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शनिवार, 9 दिसंबर 2017

अभयदाता-तंन्त्र

          "अरे सर..आप आफिस में हैं...कहाँ मिलेंगे...?.. एक कार्ड है...आपको देना था.." मोबाइल फोन पर आती यह आवाज एक परिचित की लगी..। "इस समय तो, मैं किसी गाँव में हूँ...हो सकता है..आने में देर लगे.." मैंने फोन पर कहा। असल में मैं भी सरकारी आदमी हूँ, सरकारी काम से ही गाँव में था। "फिर तो..मैं आपके आवास पर यह कार्ड भेज देता हूँ.. कोई तो होगा न आवास पर..?" उधर से आवाज आई। "नहीं..दरवाजे के नीचे से कार्ड डाल दीजिएगा...मुझे मिल जाएगा.." मैंने बोला। "ठीक है..लेकिन कल आइएगा जरूर..हमारे भाई का सम्मान-समारोह है।" "कार्ड मिले या न मिले आपका फोन आ गया यही बहुत है..हम अवश्य आएंगे।" फोन करने वाले व्यक्ति से मेरा कोई प्रगाढ़ परिचय तो नहीं था, लेकिन जैसे मैंने चाटुकारिता में यह वाक्य बोला हो। इसके साथ हमारी वार्ता भी समाप्त हो गई थी। यह गाँव एक कम ऊँचाई वाले पहाड़ी चट्टान पर बसा हुआ है। गाँव से लौटते समय वातावरण में धीरे-धीरे काला रंग भरने लगा था। 
          
          इस इलाके में पहाड़ तोड़कर निकले पत्थर से गिट्टी बनाई जाती है। यहाँ पहाड़ को उसकी ऊँचाई से अधिक की गहराई तक खोदकर उसे गिट्टियों में बदल गायब कर दिया जाता है। इसलिए इस क्षेत्र में पत्थर तोड़ने वाले क्रेशर-मशीनों का उद्योग पनप आया है। कहते हैं, यहाँ के गरीब-मजदूर इसमें रोजगार पाते हैं। लेकिन, एक-एक कर गायब होते पहाड़ों के बाद फिर यहाँ क्या बचेगा? और तब इस क्षेत्र में मजदूरों के लिए कौन सा रोजगार पनपेगा? फिर तो, पत्थर उद्योग में मजदूरों के लिए रोजगार तलाशना यहाँ के लिए दीर्घकालिक रूप से घाटे का सौदा ही सिद्ध होगा, क्यों! क्योंकि, ये पहाड़ मुझे वनस्पतियों और नमी का संरक्षण करते दिखाई देते हैं, या कम से कम जैव-संवर्धन के लिए ये पहाड़ यहाँ होने ही चाहिए। लेकिन एक कम वर्षा वाले सूखे क्षेत्र में ऐसा पहाड़-तोड़ पत्थर-खनन हृदय-विदारक और व्यवस्था के प्रति मन विचलित करने वाला है। या तो, शायद हम सोच बैठे हैं; भविष्य में मानव सभ्यता इतनी विकसित होगी कि उसके अस्तित्व के लिए धरती की भी आवश्यकता न हो! 
          यहाँ खदान-क्षेत्र में गाँव की सड़कें, ट्रकों से पत्थर-ढुलाई के चलते बारहों महीने खास्ताहाल रहती हैं, जिस पर चलना दूभर होता है। इस क्षेत्र की सड़कों का मरम्मत सीमित सरकारी बजट में नहीं हो पाता। जब-तब क्रेशर-यूनियन वाले अपने व्यावसायिक हित में ट्रकों के चलने लायक सड़कों की मरम्मत कराते हैं, लेकिन बरसात के दिनों में स्थिति बेहद खराब हो जाती है। सड़कों पर बन आए गड्ढों में भरे पानी में ट्रक छपकोरिया खेलते हुए निकलते हैं, और गड्ढों में उठे सुनामी से किनारे के कच्चे घरों की दिवालें छीज कर भरभरा जाती हैं। इन बेचारों बुन्देलखण्डियों के लिए गड्ढे में उठी सुनामी ही बहुत कुछ है, चाहे इससे भला हो या बुरा! वैसे यहाँ के ये लोग इसे ही अपनी नियति मान बैठे हैं, लेकिन कभी-कभी इनका विरोध तूती की आवाज जैसे सुनाई दे जाती है।
          
