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मंगलवार, 30 जून 2015

ये बायोडाटा चाहने वाले लोग....

        उस दिन सुबह-सुबह दर्पण में चेहरा देखा तो सिर के बाल कुछ बढ़े देख मन ने नाई के यहाँ जाने का निर्णय ले लिया| लेकिन आज उसके सैलून पर भीड़ कुछ ज्यादा ही थी एक तो उसके सैलून की चारों कुर्सियां भरी थी दूसरे पाँच लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा करते लाइन लगाए बैठे थे, अपनी बारी आने में बिलम्ब का अनुमान कर एक बार तो लौटने का मन किया..फिर आगे समय मिल पाए या न यह ध्यान आते ही मैं भी छठे नम्बर पर अपनी बारी की प्रतीक्षा में वहाँ बैठ गया...दायें-बाएं देखा तो सैलून का मालिक नहीं दिखा...कौन ग्राहक किस क्रम पर आया है इस बात का ध्यान वही रखता है...
        
         नज़रे घुमाई तो देखा एक कुर्सी पर बैठे व्यक्ति के बालों की कटिंग के साथ उसकी ढाढ़ी भी बन चुकी थी..लेकिन वह चेहरे की फेसियल करा रहा था...मतलब...इस कुर्सीवाला व्यक्ति अभी पन्द्रह मिनट खायेगा...! पता नहीं फेसियल की इसे कौन सी आवश्यकता आन पड़ी कि व्यर्थ का समय नष्ट कर रहा है...यह सोचते हुए दूसरी कुर्सी पर निगाह पड़ी..इसकी तो अभी हेयर कटिंग चल रही है...अरे..! इसकी दाढ़ी भी तो बढ़ी है...मतलब आधे घंटे के लिए यह कुर्सी भी बुक..! तीसरी कुर्सीवाला मुँह टेढ़ा कर बार-बार शीशे की ओर निहार रहा था...सोचा इसकी कटिंग वगैरह तो हो चुकी है तो फिर यह क्यों मुँह चियार रहा है ? लेकिन अगले ही पल उसने नाई से कटिंग को ठीक करने के लिए कहा...यह कुर्सी मुश्किल से चार-पाँच मिनट में खाली हो जायेगी...चौथी कुर्सी पर एक बच्चा बाल कटवा रहा था...मैंने सोचा चलो इसके तो दाढ़ी है नहीं दस मिनट में यह कुर्सी खाली हो जायेगी...अभी यह सोच ही रहा था कि तीसरी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अपने सफ़ेद बालों पर हेयर-डाई लगवाना शुरू कर दिया..मतलब इस काम में यह दस मिनट खाएगा...लेकिन इस उम्र में इस पर सफ़ेद बाल ही अच्छे लगेंगे...खा-म-खा का बाल रंगने में समय बर्बाद किये दे रहा है...
         अभी मैं अपने इसी मुआयानें और विचारों में खोया ही था कि मेरा ध्यान अपनी बारी की प्रतीक्षा में सामने बैठे मोबाइल पर किसी से बात करते व्यक्ति की ओर उसकी यह बात सुनकर गया कि वह इस समय फला जगह पर है जबकि फला जगह यहाँ से तीन किमी की दूरी पर है...मुझे ध्यान आया कई बार ऐसे ही बॉस ने भी मेरे होने के स्थान के बारे में पूँछा तो मैं भी गाड़ी का इंजन बंद कर ऑफिस के रास्ते से ही उन्हें बताया कि कार्यालय में हूँ...यह ध्यान आते ही मैं मुस्कुरा पड़ा...
        
        ‘हाँ..हाँ..आप चाहे जब आ जाइए....अरे नहीं..हाँ लम्बाई कितनी है....नहीं...पहले लड़की की एजुकेशन...हाँ...हाँ..बायोडाटा भेज दीजिए...मेरे ईमेल पर..नोट करिए..फिर बैठ कर बाते होंगी....हाँ..हाँ..पूरा बायोडाटा...अरे बाकी बातें बाद में हो जायेंगी..’ शायद यह व्यक्ति लड़कावाला रहा होगा फोन पर ही वैवाहिक कार्यक्रम तय हो रहा था...इनका तो बाल और दाढ़ी दोनों बनेगा यह आधे घंटे का समय खायेगा...इसी तरह मैं वहाँ अपनी-अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे व्यक्तियों को देख सैलून में अपनी प्रतीक्षा-अवधि का मन ही मन आकलन करता रहा..अभी भी सामने बैठा व्यक्ति फोन पर बातें किये जा रहा था..उसकी वार्ता अभी तक ‘बायोडाटा’ पर ही जारी थी...हाँ अब उसके साथ ‘कुण्डली’ भी आकर जुड़ गई थी...
      
        मैं सोच रहा था यह ‘बायोडाटा’ क्या होता है...अकसर मैंने नौकरी वाले विज्ञापन में पढ़ा है.. “अपना बायोडाटा इस पते पर भेजें..” हो सकता हैं नौकरियों के लिए बायोडाटा अनिवार्य हो, परीक्षा प्रणाली का अंग हो..लेकिन..नौकरियों जैसा ही विवाह के लिए भी उसी तरह से बायोडाटा की माँग किया जाना मेरे समझ में नहीं आता...और वह भी बेचारी लड़कियों का विशेष रूप से उनके नख-शिख वर्णन के साथ...!

        अब-तक फेसियल वाले की कुर्सी खाली हो चुकी थी...हम प्रतीक्षारत में से एक की बारी आ गयी थी, वह उस खाली कुर्सी पर अपना आसन जमा चुका था...अब मेरा पाँचवा क्रम हो गया था...इधर मैं सोच रहा था...यह बायोडाटा भी गजब का होता है...किसी न्यायालय के निर्णय जैसा अंधे-कानून का सहारा लेते हुए सा...! बस साक्ष्य चाहिए और इन्हीं साक्ष्यों पर आधारित होता है निर्णय...! वास्तविकता की आँखों में आँसू हो तो हो, हाँ...ऐसा ही होता है यह बायोडाटा, जो किसी के अंतर्मन में नहीं झाँक पाता उस पर कोई निर्णय नहीं सुना पाता..!! केवल इस बायोडाटा मात्र से किसी व्यक्ति का मूल्याँकन कैसे किया जा सकता है..? लम्बाई..चौड़ाई..ऊँचाई..डिग्री और परिवार क्या केवल इतने भर से किसी व्यक्ति पर कोई निर्णय सुनाया जा सकता है..? अगर ऐसा है तो यह व्यक्ति की उपेक्षा ही है जो उसके अंतर्मन की गरिमा को उपेक्षित करता है...फिर तो बायोडाटा पर विश्वास करने वाले क्रूर होने के साथ ही अज्ञानी भी होते होंगे...!
          
        ‘देखो न वह बायोडाटा माँग रहा था बेचारी बच्ची का...! अरे तुम बच्ची को सामने देख ही रहे हो...उससे बातें भी कर रहे हो...शिक्षा-दीक्षा का अंदाज तो हो ही जाना चाहिए..इसके बाद भी कैसा बायोडाटा...? यहीं नहीं उसने बच्ची को खड़ा कर उसकी लम्बाई भी माप रहा था...भूल गया कि उसकी भी बेटियाँ है...अपना नहीं देखता कि कोई उसका ऐसे ही बायोडाटा लेने लगे वह कहाँ ठहरेगा...! अरे बच्चियों की भावनाओं-संस्कारों की पहचान और इनका कद्र तो करना सीखो...क्या बच्चियाँ कोई सामान हैं कि...लड़के वाले हैं तो इतने अहंकारी हो जाएँ..?’ हाँ इन बातों को बताते हुए श्रीमती जी उस दिन बहुत गुस्से में थी...
        
         इन्हीं बातों में खोया था..तीसरी कुर्सी खाली हो चुकी थी मैंने देखा उस पर बैठे महाशय तो अपने सिर के बालों के साथ ही मूँछे भी रंगवा चुके थे...! उन्हें देख पता नहीं मैं क्यों मुस्कुरा उठा..! वैसे आजकल मैं भी अपने सिर के बालों पर रंग चढ़ाने लगा हूँ...अब मेरा क्रमांक चौथा हो चुका था...बायोडाटा वाले महाशय कोई नम्बर मिला रहे थे...हाँ ध्यान आ गया...बायोडाटा...!!
        
        उन दिनों सोलह-सत्रह वर्ष की आयु रही होगी, मेरी शादी तय हो चुकी थी...मेरे दादा जी की विशेष इच्छा थी इसके पीछे...! एक दिन उनके तकिये के नीचे मुझे एक अंतर्देशीय-पत्र मिला, उत्सुकता वश उसे मैं पढ़ने लगा था...अरे यह क्या..! इस पत्र में उस लड़की के बारे में लिखा था जिससे मेरा विवाह होने वाला था.. “हाँ माथे पर गड्ढे जैसा निशान है...” तथा पहनावे आदि का वर्णन करते हुए अंत में लिखा था.. “शादी न हो तो अच्छा है...” उस पत्र को पढ़ने के बाद उसे वैसे ही मोड़कर तकिए के नीचे रख दिया था...लेकिन दादा जी का निर्णय अडिग रहा था...पत्र में वर्णित भावी पत्नी की छवि मन में लिए उन्हें देखने की इच्छा अवश्य उठी लेकिन तब की पारिवारिक परम्पराओं के अनुसार मेरे लिए यह संभव नहीं था...श्रीमती जी के ही शब्दों में ‘गुड्डे-गुड़ियों जैसा हमारा विवाह’ हो गया था...हाँ वह भी कहती हैं कि मैं भी उस समय चौदह वर्ष की थी...! उन्हें देखने की इच्छा मन में ही दबाये धीरे-धीरे पांच वर्ष व्यतीत हो गया..फिर हमारा गौना हुआ...उस पत्र में वर्णित बायोडाटा से बहुत कोशिश करने के बाद भी मैं उनकी कोई समानता स्थापित नहीं कर पाया था...|

          बहुत दिनों बाद...! एक दिन अपनी कोशिशों से थक-हार कर  मैंने श्रीमती जी से पूँछा, “पहले तुम्हारे माथे पर कोई गड्ढा था क्या..?” उनका उत्तर था, “नहीं तो..मुझे याद नहीं...लेकिन हाँ...बचपन में...शायद तब मैं बहुत छोटी थी तो माथे पर चोट लगी थी..लेकिन ऐसे किसी निशान का मुझे पता नहीं” एक निर्दोष मासूम सा उत्तर मेरे सामने था...उस समय उस पत्र की बात मैंने श्रीमती जी से छिपा लिया था..

