यह अकथ-मन ! यहाँ प्रश्नों और उत्तरों की टकराहटों में एक सार्थक दुनियाँ तलाशनें की आकुलता है...
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सोमवार, 30 अक्टूबर 2017
मैं किसी के जेब-वेब में नहीं रहती
शाम को आफिस से लौटकर अपने आवास में पदार्पण करते समय मैं मोबाइल फोन पर बात भी कर रहा था। बात समाप्त होने पर देखा, फोन के स्क्रीन पर श्रीमती जी का नम्बर दिखाई पड़ा, लेकिन मैंने काल पर प्रेस नहीं किया तथा फोन को वैसे ही, यह सोचते हुए, अपनी पैंट की जेब में रख लिया कि, अभी थोड़ी देर बाद रिलैक्स होकर फोन कर लेंगे। इसके बाद किसी काम में व्यस्त गया तथा फोन के बारे में भूल गया। कुछ क्षणों बाद मेरे कानों में एक महीन सी "हलो-हलो" की आवाज सुनाई पड़ी। यह आवाज मेरे जेब में पड़ी मोबाइल फोन से आ रही थी। देखा, श्रीमती जी की ही काल थी...मैं समझ गया कि मोबाइल के टच-स्क्रीन पर टच हो जाने से काल चली गई होगी।
जेब से फोन निकाला और मैं भी "हलो-हलो" करने लगा। उधर से श्रीमती जी की आवाज आ रही थी "तुम्हें मेरी आवाज सुनाई नहीं पड़ रही है क्या? इतनी देर से हलो-हलो कर रही हूँ...!" मैंने कहा, " नहीं..ऐसी बात नहीं..असल में यार! तुम्हारी आवाज मेरे जेब से आ रही थी.." मेरे इतना कहते ही वह तपाक से बोली, "सुनो! मैं किसी की जेब-वेब में नहीं रहती कि मेरी आवाज जेब से आएगी..!!" मैंने हँसते हुए कहा, " अरे भाई! तुम नहीं, मेरा मोबाइल मेरे जेब में था..जहाँ टच हो जाने से काल चली गई होगी ..मैं जानता हूँ..तुम जेब में नहीं रह सकती" खैर, इसके बाद हम दोनों एक साथ हँस पड़े थे।
मैं जानता हूँ, श्रीमती जी अपनी पत्नी की भूमिका के साथ-साथ एक स्त्री होने और इसके सम्मान के प्रति भी काफी सजग और संवेदनशील रही हैं, शुरू से ही मुझे इस बात का इल्म रहा है और इसी वजह से कभी-कभी वे पारिवारिक परिस्थितियों में असहज हो जाती हैं। खैर, फोन पर हमारी वार्ता समाप्त हुई तो मेरा ध्यान उस दिन की उनकी बात पर चला गया।
किसी छुट्टी के दिन जब मैं घर पर होता हूँ तो उनके किचन-टाइम पर मैं भी या तो टी.वी. पर न्यूज देखने या फिर मोबाइल में व्यस्त हो जाता हूँ। अकसर इस बात को लेकर हमारे बीच नोंक-झोंक भी हो जाती है। उस दिन मैंने अपनी इस ज्यादती को भाँप लिया और उनका साथ देने के लिए किचेन में चला आया। भृकुटी टेढ़ी कर उन्होंने मुझे देखा था, जैसे वे कहना चाहती हों, "मैं आपकी चाल समझती हूँ।" हाँ मेरी चाल उनकी डाट से बचने की ही थी, लेकिन वे बोली कुछ नहीं और इधर मैं वहीं किचेन की काली ग्रेनाइट वाले प्लेटफार्म के ऊपर पसर गया था। रोटी बेलते और सेंकते हुए श्रीमती जी हमें बताने लगी थीं..
