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गुरुवार, 19 सितंबर 2013

कामवालियां

         उस दिन मैंने घर पर एक नई कामवाली को देखा; मैंने सोचा चलो अब श्रीमती जी की झल्लाहट मेरे ऊपर थोड़ी कम हो जाएगी। इधर कई दिनों से घर के छोटे-मोटे काम खासकर घर की साफ सफाई उन्हीं को करनी पड़ रही थी क्योंकि पहलेवाली कामवाली कुछ दिन पूर्व ही काम छोड़ कर चली गई थी और इसका खामियाजा मुझे रह-रह कर मेरे ऊपर उनकी झल्लाहट में मिल जाया करता था, जैसे ‘मैं तो घर की नौकरानी हूँ, मेरी चिंता किसको है’ उन्हीं के शब्दों में ‘मैं नौकरी कर परिवार पर अहसान कर रहा हूँ’ आदि-आदि। हालांकि मैं अपने तर्कों से उनकी झल्लाहट को अपने तरीके से कम करने का प्रयास भी करता था और कभी-कभी इसमें सफलता भी मिल जाया करती थी...मेरे इस तर्क से वह सहमत थी कि इस प्रकार घर का काम करने से शरीर स्वस्थ रहता है तथा शरीर की स्थूलता में भी कमी आती है। 
       मैंने कामवाली को देखते हुए, जो उस समय पोंछा लगा रही थी, श्रीमती जी से पूँछा, ‘अच्छा ये बताओ इसके बैकग्राउंड के बारे में कुछ पता-वता किया है कि नहीं...कौन है कहाँ से है...कि ऐसे ही काम पर रख लिया।’
       पत्नी जी ने उत्तर दिया, “अरे और कहाँ की है वही आसाम की है..वही जो बंगलादेशी लोग आसाम में बसे हैं उन्हीं में से है।”
       खैर पत्नी जी की अन्य बातों से मैं सहमत होऊँ न लेकिन इस बात से सहमत था कि वह भी घर में काम कर चुकी अब तक अन्य कामवालियों की तरह आसाम या बंगाल की ही होगी। तभी उस कामवाली की एक छोटी बच्ची दिखाई दी उसे देखते हुए मैं श्रीमती जी से पूंछ पड़ा, “इसका पति क्या करता है...। ” मेरे इस प्रश्न का उत्तर देने के पूर्व उन्होंने एक गहरी सांस ली, और फिर बोली, “यह तो बता रही थी....” फिर चुप हो गयीं।
        मैं उनकी इस गहरी सांस और चुप्पी के बाद आगे उसके बारे में और अधिक जानने की इच्छा को त्याग दिया। तब तक पोंछा लगाते हुए वह हम लोगों से थोड़ी दूर जा चुकी थी। 
       उसकी ओर देखते हुए वह बोली, ‘बेचारी..!’
       यह सुनकर कामवाली के बारे में जानने की जिज्ञासा मेरे मन में पुनः जागृत हो गई। 
       मैंने फिर पूँछा, “क्या बता रही थी...?”
       “बता रही थी...यह अपने पति की दूसरी पत्नी है...।” पत्नी ने कहा|
       “क्या इसके पति ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ दिया है...!” मैंने अपनी जिज्ञासा बढ़ाई।
       श्रीमती जी ने उत्तर दिया, “नहीं, छोड़ा नहीं था...यह बता रही थी कि उसने पहली वाली पत्नी को मार डाला था...। 
       मैं आश्चर्य से बोला, “क्या...!”
       “यह बच्ची किसकी है...।” मैंने पूँछा|
       उन्होंने आगे बताना शुरू किया, “यह बच्ची तो इसी की है, हाँ पहली वाली को एक लड़का भी था...लेकिन वह बेचारा भी...!”
      “बेचारा...!” मेरी उसके बारे में जानने की उत्सुकता बढ़ चुकी थी। 
       अब श्रीमती जी मेरी ओर देखती हुई बोली, “हाँ...वह बेचारा ही तो था...यह कामवाली बता रही थी... जब उसका पति उसकी माँ को मार रहा था तो वह छोटा बच्चा अपनी माँ को खून से लथपथ मार खाते मरते हुए देख रहा था...यह दृश्य देखकर उसका दिल बैठ गया और बेचारा मर गया...! इसके बाद.. इससे शादी किया।”
       मैं मन ही मन उस क्षण की कल्पना करने लगा जब उस बच्चे ने अपनी माँ को उस स्थिति में देखा होगा...बच्चे की उस समय की मन:स्थिति क्या रही होगी...! सोचकर...मैं बरबस बोल उठा, “ओह...!” और एक गहरी सांस ली। 
      श्रीमती की ओर मुखातिब होते हुए बोला, “इन कामवालियों की जिन्दगी भी क्या होती है...! इस बात का ध्यान रखना...यहाँ ठीक से झाड़ू नहीं लगाया...कोने में पोंछा लगाना भूल गई...जैसी टोका-टाकी इससे अधिक मत करना नहीं तो अन्य कामवालियों की तरह यह भी काम छोड़ कर चली जाएगी।”
     श्रीमती जी ने आँखे तरेरा और बोली, “जैसे मैं ही सब की दोषी हूँ...।” 
      मैं उनके गुस्से से थोड़ा भयभीत हो बातचीत की धारा को दूसरी दिशा देते हुए बोला, "अच्छा इसका पति क्या करता है…?"
      श्रीमती जी ने आगे जानकारी देते हुए बताया, "यह तो बता रही थी…इसका पति इसके साथ नहीं रहता…वह आजकल मुंबई में रह रहा हैं…।" 
      "अच्छा…! वह इसकी खबर लेता है …?" मैंने फिर पूँछा।
      "नहीं इसके अनुसार तो इसका पति इससे भी कोई खास मतलब नहीं रखता लेकिन इस छोटी बच्ची से कभी-कभार फोन से बात करता है…।" श्रीमती जी ने उत्तर दिया।
       "हूँ…।" मैं कुछ सोचते हुए बोल उठा। 
       तभी पत्नी की आवाज पुनः सुनाई दी, "यह तो कह रही थी कि पति को बच्ची से भी बात नहीं करने देती।"
        इसका कारण पूँछने पर श्रीमती जी ने मेरी जानकारी  में वृद्धि किया और बोली, "पति के पहले वाले कृत्य को सोचकर… कि बच्ची पर कोई गलत प्रभाव न पड़े इसी कारण बच्ची से बात नहीं करने देती।"
        तभी उस कामवाली की बच्ची रोने लगी वह उसे एक कोने में ले जाकर दूध पिलाने लगी।
        एक दिन सुबह जब वह कामवाली नहीं आई थी तो मैंने उसके न आने का कारण श्रीमती जी से पूँछा तो वह बोली, "क्या करती उसकी लड़की तो घर में इधर-उधर कूदती और रोती रहती जब देखो तब काम छोड़कर वह उसे दूध पिलाने बैठ जाती…ऐसे थोड़ी न काम होता है…।"
         "तो…" मैं पत्नी को घरेलू कार्यों के संबंध में प्रोफेशनल अंदाज में सोचते हुए देखकर बोला।"
        "तो क्या.… मैंने कह दिया कि अब वह काम पर न आया करे।" श्रीमती जी मेरी ओर देखती हुई बोली। शायद उन्हें प्रफेशनल ढंग की कामवाली की आवश्यकता थी।  
       हालांकि मेरी पत्नी भी मानववादी हैं वह इस बात को समझती हैं कि मैं इसे समझता हूँ कामवाली को हटा देने से कहीं उनके मानवतावाद पर कोई चोट तो नहीं लगी सोचकर उन्होंने आगे कामवाली को हटाने के संबंध में सफाई सी देते हुए कहा, " एक तो यह बहुत गंदे से रहती थी और बच्ची को भी बहुत गंदे से रखती थी…. जानते हो, झुग्गी-झोपड़ी से कौन से रोग-व्याध लेकर वह यहाँ टहल रही हो…।"
        सुनकर मैं चुप रहा, मेरी चुप्पी उन्हें खलने सी लगी थी फिर आगे कहना शुरू किया, "एक तो उसके बारे में मुझे कोई सही जानकारी नहीं थी कि वह कहाँ की है और कैसी है दूसरे उसकी बातों पर भी मुझे विश्वास नहीं….जानते ही हो शहरों में तमाम तरह की उलटी सीधी बातें सुनाई देती रहती हैं यही सब सोचकर मैंने उसे हटा दिया।"
       मैं पता नहीं क्या सोचकर एक गहरी सांस लेते हुए कहा, "चलो फिर से दूसरी कामवाली ढूँढना।"
      हम-दोनों के बीच चुप्पी पसर चुकी थी।
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शनिवार, 4 मई 2013