        ‘बायोडाटा’ शब्द के कारण ही इन स्मृतियों में मैं खो गया था...क्योंकि किसी ‘बायोडाटा’ में आत्मा, मन और शरीर नहीं होता...तो फिर इस ‘बायोडाटा’ पर इतना महत्त्व क्यों..? यह निर्जीव सा बायोडाटा किसी के मन और आत्मा का दर्पण नहीं बन सकता...और शरीर भी तो कोई बस्तु नहीं है...एक निर्दोष मासूम सी भावनाओं को बायोडाटा तले नहीं रौंदा जाना चाहिए...    

         मैंने देखा वो ‘बायोडाटा वाले महाशय’ सैलून वाली कुर्सी पर विराज चुके थे...नाई उनका हजामत बना रहा था..यकायक वो पुनः अपने मोबाइल पर बातें करने लगे थे...नाई हजामत बनाना छोड़ दूर खड़ा हो उनकी फोन पर चल रही वार्ता के समाप्त होने का इंतजार करने लगा...लेकिन मोबाइल पर चल रही उनकी यह वार्ता समाप्त ही नहीं हो रही थी..! मुझे लगा जैसे वो बायोडाटा के एक-एक बिंदु पर चर्चा कर रहे हों...इस तरह कई मिनट बीत गया...नाई समेत प्रतीक्षारत लोगों को अब यह नागवार लगने लगा था...अंत में मुझसे नहीं रहा गया...मैं उस नाई से बोल उठा, “इन्हें तो जैसे किसी अन्य व्यक्ति की परवाह ही नहीं...इन्हें इसका एहसास कराओ..” शायद यह कहते हुए उनने मुझे सुन लिया..फिर अपनी खींसे निपोरते हुए मोबाइल पर बात करना बंद कर दिए..
       
          अंत में मेरी भी बारी आ गयी..मैं कुर्सी पर बैठ चुका था...मेरा वाला नाई कटिंग के लिए तैयार हो रहा था...इसी बीच मेरे बगल की कुर्सी पर हेयर-कटिंग करा रहा व्यक्ति अपने नाई से पूँछा, “क्यों तुम्हारा मालिक कहाँ गया..?” “अरे..वह तो जेल में हैं...” मैं भी सोच रहा था कि आज इस सैलून का मालिक नहीं दिखा..! अब-तक बायोडाटा वाले महोदय भी जा चुके थे...

          हाँ...वास्तव में सैलून वाली बात मैं भूल सा गया था...लेकिन उस दिन श्रीमती जी ने फोन पर मुझसे पूँछा, ‘अरे आज आप को कुछ याद है कि कौन सी तारीख है..?” मैंने थोडा सा मस्तिष्क को टटोला और झट से बोल उठा, ‘हाँ..हाँ..याद है...!” फिर उन्होंने बताया “हमारे विवाह को आज इत्ते साल हो गए...लेकिन आप को तो जैसे कुछ याद ही नहीं रहता एक फोन तक नहीं किया..?” मैं मारे डर के कोई सफाई नहीं दे पाया क्योंकि मेरे किसी उत्तर पर ‘नोक-झोंक’ तय था...हाँ..इस विवाह तिथि के याद आते ही हमें वह पत्र भी याद आ जाता है...और श्रीमती जी के कथनानुसार अपना वह ‘गुड्डे-गुडियों जैसा विवाह’ भी...! आज मैं सोचता हूँ..दादा जी के तकिए के नीचे का वह पत्र भी मेरे लिए किसी लड़की के बायोडाटा जैसा ही था...लेकिन हम भी उस समय मासूम से ही थे...उस समय के हमारे निर्दोष मासूमपने के सामने इस बायोडाटा रूपी पत्र की कोई अहमियत नहीं थी...
     
        आज..हमारी उस विवाह-तिथि के बत्तीस वर्ष हो चुके हैं और श्रीमती जी के साथ साढ़े सत्ताइस वर्ष का समय गुजर चुका है...! लेकिन हमारे रिश्ते की सहजता ऐसी रही कि लगता है जैसे अभी कल की ही बातें हैं..! हाँ...हमें कभी इसे जताना नहीं आया, बस हम इसे जीते चले जा रहे हैं क्योंकि जिंदगी को तो जिया जाता है...इसीलिए फोन-फान, दिन, तिथि सब भूल जाते हैं...याद रहता है तो बस केवल जीना...!

        एक बात है ये ‘बायोडाटा’ होते हैं बड़े झूठे...!! यदि इन पर आप विश्वास करते हो तो एक खूबसूरत जिंदगी से हाथ धोते हो...श्रीमती जी द्वारा विवाह तिथि के याद दिलाने से उस झूठे बायोडाटा की याद आ गयी..और फिर सैलून पर के वे ‘बायोडाटा वाले महोदय’ जैसे लोग याद आए, जो दूसरों की परवाह करना जानते ही नहीं...!
     
         अंत में मैंने एक गलती कर ही दिया हमारे बीच ‘नोक-झोंक’ होना तय..! क्योंकि विवाह तिथि जो मुझे याद नहीं रहती..!!

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शुक्रवार, 5 जून 2015

इस धरती की खूबसूरती के राज....

        उस दिन इलाहाबाद से महोबा स्वयं ड्राइव करते हुए कार से जाने का मन कर गया...साथ में श्रीमती जी और छोटे पुत्र श्रेयांश भी थे...एक बात है ड्राइविंग भी एक प्रकार का नशा है...ध्यानावस्था है..जब आप ड्राइविंग करते हैं तब आपको अपनी सारी समस्याओं को भूलना होता है..और केवल ड्राइविंग पर ही अपनी चेतना को केन्द्रित करना होता है...यह स्थिति भी एक प्रकार से आनंदानुभूति की होती है..योग की ध्यानाक्रिया से कुछ मिलती-जुलती...! इस स्थिति में आप तमाम तरह के मनोविकार उत्पन्न करने वाले चिंतन से मुक्त होते हैं...यही आनंदानुभूति की अवस्था होती है...इस आनंदानुभूति के साथ ड्राइविंग का रोमांच भी अलग से जुड़ जाता है....
         
           हाँ तो अलसुबह ही हम इलाहाबाद से निकल पड़े थे..यमुना पर नया बना झूले सा ब्रिज आकर्षित कर रहा था...श्रेयांश चलती कार से ही इसकी वीडियो रिकार्डिंग करने लगे थे...पुल पार कर हम टोल टैक्स दे आगे बढ़ चले...एक पेट्रोलपम्प पर मैंने तेल लेने के लिए अपनी कार रोकी..मुझे अनुभव हुआ कि पेट्रोलपंप-कर्मी अलसाए हुए से थे...एक कर्मी धीरे-धीरे कर मेरे कार के पास तक आया..शायद यह सोचते हुए ‘इतने सबेरे-सबेरे यह तेल लेने कहा से टपक पड़ा..’ मुझसे पूँछा, ‘कितने का..’ मैंने एक हजार का इशारा किया...उसने मशीन में फीड किया और मुझे इसे दिखाते हुए तेल की पाइप कार की टंकी में लगा कर आराम से चलते हुए वहीँ टंकी के चबूतरे पर बैठा गया..मैंने पेट्रोलपंप के प्वाइंट को देखना शुरू किया..अरे इतना स्लो प्वाइंट चल रहा है...! ऐसे में एक हजार का तेल पूरा होते-होते मिनटों लग जायेंगे..मैंने देखा वह पम्प-कर्मी चबूतरे पर आराम से बैठा ऊँघ सा रहा था..श्रेयांश मेरी ओर देखते हुए इस स्थिति को समझ मुस्कुरा दिए...खैर..जैसे-तैसे कर तेल पूरा हुआ अब हम आगे बढ़ चले...
        
