                 *                  *

        “देख धुरी..! चित्तू परधान कहत रहे कि बीडीओ साहब ने आपन कालोनी पक्की कर दी है..” सुखई ने पत्नी के चेहरे पर गंभीर दृष्टि डालते हुए कहा..जैसे पत्नी की प्रतिक्रिया पढ़ने की कोशिश कर रहा हो..|
        “हूँ...तो तुम चित्तू परधान के घर से आई रहे हो...!” जैसे कुछ सोचते हुए धुरिया बोली..
        “हाँ उनहिं के इहाँ से आ रहे हैं..” सुखई को अपनी पत्नी की प्रतिक्रिया का कोई डर रहा हो इसी से उसने धीमी आवाज में कहा
        “लेकिन एक बात है...एहमें चित्तू परधान के एहसान मत मानों..कालोनी बीडीओ साहब मंजूर किए हैं... और याद है...? हमहूँ तो..बड़के साहब से कहे रहे...!” धुरिया ने जैसे पति को समझाया हो|

        फिर सुखई धुरिया को समझाने का प्रयास करने लगा कि कैसे चित्तू परधान के प्रयासों से ही बीडीओ ने कालोनी मंजूर की है..और वह पाँच हजार चित्तू परधान को कब देगा इस बात को भी उसने धुरिया को बताई...लेकिन इन सब बातों को सुनने के बाद भी धुरिया ने सुखई से कहा,
        “अरे.. एक बार बीडीओ साहब से जाई के मिलि लो न..और पूँछ लो कि कालोनी कैसे मंजूर हुआ है...तुमको कहीं चित्तू भरमा रहा हो तो....? नाहक ही पाँच हजार देना न पड़े..!”
       
        “देख धुरी..तू समझती नहीं...! चित्तू परधान इतने छोट आदमी नहीं हैं...की हमसे पांच हजार के लिए झूठ बोलेंगे...! तिलकवा में उनके यहाँ बड़े-बड़े लोग आई रहेन..अरे..ऊ दरोगा जी तो वहाँ पूरे समय खड़े ही रहे..और अपने बीडीओ साहब त उहाँ एक कोने में बैठे रहे और ऊ पलटुआ उन्हई घेरे रहा...उसे भी कालोनी चाहे..! और हाँ तहसीलदार साहब और डिप्टी साहब भी थे मुला वे जल्दी चले गए...बड़का साहब भी तो हाऊँ-हाऊँ करते आये थे...और ऊ आपन नेताजी भी तो आए रहेन जिनका हम सब ओटवा दिए थे...उनके दुआरे गाड़ी पर गाड़ी ताँता लगा रहा..! अब तू ही बता...! का मामूली आदमी हैं चित्तू परधान..! साहबन का भी बड़ा-बड़ा खेल होत है..बिन पैसा लिए कालोनी पास न हुआ होए..!”

     सुखई द्वारा चित्तू के इस बड़ेपन के वर्णन से धुरिया निरुत्तर सी सोच में पड़ गयी..लेकिन उसका मन पति की इस बात को मानने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था कि उसे कालोनी चित्तू के प्रयास से ही मिल रही है...उसने जैसे अंतिम प्रयास करते हुए चित्तू से कहा,
     “एक बार बीडीओ साहब से मिलई में का बुराई है..पता तो चल जाएगा कि कालोनी कैसे मिली है...?”
      पत्नी की इस बात को सुनकर सुखई कुछ क्षण के लिए चुप हो गया जैसे वह कुछ सोचने लगा हो..लेकिन अगले पल ही पत्नी धुरिया से झल्लाते हुए बोला,
     
