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बुधवार, 25 मार्च 2026

अम्मा : स्मृति की अनंत परिधि



         मेरी गाड़ी घर के सामने आकर रुक गई थी, पर दरवाज़े पर अम्मा दिखाई नहीं पड़ीं। पहले ऐसा कभी नहीं होता था। मेरी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही वे दरवाज़े पर आकर खड़ी हो जातीं, जैसे मेरी राह देख रही हों। आज दरवाज़ा वैसा ही था, पर अम्मा नहीं थीं।

     मैं जानता था..अब गाड़ी की आवाज़ सुनकर अम्मा कभी दरवाज़े पर नहीं आएँगी।

     भारी मन से मैं गाड़ी से उतरा और दरवाज़े की ओर बढ़ा, पर कुछ कदम चलकर ही ठिठक गया। भीतर कहीं एक हूक-सी उठी। पहले होता तो सीधे जाकर दरवाज़े पर खड़ी अम्मा के पैर छूता और सामने पड़े तख़्त पर जा बैठता। पीछे-पीछे अम्मा भी अपनी प्लास्टिक की कुर्सी खींचकर तख़्त के पास ले आतीं। उसी कुर्सी पर बैठी वे मेरा हाल-चाल पूछती रहतीं।

       आज तखत भी वहीं था, कुर्सी भी वहीं रखी थी..पर न जाने क्यों उन्हें देखते ही एक अजीब-सा उजाड़ मन में उतर आया। मैंने ध्यान से देखा…तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी।

     यही वह तखत था, जिस पर अम्मा तह किए हुए कपड़े रखती थीं। उनकी छोटी-सी डोलची भी यहीं रहती थी। रोज़मर्रा की कई चीज़ें वे इसी तख़्त पर सहेजकर रख देतीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उन्हें ढूँढना न पड़े।

        मैं भी जब नहाने जाता तो अम्मा से ही कह देता, ‘अम्मा, नहाने जा रहा हूँ।’ और वे वहीं से बता देतीं, ‘तौलिया तख़्त पर रखा है, कंघी और तेल की शीशी डोलची में है…शीशा भी उसी में मिल जाएगा।’

      लेकिन आज उस तख़्त पर अम्मा की कोई चीज़ नहीं थी..सिवा एक गहरी उदासी से भरे खालीपन के।

    मैंने दरवाज़े से नज़रें फेर लीं। ठिठके हुए मेरे कदम अनायास ही पापा के कमरे की ओर मुड़ गए। 

       मेरी पहली तैनाती एक सुदूर जिले में हुई थी। पत्नी और बच्चे भी मेरे साथ जा रहे थे। उस दिन घर के इसी दरवाज़े पर अम्मा खड़ी थीं। वे चुपचाप हमें जाते हुए देख रही थीं। उनके चेहरे पर कोई शब्द नहीं था, लेकिन आँखों में एक ऐसी नमी थी जो बहुत कुछ कह रही थी। जैसे मन का सारा स्नेह उस क्षण पलकों तक आकर ठहर गया हो।

       अम्मा हमेशा चाहती थीं कि घर का कोई भी सदस्य उनसे दूर न जाए। परिवार को एक साथ बाँधे रखना जैसे उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। शायद इसी जिद में कभी उन्होंने पापा का तबादला बम्बई से इलाहाबाद कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। पापा केन्द्र सरकार की नौकरी में थे, पर अम्मा के लिए नौकरी की चमक-दमक से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह था कि परिवार बिखरे नहीं। वे चाहती थीं कि सब उनकी आँखों के सामने रहें..एक ही आँगन, एक ही छत के नीचे।

      लेकिन उस दिन शायद परिवार के साथ रहने का सुख उनसे दूर जा रहा था।

       बच्चे रिक्शे पर बैठे थे। रिक्शा धीरे-धीरे घर से कच्चे रास्ते से गाँव से बाहर निकलने लगा। पापा उस रिक्शे के साथ-साथ चल पड़े। वे पक्की सड़क के मोड़ तक आए, फिर उससे आगे सड़क पर चलने लगे थे। वे बिना कुछ कहे चलते रहे..जैसे लौटने का मन ही न हो। अंततः जब वे वापस होने को हुए, तो उनकी चाल में एक अनकही थकान उतर आई थी।

       उसी क्षण मेरी आँखें भी भर आई थीं, पर मैंने उन्हें छिपा लिया। उस समय पहली बार लगा, जैसे मैं किसी नौकरी पर नहीं, अपने ही घर से विदा ले रहा हूँ।

        बच्चों का घर से चले जाना अम्मा को भीतर तक दुःखी कर गया था। वही दुःख धीरे-धीरे उनकी चुप रहने वाली सी नाराज़गी में बदलने लगा। इसके बाद वे मुझसे भी कुछ खिंची-खिंची सी रहने लगीं। अम्मा बहुत भावुक थीं, पर उतनी ही स्वाभिमानी भी। अपने मन की पीड़ा वे किसी से कहती नहीं थीं; उसे भीतर ही भीतर जज़्ब कर लेती थीं।

         और मैं, उनके इतने निकट होकर भी, उनके मन की उन हलचलों को समझने की फुर्सत नहीं निकाल पाया।

       अब जब उस दिन को याद करता हूँ, तो लगता है..दरवाज़े पर खड़ी अम्मा की नम आँखें केवल विदा की नहीं थीं; वे एक ऐसे खालीपन की शुरुआत थीं, जिसे समझने में मुझे बहुत हो गई।

          शायद उस दिन घर से केवल मैं ही नहीं गया था, अम्मा के जीवन का एक हिस्सा भी चुपचाप मेरे साथ चला गया था।

          मैं अपनी नौकरी की व्यस्तताओं में इस कदर उलझता चला गया था कि समय जैसे अनजाने ही हाथ से फिसलता जा रहा था, और इधर अम्मा धीरे-धीरे उम्र की ढलान की ओर बढ़ रही थीं। मेरे मोबाइल में ‘अम्मा’ तो दर्ज था, पर विडंबना यह थी कि उस नाम पर उँगली बहुत कम जाती थी। अक्सर मैं पापा के ही मोबाइल पर फोन कर देता। मन में यह सहज-सा विचार आ जाता कि अम्मा भी तो वहीं पास ही होंगी; यदि इच्छा होगी तो पापा से फोन लेकर मुझसे बात कर लेंगी। पर ऐसा शायद ही कभी हुआ।

     वैसे भी, जब कभी फोन पर अम्मा से बात होती, तो वह दो-तीन वाक्यों से आगे बढ़ ही नहीं पाती। वे पूछतीं—‘सब ठीक है?’

        मैं कहता, ‘हाँ, सब ठीक है।’

        फिर वे दुबारा पूछ लेतीं, ‘खूब ठीक है न?’

      और मैं उतने ही संक्षिप्त स्वर में कह देता, ‘हाँ, खूब ठीक है।’

      बस, इस ‘खूब’ के बाद जैसे शब्दों की डोर टूट जाती और बातचीत वहीं समाप्त हो जाती।

      पर एक दिन उनके सब्र का बाँध जैसे चुपचाप टूट गया। बड़ी करुण आवाज़ में वे बोली थीं, ‘तुम्हारे मुँह से “अम्मा” सुनने को तरस जाती हूँ।’

     उनके स्वर में जो पीड़ा थी, वह आज भी मेरे भीतर कहीं गूंजती है। पर उस समय मैं था कि उनकी इस बात को भी हँसकर टाल गया। कभी-कभी तो वे मुझे आधे उलाहने, आधे स्नेह में ‘निर्मोही’ भी कह देतीं।

      अम्मा चाहती थीं कि मैं उनसे हुलसकर बातें करूँ, जैसे बेटा अपनी माँ से करता है। पर न जाने क्यों, मेरे हिस्से में मौन ही अधिक था। और अम्मा कभी-कभी हल्की-सी शिकायत के साथ पूछ बैठतीं, ‘तुम इतना चुप क्यों रहते हो?’     

         मैं अकसर सोच में पड़ जाता कि आख़िर मेरी मानसिक बनावट कैसी है? और क्यों अम्मा मेरे बारे में इस तरह की धारणाएँ बना लेती हैं? इन प्रश्नों के साथ मैं अपनी स्मृतियों की तहों में उतरने लगता।  

      मेरे बालमन पर अंकित सबसे पहली स्मृति कुछ धुँधली-सी, पर गहरी है। मैं घुटनों के बल सरकता हुआ घर की ऊँची डेहरी लाँघने की कोशिश कर रहा हूँ। डेहरी मेरे छोटे कद के लिए बहुत ऊँची है। घर के दूसरे सदस्य वहीं मौजूद हैं, पर जैसे मेरी ओर उनका ध्यान ही नहीं है। कोई मुझे गोद में उठाकर पार नहीं करा रहा, कोई हाथ बढ़ाकर सहारा नहीं देता। उस क्षण मेरे भीतर पहली बार उपेक्षित होने की एक अनजानी अनुभूति जन्म लेती है।

       इस स्मृति का ज़िक्र बाद में मैंने अम्मा से किया, तो उन्होंने मुझे समझाने के अंदाज में बताया था कि उस समय मेरी उम्र मुश्किल से एक वर्ष रही होगी। तब वे बीटीसी की ट्रेनिंग के लिए इलाहाबाद गई हुई थीं और कभी-कभार मुझे भी अपने साथ वहाँ ले जाती थीं। मेरी स्मृतियों में कर्नलगंज का वह कच्चा दोमंज़िला मकान आज भी धुँधली-सी तस्वीर की तरह बसा हुआ है; वही मकान, जहाँ अम्मा अपनी बीटीसी की ट्रेनिंग कर रही थीं।

       एक बार अम्मा क‌ई महीनों की ट्रेनिंग के बाद घर लौटी थीं। इतने लंबे समय बाद उनका लौटना मेरे बालमन को खल गया था। भीतर कहीं रूठा हुआ गुस्सा जमा था। मैं एक डंडा उठाकर उनके पास पहुँचा और उसे उनके सिर पर चला दिया। पर अम्मा ने न तो डाँटा, न ही क्रोध किया, उन्होंने मुझे तुरंत अपनी गोद में खींच लिया। उस क्षण उनके स्नेह ने मेरे बाल-क्रोध को जैसे पिघला दिया।

       अम्मा यह जानतीं थीं कि मैं बचपन से ही उनसे रूठता आया हूँ..कभी-कभी रूठकर मैं अम्मा से बोलना बंद कर देता तब अम्मा भी मुझसे न बोलतीं‌। मैं सोचता रहता कि अम्मा मुझे मनाए तब मैं बोलूँ। लेकिन अम्मा मुझे सुनाते हुए कहतीं कि देखो यह अपने अम्मा से भी नहीं बोलता, इससे मेरे बालमन को ठेस लगता और अचानक मैं ‘अम्मा’ बोल देता। 

         कभी-कभी इन प्रसंगों को यादकर मैं अम्मा से इसकी चर्चा छेड़ देता। तब अम्मा कहतीं, हाँ बाबा बहुत छोटे थे जब आपको छोड़कर मैं बीटीसी की ट्रेनिंग करने गई थीं। इसके बाद वे मेरा बचपन याद कर भावुक हो उठतीं। इन दिनों अम्मा को मेरा बचपन कुछ ज़्यादा ही याद आने लगा था। अक्सर मुझसे बात करते-करते वे एक घटना का ज़िक्र छेड़ देतीं कि… “बाबा, आप साल भर के हो रहे थे जब पहली बार आप खड़े होकर चले थे। आँगन में तुलसी के चौरा के पास खड़े होकर आपका यह चलना देख मैंने खुशी से चिल्लाकर माई (मेरी नानी) को पुकारा था कि माई देख बाबा चलने लगे..!!”  यह बात पूरी होते-होते अम्मा की आँखें छलछला उठती। इधर दो-एक वर्षों से मैं यह भी देख रहा था अम्मा मेरे बचपन की बातें यादकर बेचैन हो उठतीं थीं जैसे उन्हें कोई बात कचोटती हो! जब भी मैं घर आता अम्मा मुझसे पूँछती, बाबा नजदीक ट्रांसफर नहीं होगा! जब मैं कहता, नहीं, इधर नहीं होगा, तो उनकी यह बेचैनी और भी बढ़ जाती। लेकिन अम्मा की यह बेचैनी मैं नहीं समझ सका। 