            उस दिन गाँव वाले बहुत आक्रोशित थे, खासकर औरतें। और, विरोध का नेतृत्व भी औरते ही कर रहीं थीं। एक औरत जबर्दस्ती मुझे अपने घर के अन्दर ले गई। आँगन को दिखाते हुए उसने कहा, "देख रहे हैं न साहब, इस पानी को हमें उलचना पड़ता है..लेकिन कहाँ उलचे..? इनके ट्रकों ने रास्ता-नाली सब बर्बाद कर दिया है" मैं आँगन में पानी भरा देख बाहर आ गया। मैंने देखा, गाँव के बाहर उस रास्ते पर सैकड़ों ट्रक खड़े थे और ग्रामीणों ने सड़क पर अवरोध खड़ा कर रखा था। "साहब समस्या सुलझने तक इस रास्ते से ट्रकों को नहीं जाने देंगे" आवाज एक औरत की थी जो एक घर की कच्ची दीवाल के पास सड़क के गड्ढे में जमें पानी की ओर इशारा कर कह रही थी।
            ठीक उसी समय नेता के लिबास में एक व्यक्ति नमूदार हुआ। जो उस औरत से कहने लगा, "बनवाता नहीं हूँ क्या इस सड़क को..जो किचिर-पिचिर किए जा रही हो..अभी पिछली बार ही तो बनवाया था इसे।" फिर उसने अपना परिचय क्रेशर-यूनियन के प्रतिनिधि के रूप में देते हुए मुझसे कहा कि क्रेशर-मालिकों के चन्दे से वह सड़क ठीक कराता रहता है। "तो ये हैं प्रतिनिधि जी, आला अफसर ने इन्हीं को लेकर समस्या हल करने के लिए कहा था!" उन्हें देखकर मैंने सोचा। "का ठीक कराए थे? सब पैसा खा जाते हैं .." वह औरत बोली थी। "अरे! ये गाँव के लोग ऐसे ही झूठ बोलते हैं..इसीलिए इनकी ऐसी दशा है..हाँ, तुम लोग दिवाल हटाने के लिए पैसा भी तो ले चुके हो..लेकिन अभी तक नहीं हटाए..सड़क छेंक कर घर बनाए हो!" प्रतिनिधि ने कहा था। "का हटाएं..अभी पूरा पैसा भी तो नहीं दिए...बारिश में कहाँ जाएँ! फिर हमारा घर तो यहाँ पर पहले से बना है..तब तुम क्रेशर-वेशर वाले भी नहीं थे" महिला ने तीखे शब्दों में कहा था। मैंने देखा यहाँ की समस्या पर पुरुषों द्वारा विरोध नगण्य था। शायद मजदूर टाइप के पुरुष अपनी गरीबी, बेकारी और नशाखोरी जैसी आदतों के कारण क्रेशर मालिकों के साथ समझौता-परस्ती के लिए मजबूर होंगे। मैनें गाँव वालों को किसी तरह समझा-बुझा कर रास्ता खुलवाया। 
          इसके बाद, एक दिन क्रेशर-यूनियन के वही प्रतिनिधि मेरे कार्यालय में मुझसे मिलने आए। उनका नाम रामनयन था। कहते हैं, रामनयन पहले साइकिल से चलने वाले अति साधारण आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति थे। लेकिन आज क्रेशर-मशीनों के मालिक हैं तथा लग्जरी वाहनों में चलते हैं। इस क्षेत्र में ज्यादातर क्रेशर-मशीनें नेता-अफसर-ठेकेदारों के आपसी गठजोड़ और उनकी काली कमाई से अस्तित्व में हैं। हाँ तो, आते ही रामनयन ने जिले के आला अफसर से अपने परिचय की चर्चा किए। चर्चा का विषय था कि कैसे वे दलितों से एक भूमि-विवाद के मामले में उस आला अफसर से तहसीलदार को डटवाते हुए अपने पक्ष में जमीन की पैमाइश करा लिए थे। बस यही, इतना परिचय था उस व्यक्ति से ! या फिर, आला अफसर को देने के लिए लाये एक तोहफे के साथ, उस व्यक्ति को मैंने एक समारोह में देखा था।
           हाँ, फोन रामनयन का ही था। आवास पर लौटते-लौटते अँधेरा हो गया था। दरवाजा खोला तो सामने फर्श पर एक कार्ड पड़ा मिला..मैंने कार्ड उठाया। यह एक आमंत्रण-पत्र था। "तो, रामनयन ने उच्च न्यायालय में न्यायाधीश बने अपने भाई के स्वागत-समारोह में मुझे आमंत्रित किया है।" लेकिन मेरा मन अगले दिन होने वाले उस स्वागत-समारोह में सम्मिलित होने को लेकर एक अजीब से ऊहापोह में फंस गया। मैंने निस्पृह-भाव से उस आमंत्रण-पत्र को मेज के एक किनारे रख दिया। न जाने क्यों, मेरा अन्तर्मन मुझे वहाँ जाने से रोक रहा था। इसे लेकर मैं किंचित तनाव में आ गया। उस स्वागत-समारोह में जाकर मैं साधन नहीं बनना चाहता था। लेकिन मन को समझाया, "बाबू, यह लेन-देन का खेल है, यही सामाजिकता है!" मन अब वहाँ जाने के लिए तैयार हो चुका था। 
             समारोह-स्थल काफी कुछ बेहतर ढंग से सजाया गया था।सम्मान-मंच भी किसी नाट्य-मंच की तरह सजा था। विवाह-मंडप की सी रौनक वहाँ छायी हुई थी। चकर-पकर मैं उस स्थान को निहार रहा था कि तभी रामनयन की निगाह मुझ पर पड़ी। वे मेरे पास आए और मुझसे हाथ मिलाकर अन्य अतिथियों की ओर मुड़ गए। मैं यूँ ही खड़ा रहा और एक-एक कर वहाँ आए अतिथियों को निरखने लगा था। क्षेत्रीय विधायक, स्थानीय छुटभैये नेता, ठेकेदार, अफसर, क्रेशर मालिक ही तो वहाँ दिखाई पड़ रहे थे! मामला उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति के स्वागत का था, सो जनपद के न्यायाधीशों की भी आमद हो चुकी थी। मतलब तंन्त्र के सभी विशिष्ट-जन वहाँ उपस्थित थे। अब तक मैंने भी दर्शक-दीर्घा में स्थान ग्रहण कर लिया था। अनमने से, बैठे-बैठे मैं न जाने किस बात की टोह में था कि उद्घोषक की आवाज पर कान दे दिया "माननीय न्यायमूर्ति बस आने ही वाले हैं।" कुछ ही क्षणों बाद न्यायमूर्ति जी की कार समारोह-स्थल पर प्रवेश कर रही थी। सभी अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर उनका स्वागत करने लगे थे। आयोजकों ने मंच पर ले जाकर उन्हें आसन ग्रहण कराया। 
         करतल-ध्वनि के स्वागत के बीच उद्घोषक ने बारी-बारी से विशिष्ट-जनों को न्यायमूर्ति के स्वागत के लिए मंच पर आने का आह्वान किया। सबसे पहले प्रशासन और पुलिस विभाग के अधिकारियों और तत्पश्चात अन्य विशिष्ट-जनों से न्यायमूर्ति का स्वागत कराया गया। वाकई! आयोजकों का प्रशासनिक अधिकारियों पर अच्छा प्रभाव दिखाई दे रहा था और स्वागत-समारोह का यह आयोजन न्यायमूर्ति के लिए कम, आयोजकों के लिए ज्यादा लगा, जो रामनयन की विशिष्टता में वृद्धि करने वाली थी। इस बीच बैठे-बैठे रामनयन की मुझसे कही एक बात याद आ गई। रामनयन ने कहा था, "हम आपस के हैं.. वह मेरी नहीं सुनता, मैं उसकी शिकायत करवा देता हूँ...जरा आप उसकी कस कर जाँच करा दीजिएगा..उसे सबक मिल जाएगा।" खैर, मेरे हाँ-हूँ के बाद वह बात आई-गई हो गई थी। मात्र कुछ क्षणों के परिचय से रामनयन के लिए मैं "आपस का" हो गया था। यह परिचय भी क्या बला है, जो कभी-कभी घोर धर्म-संकट में डाल देता है। ऐसे कई अवसर आए जब इस धर्म-संकट से उबरने के चक्कर में मेरे परिचित धीरे-धीरे अपरिचित होते गए। परिचय का यह खेल मेरे समझ में कभी नहीं आया। 
           इन्हीं बातों में खोई मेरी तन्द्रा को मंच के उद्घोषक ने तोड़ा। बात कोई विशेष तो नहीं, लेकिन न जाने क्यों मैं इस पर कान दे गया। उद्घोषक जी मंच से कह रहे थे, "देखिए! ऐसे होते हैं संस्कारी...न्यायमूर्ति जी के बगल में नहीं बैठना चाहते..आखिर कैसे बैठेंगे.. प्रोटोकॉल एलाउ नहीं करता बगल में बैठना..! इसे कहते हैं संस्कार!!"  मंच पर न्यायमूर्ति जी अकेले बैठे थे उनके अगल-बगल की कुर्सियाँ खाली थी। आयोजक ने जनपद के किसी अधिकारी को उनके बगल की कुर्सी पर बैठने के लिए कहा होगा तो उन अधिकारी जी का संस्कार जाग उठा था। वाकई! यह देश ऐसा ही है ; छोटे-बड़े का देश! इस देश में किसी बड़े के सामने कोई छोटा ऊँची आवाज में नहीं बोल सकता..ऊँची आवाज में बोलने का अधिकार तो यहाँ केवल बड़ों को ही प्राप्त है। सदियों से यही संस्कार मिला है यहाँ के लोगों को।
          इसके बाद उद्घोषक ने न्यायमूर्ति की सहृदयता का उल्लेख किया, "माननीय जज महोदय इस क्षेत्र के बारे में बेहद संवेदनशील हैं...रास्ते में आते समय क्रेशर-मशीनों से उठते धूल पर इन्होंने चिंता जताई..इस धूल से लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे दुष्प्रभाव पर चिन्तित थे...! लेकिन हम माननीय न्यायमूर्ति जी से यह भी कहना चाहते हैं कि यहाँ के गरीबों-मजदूरों-बेरोजगारों के लिए यह पत्थर-उद्योग रोजगार मुहैया कराता है।"  यह कहते हुए उद्घोषक जी ने न्यायमूर्ति की ओर ऐसे देखा, जैसे लगे हाथ वे उनसे यहाँ के पत्थर-खनन और क्रेशर-उद्योग से संबंधित किसी याचिका पर अभयदान मांग रहे हों। ऐसे विशिष्ट-जनों के बीच गरीब-मजदूर-बेरोजगार जैसे अविशिष्ट जन इस स्वागत-समारोह में आमंत्रित नहीं थे। आखिर ये बेचारे दिखाई भी कैसे देंगे, विशिष्ट-जनों के गठजोड़ के हिस्से जो नहीं हैं! 
            मेरा मन उद्विग्न हो उठा! यहाँ मुझे एक अजीब सा घुटन हो रहा था। अचानक मैं उठा, और समारोह-स्थल से बाहर निकल आया। बाहर आते ही मुझे सुकून का एहसास हुआ और मैं विशिष्ट-जनों के अभयदाता-तंन्त्र से आजाद था। अब मैं अविशिष्ट और मुझे भय के साथ जीना था। फिर भी न जाने क्यों, मैं अपनी अविशिष्टता के एहसास के साथ खुश था, जिसमें गजब की स्वातंत्र्यतानुभूति थी। 

