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मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

विरहिन की गली मत जाना रे भौंरा....


           जाफरी साहब...! हाँ....जाफरी साहब...! यही नाम था उनका... बचपन की कुछ यादों के बीच जाफरी साहब भी स्मृतियों में अकसर आते रहते हैं... व्यक्तित्व आकर्षक..! गोरे-चिट्टे..! लम्बा कद लम्बी सफ़ेद दाढ़ी...याद है...कभी-कभी गोल सफ़ेद टोपी लगा कर आते तो कभी बिना टोपी के... हम बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय थे जाफरी साहब..! जब भी आते हम बच्चे उन्हें देखते ही..जाफरी साहब-जाफरी साहब... कहते उनके पास दौड़ पड़ते थे....और जाफरी साहब हम बच्चों के हाथों में पांच या दस पैसे का एक-एक सिक्का रखते चले जाते... फिर हम बच्चे ‘मलाई वाले’ को खोजते...मलाई-वाला और कोई नहीं बल्कि लकड़ी के डब्बे को साईकिल के कैरियर पर रख उसमें आइसक्रीम रख उसे बेचने वाले को कहते थे... जैसे ही वह ‘मलाई वाला’ दिखाई पड़ता हम सारे बच्चे उसे घेर कर खड़े हो जाते और जाफरी साहब के दिए उसी पैसे से मलाई खरीद उसका मजा लेते... कभी-कभी तो जाफरी साहब स्वयं ‘मलाई वाले’ को बुला लेते और मलाई खरीद कर दिला दिया करते... हमारे बीच उनका आगमन अकसर मार्च महीने से जुलाई माह तक नियमित अंतराल पर बना रहता था...और हम बच्चे उनके आने का बेसब्री से इंतजार किया करते थे...

           मुझे आज भी याद है..जब मैं भी अन्य बच्चों की तरह हुडदंग मचाते जाफरी साहब की ओर दौड़ता तो मेरे दादा जी अकसर मुझे घूरा करते थे... शायद जाफरी साहब से पैसे लेने के लिए अन्य बच्चों की तरह मेरा हाथ बढ़ाना उन्हें अच्छा नहीं लगता था... खैर दादा जी की भावनाओं को धीरे-धीरे मैं समझ गया था... हाँ जाफरी साहब मेरे दादा जी के साथ बैठ घंटों बतियाते थे.... जाफरी साहब के हम बच्चों के बीच आने का सिलसिला कई वर्षों तक जारी रहा...

           शायद वह समय था जब हम किशोर-वय में प्रवेश करने वाले थे...यही कोई मार्च का महीना रहा होगा... गाँव के लोग हमारे घर जुटते और और रात-रात भर होली गीत ‘फगुआ’ होता रहता...हम बच्चे भी रात में जाग कर उन गीतों और ढोल की थापों का मजा लिया करते...फगुआ के कुछ गीत तो इतने लोकप्रिय होते कि हम बच्चे दिन में मंडली बना ढोल-झंझीरे के साथ रात का नकल किया करते...हम बच्चों की मंडली के बीच एक 'फगुआ' गीत बहुत लोकप्रिय था..."विरहिन की गली मत जाना रे भौंरा और कहीं उड़ जाना...."

            स्मृतियों में थोड़ी धुंधली सी यादें शेष हैं... इसी होली के बाद का कोई महीना रहा होगा जब कोई बड़ा चुनाव होने वाला था... उसमें जाफरी साहब भी उम्मीदवार थे....! हाँ जाफरी साहब हम बच्चों में लोकप्रिय थे ही... हम लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता का फायदा उठाया गया...हम बच्चों को उनके चुनाव-प्रचार की ज़िम्मेदारी दी गयी... इस प्रचार के लिए लाउडस्पीकर लगे मिठाईलाल के रिक्शे का प्रबंध किया गया था...हाँ.. मिठाईलाल से भी हम बच्चों की विशेष दोस्ती थी...कारण.. जब कोई 'मलाई वाला' हमारी आवाजें नहीं सुनता था तो उसे बुलाने का प्रयोग वह अपने इसी रिक्शे से करते थे.... खैर...बारी-बारी से हम बच्चों के बीच से दो बच्चे चुन कर प्रचार के लिए आस-पास के गावों में उसी रिक्शे में भेजा जाता था....

            उस दिन जाफरी साहब के चुनाव प्रचार की हमारी बारी थी...इस प्रचार के लिए मैं और मेरे हम-उम्र परिवार के एक अन्य बच्चे जो रिश्ते में मेरे चाचा लगते थे...चुने गए, हम दोनों बच्चे जाफरी साहब के चुनाव प्रचार के लिए बहुत उत्साहित थे... हम दोनों को उसी प्रचार वाले रिक्शे पर कुछ हिदायतों के साथ बैठा दिया गया था... हमारा रिक्शा दूसरे गाँव की ओर बढ़ चला था... 'जाफरी साहब को वोट दें....' 'उनके चुनाव चिन्ह .....पर ठप्पा लगाएं...' फिर हम दोनों गाते... 'आवा सखी वोट दई आई मुहर ... पर लगाई...' इन्हीं जुमलों को दुहराते-दुहराते हम कई बस्तियों को पार कर गए थे... फिर हमारा रिक्शा मुड़ा.... अब हम प्रचार के लिए सिखाए गए जुमलों के अंत में अपना एक नया स्वर जोड़ रहे थे.... ‘’अपने जाफरी साहब के चुनाव निशान.....पर ठप्पा लगाएं...’’ ठीक इसके बाद हम अपने सुरीले अंदाज में गाते.... ‘’बिरहिन की गली में मत जाना रे भौंरा और कहीं उड़ जाना..’’ जब हम अपने इस लोकप्रिय फगुआ गीत को गाते तो मिठाईलाल अपना सिर गोल-गोल घुमाते रिक्शा चलाते हमारा उत्साहवर्धन करते जाते... अब हम दोनों लाउडस्पीकर का मजा लेने लगे थे... और अपने इस गीत “ को सुरीले अंदाज में गाने का प्रयास करते इसकी आवृत्ति को बढ़ा रहे थे... ’बिरहिन की गली में मत जाना रे भौंरा और कहीं उड़ जाना..’’