         जब अम्मा अध्यापिका बनीं तो एक दिन मुझे भी अपने साथ पहली बार स्कूल ले ग‌ईं। अम्मा ने मुझे अन्य बच्चों के बीच बैठा दिया। कक्षा में अन्य बच्चे अपनी-अपनी पुस्तकें पढ़ रहे थे अम्मा ने मुझे भी पढ़ने के लिए एक पुस्तक दिया और किसी शब्द को पढ़ने के लिए कहा‌। उस समय मैं पढ़ना सीख ही रहा था। किसी अनपहचानी सी शब्दाकृति पर मैं अटक गया। इसे पहचानने की कोशिश कर रहा था कि तभी अम्मा का एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गालों पर पड़ा। उस तमाचे की स्मृति आज भी मेरे गालों पर उभर आती है। एक शिक्षिका होने से इतर अम्मा के व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष भी था जैसे कि वे सत्य के प्रति आग्रहशील और अपने आदर्शों से समझौता न करने वाली महिला थीं। वे साहसी भी थीं। उस जमाने में साइकिल चलाकर अम्मा स्कूल में पढ़ाने जातीं। इसके लिए उन्हें चार से पाँच किलोमीटर तक साइकिल चलाना पड़ता। कभी-कभी अम्मा मुझे भी साइकिल के पीछे कैरियर पर बैठाकर अपने स्कूल लिवा जातीं। वे मुझे घर पर भी पढ़ने के लिए प्रेरित करतीं।        

     पापा, दादा जी की अकेली संतान थे और मैं तीन बहनों में अकेला भाई। इसलिए दादा जी मुझे ‘तुरुक का दातुन’ कहते, यानी सबके लिए प्रिय अकेली चीज। दादा जी का स्वभाव बड़ा अनुशासनप्रिय था। वे जीवन को नियम और संयम की डोरी से बाँधकर जीने में विश्वास रखते थे। बचपन में उन्होंने मुझे अनुशासन का ऐसा कठोर पाठ पढ़ाया कि उसकी छाप मेरे स्वभाव पर गहराई से अंकित हो गई—आज भी उनकी वह सीख जीवन की राह में मेरा मार्गदर्शन करती है। अम्मा भी तो ऐसी ही थीं। कहते हैं कभी-कभी बहुत दुलार से बच्चों के बिगड़ने का डर होता है, यह बात अम्मा को भी पता थी। अम्मा सदैव मुझे अपने आदर्शों पर कसती रहीं-गढ़ती रहीं। एक दिन रसोईं के पास बैठाकर अम्मा ने मुझे एक पाठ बहुत समझाकर पढ़ाया था: सच्चा बालक! किसी कहानी का यह मेरा पहला पाठ था। इस पाठ के बहाने अम्मा ने मुझे जैसे जीवन का पाठ पढ़ाया था‌। इस तरह अनजाने में ही सही अम्मा मुझे अपने तरीके से गढ़ रही थी।

      पर न जाने क्यों, अम्मा के साथ मेरे संबंधों में एक अदृश्य-सा भावनात्मक शीतयुद्ध भी चलता रहा। शायद ऐसा इसलिए होता है कि जो व्यक्ति हमारे जीवन में सबसे अधिक प्रिय और सबसे अधिक निकट होता है, उसके खो जाने का भय भी उतना ही गहरा होता है। संभव है, माँ-बेटे के बीच यह मौन खिंचाव उसी भीतरी आशंका की उपज रहा हो।

       लेकिन इसके पीछे एक और कारण भी रहा होगा। उम्र चाहे जितनी बीत गई हो, अम्मा के सामने जाते ही मैं अनायास वही छोटा-सा बच्चा बन जाता था…हाँ, वही बच्चा, जो शैशव से ही उनसे रूठता-मनाता चला आया था।

      शायद इसी भावनात्मक शीतयुद्ध का परिणाम था कि न तो अम्मा ने मुझ पर अपना अधिकार जताया, न ही मैं उन पर। और जब जीवन के किसी मोड़ पर मुझे लगा कि अब मुझे अम्मा पर अपना अधिकार जताना चाहिए तभी वे इस दुनिया से विदा हो गईं।

        अम्मा ने अपना पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया… स्वाभिमान और संतोष के साथ। उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं थी; जो मिला, उसे उन्होंने सहज भाव से स्वीकार किया और उसी में प्रसन्न रहना सीखा। शायद वे मुझसे यही चाहती थीं कि मैं उनके पास बैठूँ, उनसे खुलकर, हुलस-हुलसकर बातें करूँ। पर न जाने क्यों, यह छोटी-सी खुशी भी मैं उन्हें नहीं दे पाया।

        मैं मन ही मन सोचता था, नौकरी से निवृत्त होने के बाद फिर एक बच्चे की तरह अम्मा के पास रहूँगा। उनके साथ समय बिताऊँगा, उनसे जी भरकर बातें करूँगा। बरसों से मन में जो कुछ दबा है, उसे उनके सामने उँडेल दूँगा। और जब मेरी बातों से अम्मा के चेहरे पर वह तृप्त मुस्कान लौट आएगी, तब शायद पहली बार मैं उन पर अपना वह सहज अधिकार भी जता सकूँगा, जो एक बेटे को अपनी माँ पर होना चाहिए।

       लेकिन जीवन हमेशा हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। मन की वह इच्छा मन में ही रह गई। जब तक मैं उस अधूरे स्नेह को शब्द दे पाता, अम्मा चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गईं…और मेरे हिस्से में रह गईं बस उनकी स्मृतियाँ, और एक ऐसी रिक्तता, जिसे अब कोई भर नहीं सकता।

         अम्मा के भावनात्मक संसार में यदि कोई सबसे अधिक निकट था, तो शायद वह मैं ही था। यह बात मुझे बचपन में उनके साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों से धीरे-धीरे समझ में आई। पर अम्मा का स्वभाव ऐसा था कि वे इस स्नेह को कभी खुलकर दिखने नहीं देती थीं। शायद उन्हें डर रहता कि कहीं ऐसा न लगे कि मैं ही उनका सबसे प्रिय हूँ और बाकी लोग अपने को उपेक्षित समझ बैठें। इसलिए कई बार सबके सामने वे मेरी उपेक्षा भी कर देतीं।

      लेकिन जब मैं घर आता और घर में बस हम दोनों ही होते, तब अम्मा का वह दबा हुआ स्नेह जैसे अपने आप बाहर आ जाता। वे मेरे आसपास ही मँडराती रहतीं…कभी मेरे बचपन की कोई भूली-बिसरी घटना सुनाने लगतीं, कभी तेल की छोटी-सी शीशी उठा लातीं और बड़े स्नेह से मेरे सिर पर मालिश करने बैठ जातीं।

      एक बार उन्हें लगा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने पूछा, ‘डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?’ जब मैंने सहज ही ‘नहीं’ कह दिया, तो वे हल्की-सी चिंता में डूबकर बोलीं थीं कि ‘जब अपने को ही नहीं दिखा रहे हो, तो बीमार पड़ने पर अम्मा को डॉक्टर को क्या दिखाओगे?’

     अम्मा की वह साधारण-सी बात आज भीतर कहीं गहरी टीस की तरह चुभ जाती है।

       पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से अम्मा की स्मरण-शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगी थी। कभी उन्हें समय का ठीक-ठीक बोध नहीं रहता, कभी स्थान का, तो कभी अभी-अभी घटित कोई छोटी-सी घटना भी उनकी स्मृति से फिसल जाती। उस समय यह सब उम्र के स्वाभाविक ढलान जैसा ही लगा।

       जब मैं गाँव गया, तब भी इन संकेतों को मैंने संकेत की तरह नहीं देखा। अम्मा की लगातार बनी रहने वाली खाँसी को भी साधारण समझकर टाल गया। कई महीनों से उनसे ठीक से कुछ खाया भी नहीं जा रहा था…मैंने इसे भी कोई गंभीर बात नहीं माना। कस्बे के डॉक्टर ने भी सहज स्वर में कह दिया था, “कोई बड़ी बीमारी नहीं है।” 

        शायद उसी एक वाक्य ने मेरी लापरवाही को जैसे एक तर्क दे दिया।

       आज सोचता हूँ…कभी-कभी मनुष्य अपने आश्वस्त रहने की सुविधा के लिए भी सच से आँख चुरा लेता है।

      अम्मा भीतर से बहुत मजबूत थीं। वे अपनी पीड़ा को सहजता के आवरण में छिपाकर जीने की आदी थीं। उनके चेहरे को देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि भीतर कोई बीमारी धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।

        और सच तो यह भी है कि अम्मा ने स्वयं भी कभी नहीं कहा, “मैं बीमार हूँ।”

        वे हमेशा यही कहतीं,

        “मैं ठीक हूँ।”

       शायद उन्हें लगता था कि उनकी बीमारी की बात सुनकर मैं व्यर्थ ही व्याकुल हो जाऊँगा।

       एक दिन पहले ही मैंने पापा के फोन पर उनसे बात की थी।

        “हलो अम्मा… अम्मा…!”

        उधर से हल्की-सी आवाज आई…

        “बाबा…”

         “हाँ अम्मा…”

          अम्मा बोलीं,

        “बाबा… घबड़ा जिन। काहे एतना घबड़ात हउ तू सभे? बीमारी-उमारी त होए जाथ है… हम ठीक होइ जाब…एतना परेशान जिन होत जा…”

         इतना कहते-कहते उन्हें खाँसी आ गई।

       मैंने उस खाँसी को भी एक सामान्य खाँसी की तरह ही लिया।

        किसे पता था कि यह हमारे बीच अंतिम संवाद होगा।

       अगले ही दिन अस्पताल में मैंने अम्मा को एक-एक साँस के लिए संघर्ष करते देखा।

        डॉक्टर ने धीमे और लगभग निर्विकार स्वर में कहा…

      “अब बहुत देर हो चुकी है। इन्फेक्शन पूरे फेफड़ों में फैल चुका है। लगभग पूरा फेफड़ा नष्ट हो चुका है। अभी जो ये साँस ले रही हैं, उसमें भी इन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ रही है.. कुछ देर में ये थक जाएंगी फिर इनकी सांसें थम जाएगी..अगर समय रहते इलाज मिल जाता तो शायद स्थिति अलग होती…”

       डॉक्टर की बात सुनते ही जैसे भीतर कहीं गहराई में टूट गया।

       उस क्षण पहली बार अपनी लापरवाही का पूरा आकार दिखाई दिया।

      अम्मा के जीवन और स्वास्थ्य के प्रति मैंने स्वयं घोर उपेक्षा बरती थी। और फिर एक दिन अम्मा नहीं रहीं।

        अम्मा और उनके बेटे के बीच की इस कहानी का वहीं अंत हो गया….या इस कहानी की वहीं से एक दूसरी शुरुआत हुई। 

           उस दिन अम्मा की चिता जल रही थी। चिता से कुछ दूर बैठा मैं अग्नि की लपटों को देर तक देखता रहा। धीरे-धीरे लकड़ियाँ अंगारों में बदल रही थीं, और मेरे भीतर स्मृतियों का एक लंबा सिलसिला खुलता जा रहा था।

तभी पहली बार यह विचार मन में आया…

        समय वास्तव में कितना अमूल्य होता है। हम अक्सर उसे पहचानने में देर कर देते हैं। और जब तक उसकी महत्ता समझ में आती है, तब तक बहुत कुछ हमारे हाथों से छूट चुका होता है।

       उस दिन लगा..अम्मा की चेतना इस दृश्य जगत से उठकर कहीं उस अनंत ब्रह्मांड में विलीन हो गई है। लेकिन धीरे-धीरे यह भी समझ में आने लगा कि अम्मा कहीं गई नहीं हैं। वे अब भी हमारे भीतर हैं…हमारी स्मृतियों में, हमारे व्यवहार में, हमारे निर्णयों में।

       अम्मा चुपचाप हमें गढ़ती रही थीं…मुझे ही नहीं, पूरे परिवार को, अपने आसपास के संसार को भी। उन्होंने अपने एक साधारण-से बेटे को भी ऐसा आत्मविश्वास दिया कि वह अपने दम पर अपना संसार रच सके।

तेरहवीं के दिन किसी ने सुझाव दिया—

       “अम्मा की एक तस्वीर रख दी जाए, ताकि आने वाले लोग उन्हें श्रद्धांजलि दे सकें।”

        पापा ने मना कर दिया। मुझे भी वही ठीक लगा। क्योंकि उस समय लगा…अम्मा अब किसी एक तस्वीर में समा जाने वाली उपस्थिति नहीं रहीं। वे स्मृति बनकर हमारे भीतर फैल गई हैं….