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

मैं किसी के जेब-वेब में नहीं रहती

         शाम को आफिस से लौटकर अपने आवास में पदार्पण करते समय मैं मोबाइल फोन पर बात भी कर रहा था। बात समाप्त होने पर देखा, फोन के स्क्रीन पर श्रीमती जी का नम्बर दिखाई पड़ा, लेकिन मैंने काल पर प्रेस नहीं किया तथा फोन को वैसे ही, यह सोचते हुए, अपनी पैंट की जेब में रख लिया कि, अभी थोड़ी देर बाद रिलैक्स होकर फोन कर लेंगे। इसके बाद किसी काम में व्यस्त गया तथा फोन के बारे में भूल गया। कुछ क्षणों बाद मेरे कानों में एक महीन सी "हलो-हलो" की आवाज सुनाई पड़ी। यह आवाज मेरे जेब में पड़ी मोबाइल फोन से आ रही थी। देखा, श्रीमती जी की ही काल थी...मैं समझ गया कि मोबाइल के टच-स्क्रीन पर टच हो जाने से काल चली गई होगी।              

          जेब से फोन निकाला और मैं भी "हलो-हलो" करने लगा। उधर से श्रीमती जी की आवाज आ रही थी  "तुम्हें मेरी आवाज सुनाई नहीं पड़ रही है क्या? इतनी देर से हलो-हलो कर रही हूँ...!"  मैंने कहा, " नहीं..ऐसी बात नहीं..असल में यार! तुम्हारी आवाज मेरे जेब से आ रही थी.." मेरे इतना कहते ही वह तपाक से बोली, "सुनो! मैं किसी की जेब-वेब में नहीं रहती कि मेरी आवाज जेब से आएगी..!!" मैंने हँसते हुए कहा, " अरे भाई! तुम नहीं, मेरा मोबाइल मेरे जेब में था..जहाँ टच हो जाने से काल चली गई होगी ..मैं जानता हूँ..तुम जेब में नहीं रह सकती" खैर, इसके बाद हम दोनों एक साथ हँस पड़े थे। 

         

         मैं जानता हूँ, श्रीमती जी अपनी पत्नी की भूमिका के साथ-साथ एक स्त्री होने और इसके सम्मान के प्रति भी काफी सजग और संवेदनशील रही हैं, शुरू से ही मुझे इस बात का इल्म रहा है और इसी वजह से कभी-कभी वे पारिवारिक परिस्थितियों में असहज हो जाती हैं। खैर, फोन पर हमारी वार्ता समाप्त हुई तो मेरा ध्यान उस दिन की उनकी बात पर चला गया।

         किसी छुट्टी के दिन जब मैं घर पर होता हूँ तो उनके किचन-टाइम पर मैं भी या तो टी.वी. पर न्यूज देखने या फिर मोबाइल में व्यस्त हो जाता हूँ। अकसर इस बात को लेकर हमारे बीच नोंक-झोंक भी हो जाती है। उस दिन मैंने अपनी इस ज्यादती को भाँप लिया और उनका साथ देने के लिए किचेन में चला आया। भृकुटी टेढ़ी कर उन्होंने मुझे देखा था, जैसे वे कहना चाहती हों, "मैं आपकी चाल समझती हूँ।" हाँ मेरी चाल उनकी डाट से बचने की ही थी, लेकिन वे बोली कुछ नहीं और इधर मैं वहीं किचेन की काली ग्रेनाइट वाले प्लेटफार्म के ऊपर पसर गया था। रोटी बेलते और सेंकते हुए श्रीमती जी हमें बताने लगी थीं.. 