"जानते हो...वह जो हमारे घर के पीछे के खाली प्लाट पड़े हैं न..कल जब मैं गैलरी में थी तो देखा, एक दुबली-पतली कृशकाय स्त्री वहाँ उगे झाड़ और पेड़ों से सूखी टहनियाँ इकट्ठी कर रही थी...वहीं जमीन पर बैठा एक पुरुष आराम फरमा रहा था...वह उस औरत का पति ही था और दोनों मजदूर ही थे...काफी देर तक, मैं उस औरत को देखती रही थी...अब तक अकेले ही वह औरत लकड़ियों का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर चुकी थी...उस गट्ठर को उसने यत्नपूर्वक अकेले ही बाँधा भी और वह औरत मुझे गर्भवती भी दिखी...मुझे उस स्त्री की, इस दशा पर अब तरस आने लगा था...और...इधर लकड़ियाँ तोड़ने से लेकर गट्ठर बाँधने तक उसका आदमी वहाँ बैठा रहा और उसने उस स्त्री की कोई मदद नहीं की थी..! मैंने देखा, उस औरत ने कपड़े की एक गुड़री बनाई और उसे अपने सिर पर रखा, फिर किसी तरह लकड़ी के उस गट्ठर को अकेले ही अपने सिर पर उठाकर रखा...यह सब मुझसे देखा न गया और उसके पास चली गई..."
रोटियाँ बेलते और सेंकते हुए ही श्रीमती जी ये बातें मुझे बता रही थीं। इस दौरान मैं ध्यान से उनकी बात सुन रहा था...बातें मुझमें उत्सुकता जगा रही थी। एक बात और, इस सुनने-सुनाने के बहाने हमारा साथ भी हो रहा था। इधर मेरी दृष्टि सिंकती रोटियों पर भी पड़ रही थी। रोटियाँ आँच पाकर फूलती और जैसे ही फूली रोटियों से भाप निकलता, वे धीरे से पिचक जाती...फिर आगे की बात बताई..
"जैसे ही स्त्री ने गट्ठर अपने सिर पर रखा..मैं उसके सामने खड़ी थी... मैंने उससे पूँछा, "तुम्हारे पेट में कितने महीने का बच्चा है?" उस स्त्री ने सकुचाते हुए बताया, "आठ...नहीं..नौ महीने का..!" आगे मैंने पूँछा, "तुम्हें जाना कहाँ है?" स्त्री का गंतव्य यहाँ से लगभग तीन किमी दूर पड़ता है..मैंने उसे डाटते हुए कहा, "उतार गट्ठर..तुरंत उतार.! तू यह गट्ठर नहीं ले जाएगी" स्त्री ने लकड़ी का गट्ठर अपने सिर से उतार कर जमीन पर रख दिया....
....इधर गुस्से से मैंने घूर कर उसके पति की ओर देखा, जो अब तक उठकर खड़ा हो गया था, मैंने पूँछा "क्यों..तू इसका पति है न?" उसके "हाँ" कहते ही मैंने उसे फिर डाटा, और कहा, "तू तो ठीक-ठाक है! और तू इसका पति भी है?...और...तुम्हारी यह पत्नी गर्भवती भी है न" अब वह सिर झुकाए मेरी बात सुन रहा था... मैंने उससे कहा, "तुम्हें शर्म नहीं आती...यह बेचारी गर्भवती है और कमजोर भी है...तब भी, इसने अकेले ही लकड़ियाँ तोड़ी और गट्ठर बनायी और अपने सिर पर भी रखा...तुमने कोई मदद नहीं की...इस हालत में बेचारी इतनी दूर तक लेकर जाएगी भी..!!" मैंने कहा, "यह नहीं ले जाएगी इस गट्ठर को...इसे तू ले जाएगा..! उठा इसे..! रख अपने सिर पर..!!" अब तक मेरी डाट से सहमा उसका पति गट्ठर को अपने सिर पर चुपचाप रख लिया था और आगे-आगे वह पीछे-पीछे उसकी वह स्त्री.. दोनों वहाँ से चले गए।"
पूरी बात ध्यान से सुन मैंने एक गहरी साँस ली और श्रीमती जी से मैंने बस इतना ही कहा,
"यार, गरीबी की स्थिति में और शारीरिक श्रम करने के कारण इन मजदूर टाइप के लोगों को अपनी संवेदनाओं को भी समझने का मौका नहीं मिलता होगा..!"