प्रश्नशंकुलता:हमारा व्यक्तित्व...!


         हमारा व्यक्तित्व...! क्या यह उस बहती हुई नदी के समान है जो उफनती तो है लेकिन उसका बहाव एक नियत दिशा की ओर ही होता है...! फिर..! उसका उफनना...उसकी भंवरें...व्यर्थ हो जाती हैं..! क्या सारी चीजें पूर्व नियत या सीमा में ही होती हैं...? क्या उस नदी के समान ही मानसिक उफान, आवेग इत्यादि हमें एक नियत दिशा की ओर ही ले जाते हैं...! उसकी दिशा में कोई अंतर नहीं डालते..? क्या हमारी नियति ऐसी ही है...अपरिवर्तनीय..! एक निश्चित दिशा की ओर नदी के खांचों में उफनते हुए बह जाना..! या कि सारी स्थितियां धोखा तो नहीं है...!
          आखिर उसकी नियति है क्या...? वास्तव में उस नदी के समान या भिन्न...? नदी तो अपने द्वारा नियत दिशा की ओर ही बहती है...हजारों वर्षों के जिस बहाव में उसने जो कटान निर्मित किए हैं वह उसी में से होकर उसी दिशा की ओर बहती है...लेकिन वह..! उसकी तो कोई दिशा ही नहीं...! कोई स्व-निर्मिति ही नहीं...! वह है क्या, क्या एक निरा पुतला..! या फिर कोई भी आकर ले लेने वाला अमीबा...! क्या इसे जीवन माना जा सकता है...! आकार रहित जीवन...! आखिर इसका अर्थ क्या है..? सच में...उसने अभी तक अपने लिए जो कटान निर्मित किए हैं क्या उसके खांचों में उसका जीवन बहा जा रहा है...?
     बचपन से लेकर आज तक ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह अपने लिए कटान ही निर्मित करता आया है लेकिन यह कितना गहरा और किस दिशा में हुआ इसे नहीं समझ सका है| उसकी यह स्व-निर्मिति जिसे वह गति समझ रहा है या अपने लिए एक कटान समझता है वास्तव में वह ऐसा कुछ है भी या नहीं...? उसके लिए कितना जटिल प्रश्न...!
      अन्तस में उठने वाले विचारों की यह प्रश्नशंकुलता उसे एक अजीब सी भंवरों में उलझा देती है...इसमें उलझ वह दिशाहीन सा हो जाता है और उसकी यह दिशाहीनता उसमें एक बेचारगी के भाव के रूप में दिखाई देने लगतीहै| यही बेचारगी का भाव उसे दुखी सा कर देता है| तभी तो एक दिन उसके एक मित्र ने उससे कहा था-
       “अरे भईया कभी तो खुश रहा करो|”
उसका इस तरह कहना वह नहीं समझ सका| शायद उसके अन्तस की बेचारगी को भांप कर ही उसने ऐसी बात कही हो| फिर उसने कहा-
“भईया कम से कम खुश तो रहा करो, आपकी कोई समस्या तो दिखती नहीं और यदि हो भी तो इस तरह सोचने से कोई समस्या नही सुलझ सकती है|”
इसके बाद वह मित्र जीवन में यथार्थता को समझाता रहा और बोला, “यथार्थ जीवन जियो भावुक मत बनो|”
      ‘यथार्थता है क्या...’ इसी तरह के प्रश्नों से तो वह जूझता रहा है...कभी-कभी तो उसे ऐसा प्रतीत होता है जैसे यथार्थता नाम की कोई चीज ही नहीं है... और है भी तो...लोगों के अपने-अपने नजरिए में यह यथार्थता खो जाती है...! इस यथार्थता को जीवन में कैसे उतारा जाए यह उसके लिए बहुत ही गूढ़ प्रश्न रहा है...| हालाँकि उसके मित्र ने इसे समझाते हुए उससे कहा,
        “जिस वस्तु पर अपना वश नहीं या जिसे हम नहीं बदल सकते यही एक प्रकार की यथार्थता है उसे इसी रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए|” आगे फिर समझाते हुए बोला-
     “...फिर तुम्हीं बताओ जिसे हम नहीं बदल सकते उसके लिए हम दुखी और परेशान होकर ही क्या कर लेंगे सिवाय अपने को कष्ट देने के या जीवन को नीरस बना लेने के|”
       आदत से मजबूर वह मन ही मन उसकी बातों का अर्थ खोजने लगा...उसने जो बातें कहीं वह उसके व्यक्तित्व के अनुरूप ही थी...छोटी-छोटी बातों में भी खुश रहने वाला बिंदास जीवन शैली थी उसकी...! जो जैसा आया उसको उसी रूप में बिना लाग लपेट के स्वीकार कर लेना उसकी आदत थी...मन की गांठे भी बड़ी सहजता से वह खोल देता था...तभी तो उसने किन्तु-परन्तु को भूल यथास्थिति को स्वीकार कर प्रसन्न रहने की बात कह डाली| लेकिन...वह ऐसा नहीं कर पाएगा...हालाँकि उसके मित्र का व्यक्तित्व उसके लिए आकर्षण का विषय रहा है...आखिर वह कैसे अपने मन की प्रश्नशंकुलता एवं मित्र की यथार्थता को एक साथ स्वीकार कर ले...और अपने मन की यथार्थता को भूल जाए...! इसी मन के कारण स्वयं वह मित्र जैसा सहज और सरल नहीं बन पाया है जबकि उसका वह मित्र सदैव सहज और सरल ही दिखाई दिया है; जीवन को प्राकृतिक ढंग से जीने वाला...!