          "जानते हो...वह जो हमारे घर के पीछे के खाली प्लाट पड़े हैं न..कल जब मैं गैलरी में थी तो देखा, एक दुबली-पतली कृशकाय स्त्री वहाँ उगे झाड़ और पेड़ों से सूखी टहनियाँ इकट्ठी कर रही थी...वहीं जमीन पर बैठा एक पुरुष आराम फरमा रहा था...वह उस औरत का पति ही था और दोनों मजदूर ही थे...काफी देर तक, मैं उस औरत को देखती रही थी...अब तक अकेले ही वह औरत लकड़ियों का एक बड़ा गट्ठर तैयार कर चुकी थी...उस गट्ठर को उसने यत्नपूर्वक अकेले ही बाँधा भी और वह औरत मुझे गर्भवती भी दिखी...मुझे उस स्त्री की, इस दशा पर अब तरस आने लगा था...और...इधर लकड़ियाँ तोड़ने से लेकर गट्ठर बाँधने तक उसका आदमी वहाँ बैठा रहा और उसने उस स्त्री की कोई मदद नहीं की थी..! मैंने देखा, उस औरत ने कपड़े की एक गुड़री बनाई और उसे अपने सिर पर रखा, फिर किसी तरह लकड़ी के उस गट्ठर को अकेले ही अपने सिर पर उठाकर रखा...यह सब मुझसे देखा न गया और उसके पास चली गई..."

          रोटियाँ बेलते और सेंकते हुए ही श्रीमती जी ये बातें मुझे बता रही थीं। इस दौरान मैं ध्यान से उनकी बात सुन रहा था...बातें मुझमें उत्सुकता जगा रही थी। एक बात और, इस सुनने-सुनाने के बहाने हमारा साथ भी हो रहा था। इधर मेरी दृष्टि सिंकती रोटियों पर भी पड़ रही थी। रोटियाँ आँच पाकर फूलती और जैसे ही फूली रोटियों से भाप निकलता, वे धीरे से पिचक जाती...फिर आगे की बात बताई..

         "जैसे ही स्त्री ने गट्ठर अपने सिर पर रखा..मैं उसके सामने खड़ी थी... मैंने उससे पूँछा, "तुम्हारे पेट में कितने महीने का बच्चा है?" उस स्त्री ने सकुचाते हुए बताया, "आठ...नहीं..नौ महीने का..!" आगे मैंने पूँछा, "तुम्हें जाना कहाँ है?" स्त्री का गंतव्य यहाँ से लगभग तीन किमी दूर पड़ता है..मैंने उसे डाटते हुए कहा, "उतार गट्ठर..तुरंत उतार.! तू यह गट्ठर नहीं ले जाएगी" स्त्री ने लकड़ी का गट्ठर अपने सिर से उतार कर जमीन पर रख दिया....

         ....इधर गुस्से से मैंने घूर कर उसके पति की ओर देखा, जो अब तक उठकर खड़ा हो गया था, मैंने पूँछा "क्यों..तू इसका पति है न?" उसके "हाँ" कहते ही मैंने उसे फिर डाटा, और कहा, "तू तो ठीक-ठाक है! और तू इसका पति भी है?...और...तुम्हारी यह पत्नी गर्भवती भी है न" अब वह सिर झुकाए मेरी बात सुन रहा था... मैंने उससे कहा, "तुम्हें शर्म नहीं आती...यह बेचारी गर्भवती है और कमजोर भी है...तब भी, इसने अकेले ही लकड़ियाँ तोड़ी और गट्ठर बनायी और अपने सिर पर भी रखा...तुमने कोई मदद नहीं की...इस हालत में बेचारी इतनी दूर तक लेकर जाएगी भी..!!" मैंने कहा, "यह नहीं ले जाएगी इस गट्ठर को...इसे तू ले जाएगा..! उठा इसे..! रख अपने सिर पर..!!" अब तक मेरी डाट से सहमा उसका पति गट्ठर को अपने सिर पर चुपचाप रख लिया था और आगे-आगे वह पीछे-पीछे उसकी वह स्त्री.. दोनों वहाँ से चले गए।"

            पूरी बात ध्यान से सुन मैंने एक गहरी साँस ली और श्रीमती जी से मैंने बस इतना ही कहा,

          "यार, गरीबी की स्थिति में और शारीरिक श्रम करने के कारण इन मजदूर टाइप के लोगों को अपनी संवेदनाओं को भी समझने का मौका नहीं मिलता होगा..!"

            मेरी बात पर उन्होंने मुझे ध्यान से देखा और रूखे अंदाज में बोली, "रोटियाँ सिंक गई हैं, खाने की तैयारी करो" यह कहते हुए वे किचेन से बाहर जाने लगीं तो मैं भी उनके साथ पीछे-पीछे किचेन से बाहर चला आया...वाकई!  चीजों को बहुत गहराई से समझने की जरूरत होती है। 

    

             इधर "नाक से सिंदूर लगाने" की बात पर मुझे ध्यान आया कि इस बात पर हमारे बीच बहुत पहले से ही चर्चा होती रही है। मैंने श्रीमती जी को मजाक में कई बार टोका भी है। ऐसे ही एक बार जब मैंने कहा, "यार, तुम सिंदूर नहीं लगाती, या लगाती हो तो बहुत कम...पता ही नहीं चलता..."  इस पर उन्होंने कहा था, "देखिए, हमारा विवाह बचपन में ही हो गया था..तब मेरी दादी कहा करती थी..सिंदूर इस तरह नहीं लगाना चाहिए कि दिखाई पड़े..या फिर सिर को पल्लू से ढँके रहना चाहिए...सिंदूर लगाना दिखावे की चीज नहीं होती..इसे दिखावे की तरह नहीं लगाना चाहिए" आगे उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा, "तभी से मेरी यह आदत पड़ गई है और ऐसे भी, लोग अपनी प्रिय चीज को बुरी नजरों से बचा कर रखते हैं... नुमाइश नहीं लगाते...समझे..!" इसके बाद मैंने इस विषय पर उन्हें फिर कभी नहीं टोंका। 

           सच है रिश्ते प्रदर्शित नहीं किए जाते बल्कि रिश्तों को जिया जाता है, प्रदर्शन में तो खोखलापन छिपा होता है!