मेरी बात पर उन्होंने मुझे ध्यान से देखा और रूखे अंदाज में बोली, "रोटियाँ सिंक गई हैं, खाने की तैयारी करो" यह कहते हुए वे किचेन से बाहर जाने लगीं तो मैं भी उनके साथ पीछे-पीछे किचेन से बाहर चला आया...वाकई! चीजों को बहुत गहराई से समझने की जरूरत होती है।
इधर "नाक से सिंदूर लगाने" की बात पर मुझे ध्यान आया कि इस बात पर हमारे बीच बहुत पहले से ही चर्चा होती रही है। मैंने श्रीमती जी को मजाक में कई बार टोका भी है। ऐसे ही एक बार जब मैंने कहा, "यार, तुम सिंदूर नहीं लगाती, या लगाती हो तो बहुत कम...पता ही नहीं चलता..." इस पर उन्होंने कहा था, "देखिए, हमारा विवाह बचपन में ही हो गया था..तब मेरी दादी कहा करती थी..सिंदूर इस तरह नहीं लगाना चाहिए कि दिखाई पड़े..या फिर सिर को पल्लू से ढँके रहना चाहिए...सिंदूर लगाना दिखावे की चीज नहीं होती..इसे दिखावे की तरह नहीं लगाना चाहिए" आगे उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा, "तभी से मेरी यह आदत पड़ गई है और ऐसे भी, लोग अपनी प्रिय चीज को बुरी नजरों से बचा कर रखते हैं... नुमाइश नहीं लगाते...समझे..!" इसके बाद मैंने इस विषय पर उन्हें फिर कभी नहीं टोंका।
सच है रिश्ते प्रदर्शित नहीं किए जाते बल्कि रिश्तों को जिया जाता है, प्रदर्शन में तो खोखलापन छिपा होता है!
निडरता और जीवन की सार्थकता
"हम नौकरी-पेशा वाले न जाने क्यों पचास के पार थके-थके से लगने लगते हैं...लगभग स्थितिप्रग्य या कहें कि स्टैग्नेशन के अंदाज में! जैसे, जहाँ जाना था जा चुके, जहाँ से लौटना था लौट चुके हैं।" अपने पूर्व साथियों को देखते हुए मैंने उस दिन यही सोचा था..इनके चेहरों पर मुस्कुराहटें तो थीं..और..हँसी भी थी...लेकिन इनमें अब वह उल्लास दिखाई नहीं दिया था जो आठ-दस वर्षों पहले किन्हीं ऐसी ही मुलाकातों में दिखाई देता था।
घर पर आ मैंने श्रीमती जी से इसी बात की चर्चा की थी..वह मुझपर फटते हुए से बोली थीं, "अरे हाँ..सब आप की ही तरह गैरजिम्मेदार थोड़ी न होते हैं...सबको अपने परिवार की चिन्ता होती है...बस एक तुम्हीं हो, जैसे किसी से कोई मतलब नहीं.." हलांकि मैंने सफाई भी दी.. लेकिन एक स्त्री जिसका पति दूर नौकरी कर रहा हो और वह छोटी-बड़ी परिवारिक समस्याओं से अकेले जूझती रही हो तो, इस तरह उसका फटना स्वाभाविक ही है। मैंने सफाई दी "नौकरी भी तो, मैं परिवार के लिए ही कर रहा हूँ" लेकिन मेरी इस बात का भी उनपर असर होता नहीं दिखा।
खैर, जो भी हो..उम्र के पचासवें वर्ष के आसपास पहुँच कर हम जैसे नौकरी-पेशा व्यक्तियों के चेहरों और स्वास्थ्य पर जीवन के जद्दोजहद और उससे उपजे तनाव का स्पष्ट-लक्षण परिलक्षित होने लगता है, साथ ही पारिवारिक समस्याओं से भी दो-चार होना पड़ता होगा...अब तक आगामी जीवन और कैरियर की भी स्थिति स्पष्ट हो चुकी होती है..शायद यही कारण है कि इस अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते व्यक्तित्व से खनक गायब होने लगती है..और..एक नई औपचारिकता घर करने लगती है...
हो सकता है इसे पढ़ते हुए, कोई मेरी इन बातों से सहमत न हो, यही सोचते-सोचते कल की रात दस बजे जब मुझे नींद सताने लगी...तो सोचा...चलो जल्दी सो जाते हैं, जिससे सबेरे पाँच के आसपास उठना हो जाएगा और टहलना भी हो जाएगा, क्योंकि इधर डेढ़-दो महीनों से सुबह स्टेडियम जाकर टहलना बंद सा हो चुका है...फिर सुबह जाकर लगभग साढ़े चार बजे नींद टूटी...रात का किया हुआ संकल्प याद आ गया..और..स्टेडियम की ओर जाने की तैयारी करने लगा...