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

प्रश्नशंकुलता


      जीवन और जगत कितना रहस्यमय है...! इसे समझना कठिन ही नहीं असंभव सा प्रतीत होता है, सहज और सरल दिखाई देने वाली चीजें वास्तव में उतनी सहज और सरल नहीं होती, जटिल सी लगने वाली चीजें विश्लेषण के क्रम में सहज भी हो सकती हैं...| चूँकि मानव इसी जगत का हिस्सा है अत: उसके उपर भी उपरोक्त स्थितियां लागू होती हैं| वह अपने मन में उठने वाले ऐसे ही तमाम प्रश्नों के बीच स्वयं को उलझा हुआ पाता है...मानसिक विश्लेषण के क्रम में उसे प्रतीत होता है कि मानसिक चेतना भी बहुत ही रहस्यमयी होती है...स्वयं को समझने के प्रयास में किसी एक निश्चित बिंदु पर पहुँचने में वह संदेहों के बीच से गुजरता रहा है...| यह संदेह वैचारिक धरातल को ले कर नहीं अपितु अपने को उसके केंद्र में रख कर जानने एवं समझने को लेकर है...और यह संदेह यथार्थता और उसके बीच फंसी हुई व्यावहारिक परिस्थितियों के कारण रहा है|
         समझना है क्या...? और क्यों...? यह एक जटिल प्रश्न है...इस तरह का प्रश्न उसके सामने क्यों खड़ा होता है...? हाँ... यह प्रश्न उसके व्यक्तित्व की सहजता से भी जुड़ जाता है...| क्योंकि समझ व्यक्तित्व को एक ऐसा दर्पण प्रदान करती है जिसमें अपने अक्स के साथ ही दूसरों को भी उसका अक्स साफ़ दिखाई देने लगता है...यहाँ तक कि वह दूसरी चीजों का अक्स भी इसी में देख लेता है...| वास्तव में व्यक्तित्व के निर्माण की दिशा और दशा इसी से सम्बंधित हो सकती है...जब हम व्यावहारिक जीवन के किसी प्रश्न में उलझ जाते है तो उसके केंद्र में हमारा व्यक्तित्व ही होता है जो विभिन्न धारणाओं के धरातल पर खड़ा होता है...ऐसे में व्यक्तित्व जिन विचारों एवं धारणाओं पर आधारित होता है सर्वप्रथम उन्हीं को समझने की आवश्यकता है...इसी समझने के प्रयास में ऐसा प्रतीत होता है कि वह सदैव एक प्रक्रिया में रहा है...इस प्रक्रिया की दिशा चाहे जो रही हो...लेकिन यह प्रक्रिया कैसी है; क्या यह व्यक्तित्व निर्माण की दिशा है या उसकी व्याख्या है...! विचारों की यह प्रश्नशंकुलता है बड़ी विचित्र..! उलझाव भरा...! क्या हम अपने व्यक्तित्व निर्माण की व्यख्या कर सकते हैं...और क्या यह एक वास्तविक सम्भावना है...!