निडरता और जीवन की सार्थकता

         "हम नौकरी-पेशा वाले न जाने क्यों पचास के पार थके-थके से लगने लगते हैं...लगभग स्थितिप्रग्य या कहें कि स्टैग्नेशन के अंदाज में! जैसे, जहाँ जाना था जा चुके, जहाँ से लौटना था लौट चुके हैं।" अपने पूर्व साथियों को देखते हुए मैंने उस दिन यही सोचा था..इनके चेहरों पर मुस्कुराहटें तो थीं..और..हँसी भी थी...लेकिन इनमें अब वह उल्लास दिखाई नहीं दिया था जो आठ-दस वर्षों पहले किन्हीं ऐसी ही मुलाकातों में दिखाई देता था। 

               घर पर आ मैंने श्रीमती जी से इसी बात की चर्चा की थी..वह मुझपर फटते हुए से बोली थीं, "अरे हाँ..सब आप की ही तरह गैरजिम्मेदार थोड़ी न होते हैं...सबको अपने परिवार की चिन्ता होती है...बस एक तुम्हीं हो, जैसे किसी से कोई मतलब नहीं.." हलांकि मैंने सफाई भी दी.. लेकिन एक स्त्री जिसका पति दूर नौकरी कर रहा हो और वह छोटी-बड़ी परिवारिक समस्याओं से अकेले जूझती रही हो तो, इस तरह उसका फटना स्वाभाविक ही है। मैंने सफाई दी "नौकरी भी तो, मैं परिवार के लिए ही कर रहा हूँ" लेकिन मेरी इस बात का भी उनपर असर होता नहीं दिखा।

   

            खैर, जो भी हो..उम्र के पचासवें वर्ष के आसपास पहुँच कर हम जैसे नौकरी-पेशा व्यक्तियों के चेहरों और स्वास्थ्य पर जीवन के जद्दोजहद और उससे उपजे तनाव का स्पष्ट-लक्षण परिलक्षित होने लगता है, साथ ही पारिवारिक समस्याओं से भी दो-चार होना पड़ता होगा...अब तक आगामी जीवन और कैरियर की भी स्थिति स्पष्ट हो चुकी होती है..शायद यही कारण है कि इस अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते व्यक्तित्व से खनक गायब होने लगती है..और..एक नई औपचारिकता घर करने लगती है...

          हो सकता है इसे पढ़ते हुए, कोई मेरी इन बातों से सहमत न हो,  यही सोचते-सोचते कल की रात दस बजे जब मुझे नींद सताने लगी...तो सोचा...चलो जल्दी सो जाते हैं, जिससे सबेरे पाँच के आसपास उठना हो जाएगा और टहलना भी हो जाएगा, क्योंकि इधर डेढ़-दो महीनों से सुबह स्टेडियम जाकर टहलना बंद सा हो चुका है...फिर सुबह जाकर लगभग साढ़े चार बजे नींद टूटी...रात का किया हुआ संकल्प याद आ गया..और..स्टेडियम की ओर जाने की तैयारी करने लगा...

        स्टेडियम की ओर जाते हुए मेरा ध्यान सड़क के किनारे खम्भों पर जलती लाईटों पर चला गया...वाकई!  सुबह होने को आ रही है.. लेकिन अभी तक बल्बों से छिटक रही रोशनी के इर्द-गिर्द कीट-पतंगे मँडरा रहे हैं...मन ही मन सोचा, "ये बेचारे रात भर से ऐसे ही मँडरा रहे होंगे..वह भी बिना थके..रोशनी के प्रति इनका इतना प्रेम..!." कई जगह कवियों ने तो रोशनी के प्रति इन कीट-पतंगों के इसी प्रेम को देखकर कर अपनी कविताएँ रच डाली हैं..हलांकि ऐसी मुझे कोई कविता याद नहीं आई... नहीं तो यहाँ एक-दो लाईन जरूरत लिखता..पढ़ाई में रट्टू टाइप का न होने के कारण अपने को कोस बैठा..

          टहलते हुए आगे स्टेडियम की ओर बढ़ा जा रहा था कि "चींपों-चींपों" की आवाज सुनाई पड़ी..! इतनी सुबह गधे की आवाज सुनकर मैं आश्चर्यचकित था...क्योंकि, एक दो वर्षों से यही मानते आया हूँ की हमारे देश में बहुत ही कम गधे बचे हैं...और अगर हैं भी तो खच्चर में, मतलब घोड़े के क्रासब्रीड हो चुके हैं... तब तक देखा, वह गधा दौड़ता हुआ मेरे पास से निकल गया....मैंने उसे ध्यान से देखा था...एकदम शुद्ध टाइप का गधा प्रतीत हुआ.. मेरे देखते-देखते उसके पीछे एक दूसरा गधा भी दौड़ते हुए निकल गया था...उसके दौड़ने की गति देख मुझे उसके गधे होने पर ही संदेह हो आया..लेकिन था वह गधा ही..अरे!  पिछले चुनाव पर गधे को लेकर छिड़े विवाद को सोचकर मैंने इस विषय पर सोचने पर तत्काल विराम लगा दिया....तब तक मेरा पीछा कर रहे एक मासूम से पिल्ले की "बौ-बौ" की आवाज सुनाई पड़ी, पीछे मुड़कर देखा..उसे देखकर मैं मुस्कुरा उठा था...

          स्टेडियम में इक्का-दुक्का लोग ही थे...इसका दो चक्कर लगाया और फिर लौट पड़े...लौटते हुए स्टेडियम में प्रवेश करते एक सज्जन दिखाई पड़े...मुझे याद आया..कई माह पहले ये किसी कार से अपने कुछ साथियों के साथ आते थे और चार-पाँच की संख्या में ग्रुप बना कर टहलते थे...और टहलते हुए इनकी हँसी के साथ जुमले सुनते हुए मैं अपनी #दिनचर्या के लिखने के विषय खोज लेता था.. आज इन्हें अकेला देख ग्रुप टूटने की सोच कुछ क्षण के लिए मन उदास हो गया...वाकई! जीवन में भी एक समय ऐसा ही आता है!!

    

           खैर... मैं टहलने का अपना कोटा पूराकर स्टेडियम से लौट पड़ा था...सड़क बैठे गो-वंशो के झुंड के पास एक कुत्ते के जोरदार ढंग से भौंकने की आवाज सुनी...पास पहुंचने पर देखा! एक गधा बेचारा सड़क पर बैठे उन गो-पशुओं के झुंड के पास से उदासी भरे कदमों के साथ धीरे-धीरे दूर चला जा रहा था...वह कुत्ता उसी गधे पर भौंक रहा था और उसे गायों से दूर भगा रहा था.. उस कुत्ते की गो-रक्षा जैसी भंगिमा पर एक बार फिर मैं मुस्कुरा उठा था...!! 

        आवास पर लौट आया था... तुलसी की पत्ती और अदरक डालकर चाय बनाया..एक बार श्रीमती जी जब यहाँ आई थीं तो तुलसी के पौधे रोप गई थीं..आजकल ये तुलसी के पौधे छंछड़ कर काफी संख्या में हो चुके हैं और मैं भी सुबह की चाय में इनका बखूबी प्रयोग करता हूँ... तो यही चाय पीते हुए मैं अपनी यह #सुबहचर्या लिख रहा हूँ... 

         इधर अखबार भी आ गया है... पढ़ा, लेकिन क्या पढ़ा, इसकी चर्चा यहाँ नहीं करना चाहता.. वैसे भी लंबा लिख गया.. आप भी पढ़ते-पढ़ते ऊब रहे होंगे.. 

     

           तो #चलते-चलते 

   

           एक जगह पढ़ा, सार्थक जीवन के लिए निडर होकर जिए..शायद जीवन का उल्लास इसी में निहित है.... 