          अब हम प्रचार का कार्य पूरा कर घर लौट आये थे....हम बड़े खुश थे कि हमने बहुत अच्छा प्रचार किया... रिक्शे से उतरते ही हम दोनों दौड़ कर दादा जी और घर के कुछ लोगों के साथ बैठे जाफरी साहब के पास पहुंचे... वे सब हमें बड़े ध्यान से देख रहे थे... तब-तक हम दोनों उनके पास दौड़ कर पहुँच चुके थे... वे सब धीर-गंभीर मुद्रा में अब भी हम दोनों को घूरे जा रहे थे... मुझे लगा शायद हमारे प्रचार की आवाज यहाँ तक नहीं पहुंची नहीं तो इतने बढियाँ प्रचार के लिए हमें शाबाशी अवश्य मिलती... कुछ यही सोचकर मैं उनसे पूंछ बैठा,

             “हमार दूनौ जने क अवाज सुनायी पड़त रहा कि नाहीं...”

             “अरे सरऊ हरे..! खूब सुनाई पडत रहा...जाफरी साहब बेचारे क वोट मिल चुका... “बिरहिन की गली में मत जाना रे भौंरा...!” दादा जी की यह डाट सुन हम सन्नाटे में आ गए थे...प्रचार की शाबाशी पाने का उत्साह काफूर हो चुका था...हम सिर झुकाए खड़े थे....

            जाफरी साहब किसी पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे या निर्दलीय थे स्पष्टता के साथ यह तो याद नहीं है... हाँ उन्हें वोट देने उनकी गली कोई नहीं गया था.. पता नहीं यह हमारे प्रचार का असर था या कुछ और... उस चुनाव के बाद जाफरी साहब बेचारे फिर कभी नहीं दिखाई दिए...!

            आज सोचता हूँ... बचपन में प्रचार के समय गाया वह गीत झूठा नहीं था...! सत्ता के बिना राजनीतिक विरही ही होता है... और...विरही की गली जाना खतरे से खाली नहीं होता.....

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

मेरा चश्मा....


           न जाने किन विचारों की तंद्रा में मैं खोया हुआ था... उन्ही विचारों में खोये हुए से, मैं बगल में रखे गिलास की ओर हाथ बढ़ा रहा था...यह सोच कर कि एकाध गिलास पानी पी लूँ... लेकिन यह क्या...! यह गिलास मेरे हाथ में क्यों नहीं आ रही... हालाँकि गिलास को देखते हुए ही उसकी ओर मैं हाथ बढ़ा रहा था...एक बारगी तो मन में हलकी सी घबड़ाहट यह सोचकर आ गयी कि मेरी मानसिक स्थिति ठीक है या नहीं... फ़िलहाल संतोष की बात यह रही कि.... दो तीन प्रयासों के बाद गिलास हाथ में न आने का रहस्य समझ में आ गया... दरअसल दोष मेरे प्रयासों में नहीं था...हाँ मेरा चश्मा ही उस भ्रम का कारण था जो गिलास को पास दिखा रहा था...और मेरा हाथ गिलास तक पहुँच ही नहीं रहा था... मैंने जब आँख पर तिरछे हो गए चश्में को ठीक किया तो उसके लेंस ने गिलास की सही दूरी को लाकर मेरी आँख के सामने रख दिया और मुझसे दुबारा ऐसी गलती न हो मैंने झट से गिलास हाथ में ले पानी गटक गया...

          अभी मैंने पानी पीकर गिलास मेज पर रख बिस्तर पर पसरने का प्रयास कर ही रहा था कि महाशय जी आ धमके... हाँ वह महाशय और कोई नही मेरे एक पुराने मित्र हैं, और अकसर हम दोनों खुलकर अपने दुःख-दर्द आपस में बाट लिया करते हैं... उन्हीं की धमक मुझे सुनाई पड़ी...|

            ‘’क्या बात है भाई, सोने जा रहे हो...?’’

            ‘’नहीं, अभी सोने का समय कहाँ हुआ..’’ आलस्य भरे मन से मैंने उत्तर दिया| तब तक मेरे मित्र चालू हो चुके थे...

            “क्या बताएं यार... यह जंग नहीं जीती जा सकती..” उन्होंने कुछ क्षोभ भरे शब्दों में कहा|

           “कौन सी जंग जीती नहीं जा सकती.. कौन सा भारत-पाकिस्तान का युद्ध छिड़ा है...|” मैंने हलके मूड में कहा|

            “तुम्हें तो मेरी बात में हरदम मजाक ही सूझता है.. मेरी बात को कभी गंभीरता से लेते भी हो...?” मित्र महोदय थोड़ा रुष्ट होते हुए से बोले|

            “अरे भाई...अभी आप ने बात ही कहाँ शुरू की..कि मैं आप की बात मज़ाक में लूँगा..|” मैंने उन्हें मनाने के अंदाज में बोला|

           मित्र महोदय ने जैसे अपनी व्यथा-कथा शुरू की.. “यार क्या बताऊँ अभी मैं कल बस से जा रह था.. मुझे अपने गंतव्य पर पहुँचने की थोड़ी जल्दी थी...रास्ते में बीच-बीच में सवारियों को उतार और चढ़ा रहा था...”

          “कौन सवारियों को उतार और चढ़ा रहा था...तुम..” मैंने मित्र की बातों पर ध्यान देने के प्रयास में पूँछा|

          “अच्छा ये बताओ क्या मैं बस का कंडक्टर हूँ...?” झल्लाहट में वह मुझसे बोले.. जैसे कंडक्टर उनके लिए कोई तुच्छ जीव हो..!