           इस समय हम इलाहबाद से बाँदा मार्ग पर चल रहे थे..धीरे-धीरे पथरीला और पहाड़ी क्षेत्र आरम्भ हो चुका था...इस क्षेत्र को श्रीमती जी और उनके सुपुत्र महोदय बड़ी उत्सुकता से देखे जा रहे थे...बारा में एक बिजली घर बनता हुआ दिखाई दिया..श्रीमती जी ने इसे देखते हुए कहा, ‘इस तरह के उद्योग या प्लांट ऐसे ही स्थानों पर स्थापित किए जाने चाहिए..’ उनका कहने का आशय यही था कि उद्योगों कारखानों आदि के प्लांट इसी तरह के अनुपजाऊ और बेकार पड़ी हुई भूमि पर ही स्थापित किये जाने चाहिए जिससे कृषि योग्य भूमि के सुरक्षित रहने के साथ ही इस तरह के पिछड़े क्षेत्रों का भी विकास हो सके...इधर मैं कार ड्राइव किये जा रहा था एक ऊँचे पहाड़ को देखते हुए श्रेयांश जी इसके बनावट और उत्पत्ति के सम्बन्ध में मुझसे तर्क करने लगे थे..खैर एक पहाड़ और जंगल को देखते हुए माँ-बेटे ने कहा धरती बहुत खुबसूरत है...आगे एक पहाड़ की ऊँचाई नापते हुए उस पर चढ़ने की इच्छा जताने लगे लेकिन मैं समय की दुहाई देते हुए कार आगे बढ़ाता जा रहा था...अचानक दूर से सड़क के किनारे हमें कुछ बन्दर दिखाई पड़े और हम लोगों की निगाह बन्दर के एक बच्चे पर पड़ी जो सड़क पर ही उछल-कूद कर रहा था...तभी हमने देखा एक बन्दर जो उसकी माँ रही होगी शायद उसने हमारी कार को सड़क पर खेलते अपने बच्चे की ओर आते हुए देखा..वह काफी तेजी से सड़क पर आई और अपने उस बच्चे को लगभग इन्सानों की तरह गोंदी में उठाकर तेजी से सड़क के किनारे पटरी पर चली गयी और गुजरती हमारी कार को सड़क की पटरी से देखने लगी थी...इस दृश्य को देखकर हम आपस में हँस पड़े थे और हँसते हुए ही मैंने श्रेयांश से कहा इतनी तत्परता तो तुम्हारी मम्मी भी नहीं दिखा पाएंगी जितनी इस बंदरिया ने अपने बच्चे के प्रति मेरी कार से उसे बचाने के लिए दिखाई है...मेरी इस बात को सुन श्रीमती जी कुछ नाराज सी हो गयीं और सुपुत्र महोदय मुस्कुराने लगे थे...वास्तव में प्रेम या अपने बच्चों की चिंता करना तथा उनके प्रति केयरफुल होना केवल इंसानों की ही बपौती नहीं है...प्रकृति का यह एक सहज गुण है जो सभी जीवों के लिए कुछ अपवादों को छोड़कर समानधर्मा है..और..इस खूबसूरत धरती का राज भी यही है...!!
         
          मैं आराम से ड्राइविंग किए जा रहा था..अब हम एक ऐसे क्षेत्र से गुजर रहे थे जहाँ दूर-दूर तक मैदान ही दिखाई पड़ रहा था...वहाँ किसानों के खेत भी थे...लेकिन लगभग असिंचित सा क्षेत्र था वह..! किसान वहाँ एक या मुश्किल से दो ही फसल ले पाते होंगे...बीच-बीच में बबूल के पेड़ दिखाई दे जाते थे...सड़क के किनारे एक ऐसे ही पेड़ को देख मैंने उसकी छाया में कार रोक दी हमने वहाँ पर साथ लाए पानी को पिया तथा मुँह पर उसके कुछ छींटे भी मारे...वहाँ मैंने देखा पाइप के ढेर पड़े हुए थे...और मशीन से पाइप बिछाने का कार्य भी चल रहा था, मुझे एक व्यक्ति दिखाई दिया शायद वह ठेकेदार रहा होगा...मैं यूँ ही उसके पास चला गया...पूँछने पर उसने बताया कि रिलायंस कंपनी टू-जी, थ्री-जी केबल हेतु पाईप बिछाने का कार्य कर रही है जो अभी कुछ ही महीनों पहले शुरू हुआ है...मैं दूर-दूर तक फैले असिंचित खेतों और उन गरीब किसानों जो बिना सिंचाई साधनों के मात्र वर्षा जल की आस लगाये खेती पर निर्भर होते हैं तथा गरीबी का दंश झेलते रहते है, को देखते हुए चल रही इस परियोजना का विरोध करने का मन कर गया लेकिन मन-मसोस कर रह गया और इस बात का जिक्र कार चलाते हुए पत्नी से किया, उन्होंने कहा, ‘अरे, अब तो गरीब से गरीब मजदूरों के हाथ में भी तो मोबाइल होता है...! उनके भी तो काम आएगा यह सब..’ फिर उन्होंने कहा, ‘हाँ यह जरुर होना चाहिए कि सरकारों को पहले इन सूखे खेतों तक पानी पहुँचाने का कार्य करना चाहिए उसके बाद टू-जी, थ्री-जी...!’
         
           हाँ, होना तो यही चाहिए कि सरकारों को सबसे पहले कृषि प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए सिंचाई साधनों का विकास करते हुए कम से कम पानी खर्च कर अधिक से अधिक फसलों के उत्पादन के लिए योजनाएँ बनानी चाहिए कि सूखे के दिनों में किसानों को आसमान की ओर टकटकी न लगाना पड़े...आखिर नदियों का पानी भी तो समुद्र में बह जाता है..क्या पाइप-लाइन बिछाकर पानी को इन खेतों तक नहीं लाया जा सकता....? मैं इन्हीं विचारों में खोया था कि मेरी कार हिचकोले लेने लगी..बात यह था कि सड़क पर कमजोर पुल की जगह मजबूत नया पुल बनाया जा रहा था..और..मैं उसके लिए बने डायवर्जन से गुजर रहा था..खैर अब तक बन रहे ऐसे तीन-चार पुलों को मैं पार कर चुका था..श्रीमती जी अचानक बोल उठी, ‘एक बात है..सरकारें विकास कार्य तो करा ही रही हैं..’ मैंने भी सहमति में सिर हिलाया और धूल उड़ाती हुई सामने से आ रही गाड़ियों को देखने लगा...हाँ..आगे सड़क निर्माण का कार्य भी चल रहा था...
       
          इस मार्ग से मैं पहली बार यात्रा कर रहा था...मैं अब कर्वी क्षेत्र में प्रवेश कर रहा था..पत्नी ने ऊँचे पहाड़ों को देखते हुए कहा कि ‘यहीं कहीं चित्रकूट भी तो है..?’ मैंने कहा, ‘हाँ है तो...’ ‘तो चलिए घूम लिया जाए..’ श्रीमती जी की इस इच्छा को मैंने भी स्वीकार कर लिया क्योंकि इधर श्रेयांश की भी इन सब चीजों को देखने की ललक बढ़ गई थी...तभी सड़क के बगल की एक ऊँची पहाड़ी पर मंदिर दिखाई दिया ...तथा नीचे से ऊँचाई पर स्थित उस मंदिर तक सीढ़ियाँ जाती हुई दिखी..श्रीमती जी ने वहाँ रुकने के लिए कहा...मैंने कार रोक दी... हम लोग कार से उतर कर उस पहाड़ी और उसके ऊपर स्थित मंदिर तक जाती सीढियों का मुआयना सा करने लगे...पत्नी ने किसी से पूँछ कर मुझे बताया कि ऊपर देवी जी का मंदिर है...उनहोंने इसकी तुलना मैहर से करनी शुरू कर दी, ‘अरे ऐसे ही तो मैहर माता जी का मंदिर है...वहाँ भी तो सीढियों से चढ़ना पड़ता है...मैं तो सीढियों से ही वहाँ चढ़ी थी..कुछ महिलायें तो गश खा गयी थीं..’ बात यह थी कि एक बार इन्होंने मुझसे मैहर देवी जी के दर्शन करने के लिए चलने को कहा था...लेकिन मैं अपनी व्यस्तताओं का हवाला दे मना कर दिया था फिर ये अपने बड़े पुत्र तथा परिवार के अन्य लोगों के साथ वहां हो आई थीं...मैंने उन्हें पुत्र से कहते हुए सुना, ‘चलो इन सीढ़ियों से चल मंदिर में दर्शन कर आयें..’ पुत्र महोदय ने लगभग उन्हें डाट लगाते हुए कहा, ‘अभी वहीँ ऊपर गश खाकर गिर पड़ोगी तो लेने के देने पड़ जाएँगे..’ मैंने लगभग मध्यस्थता के अंदाज में कहा, ‘चलो चित्रकूट घूम लेते है...’ फिर हम आगे बढ़ चले...
         
          अब हम चित्रकूट क्षेत्र में थे..हमारे पास समय की कमी थी अतः हमने तीन स्थानों पर जाना तय किया...हमने स्फटिक शिला देखा...हमें सबसे अधिक प्रभावित वहाँ के प्राकृतिक वातावरण के साथ ही स्फटिक शिला ने किया क्योंकि यह पत्थर वहाँ के अन्य पत्थरों से भिन्न था...इसके बाद हम अनुसूया मंदिर गए यह पूरा क्षेत्र इस भीषण गर्मी में भी अपनी हरियाली संजोये हुए था..कार पार्क करने के बाद अनुसूया मंदिर जाने वाले मन्दाकिनी नदी के किनारे वाले मार्ग पर कुछ दुकाने लगी हुई थी जो पूजन सामग्री और जलपान की थी...नदी का दूसरा किनारा प्राकृतिक रमणीक दृश्य प्रस्तुत कर रहा था...इस प्राकृतिक दृश्य के बीच मुझे एक बात खल रही थी वह थी दुकाने..! मेरे समझ से यहाँ पर किसी अन्य गतिविधियों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए क्योंकि इससे नदी के प्रदूषित होने के साथ ही क्षेत्र की सुरम्यता बाधित हो सकती है..
        