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

अकथ-मन

"वह खिलखिलाकर हँस रहा है...उसकी खिलखिलाहट के बावजूद उसकी माँ की आँखों में आँसू है...वह उठ कर बैठना चाहता है, पर बैठ नहीं पा रहा..माँ को देखता है...माँ के पास जाना चाहता है...कैसे जाए..उसे समझ नहीं...जब उसे उठना होता है, तो माँ ही उसे उठाती हैं...अब माँ के पास आने का मतलब समझने लगा है... माँ जब भी उसके पास आती है वह खिलखिलाने लगता है...उसे अच्छा लगता है.. उसकी आँखों में चमक आ जाती है.... माँ की गोंदी में वह वह कितना कुछ देख पाता है...! उसे नयी-नयी चीजें दिखाई देने लगती हैं...उसका मन करता है.. वह इन सब को ऐसे ही देखता रहे...लेकिन बिना माँ के यह सब संभव नहीं...आखिर ऐसा क्यों है...

            अब वह कुछ-कुछ समझने लगा था..अरे! वह मेरी तरह ही है...लेकिन यह क्या! मैं उसके जैसा क्यों नहीं..ये मुँह में कुछ डाल रहा है..बिना अपनी माँ के..!! ये हाथ क्या होता है..?  पैर किसे कहते हैं..? यह उसे नहीं बताया गया... माँ ने बताया था...मेरे मुँह है..आँखें हैं...कान है...सब मुझे ध्यान से देखते हैं... कुछ हँसते हैं... माँ मुझे देखती है... तो रोती है.... मैं माँ से बोलुंगा..."माँ मुझे देखकर तुम रोती क्यों हो..?" माँ ने कहा था, मेरे हाथ नहीं है...पैर नहीं है...मैं बिना हाथ पैर के पैदा हुआ था...वह इसीलिए रोती है...माँ का रोना कैसे बंद हो..!!

            माँ उसे उसे बच्चों के बीच ले जाती है...उसे भी खड़ा कर देती हैं... लेकिन....उसे नहीं पता वह खड़ा है या बैठा है...

          धीरे-धीरे अब वह समझने लगा है... माँ से कहता है "माँ मैं भी खेलना चाहता हूँ..." माँ उसे बच्चों के बीच छोड़ देती हैं...यूँ ही वह खुश हो लेता है...यही उसका खेलना हो जाता है...उसकी आँखों में चमक आ जाती है।"

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मेरी बस-यात्रा

         मुझे लगता है सरकारी बस सेवा मने रोडवेज बस पर चलना सुरक्षा और आर्थिक लिहाज से यात्रा का एक बेहतरीन विकल्प है। वैसे भी आजकल धीरे-धीरे सड़कों की स्थिति, खासकर प्रमुख शहरों को जोड़ने वाले मार्गों की दशा सुधरी है, मतलब फोरलेन या टू-लेन में परिवर्तित होते हुए स्मूथ टाइप का बन रहे हैं, यानी अब, चाहे बस की पिछली सीट पर ही क्यों न बैठें हों, आपको धचके नहीं लगेंगे। खैर.. 

       इधर मैं बस-यात्रा के गुण गा रहा हूँ तो, वहीं इधर थोड़ा समय बचाने के चक्कर में बस-यात्रा वाली अपनी बात के उलट मैं दो-सवा दो सौ किमी की अपने कार्यस्थल की दूरी अकसर अपनी कार से, स्वयं ड्राइव करते हुए तय करने लगा हूँ। वैसे भी, मैं अपनी दो हजार चार माडल की जेन कार से बहुत प्रेम करता हूँ...क्योंकि अभी तक इस बेचारी मेरी कार ने मेरी ड्राइविंग की गलतियों का खामियाजा स्वयं अपने ऊपर भुगता है और हम पर आँच नहीं आने दिया है! भाई! इसीलिए तो हम कण-कण को चेतन मानते हैं... 

         हाँ तो, उस दिन मैं अपनी कार से नहीं था.. आधी दूर अपनी "वो वाली गाड़ी" से और शेष आधी यात्रा बस से तय किया था...बस कानपुर पहुँची रात के लगभग दस बज चुके थे...बस-अड्डे वाले रास्ते पर बस मुड़ते देख, मैं अपनी सीट से उठकर कंडक्टर के पास पहुँचा और कंडक्टर से पूँछा था, "क्यों कंडक्टर साहब..अगर यहाँ उतर जाएँ तो, यहाँ से इस समय लखनऊ वाली बस मिल जाएगी या नहीं?"  बस-अड्डे तक न जाकर समय बचाने के लिए उधर से लखनऊ जाती बस को वहीं मोड़ पर पकड़ने का इरादा लिए मैंने बोला था। एक क्षण कंडक्टर ने मेरी ओर देखा और बोला, "नहीं साहब, इस समय इधर से बस नहीं गुजरेगी..झकरकट्टी से ही पकड़ लीजिए.. अब टाइम ज्यादा हो गया है।" मैंने कंडक्टर की बात मानी और उसके बगल में उसी की सीट पर बैठ गया था। 

         रास्ते पर पड़ने वाले चौराहों पर बस रूकती और यात्री उतर जाते...खाली होती बस देखकर जब कंडक्टर से मैंने पूँछा कि बस के लिए सवारी मिल जाती है या नहीं तो, कंडक्टर ने बताया था, "हाँ, मिल जाती हैं, बस-अड्डे पर तो नहीं लेकिन रास्ते में काम भर की सवारी हो जाती है, यहाँ बस-अड्डे पर सवारी का इन्तजार करते ही रह जाते हैं.. दूसरे दबंग कंडक्टर मेरी बस के आगे अपनी बस लगा कर सवारियों को अपने बस में बैठाने लगते हैं.. साहब, हम ठहरे सीधे आदमी, बोले तो झगड़ा कर बैठते हैं और गरियाने लगते हैं...इसीलिए बोलता नहीं, बस भगवान् भरोसे रहते हैं..रास्ते में बस को रोककर सवारी लेते हैं।"