      एक ऐसी अदृश्य चेतना की तरह, जो शायद अब कभी हमसे दूर नहीं होगी।


शनिवार, 4 मई 2024

सिंहोरा

      मुख्य सड़क से गाँव जाने वाली सड़क पर कार मुड़ी। पहले खेत शुरू हुए। इनमें लहलहाती गेहूँ की बालियाँ बस जैसे पकने को तैयार हों। बचपन में दादी के साथ इन खेतों में काम करते मजदूरों के लिए पानी चबैना लेकर आई हूँ। तब यह पक्की सड़क नहीं सूनसान खोरी हुआ करती थी। जिसके दोनों ओर सरपत खड़े होते। इसके बीच से गुजरते हुए मुझे भय लगता। बरसात के दिनों में इस खोरी में पानी इकट्ठा हो जाता तो किसान इसे दुबले से उलचकर धान की सिंचाई कर लेते थे। लेकिन आज खोरी और सरपत का नामोनिशान मिट चुका है बल्कि उसकी जगह बनी यह सड़क हमारे गाँव से आगे एक दूसरे गाँव को भी जोड़ती है। घर-घर मोटरसाइकिल और चारपहिया होने तथा स्कूली बच्चों की आवाजाही से सुबह-शाम यह सड़क गुलजार हो उठती है। अचानक ज़ेहन में कुछ यादें उभर आई। मैं मुस्कुरा उठी। मुझे मुस्कुराते पाकर कार चला रहे बेटे ने पूँछा, मम्मी तुम मुस्कुरा क्यों रही हो? मैंने कहा, कुछ नहीं, बस ऐसी ही कोई बात याद आ गई। उस धूलभरी खोरी में दादी के साथ चलते हुए मैं किसी बड़े आदमी के पैरों के निशान के ऊपर पैर रखती और उससे अपने पैर की तुलना करती या बैलगाड़ी के पहिए से बने लीक पर मैं पैर धरते चलती। अपने पैरों की छाप देखकर मुझे मजा आता। लेकिन मुझे कूदते-फाँदते चलते देख दादी डांटने लगती तो उन्हें मैं अपने पैरों के निशान दिखाने लगती। दादी मुझे नसीहत देती, बिटिया सीधे अपनी राह चलो, किसी की बनाई लीक पर नहीं चलते। इस बात के साथ कहीं पढ़ी सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की यह कविता किलीक पर वे चलें/ जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं” याद आ गई थी इसीलिए मैं मुस्कुराई थी। यह दादी की ही सीख थी कि मैं जैसी हूँ वैसी ही बनी रही किसी की लीक पर नहीं चली। लेकिन यदि जमाने से पूँछो तो उत्तर मिलता है तुम वैसी नहीं तो ऐसी नहीं हो! यहाँ लोग स्वयं की राह पर चलने की नहीं, किसी न किसी की लीक पर चलने की ही सलाह देते हैं। इसीलिए तो मेरे ‘वो’ भी कभी-कभी मुझे ‘पगली’ कह बैठते हैं। इसपर मैं उनसे यही कहती हूँ, ‘हाँ जो अपनी राह चलते हैं उन्हें लोग पागल कह देते हैं।’ 

          खेतों की सीमा समाप्त हुई तो बाग शुरू हुए। मेरी आँखें चुरैलिया वाले बरा के उस विशाल वृक्ष को खोजने लगी, जो इस खोरी से गाँव की ओर जाते समय बाग से पहले पड़ता है। लेकिन उसे ठूँठ जैसी हालत में देख मैं चकरा ग‌ई। बाग के छोर पर खड़ा मेरे बचपन का विशाल बरा का वह वृक्ष पेड़ों के सरदार जैसा तब बाग की रखवाली करते हुए दिखाई देता। किसानों ने अपने खेत उसके तने के पास तक फैला लिए हैं। शायद इसकी दूर तक फैली शाखाओं को सहारा देने वाली जड़ें नष्ट हो गई होंगी या उन्हें जमीन से महरूम कर दिया गया होगा, फिर बिन सहारे के बरा की वे शाखाएं टूटकर गिर पड़ी होंगी। मेरे बचपन के बरा के उस पेड़ पर रहने वाली चुड़ैलिया का क्या हुआ अब वह कहाँ रहती होगी! शाम गहराने पर जिसके डर से बच्चे इस बरा के आसपास नहीं जाते थे! उन दिनों दादी भी हमें डराती, कहती, बरा के पेड़ के पास जाने वाले अकेले बच्चे को चुरैलिया पकड़ लेती है। लेकिन दिन-दोपहरी में चरवाहे हों या किसान उस बरा के नीचे बैठे सुस्ताते दिखाई पड़ते, और तो और, गर्मियों के दिनों में इसके नीचे पशुओं का भी जमावड़ा होता। यह देखकर मैं दादी से पूँछती, इन्हें चुड़ैलिया क्यों नहीं पकड़ती, तो वह कोई उत्तर न देकर केवल मुस्कुरा देती।

       और यह बाग जिसके बीच से मैं गुजर रही हूँ तब कितना डेंस था! आम और महुआ के वे दरख्त नहीं रह ग‌ए, जिनके इर्द-गिर्द हम-उम्र सहेलियों के साथ मैं खेला करती। वही बाग अब खंडहर सा उजाड़ दिखाई दिया। लेकिन मेरी बचपन की यादों को सँजोए भीटे वाला तालाब और वहां बना शिवाला दूर से अभी भी वैसे ही दिखाई दिया जैसे मेरे बचपन में था। तीज पर गाँव की महिलाएं यहाँ ऐसे जुटती जैसे कोई मेला लगा हो! लेकिन सुनती हूँ कि तीज-त्यौहारों पर अब महिलाओं का यहाँ वैसा जमावड़ा नहीं होता।

        बेटे ने कार में ब्रेक लगाया तो देखा, हम गाँव की गली में थे। ये दुल्ली काका थे। साइकिल के कैरियर पर हरा चारा बाँधकर खेत से लौट रहे हैं। कार के सामने आ ग‌ए थे। किनारे हुए तो बेटे ने उनके बगल से धीरे-धीरे कार निकाला। कितने बूढ़े हो ग‌ए हैं कक्कू! मुझे नहीं देखा, नहीं तो मेरा हालचाल जरूर पूँछते। गाँव की यह गली सँकरी थी। मैंने बेटे को सावधानी से कार चलाने के लिए कहा। गाँव भी कितना बदल गया है, अब कच्चे घर नहीं रह ग‌ए, छोटे-बड़े सभी घर पक्के हो चुके हैं। 

        एक मोड़ आया। जैसे घर की गौरैया घर के आँगन के प्रत्येक कोने से परिचित होती है वैसे ही मैं इस मोड़ से परिचित थी। नजर घुमाई। मेरा हृदय धक से रह गया। यह सिंहोरा थी। मेरी बचपन की सहेली‌। दीन-हीन सी मैली-कुचैली साड़ी में लिपटी अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी! वह मुझे ही देख रही थी। उसके चेहरे का निर्विकार भाव सुख-दुख से विरक्ति वाला नहीं, बल्कि बेबसी का था। वैसे ही जैसे किसी मजबूत बाँध के पीछे कोई उफनाई नदी आकर ठहर जाए! मैं विस्फारित आँखों से उसे देखने लगी। हम दोनों एक दूसरे को तब तक देखती रही जब तक कार मुड़कर आगे नहीं निकल आई। मन में आया, गाड़ी रुकवाकर बचपन की इस सहेली से मिल लूँ, लेकिन बेटे से कार रोकने के लिए नहीं कह सकी। सिंहोरा से मैं कब मिली थी, याद नहीं। यह तो सुना था कि वह विधवा हो गई है और उसे कोई बच्चा नहीं है। विवाह के कुछ बरस बाद एक बेटा हुआ था उसे, लेकिन सौर में ही उसके नवजात की मौत हो गई थी। उस बच्चे को जन्मते ही ठंडे पानी से नहला दिया गया जिससे उसे निमोनिया हो गया था। इसके आठ-दस साल बाद बीमारी से उसके पति की मृत्यु हुई। बेचारी सिंहोरा आज कैसी हालत में है!

         ..अरे! इस मोटर में फूटो बैठी है? हाँ फुटेरा ही तो है! बहुत साल हो गए थे इसे देखे..गौना था जब फुटोरा से मिलने ग‌ई थी। सुना था, बाद में इस फूटो का आदमी अफसर हो गया था। और जो मोटर चला रहा है…वह फुटेरा का बेटा होगा…यदि उसका भी बेटा जिया होता तो ऐसे ही होता…

         सिंहोरा के हृदय में एक टीस सी उठी और उसकी आँखें डबडबा आईं। 

        “सिंहोरिया…हे सिंहोरिया..कहाँ मर गई रे..” यह बिब्बो की आवाज थी। चिल्लाती काहे हो..आती हूँ, बोलकर सिंहोरा ने अपनी डबडबाई आँखों को अपने मैले-कुचैले आँचल से पोंछ लिया। वह मुड़ी तो सामने माँ बिब्बो थी जो पचहत्तर साल के वय से ऊपर थी। बिब्बो फिर बोली थी, चिल्लाऊँ न तो क्या पूजा करूँ…तेरा भाई आता होगा उसके लिए कुछ बना दे, नहीं तो चार गारी देगा तुझे। सिंहोरा कुछ न बोली, घर के अंदर चली गई। 

       भाई तो भाई, बिब्बो भी न जाने क्यों हर वक्त उससे चिढ़ी रहती है, बात-बात पर उसे झिड़कना-दुत्कारना जैसे उसकी आदत बन गई है..यही बिब्बो पहले उसकी खूब मया करती, यहाँ तक कि विवाह के बाद ससुराल में उसे ज्यादा दिन न रहने देती। महीना-दो-महीना बीता नहीं कि बुला लेती। विवाहित होने के बावजूद घूम-फिरकर उसका समय मायके में ही बीतता। 