          मेरी जिज्ञासा अनुसूया मंदिर को देखने की थी...हम लोग मंदिर में प्रवेश किए...देखा दो पुजारी आसन लगाए हुए बैठे थे उनके सामने एक चादर बिछी हुयी थी जिस पर कुछ नोट और सिक्के बिखरे हुए थे...मैंने सोचा शायद श्रद्धालुओं ने उसपर चढ़ाए होंगे...हाँ हमे वहाँ से आगे मंदिर में जाने का रास्ता नहीं दिखाई पड़ा तो मैंने पुजारी से अन्दर जाने का रास्ता पूँछा...उसने चढ़ावे की ओर इशारा किया उसके अभिप्राय को समझते हुए भी मैंने कोई चढ़ावा नहीं दिया और दूसरी ओर मुड़ गया वहाँ भी पुजारी बैठे हुए थे लेकिन उनने बताया कि यह लौटने का मार्ग है...और फिर उसी ओर इशारा किया..मैं पुनः उन्ही पुजारियों के पास लौटा और रास्ते के बारे में पूँछा लेकिन उसने कहा, ‘जाइए-जाइए उन्हीं से पता करें..’ मैं बात को समझते हुए दश का नोट उस चादर पर रख दिया तुरंत पुजारी नें हाथ के इशारे से रास्ता दिखा दिया..मैंने श्रीमती जी से कहा, ‘यह इसीलिए रास्ता नहीं बता रहा थ..’ खैर हमने पूरा मंदिर घूमा उस मंदिर ने हमें प्रभावित नहीं किया शायद मुझमें श्रद्धा की कमी रही हो हाँ वहाँ एक बात हमने अवश्य देखी...उस मन्दिर में कई स्थानों पर गुरुओं और भिन्न-भिन्न देवताओं की मूर्तिया स्थापित थीं और सबके सामने पुजारी चादर फैलाए बैठे थे..और सभी चादर की ओर इशारा करते थे...मंदिर से बाहर आते ही मैंने श्रीमती जी से कहा, ‘इसीलिए मैं मंदिर जाना पसंद नहीं करता..’ श्रीमती जी ने कहा, ‘ये कर्म से भागे हुए लोग हैं ये दूसरों को क्या आशीर्वाद देंगे..?’ इसके बाद हम गुप्त गोदावरी गए वहाँ की गुफाएँ प्रभावशाली और देखने लायक थीं..सुपुत्र जी ने उन गुफाओं को देख उनकी निर्माण प्रक्रिया के बारे में हमें समझाने लगे, ‘यहाँ सैंड स्टोन रहा होगा जो धीरे-धीरे पानी की बूंदों के साथ बहता गया होगा और इन गुफाओं का निर्माण हुआ होगा..’ हाँ...उन गुफाओं में घुटनों तक ठंडा पानी भरा हुआ था...इन स्थानों का भ्रमण हम लोगों के लिए काफी आनंददायक रहा...
       
         अब हम बाँदा होते हुए महोबा की ओर चल पड़े...महोबा क्षेत्र में प्रवेश करते ही हमें पथरीले पहाड़ और क्रेशर दिखाई पड़ने लगे थे...यहाँ पर पहाड़ों को ब्लास्टिंग से तोड़कर ग्रेनाईट चट्टानों का कारोबार किया जाता है, मैंने श्रीमती जी को बताया कि यह कबरई है.. ‘अरे कबरई की गिट्टी तो मशहूर हैं..’ मैंने कहा, ‘आपको कैसे पता..?’ ‘अरे घर पर छत डालने के लिए जो गिट्टी आई थी ठेकेदार उसे कबरई की ही बता रहा था...’ श्रीमती जी की इस जानकारी से मैं अभी तक अनभिज्ञ ही था...इसके आगे मैंने उन्हें अपनी जानकारी दी कि ऐसे ही यहाँ के कई पहाड़ अपने अस्तित्व को खो दिए हैं उन्हें तोड़कर बेंच दिया गया है, यही नहीं सैकड़ों फीट नीचे जमीन को खोद कर पत्थर निकाल लिए गए है..इसपर पत्नी ने मुझसे पूँछा, ‘सरकार रोकती नहीं...’ मैंने कहा, ‘सरकार क्यों रोकेगी वह टैक्स लेती है...’ फिर श्रीमती जी ने कहा, ‘यहाँ तो चारों और धूल ही धूल उड़ रही है..’ ‘यह यहाँ चल रहे क्रेशरों के कारण है...इससे स्वांस की बीमारियाँ भी हो सकती है...यही नहीं यहाँ के लोग बताते हैं कि जहाँ क्रेशर चल रहे होते हैं उसके आस-पास की कई बीघे की जमीन इस धूल जमाव के कारण अनुपजाऊ हो जाती है..जिस किसान ने क्रेशर के लिए जमीन दी होती है वह तो किराया पाता है लेकिन क्रेशर के आस-पास की भूमि के किसान अपनी भूमि से फसल भी नहीं ले पाते उनका तो नुक्सान ही होता है लेकिन उनका सुनने वाला कोई नहीं है..’ श्रीमती जी इन बातों को सुन दुखी सी हो गईं, उनकी इस भाव-भंगिमा को देखकर मैंने कहा, ‘कम से कम हमें दुखी होने का अधिकार तो नहीं ही है..’ आश्चर्य से मेरी ओर देखते हुए उन्होंने पूँछा, ‘क्यों...’ मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘अरे भाई..हमारे घर की छत भी तो कबरई की गिट्टी से ही तो बनी है...’ इसे सुन वह कुछ नहीं बोली..
         
          ‘आखिर इन पहाड़ों को कैसे बचाया जा सकता है...?’ श्रीमती जी के इस प्रश्न को सुन मैं कुछ क्षण मौन रहा..अचानक उनके इस प्रश्न को अनसुनी करते हुए से मैंने कहा, ‘वह देखो दूर वह जो पहाड़ पर गोलाई में भवन दिखाई दे रहा है वही विकास भवन है...’ ‘पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए कि इन पहाड़ों को ख़तम होने से कैसे बचाया जाए..?’ मैंने उनकी ओर देखते हुए कहा, ‘इनके ऊपर मन्दिर या मस्जिद बना दिए जाए..!’ ‘अरे इससे कैसे ये बच जायेंगे...’ इस प्रश्न पर मैंने कहा, ‘यहाँ के लोग बताते हैं कि जिन पहाड़ों पर मंदिर होते हैं उनका खनन पट्टा नहीं दिया जाता और वे ब्लास्टिंग से बच जाते हैं...’ अचानक उन्होंने इन पहाड़ों की और देखते हुए कहा, ‘अरे कितना तोड़ेंगे...बहुत पहाड़ हैं...!’ लेकिन इंसान की भूँख को सोच मेरी रूह काँप गई..पहाड़ भी इसके सामने मुझे बहुत छोटे नजर आने लगे थे...!

       मैंने कहा ‘ये पहाड़ ज्वालामुखी से बने हैं...एक पहाड़ की चट्टानों की ओर इंगित करते हुए मैंने उन्हें दिखाया कि देखो इसकी चट्टानें पिघलती हुई सी परत दर परत बहती हुई सी हैं...’ उन्होंने कहा, ‘हाँ यह हिमालय से पुराने पहाड़ हैं..’ मैं उनके इस ज्ञान की प्रशंसा करते हुए सोचने लगा..

        “जब धरती बनी होगी तब न इसपर जीवन रहा होगा और न ये पहाड़ रहे होंगे.. तब यह गर्म धरती इन तमाम ज्वालामुखियों के साथ उबल सी रही होगी...फिर धीरे-धीरे इनसे ये पहाड़ बने होंगे यह धरती ठंडी होती गयी होगी..पेड़ पौधे उगे होंगे और फिर हमारे रहने लायक पर्यावरण बना होगा...लेकिन इन पहाड़ों को तोड़ते हुए हम जहाँ से आए हैं क्या हम फिर वहीँ वापस जाने का मार्ग तो नहीं बना रहे..?” क्योंकि इन पहाड़ों से ही तो हमारा अस्तित्व बना होगा..हवा-पानी की इस धरती पर स्थिरता का कारण धरती की यदि इसी बनावट पर निर्भर होता होगा तो फिर इन्हें नष्ट कर हम जल और प्राण-वायु को भी धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन कर देंगे और यह धरती तपती हुयी सांय-सांय करती वियावान निर्जन गोले में बदल जायेगी...फिर हम कहाँ होंगे...!!” यही सोचते-सोचते हम अपने गंतव्य तक पहुँच गए थे....


          आज पाँच जून है...विश्व पर्यवरण दिवस....! संयोग से यह वृत्तांत आज ही आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.....      

शनिवार, 9 मई 2015

फाल और मेढक...