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

नीरस व्यक्ति


     मेरा वह मित्र किसी संस्था में डाइरेक्टर था एक दिन जब वह मेरे पास आया तो कुछ परेशान सा था और जब वह किसी मानसिक परेशानी या अंतर्द्वन्द्व का शिकार होता है तो वह ऐसे ही आकर मुझसे गप्पबाजी करने लगता है...इसे भांपते हुए मैंने उससे पूँछा,
''क्यों भाई क्या हालचाल है|''
''कुछ नहीं यार...कोई ऐसी बात नहीं...|'' वह बोला|
मैंने उससे कहा,
''नहीं कुछ बात अवश्य है...परेशान से क्यों हो,,?''
''नहीं कोई वैसी परेशानी तो नहीं है...बस सोच रहा हूँ कि मैं कैसा हूँ..|'' कुछ छिपाते हुए सा वह बोला|
''पहेली मत बुझाओ ...बताओ क्या बात है|'' मैंने अपनी जिज्ञासा को प्रकट किया|
मेरे मनोभाव को अनसुना करते हुए उसने मुझसे कहा,
''अच्छा बताओ..क्या मैं नीरस व्यक्ति हूँ...|''
''अरे, मेरे भाई आप तो जैसे पहेली बुझा रहे हो...किसने आप को नीरस व्यक्ति कह दिया...|'' मैंने कहा|
''नहीं-नहीं बताइए...क्या मेरे व्यक्तित्व में नीरसपन झलकता है|'' वह थोड़ा मायूस होते हुए सा बोला|
          उसकी मायूसी और उसके बात करने के भोलेपन को देख मैं उसके बारे में सोचने लगा...हाँ वह एक सीधा-साधा सा अपने काम को ठीक तरीके से या कहें कि निष्ठापूर्वक करने वाला व्यक्ति था...उसे अपने स्वार्थ में किसी की लल्लो-चप्पो करना भी पसंद नहीं था...अर्थात वह अपने काम से काम का मतलब रखता था...और जहाँ तक पारिवारिक जीवन का प्रश्न है वहाँ भी वह अपने दायित्वों को ठीक ही निर्वहन करता आया है...मैं उसके बारे में यह सब सोच ही रहा था कि उसकी आवाज मुझे फिर सुनाई दी,
''क्या सोचने लगे मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिए..|''
मैंने अचानक अपनी तन्द्रा को भंग करते हुए कहा,
''नहीं यार कौन कह दिया आपको नीरस व्यक्ति..तुम ऐसे नहीं हो|''
''तो उन्होंने ऐसा फिर क्यों कहा...|'' उसने कहा|
मैंने फिर पूँछा -
''किसने कहा..|''
मेरी इस जिज्ञासा को शांत करते हुए वह बोला,
''मेरे बॉस ने मुझे नीरस व्यक्ति कहा.."
मुझे यह सुनकर हँसी आ गई और मैं हँसने लगा, मुझे हँसता देख उसने झल्लाहट के साथ कहा,
''आपको मेरी बात मजाक सूझ रही है|'' ''आपके लिए यह मजाक जैसी बात हो सकती है,,लेकिन मेरे लिए नहीं...आखिर उन्होंने मेरे अन्दर कौन सी कमी देखी जिससे मुझे नीरस व्यक्ति कह दिया...|'' उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए एक ही साँस में कह दिया|
         तब तक मैं अपनी हंसी रोक संयत हो चुका था और उसकी संवेदनशीलता को भांप चुका था| उसे थोड़े समझाने के भाव से बोला,
''इसमें परेशान होने की क्या बात है...बॉस के अलावा किसी और ने तो तुम्हे नीरस नहीं कहा..|''
''क्या मतलब...?''  वह थोडा जिज्ञासु सा बोला|
''मतलब इसका यही है भाई कि आपके बॉस को आपसे कोई रस नहीं मिलता होगा..इसीलिए उन्होंने आपको 'नीरस' का विशेषण दे दिया होगा..|'' मैंने उसे समझाते हुए से कहा|
''रस..! कैसा रस..! और यह रस कहाँ से लाऊं..| ''मेरी बात को समझने के अंदाज में वह बोला...फिर हम दोनों एक साथ हँसने लगे| अचानक उसने अपनी हंसी रोक थोड़े चिंतित स्वर में बोला,
''मेरे कार्यों का मूल्यांकन भी कही इस रस के अभाव में....|''
मै उसकी इस चिंता से प्रभावित लेकिन इसे प्रकट न करते हुए उससे कहा,
''नहीं यार अपने पर विश्वास रखो..|'' फिर हम दोनों चुप हो गए| 
         तभी एक आदमी तेज कदमों से चलते हुए हम दोनों के पास आया और मेरे परिचित उस डाइरेक्टर से मुखातिब हो उनका अभिवादन करते हुए बोला,
''अरे साहब अपने गजब का निर्णय लिया आपके उस निर्णय से हम लोगों की समस्याएँ हल हुई... नहीं तो हम गरीब लोगों की बात कौन सुनता...|'' 
यह कहते हुए उसने मेरी ओर भी देखा और फिर दो लोगों के बीच की वार्ता में अपने को असहज मानते हुए हम दोनों से नमस्कार का भाव प्रकट करते हुए चला गया| फिर मेरे मित्र ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा,
''जानते हो उसने मेरे किस निर्णय के बारे में कहा...|''
    मैं केवल उसके चेहरे को देख रहा था...और चुप रहा, उसने फिर आगे कहा,
''...उस निर्णय को न लेने के लिए मुझ पर बहुत दबाव था...धमकी के साथ लालच भी दिया गया...लेकिन मैं नहीं...''
तभी मैं बीच में ही उसे लगभग टोकते हुए बोला,
''मैं जनता हूँ...तुम्हें...! तुम्हारा रस तो सब के लिए है...! तभी तो तुम्हारे निर्णय के रस से उस गरीब आदमी की भी समस्याएं हल हुई...!'' आगे मैंने उसे समझाने के अंदाज में और जोड़ा,
''यदि तुम्हारे पास ऐसा रस है तो तुम नीरस कैसे हो सकते हो...!''
हमारी वार्ता अब समाप्त हो चुकी थी...|




शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

लिखने योग्य अच्छा काम...!!