       “देख धुरिया तू बात समझती नहीं...बीडीओ साहब से मिलई में का बुराई है...! समझती तो यह न कहती...अरे..चित्तू परधान को पता चल जाए कि हम बीडीओ साहब से मिलई गए थे..तो कालोनी मिलना तो दूर घर से निकलब-बैठब अपाढ़ हो जाई...वैसे भी ओ तुमको नेताइन मानत हैं...तुम्हई कुछ याद भी रहता है..? बड़के साहब के सामने तनिक बोल दिहे रहू..तो उसके बाद का हुआ था...? याद करो तीनई दिन बाद जब गईया के लिए परधान के खेतवा के मेंड़ से घास छीलत रहू तो ओकर ऊ दुनौऊ भतीजे आ गए थे...! ऊ छोटकी खाँची और खुरपिया दूनौ छीन लिए थे..और गरियाए ऊपर से रहे थे...कह रहे थे कि तुम मेंड़ ओदारत रहू...ऊ तो हम मिन्नत करके चित्तू परधान से खाँची-खुरपी फिर से कैसौ माँगे थे...!”

      सुखई ने अपनी बात पूरी की...और पत्नी के चेहरे पर नजरें गड़ा दी...दोनों के बीच एक प्रकार से सन्नाटा जैसा छा गया...अब वातावरण थोड़ा बोझिल हो गया था...आकस्मात धुरिया की आँखों से दो बूँद आंसू आँसू टपक गए..शायद उसकी आँखें भर आई थी..! पता नहीं यह पति की डाट का असर था या उस दिन की घटना का फिर से याद होना...हाँ उस दिन भी तो वह रोई थी..उसने क्या गलती की थी..फिर क्यों चित्तू परधान के भतीजों ने उसे गाली दिया था..? गाली ही नहीं दिया बल्कि कितने भद्दे तरीके से खुरपी छीनते समय छूने की कोशिश भी की थी उन दोनों ने...! इस बात को तो उसने पति से भी छिपा दिया था.. फिर उसने अपना आँचल उठाया और अपनी आँखें पोंछ ली..उसे अहसास हुआ कि सुखई उसके थोड़ा और करीब आ गया था..और सुखई की एक बाँह ने उसके कन्धों को घेर लिया था..और दूसरा हाँथ पत्नी के सिर पर पहूँच गया..जैसे उसके सिर को वह प्यार से सहला रहा हो...उसी प्यार भरे अंदाज में पत्नी के चेहरे पर आँखे गड़ाए सुखई बोला,
      “देख धुरी...हम सब समझते हैं...उस दिन मेरा खून खौल गया था..लेकिन हम का करते..? सोच कर मन मसोस रह गए थे..फिर आपन ऊ पराना बिटिया और टिंकू का खियाल मन में आय ग..फिर हमहू चुप लगाय गए...आखिर इनहीं कैन में तो निकरई-बैठई की मजबूरी है..बस चिंता इतनी जरूर अहै कि कैसौऊ इज्जत-मरजाद बची रहै!”
      “हमका भी सबसे अधिक चिंता पराना और टिंकू का हैं..बाकी हमका आपन भी चिंता नहीं है..वइसे जैसे तुम उचित समझौ..|” धुरिया ने पति के हाथों को अपने से परे करते हुए कहा..|