          “ओह..यार सो सारी...!” मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ|

          “हाँ वही बस वाला...उसके कंडक्टर से मैंने कहा कि तुमने तो इसे पैसेंजर बना दिया है... और बस में लिखाये हो सुपर फ़ास्ट एक्सप्रेस..! तो यार... वह बोला बाबूजी हवा में नहीं चलते जमीन पर चलते हैं...हवाई-जहाज नहीं हैं... आखिर सवारी नहीं लेंगे तो सरकार के खाते में क्या जमा करेंगे... और जो बेचारा परेशान है क्या उसे छोड़ते चलें...अगर आप को इतनी ही जल्दी है तो अपनी सवारी से चला करें...|” एक साँस में मित्र महोदय बोल गए|

          “तुम भी तो किसी के फटे में अनावश्यक टांग अड़ाने लगते हो... उस बेचारे कंडक्टर ने क्या बुरा कहा...?” मैंने जैसे उन्हें समझाने के स्वर में बोला|

          “बात तो आप सही कह रहे हो..वह बेचारा ठीक आदमी था तभी तो सरकार के खाते की उसे चिंता थी.. मैंने उसकी बातों का बुरा नहीं माना|’’ जैसे वह स्वयं अपने को ढाढ़स दे रहे हों|

         मैंने पूँछा, ”फिर क्या हुआ आगे कुछ और घटित हुआ कि सीधे अपने गंतव्य पहुँच गए...|”

         “तुम मेरी बातों पर गंभीर नहीं हो...तुम्हें तो बस....|” महाशय थोड़ा नाराज होते हुए से बोले|

         “अरे भाई बुरा मत समझिये मैं तो आप को सुनना चाहता हूँ..तभी न पूँछ रहा हूँ...” मैंने उनकी बातों में रूचि दिखाते हुए बोला|

          अब उनमें मेरे एक अच्छे श्रोता होने का विश्वास जगा....उन्होंने कहना शुरू किया.. “बस कुछ देर तक चली ही थी कि ड्राइवर ने उसे फिर रोक दी...और मैं कुछ समझता तब तक मैंने उसे कंडक्टर से कहते हुए सुना कि टी. आई. साहब हैं..., मैं समझ गया था कि बस को चेकिंग के लिए रोका गया था... और यार मुझे चिंता हुई कि...मुझे अब थोड़ा देर और होगा...लेकिन..टी. आई साहब तो कंडक्टर साहब के परिचित निकले... उन्होंने तो कंडक्टर को देखते हुए ही कहा...अरे तुम हो..! जाओ-जाओ.. और कंडक्टर ने तुरंत ड्राइवर से चलने के लिए कहा और बस चल पड़ी...|” वह चुप हो गए|

         हम दोनों के बीच छाई चुप्पी को तोड़ने के अंदाज में मैंने कहा “चलिए आपका समय बच गया.. नहीं तो बस चेकिंग के चक्कर में और देर हो जाती..”

         “बात यह नहीं है..” मेरे मित्र थोड़ा उदास आवाज में बोले|

         “तो..अब कौन सी बात आ गयी...|” मैंने उन्हें कुरेदने के अंदाज में कहा|

         “बात तो अब कुछ नहीं आई थी... लेकिन यार मै सोचने लग गया था...कि..क्या टी. आई. ने बस की चेकिंग न कर अपनी डयूटी के साथ न्याय किया था...? या उसके संबंध उसकी डयूटी पर भारी थे...?” उन्होंने एक चिंता सी जाहिर की..|

         “यार तुम एक साधारण सी बात में इतना क्यों सोच रहे हो...इसमें बाल की खाल निकालने की आवश्यकता नही...” मैंने कहा|

         “नहीं इसमें बाल की खाल नहीं है...सोचो हमारे देश में ऐसे कितने लोग संबंधों के निर्वहन में अपनी डयूटी पूरी नहीं कर रहे हैं... और तो और... क्या हम अपने डयूटी के प्रति लापरवाह दिखाई नहीं देते...फिर हम व्यवस्था ठीक करने के लिए क्यों झगड़ रहे हैं...|” उनके स्वर में थोड़ी उत्तेजना आ गयी थी|

          “अरे भाई हम समाज में रहते हैं थोड़ा सामाजिक संबंध निभाना भी तो पड़ता है...इसमें कौन सी बुराई है...|” मैंने उनकी उत्तेजना को शांत करने का प्रयास किया...|

          “बात सामाजिक संबंधों की नहीं है...ऐसे संबंधों का क्या महत्त्व जो कर्तव्यपालन में बाधक हो... इससे अच्छा तो फिर असामाजिक होना ही है... फिर क्यों हम अन्ना या केजरीवाल को तलाशते हैं....जानते हो इसी सोच से तो हमारी गिरावट शुरू हो जाती है...और मैं यह भी कहता हूँ .. कर लो तमाम एजेंसियों का गठन... हमारे और आपके बीच में क्या है..कौन से संबंध हैं.. कौन सी एजेंसी इसकी जाँच कर लेगी...! अंत में क्लीन चिट ही हाथ आएगी...|” अब वह थोड़ा भर्राए स्वर में बोलना आरम्भ कर दिए थे..|

            हम दोनों के बीच चुप्पी छाई हुई थी..थोड़ी देर बाद मैंने करवट बदली तो पीठ में कुछ गड़ा....लगा जैसे मेरा चश्मा तो नहीं टूट गया..! सोचा कैसे देखूंगा... मेरे मित्र अब जा चुके थे....|