         सुबह का वक्त था..., ट्रेन प्लेटफार्म से धीरे-धीरे खिसक रही थी...दौड़ कर किसी तरह चढ़ पाया..., बैठने के लिए सीट तलाश करने लगा...नीचे की एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी...वहां बैठना चाहा...पास में ही बैठा एक व्यक्ति बोला,
                   “नहीं-नहीं, यहाँ मत बैठो मेरी बर्थ है...|”
मैंने वहां बैठने का निर्णय बदल लिया...ट्रेन के गलियारे में, आते-जाते लोगों के धक्के खाते खड़ा रहा...तभी दूसरे बर्थ पर बैठे एक व्यक्ति को उसी बर्थ पर आराम से बैठा एक आदमी यह कहते हुए उठा रहा था,
        “अरे यहाँ से उठो, यह हमारी रिजर्व बर्थ है...”
लेकिन दूसरा उठने से रहा... बोला,
        “मैं अब बैठ गया हूँ नहीं उठूँगा..मैं रोज चलता हूँ|”
उठाने वाला भी थक-हार कर चुप हो गया...| ट्रेन अपनी पूरी गति पकड़ चुकी थी...इधर मैं भी गलियारे में खड़े-खड़े लोगों के धक्के खाते ऊब गया था...अब ऊपर के खाली बर्थ पर बैठना चाहा...जैसे ही मैंने ऊपर बैठने का प्रयास किया नीचे आराम से बैठे व्यक्ति ने टोक दिया,
       “अरे भाई इतना परेशान होकर तो हम लोग रिजर्वेशन करा पाते हैं, आप लोग इस बात को समझते नहीं...पिछली बार तो वेटिंग ही कन्फर्म नहीं हो पाई तो हम लोग गैलरी में ही लेट और बैठ कर गए थे...|”
उसने फिर कहा,
                “वहां न बैठो, मैं लेटने जा रहा हूँ...|”
मैंने उसकी बात सुनी, उससे बहस नहीं करना चाहता था फिर भी झुंझलाकर बोल उठा,
                  “समझता हूँ...|
खैर बैठने के इस प्रयास को भी मैंने छोड़ दिया और सोचने लगा...
        ...ये रेल वाले भी अजीब व्यवस्था बनाते हैं...बैठने तक की कोई ठीक व्यवस्था देते नहीं...हाँ, लेटने की पहले कर देते हैं...कहने को जनरल बोगी लगी है...लेकिन वहां भी तिल रखने की जगह नहीं होगी...शौचालय में लोग घुस कर बैठे होंगे...जनसँख्या या व्यवस्था, पता नहीं कौन जिम्मेदार है...सोचते-सोचते सीट की तलाश में दूसरे कूपे में आ गया...अचानक एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी, उल्लसित हो वहां मैं बैठ गया...यहाँ भी पास ही बैठे एक व्यक्ति के सज्जनतापूर्ण प्रतिरोध का सामना करना पड़ा...फिर भी मैं ही सफल हुआ| गाड़ी कहीं रुकी थी...चल पड़ी...एक टीटी आता हुआ दिखाई दिया, मैं थोडा नर्वश सा हुआ क्योंकि टिकट तो जनरल क्लास का लिए था और बैठा स्लीपर बोगी में..., टीटीई पास बैठे व्यक्ति से उलझ गया शायद वह भी मेरे ही जैसा इस बोगी के लिए अनधिकृत था, दोनों में थोड़ी बहस होने लगी, मैं उनके बीच के वार्तालाप को ध्यान से सुनने लगा, टीटीई कह रहा था,
         “टिकट दिखाओ..|
उसके टिकट दिखाने पर टीटीई ने कहा,
         “इस बोगी में क्यों बैठ गए...यह टिकट तो जनरल क्लास का है...|” 
         “क्या करते जनरल डिब्बे में बहुत भीड़ है खड़े होने तक की जगह नहीं है” यात्री ने कहा|
         “लेकिन पेनाल्टी देनी पड़ेगीया अभी यहाँ से हटो...”
टीटीई ने थोडा हडकाते हुए से कहा| ट्रेन भागी जा रही थी..उतरना संभव नहीं था, यात्री ने पूंछा,
         “कितनी पेनाल्टी...”
इस पर टीटीई ने कोई धनराशि बताई, लेकिन यात्री उसे देने में अपनी असमर्थता जताते हुए कहा,
         “मेरे पास इतना पैसा नहीं है…|”  
इसके बाद टीटी उस व्यक्ति को थोडा अलग ले गया, वहां से वापस आकर वह यात्री मुस्कराते हुए पुन: अपनी सीट पर बैठ गया...| मुझे अपने एक मित्र की रेल यात्रा के बारे में कही एक बात याद आ गई...उन्होंने बताया था,
         “जेब में पैसा हो तो टिकट लिए हैं या नहीं या फिर किस बोगी में बैठे है इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, आपकी यात्रा सकुशल सम्पन्न हो जाएगी|”
अब मेरी बारी थी...लेकिन यह क्या...! टीटी ने एक बार मुझे देखा और आगे बढ़ गया...शायद मुझे डेली पेसेंजर समझ कर नजरंदाज कर दिया हो...जो भी हो मैंने राहत की सांस ली| तभी बैठे-बैठे मेरी नजर सामने लगे एक छोटे से पोस्टर पर पड़ी... हाँ...,वह पोस्टर किसी सामाजिक संस्था का था...उस पर लिखा था-
         “अच्छा लिखने से बेहतर है कि लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय|
मैं इस पर चिंतन-मनन करने लगा...|
        ट्रेन पुन: अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी...अचानक मेरी दृष्टि ट्रेन के गलियारे में झाड़ू लगाती एक औरत पर पड़ी...वह कृशकाय, चीथड़ों में लिपटी थी...लगभग डेढ़ साल की बच्ची को कांख में दबाए झाड़ू लगाते हुए धीरे-धीरे मेरी ओर चली आ रही थी....उसकी बच्ची को देख...मैं सोचने लगा...इस बच्ची का पिता कौन होगा...कोई अपनी पत्नी और बच्चे को इस हालात में छोड़ सकता है..! या फिर इसकी माँ किसी वहशी दरिन्दे का शिकार हुई होगी...इस अभागी बच्ची का भविष्य क्या होगा...! तब तक उस औरत का हाथ मेरी ओर बढ़ चुका था... शायद उसने अपना काम पूरा कर लिया था...मैंने उसके हाथ पर एक सिक्का रख दिया...वह आगे बढ़ चुकी थी...मैंने पुन: उस छोटे से पोस्टर की ओर देखा, दृष्टि इस वाक्य पर रुक गई, “लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय,” मैं फिर अपनी विचारमग्नता में खो गया...पता नहीं...लिखने योग्य अच्छा काम कौन कर रहा है...यह पोस्टर..! या झाड़ू लगाती कांख में बच्ची दबाए कृशकाय यह औरत...! या लिखने के लिए मसाला तलाश रहा मैं...! या फिर टीटीई समेत हम सब को ढोती बेचारी यह ट्रेन...! और मैं...अपने इन विचारों में मगन हो गया...लेकिन...वह औरत..! वह तो...बच्ची को कांख में दबाये लोगो के सामने हाथ फैलाती आगे बढ़ी जा रही थी...|
           इस बात की चर्चा मैंने जब अपनी पत्नी से किया तो उन्होंने कहा,
           “अरे ! वह इन पैसों से जाकर समोसा खा लेगी या फिर कोई उससे भींख मगवा रहा होगा...इन सबके पीछे माफिया लोग रहते हैं..! नहीं तो इतनी सारी व्यवस्था होते हुए भी वह यह सब क्यों झेल रही है,”
पत्नी ने आगे फिर जोड़ा,
           “समय बिताने के लिए आपके पास अच्छा काम है...बस लिखने बैठ जाओ...! अगर समाजसेवा का इतना ही शौक है तो ऐसे लोगों के लिए शेल्टर होम खोलो...या फिर उन परिस्थितियों, माफियाओं से भिड़ो जिसके कारण उसके लिए यह हालात पैदा हुआ..|”
पत्नी ने ये सारी बातें एक सांस में कह डाली...मैं अपनी हदें जानता हूँ...मैंने सोचा...बस अब चुप हो जाना ही अच्छा है और मन ही मन ही..ही..करने लगा...|
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शनिवार, 10 नवंबर 2012