       सिंहोरा अपनी माँ को ‘बिब्बो’ ही बोलती है। बुआ माँ को ‘भाबो’ कहती थी,  यह ‘भाबो’ उसकी जुबान में ‘बिब्बो’ हो गया। धीरे-धीरे पूरा गाँव उसकी माँ को ‘बिब्बो’ के नाम से जानने लगा। उसके नाम ‘सिंहोरा’  के पीछे भी एक कहानी है। साधारण नैन-नक्श वाली सिंहोरा अपने छुटपन में गोल-मटोल हुआ करती थी। बिब्बो के पास एक खूबसूरत सिंदूरदानी थी। जिसे वह जतन से बक्से में छिपा कर रखती। माँ प्यार से कहती, तू मेरी सिंदूरदानी जैसी सुंदर गोल-मटोल सिंहोरा है और उसे ‘सिंहोरा’ कहकर बुलाती।

         सुबह-शाम दोनों टैम की रसोईं की जिम्मेदारी उसी की है‌। माँ की झिड़की खाकर वह रसोईं में आ ग‌ई थी। उसकी आँखें फिर भर आई। जीवन के पन्ने पर हँसने और रोने में अन्योन्याश्रित संबंध लिखा होता है! जो हँस सकता है वही रो भी सकता है। लेकिन इसी पन्ने पर सिंहोरा के लिए जैसे हँसना लिखा ही नहीं था, इसीलिए उसे कभी ठीक से रोना भी नहीं आया‌। वह जी रही या जीयाई जा रही, उसे नहीं पता। पति को मरे एक माह भी नहीं हुए थे कि बिब्बो ने उसे ससुराल से बुला लिया था। तब बिब्बो बहुत दुखी दिखाई देती! यहाँ तक कि खाना-पीना तक भूल ग‌ई थी वह। विधवा के रूप में उसे देख जब-तब वह रो भी पड़ती। तब चुपचाप वह बिब्बो को निहारती। धीरे-धीरे बिब्बो का यह रोना-धोना बंद हो गया था। कुछ महीने बाद जब देवर उसे लेने आया तो बिब्बो ने उसको यह कहकर लौटा दिया था कि दुख भूलने के लिए सिंहोरा अभी नैहर में ही रहेगी। 

      उसने याद किया। इसके साल भर बाद उसकी देवरानी आई थी, साथ में वह देवर भी था। उसे ससुराल लिवा जाने के लिए देवरानी ने बिब्बो से खूब मिन्नतें की थी। “अम्मा जिज्जी हमारी बड़ी हैं वे घर की मालकिन बनकर रहेंगी.. इन्हें कोई तकलीफ़ नहीं होने देंगे हम लोग..इन्हें जाने दें..।” लेकिन तब बिब्बो को उसकी कितनी फ़िक्र करती थी! तभी तो देवरानी से उसने कहा था, “यह सिंहोरा के मान-अपमान का सवाल है..देखो, जब पति ही नहीं रहा तो ससुराल जाकर वह क्या करेगी.. अब उसका वहां कौन है जो उसके मान की परवाह करेगा? वहाँ जाकर उसे अपमान नहीं सहना..यहाँ वह न‌इहर में अपने माँ-बाप-भाई के घर रहेगी तो कम से कम इज्जत से तो जियेगी!”  

       “नहीं अम्मा..उनका घर तो ससुराल ही है..आखिर जिज्जी हमारी भी तो कुछ हैं...और ये..ये भी तो यही कहते हैं कि माँ नहीं है तो क्या हुआ, भाभी तो हैं! अम्मा ये जिज्जी को माँ की ही तरह इज्जत देंगे..” देवर की ओर इशारा कर उसकी देवरानी ने जैसे गिड़गिड़ाते हुए कहा था। फिर बिब्बो को मनाने के लिए उसके पैर भी पकड़े थे। उस दिन वह इसी बिब्बो के पीछे खड़ी एक हाथ से आँचल मुँह में ठूँसे चुपचाप यह सब देख रही थी। फिर देवरानी ने रोते हुए उसके भी तो पैर पकड़ लिए थे, उससे कह रही थी, जिज्जी, अम्मा को तुमही समझाओ..क्या वह आपका घर नहीं और हम लोग आपके कुछ नहीं..बोलो जिज्जी..कुछ बोलती क्यों नहीं…” लेकिन काठ की बनी वह कुछ भी नहीं बोल पायी थी।  

        कैसे फूटते उसके मुँह से बोल? बिब्बो आदर्श मां जो थी, बचपन से ही उसे सिखाती आई थी, यह न करो वह न करो, ऐसे नहीं वैसे करो। एक-एक कहा माना था उसने बिब्बो का। कंडा सीला था लकड़ी भी नहीं जल रही थी। फुंकनी काम नहीं आ रही। धुएं की घुटन से निकल कुछ पल के लिए खुली हवा में साँस लेने का उसका मन हुआ। लेकिन बिब्बो देखेगी तो दस बात बोलेगी और भाई भी चिल्लाएगा। वैसे भी जब जीवन ही धुँआसे में डूब जाए तो क्या खुली हवा और क्या बंद! वह चूल्हे में पड़ा कंडा फिर सुलगाने लगी। यह बिब्बो ही थी जो उसकी देवरानी से उस दिन यह भी कह रही थी कि हमारी बेटी किसी दूसरे की सेवा-टहल करने नहीं जाएगी। लेकिन एक नौकरानी से भी बदतर आज की उसकी यह हालत उसे नहीं दिखाई देती। घर में गैस चूल्हा है, पहले उसके विधवा पेंशन से सिलेंडर भराया जाता लेकिन अब वह भी खाली पड़ा रहता है। रसोईं में चूल्हे से उठते धुँएं के बीच वह उस वक्त को कोस रही थी जब एक बार फिर बिब्बो के सामने वह मूक बनी रही। इस बार ससुराल के रिश्ते से मिला उसका अधिकार बेंचा गया था। आठ लाख रुप‌ए में सब बिक गया। बिब्बो ने यह पैसा उसके बैंक खाते में जमा कराया था। 

       अचानक एक दिन भाई का व्यवहार बदल गया था। ‘बहिनो-बहिनो’ कहते न थकने वाला भाई उस दिन अनायास ही उससे झगड़ पड़ा था। उसके कटु शब्दों से सहम गई थी वह। बिब्बो ने इसे ऐसे अनदेखा कर दिया था जैसे वह भी बदल गई हो! भाई को मोटरसाइकिल का शौक पूरा करना था। इसके लिए उसे पचास हजार रुपए चाहिए था। पैसा निकालने वह बैंक नहीं जाना चाहती थी। उसके टालमटोल से भाई चिढ़ गया था। बिब्बो भी भाई की तरफदारी कर रही थी। अंततः मजबूर होकर उसे बैंक जाना पड़ा‌। 

        भाई की नजर अब जैसे उसके पैसों पर ही गड़ी थी। आए दिन वह कोई न कोई फरमाइश करता। बिब्बो भी उसके ही पक्ष में बोलती। वह यह भी फ़िक्र न करती कि सिंहोरा का जीवन लंबा है ये पैसे हारे-गाढ़े उसके काम आएंगे। जबकि यही कहकर तो उसने ससुराल में उसके हिस्से की जमीन बिकवायी थी। आखिर एक दिन बिब्बो की ही शह से भाई ने किसी कागज पर उसका अँगूंठा लगवाया और बैंक से एटीएम कार्ड लाकर उसे दे दिया था। अब वह बैंक चलने के लिए उसकी चिरौरी भी न करता। बस यह कार्ड मांग लेता। कभी वह विरोध करती भी तो बिब्बो यही कहती कि सिंहोरा तेरे आगे-पीछे कोई नहीं है मेरे बाद तेरे भाई ही तेरी सेवा-सहाय करेंगे..भाइयों को नाराज करना ठीक नहीं। यह बिब्बो की सलाह थी या चेतावनी, इसे न समझ पाने पर वह चुप रह जाती। पता नहीं क्या हो गया है बिब्बो को? क्यों बदल गई है वह? इन बातों को सोचकर सिंहोरा तड़प उठी!!

      केवल हाड़-मांस की नहीं बनी वह, सब समझती है! उसके खाते में पैसा जमा होते ही भाई ने बिब्बो का खूब ख़्याल करने लगा था। इधर भाभी भी बिब्बो की तीमारदारी में जुट गई थी। दोनों बिब्बो की मया करने का खूब दिखावा करते और बिब्बो के मन में उसके प्रति द्वेष बढ़ाने के लिए उसके सामने घर के कामों में उसकी खूब कमियाँ निकालते। बिब्बो भी इसे चुपचाप सुनती। धीरे-धीरे बिब्बो उससे चिढ़ी सी रहने लगी थी! तभी तो इस विधवा बेटी से ज्यादा अब उसे अपने बेरोजगार बेटे की चिंता सताने लगी है, नहीं तो उससे एटीएम कार्ड मांगकर वह भाई को न देती! अपनी विवशता और असहायता को समझ यह जानने की अब उसकी इच्छा भी नहीं होती कि खाते में उसके कोई पैसा बचा भी है या नहीं। लेकिन बिब्बो तो उसकी भी माँ है वह ऐसे बदल जाएगी! यह सोचकर उसकी आँखें छलछला आई।

     किस मुँह से अब वह देवर-देवरानी से नाता जोड़े, चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकती। चूल्हे में आग भभक उठी, इसके ताप में उसके गाल पर ढुलक आए आँसू लकीर बनकर सूख गए। तवे पर चढ़ी रोटी जलने न पाए उसे अंगुलियों से ही वह पलटने लगी। जबकि उसके बगल में चिमटा अभी भी अनछुआ पड़ा था।  

         मेरे मायके का घर नदी के किनारे गाँव के छोर पर है। बेटे ने कार उसी ओर मोड़ लिया था। लेकिन मुझे मेरे बचपन की सिंहोरा याद आ रही थी। वैसे तो मेरा नाम श्यामला है लेकिन बचपन में सिंहोरा मुझे फूटो या फुटोरा ही बुलाती थी। ककड़ी की एक प्रजाति फूट है वह कहती तेरा नाम इसी फूट पर पड़ा है। बचपन में हम दोनों मक‌ई के खेतों में फूट ढूंढ़ती फिरती, कोई फूट मिलता तो वह मुझे चिढ़ाती, देख फुटोरा फूट.. मैं भी यह सुनकर पहले चिढ़ने का नाटक करती फिर दोनों मिलकर हँस पड़ती।     

       मुझे याद है, हम बच्चियां बाग में साथ मिलकर खेलती। किसी दरख़्त का कोटर हमारे गुड्डे-गुड़ियों का घर बनता। लेकिन सिंहोरा की दिलचस्पी इस खेल में न होती। उसे चिबिद्दी खेलना पसंद था। मेरा मनुहार कर वह मुझे अपने साथ इस खेल में शामिल कर लेती। मैं भी गुड्डे-गुड़ियों का खेल छोड़ उसके साथ चिबिद्दी खेलने लगती। हम जमीन पर लाईनें खींचकर आठ-नौ आयताकार खाने बनाती। जिसे घर कहतीं। इस घर में खपरैले की एक छोटी चिप्पी फेंककर लंगड़ी टांग से चलकर इसे उठाती। एक घर खाली छोड़ती जिसे लंगड़ी टांग से कूदकर पार करती। सिंहोरा की फेंकी चिप्पी खाने में ही जाकर गिरती‌‌ या उसकी पहुँच में होती और बिना डगमगाए वह चिप्पी उठा लेती‌। इस खेल में संतुलन साध लेने में वह पारंगत थी। कहते हैं जीवन भी एक खेल है, जिसमें संतुलन और नियंत्रण की जरूरत है। लेकिन बेचारी सिंहोरा की भाग्य रेखा में उसकी इस कला के उपयोग की इबारत ही नहीं लिखी थी। लेकिन भाग्य रेखा की कौन कहे वह बेचारी तो किसी पन्ने की इबारत भी नहीं पढ़ सकती थी। बिब्बो भी कहती लड़कियां पढ़-लिखकर चौका-बेलना ही तो करती हैं और हमारी सिंहोरा इसमें होशियार है, घर के सारे काम वह जिम्मेदारी से कर लेती है। शायद यही बात थी कि बिब्बो ने उसे कभी स्कूल जाने के लिए नहीं कहा। 