स्टेडियम की ओर जाते हुए मेरा ध्यान सड़क के किनारे खम्भों पर जलती लाईटों पर चला गया...वाकई! सुबह होने को आ रही है.. लेकिन अभी तक बल्बों से छिटक रही रोशनी के इर्द-गिर्द कीट-पतंगे मँडरा रहे हैं...मन ही मन सोचा, "ये बेचारे रात भर से ऐसे ही मँडरा रहे होंगे..वह भी बिना थके..रोशनी के प्रति इनका इतना प्रेम..!." कई जगह कवियों ने तो रोशनी के प्रति इन कीट-पतंगों के इसी प्रेम को देखकर कर अपनी कविताएँ रच डाली हैं..हलांकि ऐसी मुझे कोई कविता याद नहीं आई... नहीं तो यहाँ एक-दो लाईन जरूरत लिखता..पढ़ाई में रट्टू टाइप का न होने के कारण अपने को कोस बैठा..
टहलते हुए आगे स्टेडियम की ओर बढ़ा जा रहा था कि "चींपों-चींपों" की आवाज सुनाई पड़ी..! इतनी सुबह गधे की आवाज सुनकर मैं आश्चर्यचकित था...क्योंकि, एक दो वर्षों से यही मानते आया हूँ की हमारे देश में बहुत ही कम गधे बचे हैं...और अगर हैं भी तो खच्चर में, मतलब घोड़े के क्रासब्रीड हो चुके हैं... तब तक देखा, वह गधा दौड़ता हुआ मेरे पास से निकल गया....मैंने उसे ध्यान से देखा था...एकदम शुद्ध टाइप का गधा प्रतीत हुआ.. मेरे देखते-देखते उसके पीछे एक दूसरा गधा भी दौड़ते हुए निकल गया था...उसके दौड़ने की गति देख मुझे उसके गधे होने पर ही संदेह हो आया..लेकिन था वह गधा ही..अरे! पिछले चुनाव पर गधे को लेकर छिड़े विवाद को सोचकर मैंने इस विषय पर सोचने पर तत्काल विराम लगा दिया....तब तक मेरा पीछा कर रहे एक मासूम से पिल्ले की "बौ-बौ" की आवाज सुनाई पड़ी, पीछे मुड़कर देखा..उसे देखकर मैं मुस्कुरा उठा था...
स्टेडियम में इक्का-दुक्का लोग ही थे...इसका दो चक्कर लगाया और फिर लौट पड़े...लौटते हुए स्टेडियम में प्रवेश करते एक सज्जन दिखाई पड़े...मुझे याद आया..कई माह पहले ये किसी कार से अपने कुछ साथियों के साथ आते थे और चार-पाँच की संख्या में ग्रुप बना कर टहलते थे...और टहलते हुए इनकी हँसी के साथ जुमले सुनते हुए मैं अपनी #दिनचर्या के लिखने के विषय खोज लेता था.. आज इन्हें अकेला देख ग्रुप टूटने की सोच कुछ क्षण के लिए मन उदास हो गया...वाकई! जीवन में भी एक समय ऐसा ही आता है!!
खैर... मैं टहलने का अपना कोटा पूराकर स्टेडियम से लौट पड़ा था...सड़क बैठे गो-वंशो के झुंड के पास एक कुत्ते के जोरदार ढंग से भौंकने की आवाज सुनी...पास पहुंचने पर देखा! एक गधा बेचारा सड़क पर बैठे उन गो-पशुओं के झुंड के पास से उदासी भरे कदमों के साथ धीरे-धीरे दूर चला जा रहा था...वह कुत्ता उसी गधे पर भौंक रहा था और उसे गायों से दूर भगा रहा था.. उस कुत्ते की गो-रक्षा जैसी भंगिमा पर एक बार फिर मैं मुस्कुरा उठा था...!!
आवास पर लौट आया था... तुलसी की पत्ती और अदरक डालकर चाय बनाया..एक बार श्रीमती जी जब यहाँ आई थीं तो तुलसी के पौधे रोप गई थीं..आजकल ये तुलसी के पौधे छंछड़ कर काफी संख्या में हो चुके हैं और मैं भी सुबह की चाय में इनका बखूबी प्रयोग करता हूँ... तो यही चाय पीते हुए मैं अपनी यह #सुबहचर्या लिख रहा हूँ...
इधर अखबार भी आ गया है... पढ़ा, लेकिन क्या पढ़ा, इसकी चर्चा यहाँ नहीं करना चाहता.. वैसे भी लंबा लिख गया.. आप भी पढ़ते-पढ़ते ऊब रहे होंगे..