भोगा हुआ


      ...कभी-कभी प्रतीत होता है कि जीवन में सिर्फ भोगा जाता है, अनुभव किया जाता है लेकिन क्या इस प्रकृया में कोई मानक तय किया जा सकता है...! क्या स्वयं को इस पर कसा जा सकता है...! और क्या किसी अन्य के लिए भी इसे मानक के रूप में स्वीकार किया जा सकता है...? प्रत्येक व्यक्ति का भोगा हुआ उसका अपना निजी होता है, इससे उसके अपने दृष्टिकोंण विकसित होते हैं...व्यक्ति अपने भोगे हुए से ही अपने लिए उत्तर खोजता है...हमारे भोगने का स्तर हमारे अनुभव की व्यापकता पर निर्भर करता है, जो मानस पटल पर तमाम प्रश्न उकेरते हैं...यह हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है...इन्हीं बातों कि चर्चा अपनी पत्नी से कर रहा था, तभी पत्नी बोली, “इन बातों पर इतना दिमाग खपाना व्यर्थ है, हाँ मनुष्य का व्यवहार किन्हीं बातों से प्रभावित हो सकता है इस पर ज्यादा विचार करना और इस आधार पर निष्कर्ष निकालना सनकपूर्ण सोच है|” लेकिन वह जानता आया है...,और पत्नी को समझाने सा लगा...कभी-कभी सर्वजन के भोगे हुए से सर्वमान्य नियम खोजने का प्रयास किया जाता है, इससे वैचारिक संघर्ष का भी जन्म होता है...इस वैचारिक संघर्ष से उपजे निष्कर्ष से ही मनुष्य का मानसिक, नैतिक और बौद्धिक विकास हुआ है, इसका उसके सामाजिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा है...यदि ऐसा नहीं होता तो मनुष्य इतना चेतन न होता और जीवन की तमाम कलाएँ केवल सनक या पागलपन होती...और लिखना...शायद केवल सनक मात्र...!
     वैसे मनुष्य के मानस पटल पर कुछ बातें, घटनाएँ अंकित होती जाती हैं, जो उसे संवेदनशील बनाती है...शायद चिंतन की प्रकृया भी उसी से आरम्भ होती है...वैचारिक प्रश्नशंकुलता इसी संवेदनशीलता का परिणाम है...और यह प्रश्नशंकुल मनःस्थिति, उत्तर पाने की आकुलता में, तमाम सृजनात्मक कार्य कर डालता है...साहित्य, दर्शन, विज्ञान एवं अन्य कलाओं का विकास इसी का परिणाम है...
      वह अकसर ऐसे ही कुछ न कुछ सोचता रहता है..., उसे लगता है...यह आदत उसमें बेचारगी का भाव पैदा करती है...जो उसे लोगों की निगाहों में दुखी दिखाने लगता है.....लेकिन क्या वास्तव में वह दुखी है.....उसमें बेचारगी का भाव है...? ...हालाँकि वह जनता है कि ऐसा वह नहीं है... किसी का उसके लिए यह लिखना, “जो भी प्यार से मिला तुम उसी के हो लिए” शायद उसमें उस वैचारिक प्रवाह की ओर संकेत करती हो जिसमें प्रवाहित हो वह कुछ तलाशता रहता है और इस तलाश में वह सभी चीजों को स्वीकार करता जाता है...
      लेकिन फिर भी वह स्वयं को असामाजिक सा पाता है..., सामाजिकता के ताने-बानें में उसने व्यवहारवाद का ऐसा उलझाव देखा है, जहाँ वह सदैव अपने को अनफिट पाता रहा है.... जब भी वह अपने को इसमें ढालने का प्रयास करता है उसे महसूस होता है... जैसे अपने को झुठला रहा है...कुछ अस्वाभाविक सा हो रहा है...एक छद्म आवरण के खोल में घुस रहा है....उसका व्यक्तित्व खंडित हो रहा है....इस खंडितत्व का अहसास ही उसमें अपराधबोध जगाकर उसे निरीह बना देता है....जो उदासी और बेचारगी का भाव उत्पन्न कर उसे आत्मपीड़क बना देता है....इस आत्मक्षरित व्यवस्था में जीने की विवशता ही उसे कभी-कभी दुःख और उदासी के मनोभाव में ढकेल देता है...और इसकी शुरुआत कहाँ से हुई वह सोचने लगा...