          कंडक्टर की सिधाई भरी मायूसी देखकर मैंने कहा, "हाँ, सरकार को भी चाहिए की बसों के चलने के बीच टाइमिंग फिक्स करे... एक ही रूट पर एक साथ दो-दो, तीन-तीन बसें निकलने लगती हैं, कम से कम इनके चलने के बीच पन्द्रह मिनट का अंतराल फिक्स कर देना चाहिए।" "लेकिन साहब इसपर तो कोई ध्यान ही नहीं देता.."इस बात पर मैंने कहा, "हाँ, यह तो ध्यान न देने वाली बात सब जगह है.. लोग अपने मतलब की बात पर ही ध्यान देते हैं।" कंडक्टर को मेरी इस बात पर आत्मीय दृष्टिकोण की झलक मिली तो वह कह बैठा, "साहब,  हमी लोगों की हालत देखिए हम संविदा पर हैं..हमें एक रूपया छब्बीस पैसा प्रति किलोमीटर के हिसाब से दिया जाता है..।" मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखते हुए पूँछा, "महीने में कुल कितना मिल जाता होगा?" "अरे साहब यही कोई सात-आठ हजार के आसपास, इसी में बच्चों को पढ़ाना और किसी तरह परिवार का गुजारा करना होता है..!" मैंने अब उसकी ओर दया भाव से देखा था, इसके सिवा और कर भी क्या सकता था। 

       अपने प्रति मेरा दयाभाव भांप कंडक्टर ने मुझसे पूँछा, "साहब आप क्या करते हैं?" मैं बताना नहीं चाहता था और टालने की गरज से बोला था, "अरे कुछ नहीं बस हम भी ऐसे ही नौकरी करते हैं।" कई बार उसके कुरेदने पर बताना पड़ा। फिर वह बोला था, "साहब, आपके आफिस आकर आपसे मिलेंगे, भूलिएगा नहीं.."  मैंने उसे आश्वस्त किया। तभी, लखनऊ की ओर जाती जनरथ की ओर इशारा करते हुए उसने कहा, " साहब, यह लखनऊ जा रही है आप इसपर बैठ जाइए।" मैं उस संविदा वाले कंडक्टर के बारे में सोचते हुए जनरथ पर सवार हो चुका था। 

            वाकई!  जनरथ बस में बैठे-बैठे एसी की ठंडक में, मैं यही सोच रहा था इस देश की व्यवस्था सामान्यीकृत नहीं है.. व्यवस्थाएँ भी चीन्ह-चीन्ह कर चलती हैं। 

रविवार, 29 जनवरी 2017

हम एक दूसरे के लिए एक दूसरे का साथ दें

           उस दिन किसी टी. वी. समाचार चैनल पर प्रसारित हो रहे एक समाचार पर मेरा ध्यान चला गया था। किसी जिलास्तरीय न्यायालय ने पति-पत्नी के आपसी विवाद के बीच पत्नी के पास रह रहे दो छोटे-छोटे बच्चों को पति को सौंपने का निर्णय सुनाया था। इस निर्णय के क्रम में किसी तरह माँ से बच्चों को अलग किया गया था। टी.वी. चैनल, माँ से बच्चों को अलग करते हुए उस भाव पूर्ण दृश्य को ही बार-बार दिखा रहा था।
        इसके बाद इस चैनल के न्यूज-ऐंकर ने उनके आपसी पारिवारिक विवाद के बीच बच्चों के हित को लेकर माँ से प्रश्न करता है -
          "अगर आपके पति आपको फिर से अपने पास रखने के लिए तैयार हो जाएं तो क्या आप अपने बच्चों की खातिर इसके लिए तैयार होंगी?"
         महिला ने इसका उत्तर "हाँ" में दिया था।
         फिर ऐंकर ने उसके पति से पूँछा था -
        "आप, अपनी पत्नी को फिर से अपने पास रखोगे?" पति का उत्तर "न" में था। 
          
         इस "न्यूज" का यही विषय था।

         यहाँ पर उल्लेखनीय है, पति-पत्नी के इस झगड़े या उनके बीच बच्चों की छीना-झपटी जैसे भाव पूर्ण दृश्य के कारण मेरा ध्यान इस न्यूज पर नहीं गया था, और न ही इस समाचार के उल्लेख का उद्देश्य इस घटना के उचित-अनुचित पहलू तथा पति-पत्नी में से किसी एक को सही या गलत ठहराने सम्बन्धी किसी नैतिक निर्णय पर पहुँचने का है। 
       
        मेरा ध्यान न्यूज-ऐंकर द्वारा पति-पत्नी से पूँछे गए उस प्रश्न की शब्दावली पर चला गया था जो उसने पति-पत्नी के बीच के इस झगड़े को सुलझाने के लिए पूँछा था।

       पति-पत्नी दोनों से पूँछे गए इन प्रश्नों की शब्दावली में "रखने" और "रखोगे" शब्द आए हैं। बस मेरा ध्यान इन्हीं दो शब्दों पर अटक गया था। इस शब्द पर ध्यान जाते ही मैने अपनी पत्नी से मुस्कुराते हुए पूँछा था -
       "क्या मैं तुम्हें रखे हुए हूँ?"
       
        उनके उल्टे प्रश्न से मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। फिर मुझे उन्हें अपने प्रश्न पूँछने का कारण समझाना पड़ा तब जाकर जान छूटी।

         वास्तव में "रखना" जैसे शब्द का प्रयोग किसी निर्जीव से वस्तु या पदार्थ के लिए ही हो सकता है। या फिर एक मालिक होने के भावग्रस्त वाला व्यक्ति ही किसी नौकर को "रखता" होगा। जहाँ नौकर का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है, वह तो अपने मालिक के निर्देशों का गुलाम और "मालिक के लिए ही रखा" हुआ होता है। यहाँ मुझे एहसास हुआ कि किसी व्यक्ति के लिए "रखना" जैसे शब्द का प्रयोग उसकी मानवीय गरिमा के विरुद्ध है। किसी व्यक्ति के लिए प्रयोग किए गए इस शब्द में उस व्यक्ति की मानवीय गरिमा के साथ ही उसकी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती परिलक्षित होती है और चाहे वह पत्नी ही क्यों न हो।
          विचारणीय है कि क्या इस "रखे" हुए भाव में आपसी प्रेम और समझ का भाव पैदा हो सकता है? क्योंकि कोई किसी को "रखे" या "रखने" में एक विलगाव जैसे संबंध का भाव छिपा होता है जो एक शक्तिशाली और एक निर्बल के बीच में ही हो सकता है।
         दुख है, एक समाचार ऐंकर मानवीय रिश्तों की गरिमा के विरुद्ध उसी शब्द; जिसमें निहित मानसिकता, जो ऐसे रिश्तों में दरार का कारण बनती है, को माध्यम बनाकर पति-पत्नी के टूटते उस रिश्ते के बीच में पुनः लाना चाहता था। उस ऐंकर द्वारा प्रयुक्त ये शब्द दरकते मानवीय रिश्तों के पीछे की मानसिकता और कारण को अनजाने में ही अभिव्यक्त कर रहे थे। 
            