तो #चलते-चलते
एक जगह पढ़ा, सार्थक जीवन के लिए निडर होकर जिए..शायद जीवन का उल्लास इसी में निहित है....
मंगलवार, 26 सितंबर 2017
अकथ-मन
"वह खिलखिलाकर हँस रहा है...उसकी खिलखिलाहट के बावजूद उसकी माँ की आँखों में आँसू है...वह उठ कर बैठना चाहता है, पर बैठ नहीं पा रहा..माँ को देखता है...माँ के पास जाना चाहता है...कैसे जाए..उसे समझ नहीं...जब उसे उठना होता है, तो माँ ही उसे उठाती हैं...अब माँ के पास आने का मतलब समझने लगा है... माँ जब भी उसके पास आती है वह खिलखिलाने लगता है...उसे अच्छा लगता है.. उसकी आँखों में चमक आ जाती है.... माँ की गोंदी में वह वह कितना कुछ देख पाता है...! उसे नयी-नयी चीजें दिखाई देने लगती हैं...उसका मन करता है.. वह इन सब को ऐसे ही देखता रहे...लेकिन बिना माँ के यह सब संभव नहीं...आखिर ऐसा क्यों है...
अब वह कुछ-कुछ समझने लगा था..अरे! वह मेरी तरह ही है...लेकिन यह क्या! मैं उसके जैसा क्यों नहीं..ये मुँह में कुछ डाल रहा है..बिना अपनी माँ के..!! ये हाथ क्या होता है..? पैर किसे कहते हैं..? यह उसे नहीं बताया गया... माँ ने बताया था...मेरे मुँह है..आँखें हैं...कान है...सब मुझे ध्यान से देखते हैं... कुछ हँसते हैं... माँ मुझे देखती है... तो रोती है.... मैं माँ से बोलुंगा..."माँ मुझे देखकर तुम रोती क्यों हो..?" माँ ने कहा था, मेरे हाथ नहीं है...पैर नहीं है...मैं बिना हाथ पैर के पैदा हुआ था...वह इसीलिए रोती है...माँ का रोना कैसे बंद हो..!!
माँ उसे उसे बच्चों के बीच ले जाती है...उसे भी खड़ा कर देती हैं... लेकिन....उसे नहीं पता वह खड़ा है या बैठा है...
धीरे-धीरे अब वह समझने लगा है... माँ से कहता है "माँ मैं भी खेलना चाहता हूँ..." माँ उसे बच्चों के बीच छोड़ देती हैं...यूँ ही वह खुश हो लेता है...यही उसका खेलना हो जाता है...उसकी आँखों में चमक आ जाती है।"
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
मेरी बस-यात्रा
मुझे लगता है सरकारी बस सेवा मने रोडवेज बस पर चलना सुरक्षा और आर्थिक लिहाज से यात्रा का एक बेहतरीन विकल्प है। वैसे भी आजकल धीरे-धीरे सड़कों की स्थिति, खासकर प्रमुख शहरों को जोड़ने वाले मार्गों की दशा सुधरी है, मतलब फोरलेन या टू-लेन में परिवर्तित होते हुए स्मूथ टाइप का बन रहे हैं, यानी अब, चाहे बस की पिछली सीट पर ही क्यों न बैठें हों, आपको धचके नहीं लगेंगे। खैर..
इधर मैं बस-यात्रा के गुण गा रहा हूँ तो, वहीं इधर थोड़ा समय बचाने के चक्कर में बस-यात्रा वाली अपनी बात के उलट मैं दो-सवा दो सौ किमी की अपने कार्यस्थल की दूरी अकसर अपनी कार से, स्वयं ड्राइव करते हुए तय करने लगा हूँ। वैसे भी, मैं अपनी दो हजार चार माडल की जेन कार से बहुत प्रेम करता हूँ...क्योंकि अभी तक इस बेचारी मेरी कार ने मेरी ड्राइविंग की गलतियों का खामियाजा स्वयं अपने ऊपर भुगता है और हम पर आँच नहीं आने दिया है! भाई! इसीलिए तो हम कण-कण को चेतन मानते हैं...