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

पचड़ेबाज


                      सुबह हो गई थी...मैं अहाते में टहल रहा था, मेरी निगाह गुलमोहर के ऊँचे पेड़ पर गई...उसकी डालियाँ बहुत खूबसूरत ढंग से फैली हुई थी...उसके नीचे मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था...मानों वह गुलमोहर का पेड़, एक माँ की तरह अपने बच्चे को धूप या बारिश से बचाने के लिए अपने आँचल की छाया कर रखी हो...उसकी डालियों पर, पत्तियों के बीच, तोते के ही समान लेकिन उससे छोटे आकार के पक्षी उछल कूद कर रहे थे...पंखों का रंग तो हरा था लेकिन सिर पूरा लाल...देखने में सुंदर...! अपलक निहारता रहा...! तन्द्रा टूटी... जब एक गिलहरी बड़ी तेजी के साथ तने से होते हुए उन डालियों तक पहुँच गई जहाँ वे सुंदर पक्षी आपस में कलरव करते हुए इस डाल से उस डाल पर उछल-कूद कर रहे थे...तभी मिश्रा की आवाज कानों में पड़ी, “सर, चाय तैयार हो गई है.” मैंने कहा, “अच्छा पिया जाए.” तब तक मेहीलाल चाय का कप लेकर मेरे सामने हाजिर था. मैंने पूँछा, “ मेहीलाल, अख़बार आया...” “अभी नहीं” उसने उत्तर दिया. मैंने कहा, “ये तो बड़ा देर कर देता है अख़बारवाला, सात से ऊपर हो गया लेकिन अभी तक अख़बार नहीं दिया.” मेहीलाल बोला, “कल से दूसरेवाले को कह देते हैं जो थोड़ा जल्दी आता है.” तभी मिश्रा ने कहा, “सर अखबार आ गया.”
     चाय पीने के साथ मैं अखबार पढ़ने में मशगूल हो गया. सहसा मेरी नजर खबर के एक शीर्षक पर ठहर गई...कार दुर्घटना में तीन लोग मारे गए....आगे लिखा था...समय रहते यदि दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाया जाता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी...खबर मुझे अंदर तक झकझोर गई...फिर..एक दिन पहले की वह घटना याद आई, शायद उसी के सम्बंध में यह खबर थी...
     शाम का धुंधलका था...मैं अपने एक मित्र के साथ, जो स्वयं कार चला रहे थे...समय से अपने गंतव्य पर पहुँच जाएँ...हाईवे पर कार भगाए जा रहे थे...सामने से आ रहे वाहनों की हेडलाईट से आँखे चौंधिया रहीं थी...तभी एक हल्की सी ब्रेक लगाते हुए सामने दिख रहे ट्रक के बारे में मित्र ने कहा, “देखा...! इसने पीछे इंडिकेटर भी नहीं जला रखा है.., सम्बंधित अधिकारी भी न जाने कैसे ऐसे वाहन को चलने के लिए परमिट करते हैं...कोई देखता भी नहीं..” मैंने सहमति जताते हुए कहा. “हाँ...सभी अपने चक्कर में रहते हैं...कौन पचड़े में पड़े.”  हम लोग फिर चुप हो गए...कार भागी जा रही थी...अचानक..! दूर सड़क के किनारे कुछ हलचल सी दिखाई दी...पास जाने पर देखा...एक कार दुर्घटनाग्रस्त हो सड़क के किनारे पड़ी थी...तीन व्यक्ति उसमें फंसे हुए थे...इसे देख हमलोग अपनी कार रोक दिए...वहाँ तब तक चार पांच व्यक्ति और पहुँच चुके थे...हम लोग अपनी कार के शीशे नीचे करते हुए पास ही खड़े व्यक्ति से दुर्घटनाग्रस्त कार में फंसे व्यक्तियों के बारे में जानकारी चाही तो पता चला कि तीनों की मौत हो चुकी है, हम लोगों को समय से पहुंचना था...फिर तुरंत चल दिए...
     अख़बार की खबर से लगा...जब हम लोग उस अभागी कार के पास पहुंचे थे तो कोई उसमें से जीवित था, बेहोश होने से लोगों ने उसे मृत समझ लिया था. उसी को यदि समय पर चिकित्सीय मदद मिलती तो वह बच सकता था...कौन पचड़ेबाजी में पड़े...यही सोचकर तो हम लोग वहाँ से निकल लिए थे...खबर पढ़ने के बाद स्वयं को अपराधी महसूस करने लगा...फिर बचपन में हुए एक हादसे की स्मृतियों में खो गया...
       उस समय आठ-दस वर्ष के बीच मेरी उम्र रही होगी...मेरे घर के पास एक तालाब था...वह तालाब तो अब भी है लेकिन बचपन में देखे गए से भिन्न...क्योंकि न तो अब उसमे कुमुदिनी खिलती हैं और न तो उसमे कोई नहाने जाता है...उस तालाब में जलकुम्भी का साम्राज्य ऐसा फ़ैल चुका है कि पानी कहीं दिखता ही नहीं, कोई कह रहा था कि किसी ने उस तालाब में जलकुम्भी इसलिए डाल दिया कि धीरे-धीरे तालाब पट जाए और उसकी भूमि पर कब्जा कर लिया जाए...यही नहीं अब तो उसका आकार भी बदल गया है….गाँव के कुछ लोगों द्वारा भू अभिलेखों में परिवर्तन कराते हुए उसे पाटना प्रारंभ कर चुके हैं. नरेगा में उस तालाब की खुदाई की ऐसी योजना बनाई गई कि उस बड़े से तालाब के बीच में ही एक छोटा सा तालाब और खोद दिया गया...खैर...बचपन की स्मृतियों का वह तालाब उसके लिए बहुत ही आकर्षक और सुंदर दृश्यों की याद दिलाता है...कुमुदिनी के खिले सफेद फूलों से सजा वह तालाब बहुत ही सुंदर दिखाई देता था...खास कर हम बच्चों के लिए...! उसमे...नहाना...तैरना...घंटों उस तालाब के किनारे समय बिताना हमारी आदत बन चुकी थी...अकसर मैं बाबू की निगाहों से अपने को बचाता हुआ वहाँ पहुँच जाता था...हाँ बाबू यानि मेरे दादा...चूँकि मुझे उस समय तैरना नहीं आता था इसलिए वह मुझे उसमें नहाने और वहाँ जाने से भी मना करते थे...काफी मिन्नतों के बाद मुझे इतनी अनुमति बाबू की ओर से मिली थी कि मै तालाब के किनारे तक जा सकता था लेकिन उसमें नहा नहीं सकता था...यही मेरे लिए बहुत था...क्योंकि बच्चों को उस तालाब में तैरते...पानी में डुबकी लगाते हुए दूर तक निकलते जाना...आदि...इन अठखेलियों को देखकर मैं बहुत आनंदित होता था...गाँव के ढेर सारे बच्चे वहाँ इकट्ठे होते थे...