         सच में हमारे शिक्षित समाज में भी अभी सोचने का नजरिया नहीं बदला है। हम शक्तिशाली और सक्षम है तो हमारे पास सब कुछ "रखा" हुआ है और यदि हम कमजोर तथा निर्बल हैं तो हम स्वयं किसी के यहाँ "रखे" हुए हैं! ऐसे में मानवीय गरिमा का कोई भी मूल्य नहीं रह जाता क्योंकि, तब व्यक्ति किसी के हाथों गिरवी ही "रखा" होता है।

         यहाँ नैतिकता, संविधान और कानून सब कहीं न कहीं इसी प्रकार से किसी न किसी के पास "रखे" हुए तो नहीं हैं? और लोग इनका "साथ" पाने से वंचित हो रहे हैं?
          ईश्वर करे हम एक दूसरे के लिए एक दूसरे का साथ दें।
          
                             ----- जय हिंद।
   

                               (26.1.16 के दिन की फेसबुक पर हमारी एक पोस्ट)

रविवार, 22 जनवरी 2017

हवा का सुरसुरापन

               स्टेडियम के सिमेंटेड पट्टी पर तेज कदमों से चलते हुए ग्रुपबाजों (पहले की #दिनचर्या में ग्रुपबाजों का परिचय दिया हुआ है) के बीच के आपसी वार्तालाप को सुनते हुए आगे निकल गया था...उनकी बात कोई खास तो नहीं थी लेकिन मेरा ध्यान उनकी बातों पर अवश्य चला गया... "घर में जब दो साथी लड़ने लगते हैं तो गुस्से मे सामानों को नुकसान पहुंचाने लगते हैं" यहाँ "साथी" का मतलब मैं नहीं समझ पाया था...लेकिन कुछ कामनसेंस लगा कर पति-पत्नी के बीच के विवाद को लगाया.... फिर उनकी बात सुनी "लेकिन सामानों को नुकसान पहुँचाना ठीक नहीं... आदमी कैसे-कैसे करके सामान बनाता है.." 
         इसी कड़ी में इनकी बात चल रही थी..."किस तरह हम दूर स्कूल कभी पैदल कभी साइकिल से जाकर पढ़े तब यहाँ पहुँचे हैं...तब बिजली भी नहीं होती थी...ढिबरी की रोशनी में पढ़े हैं...यहाँ तक कि लालटेन होना भी बड़ी बात होती थी...किसी-किसी घर अगर लालटेन होती भी थी तो एकाध ही...टार्च होना भी बड़ी बात होती...अब टार्च की जरूरत ही नहीं रह गई है...बच्चे कहते हैं टार्च की क्या जरूरत...."
             हाँ, आज बहुत दिनों बाद मैं साढ़े पांच बजे मैं स्टेडियम में टहलने पहुँचा था.. स्टेडियम में अँधेरा था...इधर महोबा में एक-दो दिन से ठंडी थोड़ी कम हुई है तभी स्टेडियम की ओर टहलने का मन किया था... वैसे भी महोबा में कुल मिलाकर छह-सात दिन ही तगड़ी ठंडी पड़ती है..अन्यथा जाड़े की धूप भी यहाँ कड़ी ही लगती है..स्टेडियम में टहलते हुए आज सुरसुरी हवा बह रही थी...यह हमारे पूर्वांचल जौनपुर या कहें लखनऊ की हिमालयी हवा जैसी हांड कंपाने वाली हवा नहीं होती ...कुल मिलाकर टहलते हुए यह हवा सुखद एहसास भर रही थी...स्टेडियम की उस सिमेंटेड पट्टी पर एक बेहद छोटा पिल्ला सिकुड़ा-सिकुड़ा सा कूँ-कूँ करता हुआ भागा जा रहा था...शायद उस पिल्ले को ठंड लग रही थी... उसकी माँ यानी कुतिया उससे काफी पीछे रह गई थी...मैंने झुककर उस पिल्ले को सहलाया और आगे बढ़ गया...कुछ दूर आगे जाने पर पीछे मुड़कर मैंने देखा तो वह पिल्ला जैसे मेरा पीछा करते हुए मेरे पीछे-पीछे चला आ रहा है...हलाँकि मेरी चाल तेज थी फिर वह मेरा पीछा नहीं कर पाया था...
           इधर ग्रुपबाजों की बातें सुनते हुए मैं उनसे आगे निकल आया था...उनकी बातें सुनकर मुझे याद आया....मैं भी बचपन में ढिबरी या लालटेन की रोशनी में पढ़ता था...मेरे पास एक लालटेन थी...शाम होते ही पहले उसका शीशा साफ करता था...कभी-कभी लालटेन की बाती यदि जली हुई होती तो जलते हुए लालटेन की बाती से धुँआ उठता और उसकी रोशनी भी तेज नहीं होती, तब उसकी बाती के जले भाग को काट कर फिर जलाता, अब लालटेन की उसी बाती से धुँआ रहित स्थिर लौ निकलने लगती और लालटेन की रोशनी भी तेज हो जाती....फिर लालटेन को अपने दालान के सामने टाँग देता...उसकी रोशनी देख मगन हो जाता...कभी-कभी हम-उम्र बच्चों के बीच लालटेन की रोशनी  को लेकर प्रतियोगिता भी हो जाती...मतलब मेरे लालटेन की रोशनी तुम्हारे लालटेन की रोशनी से तेज है टाइप का...
          वाकई, अब समय बहुत बदल गया है...ढिबरी और लालटेन का युग बहुत पीछे छूट गया है...तब का समय और परिस्थिति वैसी ही थी..आज के दौर में हो सकता है वही पुराना युग किन्हीं खास कारणों या परिस्थितियों वश कुछ खास लोगों या क्षेत्रों में देखने को मिल जाए लेकिन चीजें अब काफी हद तक बदल चुकी हैं..
             इस बदलाव में एक चीज बदलती हुई दिखाई नहीं देती, वह है... गरीब और गरीबी की बात करना..बल्कि आज भी यह उतनी ही शिद्दत के साथ राजनीति करने का हथियार बनी हुई है...यही नहीं, पेट्रोल खरीदते-खरीदते सात रूपए प्रति लीटर से सत्तर रूपए प्रति लीटर तक आ पहुँचा हूँ और आज हम एक बार में पहले से दस गुना ज्यादा पेट्रोल भरवाते हैं...लेकिन फिर भी हम गरीब की राजनीति के प्रति कुछ अधिक ही आकर्षित होते हैं...
          वैसे भी आजकल राजनीति की हवा बहुत तेज बह रही है..यह हमें और आपको अपने-अपने तरीके से आकर्षित करती है.. हम इस राजनीति के आकर्षण में खो जाते हैं.. आइए! राजनीति की हवा के सुरसुरे-पन का मजा लीजिए.. गरीबी-वरीबी तो आती-जाती रहती है..राजनीति में बहुत गर्मी होती है..चलिए हम राजनीति तापें...