            धीरे-धीरे मैं प्लेटफार्म पर चढ़ आया..ट्रेन के आने में थोड़ा समय शेष था..| काफी मात्रा में यात्री ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे...कुछ यात्री यात्री-शेड के नीचे की तीन-चार बेंचों पर बैठे हुए थे तो कुछ प्लेटफार्म पर खड़े थे..एक बेंच पर थोड़ी सी जगह देख मैं वहाँ जाकर बैठ गया..| पास में ही चार-पाँच युवा, जो लगभग चौबीस-पच्चीस वर्ष के रहे होंगे, शायद वे भी ट्रेन की ही प्रतीक्षा कर रहे होंगे, उनमें आपस में हो रही बातों को मैं सुनने का प्रयास करने लगा था..|
            उनमें से कोई एक कह रहा था.. ‘मेरे तो फेसबुक पर पचास से ज्यादा मित्र नहीं है...’
            दूसरा बोला.. ‘जिसको जानते हों उन्हीं को दोस्त बनाना चाहिए..’
           पहला फिर बोल उठा, ‘ऐसा है यार..बहुत ज्यादा फेसबुक मित्र हो जाने पर पता नहीं कैसे-कैसे लोग जुड़ जाते है...’
            दूसरे ने फिर कहा, ‘हाँ कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो उल्टी-सीधी चीजें पोस्ट कर देते हैं..’
            पहले युवक ने फिर कहा, ‘हाँ..बात यह है हमारे फेसबुक-वाल पर परिवार के सदस्य भी जुड़े होते हैं जिनमें परिवार की लड़कियाँ, रिश्तेदार या बड़े लोग भी सम्मिलित होते हैं, लेकिन कुछ लड़कों के फेसबुक फ्रेंड-लिस्ट में उनके परिवार के लोग या लड़कियाँ नहीं जुडी होती, केवल लड़के ही उनकी लिस्ट में शामिल होते हैं और यदि हम किसी परिचित लड़की की पोस्ट पर ‘लाइक या कमेन्ट’ करते हैं तो इसका डर बना रहता है कि ऐसे फेसबुक-मित्र जो अपने परिवार के सदस्यों से नहीं जुड़े होते वे बड़ी उल्टी-सीधी टिप्पड़ियां कर बैठते है...तब हमें बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है...इसीलिए..जो अपने परिवार से जुड़े हों और जिम्मेदारी का परिचय दे रहे होते है, उन्ही की फ्रेंड-रिक्वेस्ट स्वीकार करते है...’
           अब तीसरा युवक बोल उठा.. ‘हाँ यार..! सही कहा..ऐसे लोग ही गैर जिम्मेदार होते है..फेसबुक पर अपने परिवार से भी जुड़ा होना चाहिए...’
          “इनकी बातें तो तथ्यपूर्ण हैं..सच में सोशल मीडिया ‘लाइक’ और ‘कमेन्ट’ तक ही सीमित नहीं है..” इन बातों को सुन मैं यही सोच ही रहा था कि तभी ट्रेन के आने की घंटी बजी...मैंने देखा आपस में वार्तालाप कर रहे उन युवकों में से दो जो अपने मित्र को स्टेशन पर छोड़ने आये रहे होंगे वापस जा रहे थे...
          मैंने सुनी वार्तालाप के पहले युवक को उनसे कहते हुए सुना, ‘हाँ.. ठीक हैं पहुँचने पर फोन से बात होगी...अरे वैसे तो हम सब फेसबुक पर तो हैं ही...’
          ट्रेन आती हुई दिखाई दी और मैं भी ट्रेन में चढ़ने की तैयारी करने लगा..
                             *                           *
         ट्रेन प्लेटफार्म पर आ चुकी थी...मैंने एक अन्य व्यक्ति के साथ एक डिब्बे चढ़ने का प्रयास किया...उसके दरवाजे पर ही खड़े टी.टी. ने उस बोगी को रिजर्वेशन कोच कहते हुए उसमें चढ़ने से मना कर दिया..| हालांकि, ऐसा नहीं था....वह कहीं से भी रिजर्व-कोच नहीं लगा..बल्कि साधारण श्रेणी का ही डिब्बा वह भी था..| खैर, हम दोनों दूसरे डिब्बे में चढ़ गए...सीटें खाली थी...मैंने वहाँ सफ़ेद लक-दक कुरता-पायजामा पहने एक नेता-टाइप व्यक्ति को एक पुलिसवाले के साथ बैठे हुए देखा, ‘शायद यह पुलिस-वाला इनका सुरक्षा-गार्ड हो’ इस विचार के साथ मैं भी वहीँ उन दोनों के सामने वाली सीट पर बैठ गया| हम आपस में एक दूसरे को देखे जा रहे थे...नेता टाइप व्यक्ति हमसे हमारे गंतव्य स्थल के बारे में पूँछ बैठे, हमारा गंतव्य स्थल एक ही शहर में होने के कारण बातचीत सम्बन्धी हममें प्रगाढ़ता पनप गई| सफ़ेद लक-दक कुरता-पायजामा पहने व्यक्ति के लिए ‘नेता-टाइप’ शब्द का प्रयोग उनके पहनावे के कारण किया है, क्योंकि प्रायः हमारे यहाँ के नेताओं ने भी अपने लिए लगभग इसी तरह का ‘ड्रेस-कोड’ निर्धारित कर लिया है..और..इस ड्रेस में दिखाई देने वाले को कोई भी आसानी से ‘नेता जी’ समझ सकता है|
         
         ट्रेन अपनी गति के रौ में थी...‘वैसे हम अकसर अपनी गाड़ी से ही राजधानी जाते हैं और ट्रेन की अपेक्षा कम समय में पहुँच जाते हैं...यह सब सड़कों में सुधार होने से हुआ’ नेता जी के इसी कथन से आपस में हमारी बात-चीत आरम्भ हुई| ‘देखिए दो मजबूत राजनैतिक दलों की सत्ता की दावेदारी में प्रतिस्पर्धात्मक विकास तो होता ही है’ नेता जी की इस बात को सुन मैंने यह कहते हुए स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया कि वास्तव में इधर विकास तो हुआ ही है|
       
        ‘लेकिन भाई साहब... इस विकास से बहुत से लोग बेरोजगार भी हो रहे हैं’ लक-दक कुरता-पायजामा पहने नेता जी के इस वाक्य को सुन मेरे चेहरे पर प्रश्नवाचक चिह्न उभर आया..! इस चिह्न को भाँप नेता जी ने इस विकास से बढ़ती बेरोजगारी की अपने तरीके से व्याख्या की..!
         
        उनका कहना, ‘सड़कों के इस तरह के विकास से तमाम फ़्लाइओवर बन रहे हैं यहाँ तक कि बाजारों में भी जहाँ से ये सड़कें गुजरती हैं लोगों के घरों और दुकानों को तोड़कर फ़्लाइओवर बना दिए जा रहे हैं..बेचारे दुकानदार बेरोजगार होते जा रहे हैं..और तो और इन सड़कों से लोग ऊपर-ऊपर ही गुजर जाते हैं, दुकानदारों की दुकानदारी भी नहीं चल पाती’ फिर आगे उन्होंने इसमें और जोड़ा, ‘बेरोजगारी बढ़ी की नहीं..?’
       
           मुझे लगा जैसे नेताजी कोई चुनावी भाषण देने लगे हों...हालाँकि मैंने अपने कुछ तर्कों के साथ उनके इस कथन के प्रतिवाद की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मेरी एक न सुनी..मुझे लगा यह महाशय मेरे इस यात्रा के साथी हैं अतः मैंने भी उनके इस कथन की सहमति में फिर दो बार सिर हिलाया..| यहाँ एक बात और स्पष्ट करना होगा कि ट्रेन में मिले इस व्यक्ति के पहनावे के आधार पर ही मैंने मन ही मन इन्हें ‘नेता-टाइप’ व्यक्ति का संबोधन दिया था, लेकिन बातों ही बातों में इन्होंने स्वीकार भी कर लिया कि ये वास्तव में ‘नेतागीरी’ करते हैं, जैसे इनके ये कथन ‘यदि सब नियम से ही काम करने लगे तो फिर हम नेताओं का क्या काम..!’ और ‘वैसे मैं किसी सरकारी आदमी को गलत काम करने के लिए नहीं कहता...’ उनकी नेतागीरी को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है|
        
            ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी...बाहर घना अँधेरा था..हमारी बोगी इंजन के पास वाली ही थी इसलिए प्लेटफार्म के ऐसे स्थान पर थी जहाँ प्रकाश व्यवस्था नहीं होगी...मेरा ध्यान नेताजी के पास ही बैठे पुलिस-वाले पर चला गया जिसे मैं नेता जी का सुरक्षा-गार्ड समझ रहा था..| मैंने ध्यान दिया वह पुलिस-वाला कोई हथियार जैसे स्टेनगन या राइफल वगैरह नहीं लिए हुए था, मैंने यही सोचा ‘शायद यह नेता जी का बाडीगार्ड न हो..!’ ट्रेन में भीड़ कम थी नेता जी पैर फैला जैसे सोने का उपक्रम करने लगे और मैं भी थोड़े आराम की मुद्रा में आ गया था| ट्रेन चल पड़ी, अचानक नेता जी उठ बैठे और मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘बहुत भ्रष्टाचार बढ़ गया है...अरे..! आदमी के लिए कितना चाहिए फिर भी संतोष नहीं...इस चक्कर में तो लोग नैतिकता जैसे भूल ही गए हैं, सरकारी आदमी को देखो, वेतन मिल रहा हैं लेकिन यदि काम भी कर रहा है तो बस जैसे पैसा ही खोज रहा हो, उसके बगैर कोई काम करने का जैसे उसके लिए कोई मतलब ही नहीं..और इसके बगैर उसका काम करने में मन भी नहीं लगता है..!’ मैंने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाया लेकिन बोला कुछ नहीं, मुझे ऐसा प्रतीत हुआ यह तो बहुत अच्छा नेता है बिलकुल आम आदमी जैसा..! लेकिन प्रशंसा में मैं कुछ बोल नहीं पाया...| ट्रेन फिर कहीं रुकी हुई थी|

            ‘यहाँ कोई स्टापेज नहीं..पता नहीं क्यों रोक दिए है..ये अब ऐसे ही करेगी’ नेता जी ने फिर कहा, ‘देखिए पुलिस वाले बेचारे रात-दिन नौकरी करते हैं लेकिन जरा सी बात पर सस्पेंट हो जाते हैं, कोई इनकी मजबूरियों को नहीं समझता’ मुझे ध्यान आया कि नेता जी के बगल में ही पुलिसवाला बैठा है, ‘तो शायद यह नेता जी का बाडीगार्ड नहीं है...फिर ये महाशय भी तो इतने बड़े नेता नहीं लगते कि इन्हें बाडीगार्ड की जरुरत पड़े..इसका मतलब पुलिसवाले को देख ये मुंहसोहासी कह रहे हैं’ यही सब सोचते उस पुलिसवाले को देखते हुए मैंने एक ऐसी पुलिस-व्यवस्था को अपनाने के लिए कहा जिसमें पुलिस डयूटी में इन्हें कुछ आराम मिल सके| ‘नहीं सरकार ने पहले इस विषय पर सोचा था लेकिन इतनी भर्तियाँ कौन करेगा..फिर यह सब ठंडे बस्ते में चला गया है..’ मेरी बात सुन पुलिस वाले ने यही कहा|
         