     ऐसे ही एक दिन कुछ बच्चे उस तालाब में नहाने जा रहे थे, उन लोगों ने मुझे भी साथ चलने को कहा...लेकिन बाबू ने मना कर दिया...सारे बच्चे चले गए...मैं मनमसोसकर गुमसुम हो बैठ गया...कुछ देर यूँ ही बीतने पर अचानक बाबू की निगाह मुझ पर पड़ी...उन्होंने पूँछा, “कहो का बात अहई...” मैंने कहा, “कुछ नाहीं बाबू.” बाबू ने फिर पूँछा, “त...काहे मुह फुलाए बइठा अहा...|” उन्होंने कुछ समझते हुए फिर कहा, “जा तालाब पर...लेकिन हिलअ मत...जल्दी आयअ...|” बाबू कि तरफ से इतना अनुमति मिलते ही मैं दौड़ कर तालाब के किनारे पहुँच गया. वहाँ गाँव घर के बहुत सारे बच्चे जमा थे...कोई नहा रहा था...कोई तैर रहा था...कुछ बच्चे तालाब के किनारे के पेड़ों पर चढ़ उसकी डालियों से तालाब में कूद रहे थे, तो कोई एक तालाब में ही एक टापू जैसे स्थान पर पहुँच वहां कुमुदनियों की माला बना उसे गले में पहन और उसकी फलियों को दूसरे बच्चों की ओर उछल रहा था...यह सब देखकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था...जब तब ख़ुशी के मारे मैं ताली भी बजा देता था...मै इधर अपने में ही मस्त था कि तभी मेरे ही हमउम्र एक लड़के की आवाज कानों में पड़ी, जो तालाब में उछल-कूद कर रहा था,विने...उंहा का बइठा हया...” तब तक दूसरा बोल उठा, “अरे अपने बाबू से पहिले पूंछि लेहीं...तब..” इतना कहते ही दोनों हँसने लगे| पहला बच्चा फिर बोला, “आवा आर...तोहरे बाबू के न बतावा जाए..” मुझे प्रतीत हुआ जैसे वे मेरा मजाक उड़ा रहे हों. इधर मेरे मन में भी तालाब में सब के साथ नहाने और खेलने की तीव्र इच्छा जाग चुकी थी, अचानक बेपरवाह सा तालाब में मैं कूद पड़ा...
            तालाब के पानी में, मैं किनारे पर ही उछल-कूद रहा था, क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता था...तभी एक लड़का मेरे पास आया और तालाब में टापू वाले स्थान की ओर इशारा करते हुए वहाँ चलने के लिए कहा. चूँकि मुझे तैरना नहीं आता था...मैंने मना कर दिया...मैंने देखा वह तालाब के बीच उस छोटे से टीले पर तब तक पहुँच चुका था...वहाँ से मुझे वह फिर बुलाने लगा...मेरा भी मन अब वहाँ जाने के लिए तैयार हो चुका था...और मेरे बालमन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि मेरी लम्बाई उस लड़के से कम थी और वह थोड़ा बहुत तैर भी लेता था...मैंने धीरे-धीरे अपना पांव उस ओर बढ़ाने लगा...तालाब का पानी अब मेरे गर्दन के ऊपर तक पहुँच चुका था...और वह लड़का लगातार मेरा उत्साह बढ़ाते हुए मुझे पानी के बीच उस टीले तक आने के लिए प्रेरित करता जा रहा था...अरे...! यह क्या...अचानक मेरा पैर फिसल सा गया और मैं किसी गहरे गढ्ढे की  ओर जाने लगा...वहाँ से निकलना भी मेरे लिए कठिन हो गया...मैं अब डूबने लगा था...अचानक मेरा सिर पानी से बाहर आया लेकिन अगले ही पल फिर पूरी तरह मेरे सिर के ऊपर पानी हो गया...शायद मैं अब पानी में डूब रहा था...मुझे आज भी याद है जब मैंने उस एक क्षण में सोचा था... “काश..! कोई मुझे बचा ले...” जब मैंने अपनी आँखे खोली तो देखा यह छोटकऊ चाचा थे जो अपने दोनों बाँहों में मुझे उठाए हुए धीरे-धीरे सूखी जमीन पर पेट के बल लिटा रहे थे तथा मेरे पेट से पानी निकालने का प्रयास कर रहे थे...हाँ, यह छोटकऊ चाचा ही थे...उन्होंने मुझे डूबने से बचा लिया था..! वह भी अपनी परवाह न करते हुए, क्योंकि किसी डूबते हुए को बचाने में स्वयं डूबने का खतरा होता है...इस घटना के बारे में बाबू को उस समय तो कुछ पता नहीं चला, लेकिन एक दिन जब एक बड़ी सी बाल्टी को उल्टा कर मैं उस तालाब में तैरने का अभ्यास कर रहा था तो उन्होंने मेरी काफी पिटाई की थी..., हाँ...छोटकऊ चाचा... वह मुझसे चार या पांच साल बड़े थे...बचपन में हम लोग उन्हें कुछ-कुछ जिद्दी जैसा मानते थे और जब किसी बात को मनवाने में उनकी तर्कशक्ति जबाव दे देती तो लड़-भिड़ कर अपनी बात मनवाने की उनमें आदत थी...वह किसी पचड़े में भी पड़ने से नहीं डरते थे...इतना सब होते हुए भी उनमें भावुकता भी थी...
      मुझे याद है उक्त घटना के कई साल बाद...तब वह इलाहबाद में रहकर पढाई कर रहे थे...एक दिन सुबह ही मैंने देखा...छोटकऊ चाचा घर के बड़े लोगों का बारी बारी से पैर छू रहे थे...कहते जा रहे थे...ऊपर वाले ने मुझे बचा लिया...फिर अपने साथ हुई घटना के बारे में बताना शुरू किया, “हम रोज सुबह गंगा नहाई जाथ रहे...काल्हि जब हम गंगाजी में नहात रहे, अऊर गंगाजी के किनारे रहई वाले कुछ लरिकऊ नहात रहे...ओन्हन धारा के बीच में तैरि के दुसरे तरफ जाई के नहात रहइ...हमरेऊ मन भा कि हमहूँ ऊहीं जाई के नहाई..|” उनकी बात हम सब बड़े ध्यान से सुन रहे थे, उन्होंने आगे कहना शुरू किया, “हाँ त हमहूँ सोचे तैर के गंगा के बीच धारा वाले उथले रेता पर जाई...अऊर जब हम कुछ दूर नदी क धारा में पहुँचे त हम खड़ा होई क कोशिश केहे...लेकिन...इ...का.., हमरे पैर के नीचे से बलुअइ खिसकि गई...!” आगे इस प्रकार बताया...चूँकि नदी की धारा में थे इसलिए पैर टिक नहीं रहा था...फिर तैर कर किनारे आने का प्रयास किया, लेकिन नदी में तैरने का अभ्यास न होने के कारण तैरने में मुश्किल आ रही थी...उन्हें लगा कि वह डूब जाएँगे...क्योंकि तब तक वह थक चुके थे...तभी उनके दिमाग ने काम किया और नदी में पीठ के बल हो उसी की धारा के सापेक्ष तैरने की स्थिति में अपने को छोड़ दिया...उधर नदी के किनारे से लोग उनकी हिम्मत बंधा रहे थे...करीब इसी स्थिति में लगभग पांच सौ मीटर बहने के बाद वह किनारे पर नदी की धारा के बहाव के सहारे पहुँचे, वहाँ भी नदी का करार काफी ऊँचा था, उस गिरते करार में दबने का खतरा था...अंत में जैसे तैसे कर लोगों ने वहाँ से सहारा देकर निकाला...इसके बाद निढाल हो गए...! छोटकऊ चाचा किसी बड़े शहर में रहते हैं और पचड़े में पड़ कर निकलने की अपनी आदत आज भी नहीं छोड़ पाए हैं...
     न जाने क्यों उक्त छोटी सी घटनाओं को लिखने के लिए प्रेरित हुआ...हाँ...उस दिन पचड़ेबाजी में पड़ते तो किसी की जान बच सकती थी... सोचा..! यह लिखना भी तो एक पचड़ेबाजी ही है...! शायद...! किसी पचड़ेबाज को समझने का मौका मिले...!
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