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

कामवालियां

         उस दिन मैंने घर पर एक नई कामवाली को देखा; मैंने सोचा चलो अब श्रीमती जी की झल्लाहट मेरे ऊपर थोड़ी कम हो जाएगी। इधर कई दिनों से घर के छोटे-मोटे काम खासकर घर की साफ सफाई उन्हीं को करनी पड़ रही थी क्योंकि पहलेवाली कामवाली कुछ दिन पूर्व ही काम छोड़ कर चली गई थी और इसका खामियाजा मुझे रह-रह कर मेरे ऊपर उनकी झल्लाहट में मिल जाया करता था, जैसे ‘मैं तो घर की नौकरानी हूँ, मेरी चिंता किसको है’ उन्हीं के शब्दों में ‘मैं नौकरी कर परिवार पर अहसान कर रहा हूँ’ आदि-आदि। हालांकि मैं अपने तर्कों से उनकी झल्लाहट को अपने तरीके से कम करने का प्रयास भी करता था और कभी-कभी इसमें सफलता भी मिल जाया करती थी...मेरे इस तर्क से वह सहमत थी कि इस प्रकार घर का काम करने से शरीर स्वस्थ रहता है तथा शरीर की स्थूलता में भी कमी आती है। 
       मैंने कामवाली को देखते हुए, जो उस समय पोंछा लगा रही थी, श्रीमती जी से पूँछा, ‘अच्छा ये बताओ इसके बैकग्राउंड के बारे में कुछ पता-वता किया है कि नहीं...कौन है कहाँ से है...कि ऐसे ही काम पर रख लिया।’
       पत्नी जी ने उत्तर दिया, “अरे और कहाँ की है वही आसाम की है..वही जो बंगलादेशी लोग आसाम में बसे हैं उन्हीं में से है।”
       खैर पत्नी जी की अन्य बातों से मैं सहमत होऊँ न लेकिन इस बात से सहमत था कि वह भी घर में काम कर चुकी अब तक अन्य कामवालियों की तरह आसाम या बंगाल की ही होगी। तभी उस कामवाली की एक छोटी बच्ची दिखाई दी उसे देखते हुए मैं श्रीमती जी से पूंछ पड़ा, “इसका पति क्या करता है...। ” मेरे इस प्रश्न का उत्तर देने के पूर्व उन्होंने एक गहरी सांस ली, और फिर बोली, “यह तो बता रही थी....” फिर चुप हो गयीं।
        मैं उनकी इस गहरी सांस और चुप्पी के बाद आगे उसके बारे में और अधिक जानने की इच्छा को त्याग दिया। तब तक पोंछा लगाते हुए वह हम लोगों से थोड़ी दूर जा चुकी थी। 
       उसकी ओर देखते हुए वह बोली, ‘बेचारी..!’
       यह सुनकर कामवाली के बारे में जानने की जिज्ञासा मेरे मन में पुनः जागृत हो गई। 
       मैंने फिर पूँछा, “क्या बता रही थी...?”
       “बता रही थी...यह अपने पति की दूसरी पत्नी है...।” पत्नी ने कहा|
       “क्या इसके पति ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ दिया है...!” मैंने अपनी जिज्ञासा बढ़ाई।
       श्रीमती जी ने उत्तर दिया, “नहीं, छोड़ा नहीं था...यह बता रही थी कि उसने पहली वाली पत्नी को मार डाला था...। 
       मैं आश्चर्य से बोला, “क्या...!”
       “यह बच्ची किसकी है...।” मैंने पूँछा|
       उन्होंने आगे बताना शुरू किया, “यह बच्ची तो इसी की है, हाँ पहली वाली को एक लड़का भी था...लेकिन वह बेचारा भी...!”
      “बेचारा...!” मेरी उसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ चुकी थी। 
       अब श्रीमती जी मेरी ओर देखती हुई बोली, “हाँ...वह बेचारा ही तो था...यह कामवाली बता रही थी... जब उसका पति उसकी माँ को मार रहा था तो वह छोटा बच्चा अपनी माँ को खून से लथपथ मार खाते मरते हुए देख रहा था...यह दृश्य देखकर उसका दिल बैठ गया और बेचारा मर गया...! इसके बाद.. इससे शादी किया।”
       मैं मन ही मन उस क्षण की कल्पना करने लगा जब उस बच्चे ने अपनी माँ को उस स्थिति में देखा होगा...बच्चे की उस समय की मन:स्थिति क्या रही होगी...! सोचकर...मैं बरबस बोल उठा, “ओह...!” और एक गहरी सांस ली। 
      श्रीमती की ओर मुखातिब होते हुए बोला, “इन कामवालियों की जिन्दगी भी क्या होती है...! इस बात का ध्यान रखना...यहाँ ठीक से झाड़ू नहीं लगाया...कोने में पोंछा लगाना भूल गई...जैसी टोका-टाकी इससे अधिक मत करना नहीं तो अन्य कामवालियों की तरह यह भी काम छोड़ कर चली जाएगी।”
     श्रीमती जी ने आँखे तरेरा और बोली, “जैसे मैं ही सब की दोषी हूँ...।” 
      मैं उनके गुस्से से थोड़ा भयभीत हो बातचीत की धारा को दूसरी दिशा देते हुए बोला, "अच्छा इसका पति क्या करता है…?"
      श्रीमती जी ने आगे जानकारी देते हुए बताया, "यह तो बता रही थी…इसका पति इसके साथ नहीं रहता…वह आजकल मुंबई में रह रहा हैं…।" 
      "अच्छा…! वह इसकी खबर लेता है …?" मैंने फिर पूँछा।
      "नहीं इसके अनुसार तो इसका पति इससे भी कोई खास मतलब नहीं रखता लेकिन इस छोटी बच्ची से कभी-कभार फोन से बात करता है…।" श्रीमती जी ने उत्तर दिया।
       "हूँ…।" मैं कुछ सोचते हुए बोल उठा। 
       तभी पत्नी की आवाज पुनः सुनाई दी, "यह तो कह रही थी कि पति को बच्ची से भी बात नहीं करने देती।"
        इसका कारण पूँछने पर श्रीमती जी ने मेरी जानकारी  में वृद्धि किया और बोली, "पति के पहले वाले कृत्य को सोचकर… कि बच्ची पर कोई गलत प्रभाव न पड़े इसी कारण बच्ची से बात नहीं करने देती।"
        तभी उस कामवाली की बच्ची रोने लगी वह उसे एक कोने में ले जाकर दूध पिलाने लगी।
        एक दिन सुबह जब वह कामवाली नहीं आई थी तो मैंने उसके न आने का कारण श्रीमती जी से पूँछा तो वह बोली, "क्या करती उसकी लड़की तो घर में इधर-उधर कूदती और रोती रहती जब देखो तब काम छोड़कर वह उसे दूध पिलाने बैठ जाती…ऐसे थोड़ी न काम होता है…।"
         "तो…" मैं पत्नी को घरेलू कार्यों के संबंध में प्रोफेशनल अंदाज में सोचते हुए देखकर बोला।"
        "तो क्या.… मैंने कह दिया कि अब वह काम पर न आया करे।" श्रीमती जी मेरी ओर देखती हुई बोली। शायद उन्हें प्रफेशनल ढंग की कामवाली की आवश्यकता थी।  
       हालांकि मेरी पत्नी भी मानववादी हैं वह इस बात को समझती हैं कि मैं इसे समझता हूँ कामवाली को हटा देने से कहीं उनके मानवतावाद पर कोई चोट तो नहीं लगी सोचकर उन्होंने आगे कामवाली को हटाने के संबंध में सफाई सी देते हुए कहा, " एक तो यह बहुत गंदे से रहती थी और बच्ची को भी बहुत गंदे से रखती थी…. जानते हो, झुग्गी-झोपड़ी से कौन से रोग-व्याध लेकर वह यहाँ टहल रही हो…।"
        सुनकर मैं चुप रहा, मेरी चुप्पी उन्हें खलने सी लगी थी फिर आगे कहना शुरू किया, "एक तो उसके बारे में मुझे कोई सही जानकारी नहीं थी कि वह कहाँ की है और कैसी है दूसरे उसकी बातों पर भी मुझे विश्वास नहीं….जानते ही हो शहरों में तमाम तरह की उलटी सीधी बातें सुनाई देती रहती हैं यही सब सोचकर मैंने उसे हटा दिया।"
       मैं पता नहीं क्या सोचकर एक गहरी सांस लेते हुए कहा, "चलो फिर से दूसरी कामवाली ढूँढना।"
      हम-दोनों के बीच चुप्पी पसर चुकी थी।
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शनिवार, 4 मई 2013