      पति-पत्नी के बीच यह वार्तालाप चल ही रहा था कि गाय का पगहा पता नहीं कैसे खूँटे से निकल गया और गाय वहीँ पास ही में हरी घास चरने के लिए लपकी...उसके आगे गाँव के बड़े जमींदारों के खेत भी थे जिसमें फसलें खड़ी थी..! एक अज्ञात भय से दोनों गाय पकड़ने के लिए भागे...गाय घास चरते-चरते कुछ दूर आगे बढ़ी....तब-तक सुखई ने उसका पगहा थाम लिया...इधर धुरिया पुनः खटोले के पास लौट आई...अकस्मात् उसकी निगाह वहीँ खटोले के पास जमीन पर पड़े पोलिथीन के थैले पर पड़ी..धुरिया ने उसे झट से उठा लिया और ध्यान से देखने लगी...शायद उसमें कोई छापेदार साड़ी थी..! उसी समय सुखई गाय को पुनः खूँटे से बाँध धुरिया के पास लौट आया..धुरिया के हाथों में उस थैले को देख वह थोड़ा सा अचकचा सा गया...तभी धुरिया पति से पूँछ बैठी,
       “एहमें का है... कहाँ पाए..!”
       साड़ी को चित्तू परधान ने दिया था...यह बात बताने पर कहीं धुरिया भड़क न उठे इसीलिए अब-तक उसने साड़ी वाले थैले को धुरिया से छिपाए रखा था... ई..तो इस गाय के चक्कर में सब गुड़-गोबर हो गया नहीं तो देखा जाता..या जरुरत पड़ने पर बता देता...! अपनी यह धुरी भी तो गजब की है किसी का अहसान लेना पसंद नहीं करती..चाहे दुई घंटा अधिक ही खटना पड़े...और किसी की मुफ्त में दी गयी चीजों को लेने से हमेशा बचती रही है...उस पर यदि उसे पता चल जाए कि इस धोती को चित्तू परधान ने दिया है..तो गजब न ढा दे..! हाँ..यही कुछ सुखई के मन में चल रहा था..तभी..धुरिया की आवाज उसे फिर सुनाई दी,
      “अरे..हम पूँछत हैं कि इसे कौउन दिहेस..?”
      “चित्तू परधान के इहाँ से मिला है..उहई..परजौटी धोती है...जब ख्याल आई त आज दिए..जबकि उनके तिलके और बियाहे में हम कितना मेहनत किए रहे..!” सुखई ने बात को घुमाते हुए दूसरे अंदाज में कहा...और धुरिया की नाराजगी से बचने की कोशिश की..और इधर धुरिया कभी साड़ी तो कभी सुखई के चेहरे को देख रही थी..लेकिन वह कुछ बोली नही...फिर कुछ सोचकर शांतभाव से सुखई से बोली,
       “देखऊ..! तुम भी अपने को थोड़ा सा बचाया करो...कुछ काम-धाम करके अपने कमाई से अगर यह धोती लाए होते तो आज हम बहुतई खुश होती...ई परजौटी-सरजौटी का होत है...कौउन राजा कौउन परजा...! अबई भी तुम इस चक्कर में पड़े रहत हो...खैर...इसे धैदो उस कोने में...|”
      
       इस बीच बात करते-करते दोनों झोपड़ी में आ गए थे क्योंकि उनके झोपड़ी के सामने का वह छोटा सा नीम का पेड़ उन्हें छाया देने में अपने को असमर्थ पा रहा था..! और इधर दिन भी चढ़ आया था...सूरज का ताप भी जैसे उनके जीवन के ताप को बढ़ाने का मन बना रहा था..! अब इससे बचने के लिए उनकी यह टूटी-फूटी झोपड़ी ही एकमात्र सहारा थी...!
      
        जैसे सुखई के जान में जान आई...! उसने उस धोती के थैले को झोपड़ी के कोने में पड़ी एक छोटी सी बोरी के ऊपर रख दिया...इस बीच खटोले को धुरिया ने झोपड़ी में खींच लिया था...सुखई मुड़ा और आकर उस झिंलगे खटोले पर पुनः पसर गया..खटोले के पास ही खड़ी धुरिया से कहा,
       “अरे..इतनी बेर चढ़ आई कुछ दाना-पानी भी पूँछोगी या राजनीति ही बूझती रहोगी..”
       “हे..! टिंकू के बाबा...! राजनीति तो तुम सबेरे से ही बूझ रहे हो चित्तू परधान के घर से लईके इहाँ तक... औउर हमसे कहते हो कि हम राजनीति बूझ रहे हैं..! तुम्हरे राजनीति के चक्कर में चूल्हा तक नहीं जला...समझे..!” कहती हुई धुरिया कुछ दूर स्थित सरकारी हैण्डपम्प से पानी लेने चली गयी..