            अब-तक ट्रेन चल चुकी थी... ‘वास्तव में पुलिस की दुर्दशा है, इतनी अधिक डयूटी करते है..वह भी लगभग चौबीसों घंटे की, लेकिन वेतन कितना कम रहता है..? वहीँ आई.ए.एस-पी.सी.एस. बन लोग मौज काटते हैं...हमारे यहाँ काम और वेतन में तो कोई तालमेल ही नहीं है..बहुत असमानता है!’ यह कहते हुए नेताजी पुलिस वाले की ओर मुखातिब होते हुए फिर बोले, ‘आप को तो इसका अच्छा अनुभव होगा..?’ मैं यह सुनते ही यह सोचते हुए ‘पक्का...यह पुलिसवाला इन नेता जी का बाडीगार्ड नहीं है..मतलब ये वजनदार नेता नहीं हैं’ उस पुलिस वाले की ओर देखने लगा| असल में ‘बाडीगार्ड’ से मैं मन ही मन नेता जी को तौल रहा था|
           
           “अरे भाई..! गांधी जी ने एक बात कही थी कि फाल किसी एकाध मेढक को ही लगता है..|” पुलिसवाले ने यह बात हमारी ओर देखते हुए कहा| मैंने इस कथन के अर्थ को समझने का प्रयास किया किन्तु असफल रहा, ‘लेकिन गांधी जी ने कहाँ और कब इसे कहा है, किसी किताब में तो मैंने इसे पढ़ा नहीं..और तो और..गांधी जी की किसी विचारधारा से भी यह कथन मेल नहीं खा रहा है’ यह सोचते हुए मैंने उस पुलिस वाले की ओर देखा, तभी उन महाशय की आवाज सुनाई दी, “आप समझे नहीं...अरे मेढक जो हैं न..अपनी निष्क्रियता की अवस्था में जमीन में दबे-पड़े रहते हैं, जब किसान खेत की जुताई करने लगता है तो कोई एकाध मेढक को ही उसके हल का फाल लगता है जबकि जमीन में तो बहुत मेढक दबे रहते हैं, जिस मेढक को यह फाल लग गया वही बेचारा दुर्भाग्यशाली होता है...!” साथ ही इसमें उन्होंने आगे जोड़ा, ‘बस इसी तरह हम भी हैं हमको यही पुलिस की नौकरी बदा थी..क्या हमीं थे...लेकिन वही है कि किसान का फाल हमें ही लग गया..और हमें यही  नौकरी मिली’ उधर उस बेचारे का यह वाक्य पूरा हुआ इधर मैं इस कथन के दूसरे ही अर्थ में खो गया..
         
          ‘हम सभी तो दबे-पड़े हैं, अपने ऊपर पता नहीं किस मिट्टी की मोटी परत दर परत चढ़कर...एकदम मेढक की सी शीत निष्कृयता लेकर...! एक अजीब सी व्यवस्था के नीचे ‘हाइबरनेशन’ की अवस्था है हमारी..!! हैं तो सभी इसमें, लेकिन जिसको फाल लग गया वही बेचारा...!’
         
          अभी मैं इसी अर्थ में खोया था कि नेता जी की आवाज सुनाई दी, ‘बात तो सही है आप पुलिस बन गए और यहाँ मैं नेतागीरी करने लगा..अपना-अपना भाग्य..! लेकिन भाई सबको संतोष होना चाहिए...कोई सिर पर थोड़े ही न ले जाना है...हमने तो आवश्यकता सीमित कर रखी है जिससे व्यर्थ की मगज़मारी न करनी पड़े..’ अब नेता जी मेरी ओर मुखातिब हुए, ‘आप क्या करते हो..?’ मैं बताना तो नहीं चाहता था लेकिन छिपाने का प्रयास करते हुए भी नहीं छिपा पाया और नेता जी को पता चल गया कि मैं भी कुछ हूँ|

           ‘इतनी दूर पोस्टिंग लिए हैं..’ नेता जी के इस बात पर मैंने कहा, ‘नौकरी करनी ही है, जहाँ भी तैनाती मिलेगी जाना तो पड़ेगा ही..’ अब नेताजी लगभग बलपूर्वक बोले, ‘अरे आप नाहक परेशान हैं...बताइए मैं बात चलाऊं...? मेरा फोन नम्बर ले लें और अपना भी दे दें..बात हो जाएगी..’ मैं किसी तरह नम्बर के आदान-प्रदान को टालते हुए बोला, ‘नहीं कौन इस पचड़े में पड़े और ज्यादा उलझन नहीं पालना चाहिए...|’ मेरी पचड़े वाली बात सुन नेता जी बोले, ‘देखिए भाई साहब आदमी को भगवान् बन कर नहीं जीना चाहिए वह इंसान है इंसान बन कर ही रहे...अरे थोडा-बहुत सब चलता है..नहीं तो जिंदगी भी नहीं चलेगी..’ यह कहते हुए नेता जी मेरा फोन नम्बर लेना भूल चुके थे..
            
            ट्रेन की गति धीमी पड़ रही थी...शायद कोई बड़ा स्टेशन नजदीक ही था, धीरे-धीरे कर ट्रेन रुक गई, प्लेटफार्म रोशनी में नहाया हुआ था..! तभी नेता जी ने अचानक प्लेटफार्म की ओर देखते हुए पता नहीं क्या सोच कर मुझसे कहा, ‘ये औरते न होती हैं बड़ी रहस्यमयी’ इसे सुन मैं चौंक पड़ा| मैं अभी उनके इस कथन के मर्म को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि आगे इसमें उन्होंने और जोड़ा, ‘बात यह है भाई साहब कि इनका कोई भरोसा नहीं कि ये कब क्या कर बैठें और आप इस बात का अनुमान नहीं लगा सकते” अब मुझसे नहीं रहा गया मैंने लगभग नेता जी के कहे इन कथनों पर प्रतिवाद दर्ज कराने की नीयत से कहा, ‘अरे नहीं भाई, ऐसी बात नहीं...इन्हें बहुत कुछ सहना और समझना पड़ता है...’ मेरे इस विचार को नेता जी ने कोई तवज्जो नहीं दिया और गंभीरता लिए शब्दों में मुझसे कहना शुरू किए, “देखिए भाई साहब आप ध्यान दीजिए...एक स्त्री के कितने रूप होते हैं..माँ..बहन..बुआ..भाभी...चाची..ताई...पत्नी...प्रेमिका...आदि, और वह इन रिश्तों को सबसे अलग-अलग एक ही साथ कुशलता से निभाती है...अब आप ही बताइए...! कोई एक साथ इतने रूप धारण कर सकता है...तो कैसे आप स्त्री के चरित्र का भरोसा करेंगे?” नेता जी के स्त्री के प्रति इस विचार को सुन एक क्षण के लिए मैंने अपना सिर पकड़ लिया..जो बात एक स्त्री को गौरवान्वित करता है उन्हीं बातों के आधार पर नेता जी द्वारा निकाले गए निष्कर्ष को मैंने मन ही मन कोई महत्त्व नहीं दिया|
        
           ‘एक स्त्री की संवेदनशीलता को लोग समझ ही नहीं पाते...स्त्री तो एक जलधारा के सदृश है, जो सागर..नदी...झील...बादल...सभी में मिल जाती है...! उसकी तरलता, उसकी संवेदना को हम समझ नहीं पाते...!! शायद उसकी यही संवेदनशीलता एक साथ इतने रिश्तों को निभाने की उसे शक्ति भी प्रदान करता है..और..उसकी भावनाएं भी वही समझ सकता है जो उसी के जैसा संवेदनशील हो...नहीं तो लोग उसे चरित्रहीन का तमगा दे देते हैं...! लेकिन, हम भूल जाते हैं कि जलधारा स्वयं में पवित्र होती है, क्योंकि इसकी तरलता में प्रक्षालन की शक्ति होती है....!’ मन हुआ नेता जी को मन की ये सारी बातें सुना दें...लेकिन ऐसा नहीं कर सका क्योंकि सबके अपने-अपने तर्क होते हैं...और फिर कुतर्कों से जीतना मुश्किल है|
         
            मैं मन की इन भावनाओं में डूबा ही था कि नेता जी का स्वर सुनाई दिया.. ‘भाई साहब सो गए क्या...? पता नहीं ट्रेन कब चलेगी..इतनी देर से खडी है...’ अपने इस स्वर के साथ वह प्लेटफार्म का जैसे मुआयना करने लगे थे| एक मूंगफली वाले को बुलाकर मूँगफली खरीदा, ‘सफ़र में मैं और कुछ नहीं खाता..तला-भुना तो एकदम नहीं खाना चाहिए..’ शायद ऐसा इसलिए कहा था कि मैं पकौड़े लेने के चक्कर में था लेकिन नहीं लिया...फिर, मैंने भी उनकी इस बात का समर्थन किया| ‘अरे..आप भी लीजिए...’ कहते हुए मूँगफली के ठोंगे को मेरे सामने कर दिया, लेकिन मेरे लिए इसके छिलकों को फेंकने की समस्या होती फिर भी उनके आग्रह को टाल नहीं पाया और एक-दो फली उठाने लगा| उसी समय, एक साठ-पैंसठ वर्षीय व्यक्ति ट्रेन की खिड़की से हम लोगों की ओर हाथ बढ़ा भींख माँगते दिखाई दिया, नेता जी अपनी जेबों को टटोलते हुए कहा, ‘फुटकर नहीं है जाओ’ और इधर मैं भी प्रतिक्रियाहीन मूंगफली फोड़े जा रहा था, लेकिन वह भिखमंगा जाने का नाम नहीं ले रहा था.. ‘अरे भाई मैंने कहा न कि हम लोगों के पास फुटकर नहीं है...तुम जाते क्यों नहीं...” लेकिन फिर भी वह नहीं गया और बोला, ‘अरे बाबूजी कुछ भी हो दे दो, चाहे कुछ खाने का ही दे दो..’ यह कहते हुए वह जैसे कुछ न कुछ लेने के लिए अड़ सा गया, इसे भाँप नेता जी ने दो मूंगफली के दाने उसकी ओर बढ़ा दिया, आश्चर्य..! दो मूंगफली का दाना पाकर भी वह खुश था और चलता बना..!
         