प्रश्नशंकुलता:हमारा व्यक्तित्व...!


         हमारा व्यक्तित्व...! क्या यह उस बहती हुई नदी के समान है जो उफनती तो है लेकिन उसका बहाव एक नियत दिशा की ओर ही होता है...! फिर..! उसका उफनना...उसकी भंवरें...व्यर्थ हो जाती हैं..! क्या सारी चीजें पूर्व नियत या सीमा में ही होती हैं...? क्या उस नदी के समान ही मानसिक उफान, आवेग इत्यादि हमें एक नियत दिशा की ओर ही ले जाते हैं...! उसकी दिशा में कोई अंतर नहीं डालते..? क्या हमारी नियति ऐसी ही है...अपरिवर्तनीय..! एक निश्चित दिशा की ओर नदी के खांचों में उफनते हुए बह जाना..! या कि सारी स्थितियां धोखा तो नहीं है...!
          आखिर उसकी नियति है क्या...? वास्तव में उस नदी के समान या भिन्न...? नदी तो अपने द्वारा नियत दिशा की ओर ही बहती है...हजारों वर्षों के जिस बहाव में उसने जो कटान निर्मित किए हैं वह उसी में से होकर उसी दिशा की ओर बहती है...लेकिन वह..! उसकी तो कोई दिशा ही नहीं...! कोई स्व-निर्मिति ही नहीं...! वह है क्या, क्या एक निरा पुतला..! या फिर कोई भी आकर ले लेने वाला अमीबा...! क्या इसे जीवन माना जा सकता है...! आकार रहित जीवन...! आखिर इसका अर्थ क्या है..? सच में...उसने अभी तक अपने लिए जो कटान निर्मित किए हैं क्या उसके खांचों में उसका जीवन बहा जा रहा है...?
     बचपन से लेकर आज तक ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह अपने लिए कटान ही निर्मित करता आया है लेकिन यह कितना गहरा और किस दिशा में हुआ इसे नहीं समझ सका है| उसकी यह स्व-निर्मिति जिसे वह गति समझ रहा है या अपने लिए एक कटान समझता है वास्तव में वह ऐसा कुछ है भी या नहीं...? उसके लिए कितना जटिल प्रश्न...!
      अन्तस में उठने वाले विचारों की यह प्रश्नशंकुलता उसे एक अजीब सी भंवरों में उलझा देती है...इसमें उलझ वह दिशाहीन सा हो जाता है और उसकी यह दिशाहीनता उसमें एक बेचारगी के भाव के रूप में दिखाई देने लगतीहै| यही बेचारगी का भाव उसे दुखी सा कर देता है| तभी तो एक दिन उसके एक मित्र ने उससे कहा था-
       “अरे भईया कभी तो खुश रहा करो|”
उसका इस तरह कहना वह नहीं समझ सका| शायद उसके अन्तस की बेचारगी को भांप कर ही उसने ऐसी बात कही हो| फिर उसने कहा-
“भईया कम से कम खुश तो रहा करो, आपकी कोई समस्या तो दिखती नहीं और यदि हो भी तो इस तरह सोचने से कोई समस्या नही सुलझ सकती है|”
इसके बाद वह मित्र जीवन में यथार्थता को समझाता रहा और बोला, “यथार्थ जीवन जियो भावुक मत बनो|”
      ‘यथार्थता है क्या...’ इसी तरह के प्रश्नों से तो वह जूझता रहा है...कभी-कभी तो उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे यथार्थता नाम की कोई चीज ही नहीं है... और है भी तो...लोगों के अपने-अपने नजरिए में यह यथार्थता खो जाती है...! इस यथार्थता को जीवन में कैसे उतारा जाए यह उसके लिए बहुत ही गूढ़ प्रश्न रहा है...| हालाँकि उसके मित्र ने इसे समझाते हुए उससे कहा,
        “जिस वस्तु पर अपना वश नहीं या जिसे हम नहीं बदल सकते यही एक प्रकार की यथार्थता है उसे इसी रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए|” आगे फिर समझाते हुए बोला-
     “...फिर तुम्हीं बताओ जिसे हम नहीं बदल सकते उसके लिए हम दुखी और परेशान होकर ही क्या कर लेंगे सिवाय अपने को कष्ट देने के या जीवन को नीरस बना लेने के|”
       आदत से मजबूर वह मन ही मन उसकी बातों का अर्थ खोजने लगा...उसने जो बातें कहीं वह उसके व्यक्तित्व के अनुरूप ही थी...छोटी-छोटी बातों में भी खुश रहने वाला बिंदास जीवन शैली थी उसकी...! जो जैसा आया उसको उसी रूप में बिना लाग लपेट के स्वीकार कर लेना उसकी आदत थी...मन की गांठे भी बड़ी सहजता से वह खोल देता था...तभी तो उसने किन्तु-परन्तु को भूल यथास्थिति को स्वीकार कर प्रसन्न रहने की बात कह डाली| लेकिन...वह ऐसा नहीं कर पाएगा...हालाँकि उसके मित्र का व्यक्तित्व उसके लिए आकर्षण का विषय रहा है...आखिर वह कैसे अपने मन की प्रश्नशंकुलता एवं मित्र की यथार्थता को एक साथ स्वीकार कर ले...और अपने मन की यथार्थता को भूल जाए...! इसी मन के कारण स्वयं वह मित्र जैसा सहज और सरल नहीं बन पाया है जबकि उसका वह मित्र सदैव सहज और सरल ही दिखाई दिया है; जीवन को प्राकृतिक ढंग से जीने वाला...!