      लेकिन अनपढ़ होकर भी सिंहोरा गहरे एहसास  वाली थी! वैसे थी तो वह सीधी-सपाट, लेकिन किसी से दबना नहीं जानती थी वह। कोई उस पर हावी हो जाए यह भी उसे पसंद नहीं था! मुझे आज भी याद है एक दिन हम बच्चियाँ पति-पत्नी बनकर नाटक कर रही थी। मैं पति बनी थी और वह पत्नी। मुझे उसपर गुस्सा होना था। लेकिन जैसे ही मैं बनावटी क्रोध कर उस पर चिल्लाई पैर पटकती वह उस खांचे से बाहर आ ग‌ई थी जिसे हमने कोठरी का नाम दिया था। एकदम से वह बोल पड़ी थी,  

       “नहीं खेलना मुझे यह खेल..।” 

      मैं कुछ समझती तब तक वह अपने घर की ओर चल पड़ी थी। वह नाराज है, भान होते ही मैं उसके पीछे भागी थी। और यह बोलते हुए कि “सिंहोरा खेल छोड़कर क्यों जा रही हो? यह सच्ची का डांटना नहीं, खेल है, खेल में क्यों गुस्सा होना? ऐसे में तो खेल बिगड़ जाता है, यह खेल तो हमें ऐसे ही तो खेलना था” मैं दौड़कर उसके आगे जाकर खड़ी हो गई थी‌ और उसके कंधे पकड़कर उसे रोका था। उससे लौटने की खूब मिन्नतें की लेकिन उसकी एक ही रट थी, “नहीं फूटो नहीं.. मुझे नहीं खेलना यह खेल।” मुझे याद है उसके चेहरे पर उस समय न गुस्से वाला भाव था और न ही नाराजगी का। फिर यह सोचकर कि यह खेल उसे पसंद नहीं, मैंने उससे चलकर चिबिद्दी खेलने के लिए कहा था। लेकिन उसने अपने कंधों से मेरे हाथ झटक दिए थे, फिर मैं रुआंसी होकर कान पकड़कर उससे बोली थी, “देख सिंहोरा मैं कान पकड़ती हूँ! सच्ची में तुझे नहीं डाटी थी..मैं भी अब यह खेल नहीं खेलुँगी..तू लौट चल।” लेकिन इस पर भी वह नहीं मानी थी और घर चली गई। फिर कभी वह उस बाग में खेलने आई हो, मुझे याद नहीं।

          सिंहोरा के अन्तर्मन से जैसे मेरे मन का जुड़ाव था तभी तो उसके बिना बाग में खेलना मुझे अच्छा न लगता। वहाँ जाने पर मुझे उदासी घेर लेती। उसे बुलाने उसके घर पहुँच जाती। लेकिन कभी वह रसोईं में तो कभी सिर पर गोबर की टोकरी उठाए घूरे की ओर जाती मिलती और कभी तो भाइयों के साथ खेत में काम कर रही होती। मुझे देखते ही बिब्बो समझ जाती कि मैं सिंहोरा को बुलाने आई हूँ। फिर वह मुझे झिड़कती, तुम्हारी तरह मेरी बेटी नहीं कि दिन भर बस खेलना ही खेलना! मेरी बेटी तो शऊरदार है घर के काम कर रही है..भागो यहां से। बिब्बो मुझे तब बहुत घमंडी लगती। लेकिन सिंहोरा जब कभी रसोईं में रोटी सेंकती मिल जाती तो बिब्बो से नजरें बचाकर मैं रसोईं की पटनी के सहारे खड़ी होकर उससे बतिया लेती। पूँछती, 

       “सिंहोरा, तू खेलने क्यों नहीं चलती?”

      पहले तो वह चुप रहती फिर कुरेदने पर ठेपवा की तरह सयानी बनकर बोलती, “देख फूटो, तू नहीं समझेगी..मुझे घर पर बहुत काम है” फिर वह घर के काम गिनाने लगती। उसकी बातों से लगता जैसे बिब्बो ने ही उसे यह सब सिखाया पढ़ाया है और उसके ही डर से वह खेलने नहीं जाती। 

     धीरे-धीरे अब मैंने भी उस बाग में जाना छोड़ दिया था‌। लेकिन सिंहोरा से मिलने का कोई न कोई बहाना जरूर ढूँढ़ती। उन दिनों गाँव में केवल सिंहोरा के घर ही टीवी था। उसके घर पर लोग ‘रामायण’ देखने इकट्ठा होते‌। मैं भी जाती। वहां सिंहोरा शांत और अलग-थलग सी दिखाई पड़ती। जैसे किसी से घुलना-मिलना उसे अच्छा न लगता हो। मेरे बचपन वाली यह सिंहोरा इस तरह बेजान और असहाय दिखाई पड़ेगी मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था।

             अचानक “मम्मी अब उतरो भी” सुनकर मैं चौंक पड़ी। बेटे ने कार रोकते हुए बोला था। कार से मैं उतरी। बुआ आयी, बुआ आयी कहकर भतीजे, भतीजियां दौड़ पड़े थे। किसी ने बैग उठाया तो किसी ने झोला‌। उनकी खुशी इस बात में थी कि बुआ आयी है तो मिठाई जरूर लाई होगी। मैं घर में चली गई। 

        दिन ढलने को हो आया था। सिंहोरा को लेकर मैं अनमनी थी, सोच रही थी अगले दिन लौटना है तो सिंहोरा से मिलती चलूँ लेकिन हिम्मत नहीं कर पा रही थी उससे मिलने की! आज देखी उसकी विरूपता को अब फिर दुबारा नहीं देखना चाहती थी। 

        घर के बाहर पेड़ो के बीच पड़े तखत पर आकर मैं बैठ गई। मार्च बीतने को है इन वृक्षों की सिंदूरी कोंपलें धीरे-धीरे हरी हो रहीं हैं। नजर घुमायी तो घर के बगल रास्ते से थोड़ी दूर बहने वाली नदी के दूसरे किनारे पर ध्यान गया‌। वहाँ नदी के करार पर खड़े बड़े-बड़े पेड़ों के पीछे सिंदूरी होते गोल सूरज अपनी दिनभर की थकान मिटाने क्षितिजगामी दिखाई दिए। शहरी जीवन से दूर इस दृश्य में मैं खोई थी कि उस रास्ते से गुजरते ब‌ऊआ ने मुझे देख लिया। सोलह-सतरह साल का यह लड़का गाँव के रिश्ते से भतीजा लगता है। वह मेरे पास आया और पांव छूकर बोला “फुआ पाँव लागी।” आशिर्वाद देते हुए उसे मैंने अपने पास तखत पर बैठा लिया। इधर-उधर गाँव का हाल-चाल पूँछने लगी थी। फिर अचानक से मैंने सिंहोरा के बारे में उससे पूँछ लिया। ब‌ऊआ ने छूटते ही कहा, 

        “अरे फुआ कुछ मत पूँछ...वह बेचारी तो जैसे अब अपने दिन गिन रही है..बताने लगूं तो उसकी एक-एक बात कहानी बन जाए…इससे अच्छा था कि अपने ससुराल ही चली गई होती वह…” 

      ब‌ऊआ ने एक सांस में कह दिया। सोलह-सतरह साल के बच्चे के अंतस में सिंहोरा के लिए करुणा की भावना से उपजी पीड़ा थी। उसके अंतस की इस अनुभूति को समझ मैं उसका मुंह ताकने लगी। सोच रही थी, किसी इंसान में प्रेम या ममत्व जैसी भावना होना उतनी बड़ी बात नहीं जितनी बड़ी बात इंसान का कारुणिक होना! बचपन वाली सिंहोरा की बिब्बो खूब मया करती। लेकिन उस बेटी का जब कोई भविष्य न रहा तो वह अपने बेरोजगार बेटे के भविष्य की चिन्ता में पड़ ग‌ई। उसकी यह चिंता बेटी से उसके प्रेम पर भारी पड़ा। बेटी के दुख से अब वह द्रवित नहीं होती। क्योंकि बिब्बो जैसी स्त्रियां प्रेम और ममत्व जैसे भाव उन्हीं के लिए उड़ेलती हैं जिन्हें वे अपने लिए सुपात्र समझती हैं। उनके अंदर की करुणा भी केवल उन्हीं के लिए उमड़ती है। बाकी के लिए ये क्रूर और संवेदनाविहीन बनी रहती हैं। बिब्बो भी कुछ ऐसी ही एक स्त्री थी। लेकिन क्या पता सिंहोरा ससुराल जाती तो वहाँ भी उसकी ऐसी ही हालत होती। मैं जानती हूँ, अधिकार लेने के पीछे जब लालच का भाव हो तो ऐसी ही परिस्थितियां बनती हैं! वैसे तो सिंहोरा इस बात में निर्दोष ही थी लेकिन इन परिस्थितियों में किसी की निर्दोषिता भी उसके अपने पक्ष में वातावरण सृजित नहीं कर पाती और तब यह बात सच हो उठती है कि दुःख उन्हीं के हिस्से में आता है जो निर्दोष होते हैं!

       “अच्छा फुआ मैं चलता हूँ..” मेरी लंबी चुप्पी देख तखत से उठते हुए ब‌उआ ने मेरे पाँव छूकर कहा। ब‌उआ चला गया था। 

       सूरज धरती की आड़ में समाने जा रहे थे। इधर वातावरण के रंग में भी साँझ की कालिख घुलने लगी थी। यकबयक मेरे कदम सिंहोरा के घर की ओर बढ़ ग‌ए। इन कदमों को उधर जाने से मैं रोक नहीं पाई। उसके घर के सामने सन्नाटा पसरा था। दरवाजे पर कम रोशनी का एक छोटा बल्ब टिमटिमा रहा था। रात घनेरी होने पर यह छोटा बल्ब इस दरवाजे से कितना अँधेरा काट पाता होगा? बल्ब को देखकर मैं सोच रही थी। मुझे घर के अंदर जाने में संकोच हुआ। दरवाजे पर ही खड़ी-खड़ी मैं आहट लेने लगी थी‌। वहां छाए सन्नाटे को टूटता न देख मैं मद्धिम आवाज में पुकार बैठी, सिंहोरा….!!!

       फिर कुछ पल बाद दरवाजे से सटी कोठरी से किसी के पदचाप की आवाज आई। उस अँधेरी कोठरी से एक आकृति निकली, जो धीरे-धीरे चलकर दरवाजे पर लगे बल्ब की रोशनी में आकर खड़ी हो गई! मेरे सामने यह सिंहोरा ही थी!! उसके क्लांत और मलिन चेहरे को देखकर मेरे हृदय में फिर एक हूक उठी! सोचा, आगे बढ़कर इसे अँकवार में भर लूँ। लेकिन उसे निश्चल और भावहीन देख मैं ठहर गई! केवल इतना ही पूँछ सकी मैं, ‘मुझे पहचानी नहीं सिंहोरा..?’  