            यह देख मैं मुस्कुरा दिया..नेता जी ने मुझे देखते हुए कहा, ‘देखा आपने भींख माँगने की भी एक आदत होती है..लोगों को भींख पाए बिना भी चैन नहीं मिलता..!’ ‘अरे भाई साहब..आपको पता है...! दिल्ली-विल्ली जैसे शहरों में तो भींख माँगने की थोड़ी खाट भर की जगह भी ये भिखमंगे पचास-पचास लाख में खरीदते और बेंचते हैं...यह बात तो मेरे विधायक जी ने बताई थी...!’ मैंने थोडा अचंम्भित हो नेता जी को सुना| वे फिर बोले, ‘आप को विश्वास नहीं होगा...लेकिन एक बार मैं अपने विधायक जी के साथ दिल्ली गया था वहीँ पर एक जगह जहाँ कोई भींख मांग रहा था..उसकी ओर इशारा करते हुए विधायक जी ने यही बात उस जगह के बारे में बताया था..’ इस समय ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ने लगी..और इधर मैं सोच रहा था हो सकता है नेता जी की इस बात में अतिशयोक्ति हो लेकिन इसमें कुछ न कुछ सच्चाई भी होगी....ट्रेन सरपट भाग रही थी|
           
          कुछ देर तक हमारे बीच मौन छाया रहा लेकिन ट्रेन फिर रुकने लगी, नेता जी ने कहा, ‘देखा, अब ऐसे ही होगा..अब इसे रोक-रोक कर अन्य गाड़ियों को आगे बढाते रहेंगे...इसका क्या..इसे तो यहीं तक जाना है...दूर की ट्रेनों को निकालते रहेंगे...’ मन ही मन मैंने भी सोचा ‘ठीक है कि हमको बस अगले स्टेशन तक ही जाना है और ट्रेन को भी, लेकिन क्या रेलवे वालों को हमारे लोगों के समय का ध्यान नहीं..?’
    
             अब नेता जी से बात करने में मेरा मन नहीं लग रहा था, जबकि उन्होंने कई बार मुझसे बात करने की कोशिश की...एक बार तो मैंने सोचा ‘नाहक ही इनसे इतनी बातें कर ली’ क्योंकि बातों से उनका मन अब भी भरा नहीं था...इसीलिए बातों के लिए जैसे वे मुझे कुरेद रहे थे...उस रुकी ट्रेन से उतर बाहर टहलने लगा था..और इया प्रतीक्षा में था कि ट्रेन कब चले....
         
             मुख्य स्टेशन तक ट्रेन दो घंटे बिलम्ब कर जैसे-तैसे पहुँची...प्लेटफार्म से बाहर आते ही नेता जी और मैं विपरीत दिशाओं की ओर अपने गंतव्यों के लिए ऑटो तलाश रहे थे...इस समय रात के बारह से अधिक हो रहा था...मुझे एक ऑटो मिला..उस ऑटो में पहले से ही एक व्यक्ति सवार था...मैंने उसे रिजर्व कर लिया और  घर के लिए निकल पड़ा...ऑटोवाला ऑटो को तेज़ गति से भगाए जा रहा था...एक मोटरसाइकिल पर दो पुलिसवाले मंथर गति से चले जा रहे थे...ऑटोवाला तेजी से उनसे आगे बढ़ गया...मैंने देखा दोनों पुलिसवाले अपनी मोटरसाइकिल से ऑटो के आगे तेजी से आए और उसे रुकने का इशारा किया...ऑटो रुक गयी..एक पुलिसवाले ने झट से ऑटोड्राइवर का गिरेबान पकड़ा और भद्दी गालियाँ देते हुए कहा, ‘..सा...ले...ठीक से चलना नहीं आता...देखो न हमारे ऊपर धूल उड़ी’ किसी तरह ऑटोवाले ने उन पुलिसवालों से हाथ-पैर जोड़ हम लोगों से यह कहते हुए आगे बढ़ा, ‘बाबूजी देखा..इन पुलिसवालों को..! मेरी कौन सी गलती थी...? लेकिन..इनके मुँह कौन लगे..’ मैं भी सोचने लगा, ‘इस बेचारे ऑटोड्राइवर की आखिर ऐसी कौन सी गलती थी जिसके कारण नाहक ही पुलिसवालों से उसे अपमानित होना पड़ा..?’
        
           खैर, थोड़ी देर बाद ऑटोवाला ऑटो में बैठे मेरे साथ के यात्री को उतारते हुए मुख्य सड़क छोड़ हमारे ब्लाक की ओर जानेवाली सड़क पर मुड़ गया..कुछ आगे जाने पर मुझे दो पुलिस वाले दिखाई पड़े, लेकिन ये पहलेवाले नहीं थे, एक पुलिसवाला लघुशंका में तल्लीन था और उसके पास ही एक मोटरसाइकिल खड़ी थी, तो दूसरा हमारे ऑटो की ओर देखते हुए सड़क पर लाठी पटकने लगा था...पास पहुँचने पर ऑटो को रुकने का इशारा किया, सहमा-सहमा सा ड्राइवर ने ऑटो रोक दिया.... ‘क्यों बे इतनी रात को ऑटो इधर क्यों लाया..’ पुलिस वाले ने ऑटो-ड्राइवर को लगभग डाटते हुए कहा| ‘बोलता नहीं...क्यों बे तू...साले..अभी दो चार थप्पड़ रशीद करेंगे तो होश ठिकाने आ जाएगा..’ पुलिसवाले ने फिर घुड़की थी| सहमें-सहमें ऑटो-ड्राइवर ने कहा, ‘अरे साहब बाबूजी मिल गए इन्हें यहाँ तक आना था..इन्हें पहुँचाने आए हैं...’ ऑटो वाले ने डर से ऐसे कहा जैसे मुफ्त मे मेरे ऊपर एहसान कर रहा हो..!
          पुलिस वाले ने अब मेरी ओर देखकर मुझ से पूँछा, ‘क्यों तुमको इतनी रात में ही आना था..’ अब मुझे उस पुलिस वाले पर क्रोध सा आ गया, मैंने कहा, ‘पहले तो तमीज सीखो कि कैसे बात करनी चाहिए..वर्दी पहन पुलिसिया अंदाज़ मुझे मत दिखाओ...तुम लोगों की यही सबसे बड़ी खराबी है...अभी मैं तुम-तुम कह तुमसे बात करूँ तो कैसा लगेगा’ पुलिसवाला थोडा सकपकाया और बोला, ‘नहीं मेरा मतलब इतनी रात को क्यों चल रहे हैं..’ मैंने कहा, ‘क्या रात में चलना कोई गुनाह है...तुम्हारे किस कानून में लिखा है...कोई अपने घर रात में नहीं जा सकता..? और सुनो अगर गुनाह भी है तो ट्रेन लेट हो गई...पहले रेलवे पर मुक़दमा दर्ज करो जिसके कारण इतनी रात हुई?’ पुलिसवाले ने फिर कहा, ‘अरे आप बुरा मत मानिए हमारा काम है..’ मैंने कहा, ‘काम है..करो..अच्छी बात है..लेकिन सभ्य तरीके से पेश आओ..हाँ हमारी तलाशी भी ले सकते हो..’ फिर उसने ऑटो-ड्राइवर से कहा, ‘जाओ..’
         मुझे अनुभव हुआ कि ‘हमारी प्रशासनिक व्यवस्था में अंग्रेजों के जमाने की वह चिरंतन कमी अभी भी जारी है...जहाँ प्रशासनिक व्यवस्थाएँ मात्र लोगों को डराने के लिए हुआ करती थी..और अंग्रेजों से मिले हुए सामंती तत्व इसका बखूबी अपने हित में प्रयोग किया करते थे...इस प्रशासन का प्रभाव उन सामंतों पर नहीं होता था बल्कि उन सामंतों का आम-सीधे जनों पर शोषणकारी प्रभुत्व वैसे ही बरक़रार रहता था...आज उन सामंतों के स्थान पर दूसरे लोग उभर आए हैं...हो सकता है चालाक या असली अपराधी इस व्यवस्था के हाथ न आएँ बल्कि नादान या सीधे-साधे लोग इससे इसी तरह प्रताड़ित होते रहें...वास्तव में अभी भी प्रशिक्षण का तरीका और इसका उद्देश्य जैसे कुछ भी नहीं बदला...! और व्यवस्था ही अपने नागरिकों से गुंडई करती हुई हर जगह दिखाई दे जाती है..!’
          हाँ, यही सब मैं सोच रहा था कि मेरा घर आ गया...मैंने घर के पास ऑटो-ड्राइवर को रुकने का इशारा किया ऑटो से उतर मैंने ड्राइवर को किराया दिया..| ‘बाबूजी वे पुलिसवाले लौटते समय मुझे परेशान कर सकते है...कोई दूसरा रास्ता बताइए..’ ऑटो-ड्राइवर ने कहा| मैंने एक सड़क की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘जाओ इसी रास्ते से चले जाओ आगे जाकर यह उसी रास्ते में मिल जाएगी..वे पुलिसवाले नहीं मिलेंगे..|’ औटोवाला जा चुका था...पत्नी ने गेट खोला ये बाते उन्हें बताई..उन्होंने कहा, ‘इधर चोरियाँ बढ़ गयी हैं..इसीलिए पुलिसवाले रात में गस्त कर रहे है...हो सकता है ऑटोवाले के पास रात में यहाँ तक आने का परमिट न हो...’ लेकिन, मैं यही सोच रहा था कि पुलिस का व्यवहार भी अपने में एक समस्या है..|

          बेचारा ऑटो-ड्राइवर..! दो बार तो किसी तरह उसे ‘फाल’ लगते-लगते बचा...फिर कहीं किसी ‘फाल’ का शिकार न हो जाए...
          यह ‘फाल’ किसी को भी लग सकता है, थके हुए से इन विचारों के साथ मुझे नींद आ गयी....