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

प्रश्नशंकुलता


      जीवन और जगत कितना रहस्यमय है...! इसे समझना कठिन ही नहीं असंभव सा प्रतीत होता है, सहज और सरल दिखाई देने वाली चीजें वास्तव में उतनी सहज और सरल नहीं होती, जटिल सी लगने वाली चीजें विश्लेषण के क्रम में सहज भी हो सकती हैं...| चूँकि मानव इसी जगत का हिस्सा है अत: उसके उपर भी उपरोक्त स्थितियां लागू होती हैं| वह अपने मन में उठने वाले ऐसे ही तमाम प्रश्नों के बीच स्वयं को उलझा हुआ पाता है...मानसिक विश्लेषण के क्रम में उसे प्रतीत होता है कि मानसिक चेतना भी बहुत ही रहस्यमयी होती है...स्वयं को समझने के प्रयास में किसी एक निश्चित बिंदु पर पहुँचने में वह संदेहों के बीच से गुजरता रहा है...| यह संदेह वैचारिक धरातल को ले कर नहीं अपितु अपने को उसके केंद्र में रख कर जानने एवं समझने को लेकर है...और यह संदेह यथार्थता और उसके बीच फंसी हुई व्यावहारिक परिस्थितियों के कारण रहा है|
         समझना है क्या...? और क्यों...? यह एक जटिल प्रश्न है...इस तरह का प्रश्न उसके सामने क्यों खड़ा होता है...? हाँ... यह प्रश्न उसके व्यक्तित्व की सहजता से भी जुड़ जाता है...| क्योंकि समझ व्यक्तित्व को एक ऐसा दर्पण प्रदान करती है जिसमें अपने अक्स के साथ ही दूसरों को भी उसका अक्स साफ़ दिखाई देने लगता है...यहाँ तक कि वह दूसरी चीजों का अक्स भी इसी में देख लेता है...| वास्तव में व्यक्तित्व के निर्माण की दिशा और दशा इसी से सम्बंधित हो सकती है...जब हम व्यावहारिक जीवन के किसी प्रश्न में उलझ जाते है तो उसके केंद्र में हमारा व्यक्तित्व ही होता है जो विभिन्न धारणाओं के धरातल पर खड़ा होता है...ऐसे में व्यक्तित्व जिन विचारों एवं धारणाओं पर आधारित होता है सर्वप्रथम उन्हीं को समझने की आवश्यकता है...इसी समझने के प्रयास में ऐसा प्रतीत होता है कि वह सदैव एक प्रक्रिया में रहा है...इस प्रक्रिया की दिशा चाहे जो रही हो...लेकिन यह प्रक्रिया कैसी है; क्या यह व्यक्तित्व निर्माण की दिशा है या उसकी व्याख्या है...! विचारों की यह प्रश्नशंकुलता है बड़ी विचित्र..! उलझाव भरा...! क्या हम अपने व्यक्तित्व निर्माण की व्यख्या कर सकते हैं...और क्या यह एक वास्तविक सम्भावना है...!