       कल ही पास-बुक में लागई वाली धुरिया की फोटो भी खीचाना है...पता नहीं धुरिया ई..चित्तू परधान की दी वाली धोती पहन कर फोटो खीचाने और बैंक में जायेगी या नहीं...यदि यह चित्तू की दी धोती न पहनी तो...? चित्तू वैसे भी पता नहीं क्यों धुरिया से चिढ़ता है..? कहीं और न बुरा मान जाए..? कहीं कालोनी मिलने में ही अड़ंगेबाजी न कर दे? वैसे भी बिना चित्तू के चाहे ई कालोनी मिल भी नहीं सकती..| ई..! चित्तुआ..स्सा....है बड़ा बदमाश...! मेरी धुरिया सही कहती है...फरेबी..कहीं का..! चुनाव में कितना बिरोध किए रहा अपने नेता जी का..! लेकिन नेतऊ जी ओकरे दुआरे तिलक में पहूँच गए थे..! लागत है सबई एकै थैले के चट्टे-बट्टे हैं...तबई हमार सबै का कोनौउ सुनवाई नही है...देखो तो...उस दिन तिलक में हम कितना मेहनत किए रहे...आटा मरदई से लेकर दोना पत्तल उठावै तक सभी काम तो किए रहे...लेकिन....
      
          लगभग रात के दस बज चुके थे...लेकिन इस तिलक समारोह में आनेवालों की भीड़ अभी कम नहीं हुई है...पाँत पर पाँत उठ और बैठ रही है..दोना-पत्तल उठाते-उठाते कमर दर्द करने लगा है..और हां भूख भी लग रही है...देखो टिंकू को भी अब नींद आ रही है...इस पाँत के उठाने के बाद अगली पाँत में वह भी बैठ कर खा लेगा...हालाँकि यहाँ बफर सिस्टम की भी व्यवस्था थी...वह पाँत में बैठ कर खाए या फिर..सुखई के मन में विचारों का ऐसा ही प्रवाह चल रहा था..
          उसे याद आया अपने बचपन का ऐसा ही एक दिन...! वह टिंकूआ से थोड़ा ही बड़ा रहा होगा...जब अपने पिता के साथ यहाँ आया था..तब इस आलीशान पक्की हवेली के स्थान पर एक कच्ची बखरी थी...! उसके पिता उसे लेकर ऐसी ही एक पाँत में खाने के लिए बैठ गए थे...उसे थोड़ा-थोड़ा याद है....लोगों के साथ पंक्ति में बैठ कर खाने की जिद उसी ने की थी...! शायद उसका मन रखने के लिए ही उसके पिता सबके साथ खाने के लिए ही पंक्ति में बैठ गए थे...
         हाँ... उसे अब भी अच्छी तरह याद है...! शायद वह चित्तू परधान के दादा ही थे...! चिल्ला कर बोले थे..अरे ओ..कतवरूआ..! ऊहाँ कहाँ बैठ गए रे..! चल उठ...! देख ऊ तोहन क पाँति बैठी बा..जे ऊहाँ बैठ...! उसके पिता और उसे वहाँ से उठा दिया गया था..! तब लोगों ने कैसे घूर-घूर कर उन्हें देखा था..कुछ तो हँस भी रहे थे..! उसके पिता को इस बात से बहुत अपमान पहुँचा था...कई दिनों तक तो वह घर से निकले भी नहीं...! वह बीमार से हो गए थे..! हाँ एक बात थी फिर कभी वह इस दरवाजे पर नहीं आए..!  
         अब पुनः अगली पंक्ति खाने के लिए बैठ रही थी..लोग बैठ चुके थे..सुखई ने सब के सामने दोना पत्तल रख दिया था...पलटुआ अलग से अपने विरादरी के साथ वाली लाइन में बैठा था...वहां भी उसने सबके सामने दोना पत्तल रखा..
           अरे..ई पलटुआ से तो वह ज्यादा ही साफ़ सुथरा रहता है..! हालाँकि यह पलटुआ भी उसी की विरादरी का है... हाँ...यह भी धुरिया का ही कमाल है..! साबुन तो घर में अकसर नहीं रहता फिर भी उसकी धुरिया... उसके कपड़े रेह से ही सही हमेशा साफ़ रखती है..! कुछ ऐसा ही सोचते हुए वह टिंकू को लेकर सब के साथ वाली पंक्ति के बीच के खाली स्थान पर जाकर बैठने की बात सोचने लगा था..अचानक पिता के साथ वाली घटना उसे याद आ गई...उसने धीरे से टिंकू की बाँह पकड़ी और पलटुआ के बगल में जाकर उसकी पाँत में बैठ गया...