     “फूटो…!” यह आवाज मूर्तिवत खड़ी सिंहोरा की ही थी..हाँ पहचाना था मुझे!! मेरी दृष्टि उसके चेहरे पर स्थिर हो गई। उसके चेहरे को देखकर मैं समझ गई कि बचपन में उसके अन्तर्मन के जिन गहरे एहसासों का मैंने अनुभव किया था उसकी वह संवेदनशीलता ही आज उसे प्राणांतक कष्ट का अनुभव करा रही है! मुझे ब‌ऊआ का कहा याद आया कि ‘बेचारी तो जैसे अब अपने दिन गिन रही है‌।” एकदम सच कहा था ब‌उआ ने। सामने खड़ी सिंहोरा को देखकर मुझे भी लगा जैसे इस घर में अब उसके जीवन से प्रेम करने वाला कोई नहीं रह गया है उसकी माँ बिब्बो भी नहीं!!

         “फूटो…तू..अब जा…बिब्बो..तुझे..यहाँ देख लेगी..तो..मुझसे झगड़ा..करेगी..भाई..भी” सिंहोरा की कांपती इस मार्मिक आवाज पर मैंने उसकी आँखों में झाँका! वहाँ अथाह समुंदर की लहरें थी!! वेगवती ये लहरें जैसे मेरी ही ओर बढ़ी आ रही थी। एक पल के लिए मैं स्वयं को सिंहोरा समझ बैठी! मुझे सारे दुनियावी रिश्ते-नाते इन लहरों में डूबते-उतराते दिखाई दिए! सहम ग‌ई थी मैं!! लेकिन इन पलों में ही जैसे हम दोनों ने एक-दूसरे से सब कुछ कह-सुन लिया था। मैं अनबोली उल्टे पाँव वहाँ से लौट पड़ी। 

                      *—-------------*

गुरुवार, 2 मई 2024

चिल रहिए यार...साँच को आँच कहाँ..

            प्लेटफार्म पर पहुंचते ही ट्रेन भी आ गई। मेरा रिज़र्वेशन फर्स्ट एसी में था। यह बोगी इंजन के पास लगी थी। बिहार जाने वाली ट्रेनों में खूब भीड़ होती है, इसीलिए प्लेटफार्म पर भी भीड़ थी। ट्रेन में चढ़ने की जद्दोजहद में पड़ी इस भीड़ के बीच से रास्ता बनाते हुए मैं अपने डिब्बे तक पहुँचा। इसमें दाखिल हुआ और एसी जोन का डोर खोलकर आगे बढ़ा। सामने दूसरा डोर देख मैं थोड़ा ठिठका। संयोग से वहां एक टीटी साहब मिल ग‌ए, पूँछने पर ‘उधर सेकेंड एसी है’ कहकर पीछे केबिन में जाने का इशारा किया। दरअसल यह बोगी सेकेंड एसी की थी, जिसमें फर्स्ट एसी के भी दो केबिन थे। स्लाइडर-दरवाजा खिसकाकर मैं केबिन में दाखिल हुआ। ऊपर का बर्थ मेरा था। इससे जुड़ा एक सीढ़ीनुमा ढांचा वाकई में ऊपरवाले बर्थ के लिए सीढ़ी है, यह समझने में मुझे कुछ पल लगे। बर्थ पर चादर का लिफाफा न देख नीचे निहारा‌। नीचे की एक बर्थ पर कोई व्यक्ति सोने की मुद्रा में था तो दूसरे पर एक लड़की अपने मोबाइल में खोई थी। उसे यह भान हुआ कि मैं अपना बिछौना खोज रहा हूं, लेकिन उसकी कोई प्रतिक्रिया न पाकर मैं ऊपर बर्थ पर चढ़ गया।

       ट्रेन के फर्स्ट एसी और सेकेंड एसी के बीच केवल ‘सीढ़ी’ और ‘प्राइवेसी’ का अंतर है। फिर भी अपने बर्थ पर आकर मुझे श्रेष्ठता-बोध हुआ कि हमसे नीचे की जो भी श्रेणी है उसमें सफर करने वाला मेरे से कमतर है। ट्रेन ही नहीं, किसी भी व्यवस्था में यह श्रेणीकरण बहुत जरूरी है अन्यथा बेचारा यह श्रेष्ठता का बोध जीते जी मर जाए‌! पता नहीं मनुष्य स्वयं को क्यों सामाजिक प्राणी कहता है जबकि पद-पैसा-अहंकार के कॉकटेल से अर्जित ‘श्रेष्ठता-बोध’ में वह ‘प्राइवेसी’ को ‘सुविधा’ की तरह चाहने लगता है।

        अचानक “अंकल लीजिए…” सुनकर मैं चौंक पड़ा जैसे सोते से जागा। यह वही नीचे बर्थ वाली लड़की थी जो मुझे एक पैकेट दे रही थी जिसमें बिछौना था। “तो लड़की कांशस थी” सोचते हुए मैंने उससे पैकेट ले लिया। उसका यह संवेदनशील व्यवहार मुझे अच्छा लगा।

        बर्थ पर अब मैंने चादर बिछाया। ट्रेन गाजियाबाद स्टेशन छोड़ चुकी थी। मैं यहीं से ट्रेन में सवार हुआ था।

        “कल ही मुझे स्कूल ज्वाइन करना है,  नहीं तो इसके बाद दो दिन की छुट्टी रहेगी..” उसी लड़की की आवाज थी‌। वह मोबाइल पर किसी से बात कर रही थी।

       दूसरों के बीच में हो रही बातचीत नहीं सुनना चाहिए, लेकिन ऐसी बात निहितार्थ से जब अपनी बात लगे तो सुनने में रुचि होना स्वाभाविक है। मैंने उसकी बातचीत पर कान लगा दिया, 

       “दो कमरे का फ्लैट है, मेरा उसमें जैसे दम घुटता है। मैं बहुत दिनों तक तो दूसरे कमरे तक भी नहीं जाती थी..अब दूसरे कमरे में भी जाने लगी हूं…मैं तो लखनऊ में बड़े घर में रहती आई हूँ। वहां तो छत पर धूप लेने की मेरी आदत है। लेकिन नोएडा की इस सोसायटी में यह संभव ही नहीं। वहां तो कभी धूप मिलती ही नहीं। और सोसायटी में फ्लैट से बाहर निकल कर लोगों के साथ बैठने की भी मेरी आदत नहीं..नोएडा बकवास जगह हम वहां नहीं रहना चाहते।”

       नोएडा में सोसायटी कल्चर पर मैं भी यही सोचता हूं।

       लड़की लखनऊ के किसी सरकारी स्कूल में टीचर है उसके विवाह के तीन माह हुए हैं और उसकी ससुराल नोएडा में है। वहां दो कमरे के फ्लैट में वह संयुक्त परिवार के साथ रहती है। उसका पति दिल्ली में भारत सरकार के किसी मंत्रालय में नौकरी करता है। लड़की को खाना बनाना नहीं आता। इसके लिए उसकी सास टोकती है। ससुराल में वह डरी-सहमी रहती है। लेकिन वह सास की शिकायत नहीं करती। उस लड़की से कोई बदजुबानी करे यह उसे उतना बुरा नहीं लगता जितना कि कहने का अंदाज। वह अंग्रेजी में बोलती है “The problem is not abusing. Problem is tone of talking” इसी में वह जोड़ती है “ये लोग ‘करिए’ की जगह ‘कर’ बोलते हैं।”

        तो पूरब की यह लड़की पश्चिम में ब्याही है, उसकी ‘Tone of talking’ और ‘करिए’ की जगह ‘कर’ वाली बात पर मैंने अनुमान लगाया। मुझे खांटी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बुजुर्ग नेता याद आए। जब उन्होंने मुझसे कहा था, “आप रामायणी हो हम लोग महाभारती…आगरे से पूरब के लोग रामायणी होते हैं जबकि इससे पश्चिम के लोग महाभारती हैं।” इस बात का निहितार्थ भी उन्होंने समझाया था, “रामायण में राजपाट का त्याग कर राम वनवास को स्वीकार करते हैं वहीं महाभारत में सूई की नोक के बराबर भूमि भी देने के लिए तैयार नहीं है।” उनकी इस बात पर मैं मुस्कुरा उठा था। दरअसल उनके कहने का आशय था कि पश्चिम के लोगों की भाषा में अक्खड़पन और उनमें जुझारूपन होता है। मैंने भी उनसे कहा था, “लेकिन यहाँ पश्चिम के लोग गन्ने के जैसे होते हैं ऊपर से कठोर और अंदर से मीठे।” मेरी बात सुन वे बुजुर्ग नेता हँसने लगे थे।

       गाड़ी की रफ्तार धीमी हो रही थी। मुझे पानी का बोतल लेना था। गाड़ी रुकी तो पानी तलाशने मैं नीचे उतरा, लेकिन मेरा डिब्बा प्लेटफार्म के छोर पर था, जहां न कोई बूथ था और न ही वेंडर आता दिखाई पड़ा। उस लड़की ने इस बीच कोच के अटेंडेंट लड़के को पानी का बोतल लाने के लिए पैसे दिए। वह लड़का दौड़ते हुए बूथ तक गया और वहां से पानी का बोतल लाया और लड़की को दिया‌। मैं देखता रह गया। इधर गाड़ी छूटने को हुई तो मैं डिब्बे में चढ़ आया। मैंने उस लड़के से पानी के बोतल के बारे में पूँछा। उसने बताया कि अभी कोई आएगा‌। मैं बर्थ पर चला आया। कुछ देर बाद एक लड़का पानी का बोतल बेचते हुए आया। मैंने उससे एक बोतल लिया।  मैं ईयर बड कान में लगाने जा रहा था कि लड़की फिर मोबाईल पर बात करते सुनाई पड़ी। मैंने उसकी बातों पर कान लगा दिया।

       “नहीं मम्मी जी मेरे खाने की चिंता मत करिए तब तक मैं पहुँच जाउंगी..हाँ, भाई मुझे लेने चारबाग आएगा..आप समय पर खाना खा लिया करिएगा और समय पर दवा भी लेते रहिए…हाँ मैं पहुँचकर बात करुंगी।“ लड़की अपनी सास से बात कर रही थी। 

       इसके बाद उसकी बातचीत उससे फिर होने लगी जिससे पहले हो रही थी, शायद वह बातचीत अधूरी रह गई थी,

     “.. हमें थोड़ा समय का मार्जिन लेकर घर से निकलना चाहिए था..पहली बार था हम अंदाज नहीं लगा सके..जब स्टेशन पर पहुँचे तो गाड़ी छूट रही थी हम दोनों खूब दौड़े..ये हमें तेज दौड़ने के लिए कह रहे थे..मैं हिम्मत भर दौड़ी.. मैंने दौड़ा कि फेफड़े बाहर आ ग‌ए.. लेकिन ट्रेन सामने से निकल गई, बहुत खराब लगा..बस एक मिनट की देर हुई थी… हम हाँफते हुए बैठ ग‌ए..दोनों कुछ देर वहीं सुस्ताए…डेढ़ घंटे बाद यह ट्रेन थी.. इनके रेल विभाग में कोई परिचित थे, उनके प्रयास से इस ट्रेन का रिजर्वेशन मिल गया…अभी मम्मी जी का फोन आया था..नहीं यार..गलती सुधारी जाती है..मेरे लिए फैमिली फर्स्ट..हाँ बढ़िया हैं, हैं तो अच्छे इंसान लेकिन सब को अलग-अलग ढंग से हैंडल करना पड़ता है।” 