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

नीरस व्यक्ति


     मेरा वह मित्र किसी संस्था में डाइरेक्टर था एक दिन जब वह मेरे पास आया तो कुछ परेशान सा था और जब वह किसी मानसिक परेशानी या अंतर्द्वन्द्व का शिकार होता है तो वह ऐसे ही आकर मुझसे गप्पबाजी करने लगता है...इसे भांपते हुए मैंने उससे पूँछा,
''क्यों भाई क्या हालचाल है|''
''कुछ नहीं यार...कोई ऐसी बात नहीं...|'' वह बोला|
मैंने उससे कहा,
''नहीं कुछ बात अवश्य है...परेशान से क्यों हो,,?''
''नहीं कोई वैसी परेशानी तो नहीं है...बस सोच रहा हूँ कि मैं कैसा हूँ..|'' कुछ छिपाते हुए सा वह बोला|
''पहेली मत बुझाओ ...बताओ क्या बात है|'' मैंने अपनी जिज्ञासा को प्रकट किया|
मेरे मनोभाव को अनसुना करते हुए उसने मुझसे कहा,
''अच्छा बताओ..क्या मैं नीरस व्यक्ति हूँ...|''
''अरे, मेरे भाई आप तो जैसे पहेली बुझा रहे हो...किसने आप को नीरस व्यक्ति कह दिया...|'' मैंने कहा|
''नहीं-नहीं बताइए...क्या मेरे व्यक्तित्व में नीरसपन झलकता है|'' वह थोड़ा मायूस होते हुए सा बोला|
          उसकी मायूसी और उसके बात करने के भोलेपन को देख मैं उसके बारे में सोचने लगा...हाँ वह एक सीधा-साधा सा अपने काम को ठीक तरीके से या कहें कि निष्ठापूर्वक करने वाला व्यक्ति था...उसे अपने स्वार्थ में किसी की लल्लो-चप्पो करना भी पसंद नहीं था...अर्थात वह अपने काम से काम का मतलब रखता था...और जहाँ तक पारिवारिक जीवन का प्रश्न है वहाँ भी वह अपने दायित्वों को ठीक ही निर्वहन करता आया है...मैं उसके बारे में यह सब सोच ही रहा था कि उसकी आवाज मुझे फिर सुनाई दी,
''क्या सोचने लगे मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिए..|''
मैंने अचानक अपनी तन्द्रा को भंग करते हुए कहा,
''नहीं यार कौन कह दिया आपको नीरस व्यक्ति..तुम ऐसे नहीं हो|''
''तो उन्होंने ऐसा फिर क्यों कहा...|'' उसने कहा|
मैंने फिर पूँछा -
''किसने कहा..|''
मेरी इस जिज्ञासा को शांत करते हुए वह बोला,
''मेरे बॉस ने मुझे नीरस व्यक्ति कहा.."
मुझे यह सुनकर हँसी आ गई और मैं हँसने लगा, मुझे हँसता देख उसने झल्लाहट के साथ कहा,
''आपको मेरी बात मजाक सूझ रही है|'' ''आपके लिए यह मजाक जैसी बात हो सकती है,,लेकिन मेरे लिए नहीं...आखिर उन्होंने मेरे अन्दर कौन सी कमी देखी जिससे मुझे नीरस व्यक्ति कह दिया...|'' उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए एक ही साँस में कह दिया|
         तब तक मैं अपनी हंसी रोक संयत हो चुका था और उसकी संवेदनशीलता को भांप चुका था| उसे थोड़े समझाने के भाव से बोला,
''इसमें परेशान होने की क्या बात है...बॉस के अलावा किसी और ने तो तुम्हे नीरस नहीं कहा..|''
''क्या मतलब...?''  वह थोडा जिज्ञासु सा बोला|
''मतलब इसका यही है भाई कि आपके बॉस को आपसे कोई रस नहीं मिलता होगा..इसीलिए उन्होंने आपको 'नीरस' का विशेषण दे दिया होगा..|'' मैंने उसे समझाते हुए से कहा|
''रस..! कैसा रस..! और यह रस कहाँ से लाऊं..| ''मेरी बात को समझने के अंदाज में वह बोला...फिर हम दोनों एक साथ हँसने लगे| अचानक उसने अपनी हंसी रोक थोड़े चिंतित स्वर में बोला,
''मेरे कार्यों का मूल्यांकन भी कही इस रस के अभाव में....|''
मै उसकी इस चिंता से प्रभावित लेकिन इसे प्रकट न करते हुए उससे कहा,
''नहीं यार अपने पर विश्वास रखो..|'' फिर हम दोनों चुप हो गए| 
         तभी एक आदमी तेज कदमों से चलते हुए हम दोनों के पास आया और मेरे परिचित उस डाइरेक्टर से मुखातिब हो उनका अभिवादन करते हुए बोला,
''अरे साहब अपने गजब का निर्णय लिया आपके उस निर्णय से हम लोगों की समस्याएँ हल हुई... नहीं तो हम गरीब लोगों की बात कौन सुनता...|'' 
यह कहते हुए उसने मेरी ओर भी देखा और फिर दो लोगों के बीच की वार्ता में अपने को असहज मानते हुए हम दोनों से नमस्कार का भाव प्रकट करते हुए चला गया| फिर मेरे मित्र ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा,
''जानते हो उसने मेरे किस निर्णय के बारे में कहा...|''
    मैं केवल उसके चेहरे को देख रहा था...और चुप रहा, उसने फिर आगे कहा,
''...उस निर्णय को न लेने के लिए मुझ पर बहुत दबाव था...धमकी के साथ लालच भी दिया गया...लेकिन मैं नहीं...''
तभी मैं बीच में ही उसे लगभग टोकते हुए बोला,
''मैं जनता हूँ...तुम्हें...! तुम्हारा रस तो सब के लिए है...! तभी तो तुम्हारे निर्णय के रस से उस गरीब आदमी की भी समस्याएं हल हुई...!'' आगे मैंने उसे समझाने के अंदाज में और जोड़ा,
''यदि तुम्हारे पास ऐसा रस है तो तुम नीरस कैसे हो सकते हो...!''
हमारी वार्ता अब समाप्त हो चुकी थी...|




शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

लिखने योग्य अच्छा काम...!!