      तभी कुछ खटका हुआ शायद पानी लेकर धुरिया आ चुकी थी... “इतनी देर कर दी पानी लाने में..?” सुखई ने पूछा|
     
     “ऊहीं नलवा पर पलटू क मेहरारू मिलि गई रहिन..और ऊहई कालोनी क बात करइ लागिन...|” धुरिया ने पसीने से तर-बतर अपने चेहरे को आँचल से पोंछते हुए कहा “बतावत रहिन कि..." हाँ आँचल से चेहरा पोंछते समय..पसीने से भीगे उसके कपड़े उसके शरीर से चिपके हुए थे... इसी समय सुखई की निगाह उसपर पड़ी...सुखई अपनी पत्नी को ध्यान से देखने लगा..
       
      वास्तव में मानव प्रकृति प्रदत्त भावनाओं को कभी भी अपने से परे नहीं कर सकता चाहे वह किसी भी सामाजिक, आर्थिक या बौद्धिक स्तर का क्यों न हो...! आदिम इच्छाएं शायद ही ऐसे किसी प्रतिबन्ध को मानने के लिए तैयार हों..? हाँ हम अपने बौद्धिक और नैतिक संचेतना से अपनी आदिम इच्छाओं को एक सीमा तक नियंत्रित कर सकते हैं....!
      
      फिर धुरिया तो सुखई की पत्नी ही थी...पत्नी के इस रूप को देखकर धुरिया में प्राकृतिक आदिम इच्छा जागने लगी..धुरिया एकटक पत्नी के ऊपर नजरें गड़ाए हुए था...पति को इस तरह देखकर धुरिया शरमा सी गयी और अपने आँचल को ठीक करते हुए बोली, “हटऊ..का देख रहे हो...” सुखई पत्नी के इस वाक्य को जैसे सुना ही नही...खटोले से उठते हुए पत्नी के सामने खड़ा हो गया..और पत्नी के चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए बोला... “धुरी.. तुम्हें देख रहा हूँ..रे..! हमार धुरी कितनी सुन्नर है..!”
       
     
                                               (कहानी अगले भाग में समाप्य)

बुधवार, 9 अप्रैल 2014

क्या ऐसा ही नहीं हो सकता...?

           
            उस दिन आफिस में मुझे काम करते हुए काफी देर हो चुका था...मित्र महोदय के घर भी उनसे मिलने जाना था... वे कई बार अपने घर न आने का उलाहना दे चुके थे...लेकिन आफिस का यह काम भी महत्वपूर्ण था क्योंकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के समक्ष बाल-श्रम के संबंध में की गयी एक शिकायत का उत्तर जो तैयार कराना था..।   
           खैर...किसी तरह काम समाप्त कर मित्र महोदय के घर गया था... मैंने दरवाजे की घंटी बजाई और दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगा... यह क्या..! दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करते लगभग चार-पांच मिनट हो चुके हैं लेकिन अभी तक मित्र द्वारा दरवाजा नहीं खोला गया था... ऐसा क्यों…! ऐसा पहले कभी नहीं होता था…! मित्र महोदय किसी के जाने पर बिना समय गवाए स्वयं दरवाजा खोलते थे और आगंतुक को स-स्वागत बैठक-कक्ष में स्वयं ले जाकर बैठाते थे...लेकिन आज अभी तक दरवाजा नहीं खुला...! मैं यही सोचने में तल्लीन था तब तक दरवाजा खुलने की आवाज सुनाई दी... मैंने अचकचा कर देखा कि साधारण कपड़ों में एक बालक दरवाजा खोल रहा था..., ऐं...ये क्या..! क्या मित्र महोदय ने कोई नौकर रख लिया है..? क्योंकि उनके लड़के को तो मैं पहचानता हूँ...और हाँ..लड़कों की उपस्थिति में भी तो वे स्वयं ही दरवाजा खोलते हैं..। एक बार बातों ही बातों में कहा भी था,
           "यार जब कोई मिलने हमारे घर आए तो वह हमें एक प्रकार से ऋणी बना जाता है…।"  
           मेरा ध्यान भंग हुआ…फिर मैंने उस लड़के से पूँछा,
           “तुम्हारे साहब नहीं हैं क्या..?”
           लड़के ने मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और मुझे यह कहते हुए अन्दर आने का इशारा किया "मैं उन्हें बता देता हूँ..." मैं बैठक-कक्ष में सोफे पर बैठकर मित्र का इंतजार करने लगा... तो…मित्र महोदय ने ये ठाट बना लिए हैं...! इस नाबालिग बच्चे को नौकर रख लिया हैं..! इसके यह पढ़ने का उम्र...! इसके नन्हें हाथों से काम लेते होंगे..! यह कैसा अहंकार उनमें आ गया…! 
         