          कुछ क्षण तक उसके बतियाने की आवज नहीं सुनाई पड़ी तो मैं समझ गया कि उसकी बातचीत अब खतम हो चुकी है। इधर ट्रेन अपने फुल स्पीड में थी। लेकिन थोड़ी ही देर में उसकी बातचीत फिर सुनाई पड़ी। इस बार उसके आवाज की टोन बता रही थी कि वह अपने पति से बात कर रही थी। उसकी इस बातचीत से मैंने अब अपना ध्यान हटा लिया था। फिर भी उसकी कुछ बातें बरबस मेरे कान में पड़ी जैसे कि, "चिल रहिए यार, सांच को आंच कहां” और मजाक में कही गई  बात ‘I got married to a liar.’  तथा “Don't focus be a negative” 

       वाकई वह लड़की समझदारी भरी बातें कर रही थी। हमारे सोचने का तरीका हमारे जीवन को प्रभावित करता है।

नौकर और मजदूर

       "वे तो उसी पर निर्भर हैं, इसलिए उसने उनको पींज लिया है.. उसे पता है कि उसके बिना उनका काम नहीं चलने वाला…” पत्नी ने कहा‌।

    “अरे, तो इसमें क्या है..उसकी तनख्वाह कम है इसे और बढ़ा दें..अभी काम के हिसाब से उसे पैसा नहीं मिल रहा है…” मैंने बोला।

    “आप नहीं समझते..बात पैसा बढ़ाने की नहीं, पैसा बढ़ा दें लेकिन मजदूर फ्री भी रहना चाहते हैं..उन्हें छुट्टी तो चाहिए ही..और.. उन्हें छुट्टी भी देनी चाहिए…” पत्नी ने कहा।

“हाँ..ये बात तो है…” मेरी स्वीकारोक्ति।

        दरअसल यह बातचीत एक घरेलू कामवाली के संबंध में थी। जिसे कुछ दिन के लिए काम से छुट्टी चाहिए लेकिन उसे छुट्टी देने में इसलिए आनाकानी हो रही थी कि घर का काम कैसे होगा।

       पत्नी से हुई इस वार्तालाप के बाद मुझे ध्यान आया कि ‘नौकर’ होने और ‘मजदूर’ होने में बड़ा फर्क होता है। ऊपर की बातचीत जिस कामवाली के संदर्भ में रही थी उसे मैं ‘नौकर’ समझ रहा था लेकिन  पत्नी की बात से मुझे अहसास हुआ कि वह ‘नौकर’ नहीं ‘मजदूर’ हैं। नौकर तो अपने मालिक के इशारों पर नाचता है, लेकिन मजदूर नहीं!!

   यहां मुझे विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास “नौकर की कमीज” की याद आई। वैसे तो इस उपन्यास में लेखक ने “ब्यूरोक्रेसी” पर जबरदस्त प्रहार किया है जिसकी चर्चा फिर कभी करेंगे लेकिन आज इसमें लेखक ने जिस मनोवैज्ञानिक और व्यंग्यात्मक लहजे में ‘नौकर’ और ‘मजदूर’ के बीच के अंतर को बताया है, उसकी चर्चा कर लेते हैं।

       इस उपन्यास का मुख्य पात्र संतू जो किसी आफिस में एक क्लर्क है, अपने बारे में सोचता है,  “मैं शान्त होता था तो उसी आदमी की तरह, जिसकी एक शेर की देख-रेख करने की नौकरी थी।...शेर की नौकरी के डर से उसे रात-भर नींद नहीं आती थी।... शेर से ज्यादा वह मालिक से डरता था।” तात्पर्य यह कि कठिन से कठिन काम नौकर को नहीं डराता, उसे ‘मालिक’ डराता है।

    "नौकरी में समझने के लिए कुछ रहता नहीं है। कुछ लोग इसलिए नहीं समझते कि उनके लिए कठिन है और कुछ लोगों के लिए समझने के लिए कुछ है ही नहीं।”  दर‌असल यहां नौकरी में जरूरी गुलामी की मानसिकता को इंगित किया गया है।  

     ‘नौकर’ होने की स्थिति में और ‘’मजदूर’ होने की स्थिति में दोनों की मानसिकता में अंतर को उपन्यास में आए इन कथनों से समझा जा सकता है, एक जगह संतू जब स्वयं को नौकर मानकर सोचता है,"

           "मुझे चंद्रमा आकाश में गोल कटी हुई खिड़की की तरह लगता था जिससे आकाश की आड़ में छुपी हुई दुनिया का उजाला आता था। सूर्य का भी यही हाल था। फर्क सिर्फ दिन और रात का था" तो वह यहां इस आकाश की आड़ में छुपे दुनिया के उजाले को पाना चाहता है - 

     लेकिन मजदूर की दृष्टि से उसका नजरिया बदल जाता है। अब वह इस आकाश को फाड़कर पूरे आकाश जितना बड़ा सूरज या चंद्रमा  को नहीं पाना चाहता बल्कि सूरज रोजी का दिन और चंद्रमा रात को नींद लाने का जरिया बन जाते हैं - 

    “जिस प्रकाश की झलक फटे हुए गोल छेद से, सूर्य और चन्द्रमा जानकर वे देखते हैं, उनसे कहा जाए कि सूर्य और चंद्रमा की खिड़की से कूदकर चोर की तरह वहां जाने की बात सोचने के बदले यदि पूरे आकाश को फाड़ दिया जाए तो पूरे आकाश जितना बड़ा सूर्य होगा और चंद्रमा होगा‌। यह बात सोची जाए, तब वे कहेंगे - ऐसे ही रहने दो! सूर्य कभी-कभी हमारे लिए रोजी का दिन भी ले आता है। और चन्द्रमा कभी-कभी नींद की रात। कुछ उल्टा-सीधा हो गया तो हम मिलनेवाले काम के दिन और नींद की रात को भी खो बैठेंगे।” 

           एक ‘मजदूर’ की लालसा उतनी बड़ी या व्यापक नहीं होती जितनी कि एक ‘नौकर’ की। मजदूर में संवेदना और संतोष की वृत्ति हो सकता है, वह काम के घंटों के बाद चैन की नींद सोना चाहता है। जबकि नौकर इस हद तक मालिक की अपेक्षाओं का गुलाम हो चलता है कि संतू के शब्दों में - 

    “ छुट्टी से मुझे घबराहट होती है। छुट्टी मुझे एक ऐसी फुर्सत लगती है जिसमें एक आदमी अपना ही तमाशा देखता है।”

        स्पष्ट है मजदूर लोकतांत्रिक परिस्थिति में ही मजदूर होता है, अन्यथा गुलामी की परिस्थिति में वह नौकर हो जाता है। एक मजदूर काम के प्रति ईमानदार हो सकता है लेकिन नौकर काम की अपेक्षा मालिक के प्रति ईमानदार होता है। इसलिए शेर की सेवा की नौकरी में उसे शेर से नहीं मालिक से डर लगता है।

          जिस कामवाली के संबंध में पत्नी से मेरी बात हुई थी। दरअसल वह नौकर नहीं मजदूर थी, उसे सारा आकाश नहीं बल्कि उसे काम से कुछ पल की छुट्टी चाहिए। मजदूर को जीवन में सुकूँन की तलाश होती है। नौकर की अपेक्षा मजदूर होना कहीं ज्यादा अच्छा है।

बढ़िया सी धूप

         इस वक्त बढ़िया सी धूप खिली हुई है। मैं इस धूप में बैठा शरीर सेंक रहा हूं, हलाकि मेरे शरीर पर कुर्ता पायजामा है,सूरज के धूप की गर्मी इन कपड़ों से छनकर शरीर को गर्मी पहुंचा रही है। शायद बहुत दिनों बाद इत्मीनान से आज धूप में बैठा था।  वैसे महीने के इस द्वितीय शनिवार को अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ जल्दी नहाया, जबकि प्रतिदिन की तरह आज कहीं जाना भी नहीं था। दरअसल सुबह मुझे नाश्ते के रूप में पराठा खाने की इच्छा हो आई थी। वैसे नाश्ता लेने की मेरी आदत नही है लेकिन आज दिन का भोजन देर से लेने का मन था इसलिए सुबह कुछ खाने की सोच लिया। इसी चक्कर में नहाने की जल्दी भी किया। क्योंकि बिना नहाए अन्न खाने की मेरी इच्छा नहीं होती। इसके पीछे कोई धार्मिक मान्यता नहीं बस ऐसे ही मैं इस नियम को अपने लिए बनाया हूं। नहा कर आया तो धूप में बैठने की इच्छा हुई थी। अभी मैं धूप में बैठा ही था कि मेरी रसोई बनाने वाले ने मुझसे पराठा खाने के बारे में पूंछा तो समय देखकर मैंने पंद्रह मिनट बाद लेने के लिए कहा और इस धूप में बैठे हुए यू ट्यूब पर पाकिस्तान के चुनाव परिणाम की चर्चा सुनने लगा। तभी गाँव से पिता जी का फोन आया। वे गाँव के घर का बिजली का बिल भरने के लिए कह रहे थे। मुझे याद आया लगभग दो साल पहले मैं गांव वाले घर के बिजली के बिल का भुगतान अपने आटोमेटिक भुगतान मोड में सेट कर दिया था। तब मैं गांव आया था। पिता जी बिजली का बिल भरने के लिए घर के पास स्थित “पावर हाउस” जाने की बात कह रहे थे। हम गाँव वाले उस 33 के वी के विद्युत सब स्टेशन को “पावर हाउस” ही कहते आए हैं। मैंने पिता जी को पावर हाउस जाने से मना किया था और अपने मोबाइल से उसी समय बिजली का बिल आनलाईन भुगतान कर दिया था। और भविष्य के बिल के आनलाईन भुगतान हेतु उस कनेक्शन को  अपने मोबाइल में आटोमेटिक मोड में सेट कर लिया था तथा निश्चित हो गया था कि अब गाँव का बिल भुगतान होता रहेगा और पिता जी को पावर हाउस जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

        लेकिन पिता जी ने आज जब बिल का भुगतान करने की बात कहते हुए यह कहा कि मुझे अब “पावर हाउस” जाने की इच्छा नहीं होती तो मैंने सोचा उनकी यह ‘इच्छा’ निश्चित ही उनकी उम्र से जुड़ी हुई है। और इस उम्र में पावर हाउस का चक्कर लगाना उनके लिए उचित भी नहीं। यहां मुझे दादा जी की याद आई। वे इस बिल को जमा करने पावर हाउस जाने की चर्चा एक दिन पहले करते थे कि कल बिजली का बिल भरने ‘पावर हाउस’ जाना है। वे भी उस समय अस्सी की उम्र के रहे होंगे। खैर आज पिता जी की बात से मैं थोड़ा हैरान हुआ कि आनलाईन पेमेंट का आटोमेटिक मोड फेल हो गया और मुझे इसकी जानकारी नहीं हुई! ऐप खोला तो पता चला कि कनेक्शन नंबर बदल गया है तथा विद्युत वितरण खंड यूपीपीसीएल की जगह अब पूर्वांचल विद्युत वितरण खंड हो गया है क्योंकि मेरा कस्बा मुंगराबादशाहपुर जौनपुर जनपद में है। खैर पिता जी को फोनकर मैंने संशोधित हुए कनेक्शन नंबर की जानकारी लिया और बिल का पेमेंट कर दिया तथा आटोमेटिक भुगतान मोड में इस कनेक्शन को सेट भी कर लिया। इसी बीच पराठा आ गया था। मैंने इसके साथ गुड़ भी मंगवाया। पराठे के साथ मुझे गुड़ अच्छा लगता है। वैसे पश्चिम में भोजन के साथ गुड़ खाने का खूब चलन है।