हाँ तो, उस दिन मैं अपनी कार से नहीं था.. आधी दूर अपनी "वो वाली गाड़ी" से और शेष आधी यात्रा बस से तय किया था...बस कानपुर पहुँची रात के लगभग दस बज चुके थे...बस-अड्डे वाले रास्ते पर बस मुड़ते देख, मैं अपनी सीट से उठकर कंडक्टर के पास पहुँचा और कंडक्टर से पूँछा था, "क्यों कंडक्टर साहब..अगर यहाँ उतर जाएँ तो, यहाँ से इस समय लखनऊ वाली बस मिल जाएगी या नहीं?" बस-अड्डे तक न जाकर समय बचाने के लिए उधर से लखनऊ जाती बस को वहीं मोड़ पर पकड़ने का इरादा लिए मैंने बोला था। एक क्षण कंडक्टर ने मेरी ओर देखा और बोला, "नहीं साहब, इस समय इधर से बस नहीं गुजरेगी..झकरकट्टी से ही पकड़ लीजिए.. अब टाइम ज्यादा हो गया है।" मैंने कंडक्टर की बात मानी और उसके बगल में उसी की सीट पर बैठ गया था।
रास्ते पर पड़ने वाले चौराहों पर बस रूकती और यात्री उतर जाते...खाली होती बस देखकर जब कंडक्टर से मैंने पूँछा कि बस के लिए सवारी मिल जाती है या नहीं तो, कंडक्टर ने बताया था, "हाँ, मिल जाती हैं, बस-अड्डे पर तो नहीं लेकिन रास्ते में काम भर की सवारी हो जाती है, यहाँ बस-अड्डे पर सवारी का इन्तजार करते ही रह जाते हैं.. दूसरे दबंग कंडक्टर मेरी बस के आगे अपनी बस लगा कर सवारियों को अपने बस में बैठाने लगते हैं.. साहब, हम ठहरे सीधे आदमी, बोले तो झगड़ा कर बैठते हैं और गरियाने लगते हैं...इसीलिए बोलता नहीं, बस भगवान् भरोसे रहते हैं..रास्ते में बस को रोककर सवारी लेते हैं।"
कंडक्टर की सिधाई भरी मायूसी देखकर मैंने कहा, "हाँ, सरकार को भी चाहिए की बसों के चलने के बीच टाइमिंग फिक्स करे... एक ही रूट पर एक साथ दो-दो, तीन-तीन बसें निकलने लगती हैं, कम से कम इनके चलने के बीच पन्द्रह मिनट का अंतराल फिक्स कर देना चाहिए।" "लेकिन साहब इसपर तो कोई ध्यान ही नहीं देता.."इस बात पर मैंने कहा, "हाँ, यह तो ध्यान न देने वाली बात सब जगह है.. लोग अपने मतलब की बात पर ही ध्यान देते हैं।" कंडक्टर को मेरी इस बात पर आत्मीय दृष्टिकोण की झलक मिली तो वह कह बैठा, "साहब, हमी लोगों की हालत देखिए हम संविदा पर हैं..हमें एक रूपया छब्बीस पैसा प्रति किलोमीटर के हिसाब से दिया जाता है..।" मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए पूँछा, "महीने में कुल कितना मिल जाता होगा?" "अरे साहब यही कोई सात-आठ हजार के आसपास, इसी में बच्चों को पढ़ाना और किसी तरह परिवार का गुजारा करना होता है..!" मैंने अब उसकी ओर दया भाव से देखा था, इसके सिवा और कर भी क्या सकता था।
अपने प्रति मेरा दयाभाव भांप कंडक्टर ने मुझसे पूँछा, "साहब आप क्या करते हैं?" मैं बताना नहीं चाहता था और टालने की गरज से बोला था, "अरे कुछ नहीं बस हम भी ऐसे ही नौकरी करते हैं।" कई बार उसके कुरेदने पर बताना पड़ा। फिर वह बोला था, "साहब, आपके आफिस आकर आपसे मिलेंगे, भूलिएगा नहीं.." मैंने उसे आश्वस्त किया। तभी, लखनऊ की ओर जाती जनरथ की ओर इशारा करते हुए उसने कहा, " साहब, यह लखनऊ जा रही है आप इसपर बैठ जाइए।" मैं उस संविदा वाले कंडक्टर के बारे में सोचते हुए जनरथ पर सवार हो चुका था।
वाकई! जनरथ बस में बैठे-बैठे एसी की ठंडक में, मैं यही सोच रहा था इस देश की व्यवस्था सामान्यीकृत नहीं है.. व्यवस्थाएँ भी चीन्ह-चीन्ह कर चलती हैं।