           बैठे-बैठे मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आ गयी... मैं इसी बच्चे के उम्र का लगभग सात-आठ साल का रहा होऊँगा...मैं अपने दूर के रिश्तेदार के घर गया था...चार-पांच दिन तक रूका था... वहाँ मुझे दूर स्थित जलनिगम के नल से सुबह-शाम उनके घर तक पानी पहुँचाना होता था...कारण जलनिगम के उस नल में पानी सुबह-शाम ही छोड़ा जाता था... हाँ..उस समय मेरे दोनों नन्हें-नन्हें हाथों में पानी से भरी बाल्टी पकड़ा कर उसे घर तक पहुँचाने के लिए कहा जाता था..और किसी तरह मैं दोनों भरी बाल्टियों को घर तक ले जाता था...उस समय ऐसा लगता था जैसे मेरे हाथ कट जायेंगे.. इस बात का पता किसी तरह मेरे दादा जी को चल गया था... उस दिन वह सोंटा लेकर आये और उन लोगों को काफी खरी-खोटी सुनाते हुए मुझे घर ले आये थे...लगा था जैसे मुझे मुक्ति मिली हो.....। 
          इस घटना का जिक्र अभी कल ही तो मैंने अपनी पत्नी से उस समय किया था जब वे किसी मिलने वाले के घर से कुछ सामाजिक दायित्व निभा कर आयी थी। 
         आते ही उन्होंने मुझसे कहा,
         “बड़े अजीब हैं वे लोग...एक छोटे से बच्चे को नौकर रखे हुए हैं..!”
         “तो क्या हुआ..?” आकस्मात मेरे मुँह से निकल गया था..। 
        “अरे हुआ क्या..! एक नन्हीं जान से क्या-क्या कराओगे..? जैसे मेरे ऊपर झल्लाते हुए से उन्होंने कहा। 
         “नहीं यार मेरा मतलब यह नहीं हैं...क्या-क्या कराते हैं वे लोग उस बच्चे से...?” मैंने शांत भाव से पूँछा। 
         “सभी कुछ तो...ये करो-वो करो..बर्तन यहाँ रखो-वहां रखो...ठीक से क्यों नहीं धुला...इसके बाद डाट...इसे तो कपड़े भी ठीक से साफ़ करना नहीं आता...बड़ा कामचोर है... क्या-क्या बताऊँ क्या-क्या कराते हैं उस नन्हें बच्चे से...” पत्नी ने जैसे एक साँस में सारी बात कह डाली थी। 
         “क्या करोगी.. उस बच्चे के माँ-बाप गरीब होंगे दो जून की रोटी के लिए आखिर कुछ तो करना ही पड़ेगा...!” मैंने पत्नी के आक्रोश के भाव पर ठंडा पानी डालने के प्रयास में कहा। 
         “अरे ऐसे भी क्या दो जून की रोटी...! जो किसी मासूम की ज़िंदगी बरबाद कर दे...!” उन्होंने आक्रोशित भाव से ही कहा। 
         “और हाँ...मैंने देखा वह बेचारा बीमार भी था...फिर भी वे लोग उससे काम लिए जा रहे थे.…। ” पत्नी ने अपने स्वर में थोड़ा तल्खी लाते हुए कहा। 
         “कहाँ तक चिंता करोगी...? सबकी अपनी-अपनी मानसिकता होती है..।” जैसे मैंने उन्हें समझाया हो..। 
         “हाँ सही कहा..मुझे तो लगा उन लोगों ने नौकर अपनी आवश्यकता के लिए नहीं बल्कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिए रखा हो...जैसे उन्हें अपने बड़बोलेपन को दिखाना हो...एक अहंकार का प्रदर्शन...! हाँ…बात तो मानसिकता की ही है।” यह कह श्रीमती जी चुप हो गयी...फिर मैंने अपने बचपन की वही घटना उन्हें सुनाई थी..। 