        मैं अभी भी धूप में बैठा हुआ हूँ। कौव्वों की काँव-कांव भी खूब सुनाई पड़ रहा है। मेरे अगल-बगल कुछ बड़े पेड़ हैं। इनमें एक बरगद और कुछ अशोक के पेड़ हैं। शेष पेड़ों का नाम मुझे याद नहीं आ रहा। शायद इसके पीछे पेड़ों से संगत छूटना या फिर किसी चीज का नाम जानने में मेरी रूचि कम होना भी हो सकता है। जबकि नाम जानना और इसे याद रखना एक अच्छा गुण है। लेकिन अपनी ही लापरवाही से मैं इस अच्छे गुण से वंचित रहता आया हूं। इस धूप में बैठे हुए यूँ ही मेरी निगाह  दूर स्थित हैंडपंप पर ग‌ई जिसमें समरसेबल लगा हुआ है, अभी कुछ देर पहले यह समरसेबल चालू था। अब इसे बंद कर दिया गया है। लेकिन इसकी टोंटी से पानी की बूँदें रह-रहकर टपक पड़ती हैं एक कौव्वा इस हैंडपंप पर बैठ इस टोंटी में बार-बार अपना चोंच डाल रहा है। मैं इसी कौव्वे को ध्यान से देखने लगा। इधर कौव्वों के कांव-कांव का शोर कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। इसे सुनते हुए बचपन याद आने लगा है तब गाँव में ऐसे ही कौव्वों के काँव-काँव का शोर सुनाई पड़ता था। लेकिन वहाँ तो अब इक्का-दुक्का कौव्वे ही दिखाई पड़ते। गाँव में बहुत सी चीजें बदल चुकी है। ये कौव्वै भी लगता है गाँव छोड़कर शहरों की ओर चले ग‌ए हैं। ऐसा हो भी क्यों न, गाँवों में जीव-जन्तु, पालव-पल्लव के प्रति पहले वाली वह उदारता अब नहीं बची। खैर आज इस काँव-काँव को सुनकर मैं किसी अनजाने सुखद अहसास में खो गया। 

वो क्या है…

       शाम गहराने को थी मैं शहर के रास्ते पर था। दूर क्षितिज के ऊपर चमक रहे सूर्य पर मेरी दृष्टि  चली गई। धरती से आसमान तक छाए कुहासे के धुंध में सूरज एक चमकीले गोले जैसे दिखाई पड़े और धरती पर वृक्ष स्याह-सफेद रंग में रंगे जान पड़े। उधर आसमान में दूर सूरज के नीचे एक पंक्षी अपने पंख फड़फड़ाते उड़ा जा रहा था। इस दृश्य के फ्रेम में इंसानी हस्तक्षेप की कोई भी चीज नजर नहीं आई। प्रकृति अपने सहज रूप में दिखाई पड़ी! मन में आया कि चित्रकार होता तो इस नजारे को कैनवास पर उतार लेता। ठीक इसी समय गाड़ी में बज रहा गीत का बोल सुनाई दिया .. इस गाने को सुनते हुए मेरी गाड़ी शहर के छोर पर पहुँच गई थी, अब तक दृश्यावलि बदल चुकी थी। शहर का विकास देखकर मैं खुश हो रहा था। लेकिन वो क्या है…गाना सुनते हुए मैं समयानुभूति में खो गया….अनुराग फिल्म जिसे अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर मैंने देखा था लगभग चालीस वर्ष पहले! यह गीत उसी फिल्म से था। तब से धरती के कितने रंग बदले कहना कठिन है! पता नहीं यह उम्र का बढ़ना है या फिर धरती पर बदलाव, यह धरती ही अब बेगानी सी होने लगी है, सोचकर मन सिहर उठा, खैर।

      रंग-बिरंगी धरती और इसके सुन्दर नजारे, जिसकी हमारी चेतना साक्षी रही है एक ब्रह्मांडीय परिघटना है! यह सोचना भी स्वयं में अद्भुत है। वैसे तो धरती अपने जन्म से ही बदलती रही है, लेकिन यह बदलाव प्राकृतिक रहा है, इसीलिए परिवर्तन को प्राकृतिक नियम कहा गया। प्राकृतिक नियम गणितीय सूत्र पर आधारित है बल्कि उन रासायनिक संयोजनों में, जिनसे धरती पर जैविक विकास का क्रम आगे बढ़ा, उनमें भी प्रकृति ने इस गणितीय सूत्र का अनुगमन किया। इससे धरती पर हुआ जैविक विकास सिमेट्रिक ही रहा, चाहे यह सरल से जटिल की ओर ही क्यों न हुआ हो! इसमें मनमानापन नहीं आया। 

        आज आदमी स्वार्थ-लिप्सा में प्रकृति में अन्तर्भुक्त इस गणितीय सूत्र के बदले उस रसायनिक-सूत्र का इस्तेमाल कर रहा है जिससे धरती के बदलावों में अब विकृति और सूनापन नजर आने लगा है। यह विकास के लिए ‘परिवर्तन’ नहीं ‘उत्परिवर्तन’ है, जिसमें व्यवस्था की जगह अव्यवस्था, जोड़ की जगह घटाव और विलोपन है। इसका परिणाम इंसान को भयभीत करता है। क्योंकि यह उत्परिवर्तन धरती के ‘स्वधर्म’ को क्षति पहुँचा रहा है। वैसे भी यदि कोई वस्तु ‘स्वधर्म’ त्याग कर दूसरा ‘धर्म’ ग्रहण कर ले तो परिणाम भयावह होता है, उस वस्तु का अस्तित्व विनष्ट हो सकता है। गीता में भी कहा गया है, स्वधर्म निधनं श्रेय परधर्मो भयावत:। प्रकृति हो या व्यक्ति सभी का अपना स्वधर्म है। मानव के स्वार्थ-लिप्सा के इस काल-खंड में व्यक्ति की मन:स्थिति भी प्रभावित हुई है। उसकी सारी संवेदनाएं इस लिप्सा के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है। उसका स्वभाव अब इस सीमा तक जटिल हो चुका है कि उसे अपने ‘स्वधर्म’ की ही समझ नहीं। इसलिए आज उसका मानवीय स्वभाव संकट में है।

          जब गीता ‘स्वधर्म’ की बात करती है तो इसका आशय जाति, पंथ, मजहब या धर्म से नहीं, बल्कि चेतना के उस गुण-धर्म से है, जिसे वह किसी देश-काल, परिस्थिति में विकसित होते हुए अर्जित करती है। गीता चेतना के इसी गुण-धर्म को पहचान कर व्यक्ति को कर्तव्य-कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। गौतम बुद्ध भी इसके पहचान के लिए “आत्मदीपो भव” का उपदेश देते हैं। वे मानते थे कि इस स्थिति में ही हम दुखों से मुक्ति पा सकते हैं। यह दुख और कुछ नहीं व्यक्ति के स्वभाव की वह जटिलता है जिसके कारण क्षरित होते इस पर्यावरणीय परिस्थिति में उसके पास तमाम प्रश्नों का उत्तर होते हुए भी वह जीवन के ऐसे चक्रव्यूह में फंसा है जहाँ खुशी के सारे इंतजामात कर लेने के बाद भी वह दुखी है। दरअसल गीता हो या बुद्ध, दोनों का आशय जीवन के इस जटिलता को समझाना और इससे उपजे दुख से मुक्ति का मार्ग बताना है।

         ‘वो क्या है…’  गाने में नायिका की आँखों में अंधेरा है..इस गाने के प्रारंभ में नायक नायिका की अनुभूतियों को जगाता है..फिर नायिका आँखों में अँधेरा लेकर भी सागर, लहरें और नाव देख लेती है! इन्हें वह कैसे देख लेती है, नायक के यह पूँछने पर वह कहती है, मन से आँखों का काम लिया। बस।

हित अनहित पशु पक्षिउ जाना

         यह आज की बात नहीं है। उस दिन लखनऊ वाली सुबह की बात है। कुछ दिनों से मैंने सुबह टहलना लगभग छोड़ ही दिया है। जब बहुत मन होता तो घर की बाउंड्री के अंदर ही चहलकदमी वाली टहलाई कर लेता। लेकिन सुबह बाहर खुली हवा में टहलने का आनंद कुछ दूसरा ही होता है। फिर भी मैं यह जरुर सोचता कि मनमाफिक समय और स्थान मिलने पर सुबह आउटडोर वाली टहलाई जरुर होगी! हाँ उस दिन सुबह की बात है। घर की चहारदीवारी में टहलते-टहलते अनायास ही एक बात याद आई कि क्या बुलबुल पक्षी डेली स्नान करते हैं? यहां बात यह थी कि उस चहारदीवारी में टहलते हुए मिट्टी के कठौते में भरे पानी को मैंने यह सोचकर गिरा दिया था कि इसमें मच्छर पल सकते हैं। पत्नी जी ने इसे देखा तो मुझे बताने लगीं कि इस कठौते में पानी इसलिए भर कर रखती हूँ कि अकसर सुबह-सुबह बुलबुल पक्षी इसमें नहाने आते हैं। फिर उन्होंने कहा कि ये सुबह सात साढ़े सात के बीच आते हैं। चूँकि उस दिन में उनके आने के समय वहाँ टहल रहा था इसलिए बुलबुल उस दिन वहाँ नहाने नहीं आए। अब मैंने तय किया कि कम से कम इनके नहाने के समय इस स्थान पर मेरी टहलाई स्थगित रहेगी। खैर जब अगले दिन मैं देर से उठा तो श्रीमती जी ने उस पानी भरे कठौते की ओर इशारा करके मुझे बताया कि इसमें बुलबुल के जोड़े अभी स्नान करके ग‌ए हैं। मैंने देखा कठौते में बुलबुल के नहाने और पंख फड़फड़ाने के कारण कठौते के चारों ओर पानी छलका पड़ा था। इसे देखकर मुझे कंपकंपी भी आई कि कठौते के ठंडे पानी में नहाते समय क्या बुलबुल को ठंड नहीं लगी होगी? जबकि हमेंं इस जाड़े में नहाने के लिए पानी गरम करना पड़ता है। खैर।

              उसी दिन की बात है शाम को मैं चक्की से आटा पिसवाकर आया था। गेट खुला हुआ था और एक जाना-पहचाना कुत्ता पत्नी के पास बैठा दुलरा रहा था और वे भी उसे दुलार रहीं थी! उन्होंने मुझे बताया कि यह आज मुझसे मिलने आया है। मैं भी इस कुत्ते को कम से कम दस वर्ष से जानता हूं जब यह एक छोटा पिल्ला था। इसे पाला भी नहीं गया था लेकिन श्रीमती जी इसे तब से कभी बिस्कुट तो कभी दूध या रोटी देती आई हैं। यह मेरे घर के सामने और आसपास की सड़कों पर खेलते-कूदते ही बड़ा हुआ। इसे हम सभ्यों की भाषा में स्ट्रीट डॉग भी कह सकते हैं क्योंकि इसका कभी कोई घर नहीं रहा। इधर पाँच-छह वर्षों से यह कहीं किसी और गली में रहने लगा है लेकिन यह श्रीमती जी को भूला नहीं है अकसर सात-आठ दिन पर यह इनसे मिलने ऐसे ही चला आता दुलराता है और फिर वापस चला जाता है।

      इस घटना को याद कर आज यहां शामली में अपने आवास में टहलते हुए मुझे रामचरित मानस की यह चौपाई बरबस ही याद आ गई -

मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥

हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना॥2॥

         वाकई में! यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि पशु और पक्षी किसी इंसान की भावना या उसके अंदर की संवेदना को कितनी आसानी से पहचान जाते हैं लेकिन वहीं पर स्वार्थ और अहंकार में डूबा इंसान इसे पहचान नहीं पाता!! तो क्या ऐसे इंसान पशु और पक्षियों से भी ग‌ए गुजरे होते हैं….