         सुबह का वक्त था..., ट्रेन प्लेटफार्म से धीरे-धीरे खिसक रही थी...दौड़ कर किसी तरह चढ़ पाया..., बैठने के लिए सीट तलाश करने लगा...नीचे की एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी...वहां बैठना चाहा...पास में ही बैठा एक व्यक्ति बोला,
                   “नहीं-नहीं, यहाँ मत बैठो मेरी बर्थ है...|”
मैंने वहां बैठने का निर्णय बदल लिया...ट्रेन के गलियारे में, आते-जाते लोगों के धक्के खाते खड़ा रहा...तभी दूसरे बर्थ पर बैठे एक व्यक्ति को उसी बर्थ पर आराम से बैठा एक आदमी यह कहते हुए उठा रहा था,
        “अरे यहाँ से उठो, यह हमारी रिजर्व बर्थ है...”
लेकिन दूसरा उठने से रहा... बोला,
        “मैं अब बैठ गया हूँ नहीं उठूँगा..मैं रोज चलता हूँ|”
उठाने वाला भी थक-हार कर चुप हो गया...| ट्रेन अपनी पूरी गति पकड़ चुकी थी...इधर मैं भी गलियारे में खड़े-खड़े लोगों के धक्के खाते ऊब गया था...अब ऊपर के खाली बर्थ पर बैठना चाहा...जैसे ही मैंने ऊपर बैठने का प्रयास किया नीचे आराम से बैठे व्यक्ति ने टोक दिया,
       “अरे भाई इतना परेशान होकर तो हम लोग रिजर्वेशन करा पाते हैं, आप लोग इस बात को समझते नहीं...पिछली बार तो वेटिंग ही कन्फर्म नहीं हो पाई तो हम लोग गैलरी में ही लेट और बैठ कर गए थे...|”
उसने फिर कहा,
                “वहां न बैठो, मैं लेटने जा रहा हूँ...|”
मैंने उसकी बात सुनी, उससे बहस नहीं करना चाहता था फिर भी झुंझलाकर बोल उठा,
                  “समझता हूँ...|
खैर बैठने के इस प्रयास को भी मैंने छोड़ दिया और सोचने लगा...
        ...ये रेल वाले भी अजीब व्यवस्था बनाते हैं...बैठने तक की कोई ठीक व्यवस्था देते नहीं...हाँ, लेटने की पहले कर देते हैं...कहने को जनरल बोगी लगी है...लेकिन वहां भी तिल रखने की जगह नहीं होगी...शौचालय में लोग घुस कर बैठे होंगे...जनसँख्या या व्यवस्था, पता नहीं कौन जिम्मेदार है...सोचते-सोचते सीट की तलाश में दूसरे कूपे में आ गया...अचानक एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी, उल्लसित हो वहां मैं बैठ गया...यहाँ भी पास ही बैठे एक व्यक्ति के सज्जनतापूर्ण प्रतिरोध का सामना करना पड़ा...फिर भी मैं ही सफल हुआ| गाड़ी कहीं रुकी थी...चल पड़ी...एक टीटी आता हुआ दिखाई दिया, मैं थोडा नर्वश सा हुआ क्योंकि टिकट तो जनरल क्लास का लिए था और बैठा स्लीपर बोगी में..., टीटीई पास बैठे व्यक्ति से उलझ गया शायद वह भी मेरे ही जैसा इस बोगी के लिए अनधिकृत था, दोनों में थोड़ी बहस होने लगी, मैं उनके बीच के वार्तालाप को ध्यान से सुनने लगा, टीटीई कह रहा था,
         “टिकट दिखाओ..|
उसके टिकट दिखाने पर टीटीई ने कहा,
         “इस बोगी में क्यों बैठ गए...यह टिकट तो जनरल क्लास का है...|” 
         “क्या करते जनरल डिब्बे में बहुत भीड़ है खड़े होने तक की जगह नहीं है” यात्री ने कहा|
         “लेकिन पेनाल्टी देनी पड़ेगीया अभी यहाँ से हटो...”
टीटीई ने थोडा हडकाते हुए से कहा| ट्रेन भागी जा रही थी..उतरना संभव नहीं था, यात्री ने पूंछा,
         “कितनी पेनाल्टी...”
इस पर टीटीई ने कोई धनराशि बताई, लेकिन यात्री उसे देने में अपनी असमर्थता जताते हुए कहा,
         “मेरे पास इतना पैसा नहीं है…|”  
इसके बाद टीटी उस व्यक्ति को थोडा अलग ले गया, वहां से वापस आकर वह यात्री मुस्कराते हुए पुन: अपनी सीट पर बैठ गया...| मुझे अपने एक मित्र की रेल यात्रा के बारे में कही एक बात याद आ गई...उन्होंने बताया था,
         “जेब में पैसा हो तो टिकट लिए हैं या नहीं या फिर किस बोगी में बैठे है इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, आपकी यात्रा सकुशल सम्पन्न हो जाएगी|”
अब मेरी बारी थी...लेकिन यह क्या...! टीटी ने एक बार मुझे देखा और आगे बढ़ गया...शायद मुझे डेली पेसेंजर समझ कर नजरंदाज कर दिया हो...जो भी हो मैंने राहत की सांस ली| तभी बैठे-बैठे मेरी नजर सामने लगे एक छोटे से पोस्टर पर पड़ी... हाँ...,वह पोस्टर किसी सामाजिक संस्था का था...उस पर लिखा था-
         “अच्छा लिखने से बेहतर है कि लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय|
मैं इस पर चिंतन-मनन करने लगा...|
        ट्रेन पुन: अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी...अचानक मेरी दृष्टि ट्रेन के गलियारे में झाड़ू लगाती एक औरत पर पड़ी...वह कृशकाय, चीथड़ों में लिपटी थी...लगभग डेढ़ साल की बच्ची को कांख में दबाए झाड़ू लगाते हुए धीरे-धीरे मेरी ओर चली आ रही थी....उसकी बच्ची को देख...मैं सोचने लगा...इस बच्ची का पिता कौन होगा...कोई अपनी पत्नी और बच्चे को इस हालात में छोड़ सकता है..! या फिर इसकी माँ किसी वहशी दरिन्दे का शिकार हुई होगी...इस अभागी बच्ची का भविष्य क्या होगा...! तब तक उस औरत का हाथ मेरी ओर बढ़ चुका था... शायद उसने अपना काम पूरा कर लिया था...मैंने उसके हाथ पर एक सिक्का रख दिया...वह आगे बढ़ चुकी थी...मैंने पुन: उस छोटे से पोस्टर की ओर देखा, दृष्टि इस वाक्य पर रुक गई, “लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय,” मैं फिर अपनी विचारमग्नता में खो गया...पता नहीं...लिखने योग्य अच्छा काम कौन कर रहा है...यह पोस्टर..! या झाड़ू लगाती कांख में बच्ची दबाए कृशकाय यह औरत...! या लिखने के लिए मसाला तलाश रहा मैं...! या फिर टीटीई समेत हम सब को ढोती बेचारी यह ट्रेन...! और मैं...अपने इन विचारों में मगन हो गया...लेकिन...वह औरत..! वह तो...बच्ची को कांख में दबाये लोगो के सामने हाथ फैलाती आगे बढ़ी जा रही थी...|
           इस बात की चर्चा मैंने जब अपनी पत्नी से किया तो उन्होंने कहा,
           “अरे ! वह इन पैसों से जाकर समोसा खा लेगी या फिर कोई उससे भींख मगवा रहा होगा...इन सबके पीछे माफिया लोग रहते हैं..! नहीं तो इतनी सारी व्यवस्था होते हुए भी वह यह सब क्यों झेल रही है,”
पत्नी ने आगे फिर जोड़ा,
           “समय बिताने के लिए आपके पास अच्छा काम है...बस लिखने बैठ जाओ...! अगर समाजसेवा का इतना ही शौक है तो ऐसे लोगों के लिए शेल्टर होम खोलो...या फिर उन परिस्थितियों, माफियाओं से भिड़ो जिसके कारण उसके लिए यह हालात पैदा हुआ..|”
पत्नी ने ये सारी बातें एक सांस में कह डाली...मैं अपनी हदें जानता हूँ...मैंने सोचा...बस अब चुप हो जाना ही अच्छा है और मन ही मन ही..ही..करने लगा...|
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