         आचानक खटका हुआ...मैं वर्तमान में आ गया...देखा मित्र महोदय सामने की कुर्सी पर बैठ रहे थे...मुझे देखते हुए बोले,
         “क्षमा करना भाई मुझे देर हो गयी...आपको इंतजार करना पड़ा..।”
        “हाँ भाई...इंतजार तो करना ही पड़ा...।” मैंने कुछ व्यंग्यात्मक लहजे में कहा..। 
         पता नहीं उन्होंने मेरे इस लहजे पर ध्यान दिया या नहीं लेकिन छूटते हुए फिर बोले,
         “अरे यार... अभी तो पानी भी नहीं पिए मैं पहले आपको ठंडा पानी पिलाऊँ..।” कहते हुए वह उठने को हुए। 
         “अरे भाई बैठो... नौकर से बोल दो…पानी लेकर आ जाएगा..” कहते हुए मैंने उनको टटोला। 
         “नौकर..! कौन नौकर...!” उन्होंने जैसे आश्चर्य से मुझसे पूँछा हो..। 
         “अरे वही लड़का जिसने दरवाजा खोला था...।” किंचित अविश्वास भाव से मैंने उनकी ओर देखते हुए कहा। 
         “क्या यार...! तुम भी क्या से क्या समझ लेते हो...वह मेरा नौकर नहीं है...अभी बेचारा अपना होम-वर्क कर रहा है।” यह कह वह उठ कर चले गए..। 
         लौटे तो उनके हाथों में ठन्डे पानी का गिलास था...पीछे-पीछे उनकी पत्नी भी आयीं और एक प्लेट को टेबल पर रखा..हमारे बीच अभिवादन का आदान-प्रदान हुआ..पानी पीते हुए मैंने अधूरी वार्ता को पूरा करने के उद्देश्य से कहा,
         “तो वह बच्चा....”
         “अरे हाँ...वह बच्चा गाँव में ही मेरे पड़ोस का है...पढ़ने में इसकी बहुत रूचि है...लेकिन इसके पिता अभी से इसे अपने साथ खेतों में काम के लिए ले जाने लगे हैं...स्कूल का काम बेचारा रात में घर के सामने खम्भे में लगे बल्व की रोशनी में पूरा करता था..।” मित्र महोदय की यह बात समाप्त ही हुई थी कि बीच में उनकी पत्नी बोल उठी,
        “इनका दिल पसीज आया और जूनियर तक पढ़ाने की बात कह इसे यहाँ ले आये हैं...बच्चों के साथ यह भी हँसता-खेलता रहता है..इस समय वह अपने स्कूल का काम कर रहा है”
        मैं उन दोनों को बड़े ध्यान से देखने लगा...सोचा.. क्या ऐसा ही नही हो सकता..? तभी मित्र की आवाज कानों में गूँजी,
         “आज आपको काफी झेलना पड़ गया...”
       “इतने देर से भाई साहब बैठे थे और आप बाथरूम से निकलने में इतना देर कर रहे थे.. अच्छा चाय बना कर लाती हूँ!” कहते हुए वह उठ कर चली गयी..और मित्र महोदय मेरी ओर देखते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे...मैं झेंपते हुए सा सोचने लगा… राष्ट्रीय मानवाधिकार का उत्तर बनाने से लेकर मित्र के घर तक झेल ही तो रहा हूँ लेकिन अब सुकून के साथ..। 
                       ---------------       
                                                   ----विनय कुमार तिवारी