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गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

मिटती पगडंडियाँ....

                  आज कई वर्षों बाद मैं ट्रेन से अपने गाँव आया था....मेरे गाँव से स्टेशन बमुश्किल डेढ़ किमी पर होगा..उस स्टेशन पर लगभग सभी प्रमुख ट्रेनों का ठहराव है...इसका कारण भी है क्योंकि हमारे गाँव से सटा क़स्बा धीरे-धीरे कर काफी बड़ा हो चुका है..अब तो कसबे के पास ही एक औद्योगिक क्षेत्र का भी विकास किया जा चुका है वहाँ कुछ छोटे-बड़े कारखाने भी लगाए जा चुके हैं..अतः कस्बे से प्रमुख शहरों की ओर आवाजाही भी बढ़ चुकी है..फिर..जनसंख्या भी तो बढ़ चुकी है..। 
                ...ट्रेन से उतरते ही पिताजी का फोन आ गया..घर से किसी को स्टेशन मुझे लेने के लिए भेजना चाहते थे...वैसे कोई सामान तो था नहीं मेरे पास...और मैं भी इस समय तक कूल माइंड का हो चला था मतलब दिमाग पर कोई रूटीन कामवाला तनाव भी नहीं था...सोचा...आज पैदल ही पुरानी यादों को ताजा करता हुआ गाँव चलूँगा...
                  हाँ.., ट्रेन के जाने के बाद ही मैं प्लेटफार्म से नीचे आया..तमाम मोटरसाइकिल...ऑटो-टैम्पो वहाँ खड़े थे..और..रिक्शे वाले तो इक्के-दुक्के ही दिखाई दिए...इनमें से कुछ तो अपने परिचितों को लेने आए रहे होंगे....लेकिन ज्यादातर सवारियाँ ढूंढ रहे थे...अचानक मेरे दिमाग में कौंधा...अब यहाँ इन वाहनों की इतनी भीड़...! पन्द्रह वर्षों पहले की बात याद आ गयी...तब...इस स्टेशन पर किसी ट्रेन के आने पर छह-सात रिक्शे-वाले ही खड़े रहते थे...लेकिन अब काफी कुछ बदल गया है...बदला नहीं तो वह पाकड़ का पेड़ और उसकी घनी छाया...उसकी घनी छाया में गोमती में चलने वाली वह चाय की दूकान...! मैंने देखा उस चाय की दूकान पर भीड़ लगी थी...
                पुरानी यादों में खोया सा मैं कुछ क्षणों तक वहीँ खड़ा रहा...फिर धीरे-धीरे कर गाँव की ओर चल पड़ा...प्लेटफार्म के नीचे-नीचे पगडण्डी पकड़ मैं चलने लगा...कुछ कदम चलने के बाद प्लेटफार्म पर के उस इमली के पेड़ को मैं खोजने लगा... “अरे..! यह तो वही इमली का पेड़ है...लेकिन इसकी यह दुर्दशा...! इसकी तो कई डालें अब गिर चुकी हैं...यह पेड़ तो अब किसी खण्डहर जैसा हो गया है...” असल में गाँव के प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई के बाद मैं अपने इस कस्बे के इण्टर कालेज में उच्च प्राथमिक स्तर के साथ इण्टर तक की शिक्षा पूरी की थी...और गाँव से उस कालेज तक आने-जाने के लिए इस प्लेटफार्म को ही पैदल रास्ते के रूप में प्रतिदिन प्रयोग करते थे...क्योंकि...सड़क मार्ग से बाजार का भी चक्कर लगाना पड़ता, उसकी अपेक्षा इस प्लेटफार्म से होते हुए गाँव से स्कूल की दूरी कम हो जाती थी... “इस पेड़ के पास प्लेटफार्म के किनारे के रेलिंग के चौड़ी पट्टी वाले दो छड़ अभी भी वैसे ही टूटे हैं....और...रेलिंग के नीचे की मिट्टी वैसे ही है...बल्कि अब नीचे की मिट्टी कुछ अधिक ही कट-बह गयी है...आराम से इस रास्ते से प्लेटफार्म पर चढ़ा जा सकता है..” सोचते-सोचते मैं थोड़ा झुकते हुए रेलिंग के नीचे से आराम से प्लेटफार्म पर चढ़ गया...इमली के उस पेड़ को ध्यान से देखने लगा..
                    बचपन में स्कूल से लौटते समय इसी इमली के पेड़ पर चढ़ हम अपने साथियों के साथ इमली तोड़ने या खाने का मजा लिया करते थे...हाँ तब यह पेड़ इतना घना हुआ करता था कि इसकी पत्तियों के बीच हम बच्चे स्टेशन मास्टर से छिप कर इमलियाँ तोड़ते थे...और यदि हमारे ऊपर उनकी नजर भी पड़ जाती तो इसके पहले कि वे हम तक पहुँचते हम उसी रेलिंग के कटे रास्ते से धीरे से सरक लेते...लेकिन..अब कोई चिड़िया भी इस पेड़ पर बैठी हो तो वह दूर से दिख जाएगी...
             उस पेड़ को देखते ही अचानक मोहन की छवि स्मृतियों में उभर आई...मोहन को हम लोग पागल मानते थे...शायद वह पागल ही रहा होगा...चिथड़ों में लिपटा मोहन अकसर वहीँ इमली के पेड़ के तने के सहारे बैठा मिल जाता...कोई कभी कुछ दे देता तो वह खा लेता...स्कूल से लौटते समय जब वह दिखाई देता तो हम उससे पूंछते, “मोहन..वह जाता है..” मोहन झट से बोल देते “ही गोज..” “मोहन..वह स्कूल जा रहा है” तो मोहन कहता “ही इज गोइंग टू स्कूल” यानी इसी प्रकार वह हमारे द्वारा बोले गए वाक्यों का अंग्रेजी में अनुवाद करता जाता..हाँ कोई वाक्य बोलने के पहले उसका नाम भी पुकारना अनिवार्य होता अन्यथा वह उत्तर नहीं देता था...स्कूल से दिए गए ट्रांसलेशन के होमवर्क को वहीँ मोहन से पूँछ लेते और बदले में उसे इमली तोड़ कर खिला देते..!
            ...मुझे याद आया...उन दिनों पंजाब मेल और काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस में ही डीजल-इंजन लगता था शेष सभी गाड़ियों में भाप के इंजन हुआ करते थे..इसी इमली के पास ही इंजन रुकता...कई मैले-कुचैले कपड़े पहने लड़के उस भाप-इंजन से गिरे हुए जलते कोयले को एक लोहे की छड़ जिसका एक सिरा मुड़ा होता उससे उलट-पुलट कर बुझाते..और उन कोयले के टुकड़ों को अपने झोले में रखते जाते..बाद में इसे बाजार में बेंच दिया करते थे..हम स्कूल जाते-आते बच्चे अकसर जब कोई गाड़ी आकर खडी होती तो उसके भाप के इंजन को बड़े ध्यान से देखते थे...ट्रेन-ड्राइवर गाड़ी के रुके होने पर भाप-इंजन के भट्ठी में जल रहे कोयले को उलटता-पलटता था..इसी प्रक्रिया में इंजन से जलते कोयले पटरियों के बीच गिर पड़ते थे या ड्राईवर अतिरिक्त जलते कोयले को गिरा देते रहे होंगे..
             ...ट्रेन जाने के बाद पटरियों के बीच से कोयला बीनते बच्चों के बीच हम एक विशेष बात देखते थे..। उन बच्चों के साथ कोयला बीनने में वह कमली भी शामिल रहती थी जो कोयला बीन कर उन बच्चों को ही दे दिया करती थी और वह एक पागल सी औरत थी...मैले कुचैले फटे-चिथड़े धोती पहने हुए अकसर प्लेटफार्म के किसी न किसी छोर पर स्कूल जाते समय हमें दिखाई दे जाती थी, हाँ..जब वह कोयला बीन रही होती तो कोयला बीनते बच्चों में से कोई बच्चा जब उसे चिढ़ाता तो इमली के तने के सहारे बैठा मोहन भड़क उठता और कंकड़ उठाकर कुछ बड़बड़ाते हुए कोयला बीनते बच्चों पर फेंकने लगता...! जब इस क्रिया को देखते तो हम भी कभी-कभी कमली को चिढ़ाने की कोशिश मोहन की प्रतिक्रिया जानने के खेल में करते, तब मोहन हमसे नाराज हो जाता और या तो वह हमें दौड़ा लेता या फिर हमारे कहे वाक्यों का अंग्रेजी में अनुवाद करने की जगह मौन ही रहता..फिर तो हमें उसे मनाना पड़ता..। हम बच्चे कमली को मोहन की ‘मेहरारू’ कहते थे...लेकिन कभी भी हमने मोहन को कमली से बात करते हुए नहीं देखा था...!
              यह सिलसिला कुछ वर्षों तक चलता रहा...धीरे-धीरे कर भाप के इंजन की जगह सभी गाड़ियों में डीजल इंजन लग गए थे...एक दिन स्कूल जाते समय हमने देखा कि मोहन इसी इमली के पेड़ के नीचे बैठा था, उसने अपने पास काफी मात्रा में ईंट के टुकड़े और कंकड़ जमा कर रखे थे और इन्हें उठा-उठा कर देखता भी जा रहा था..! हमें कुछ अजीब सा लगा था, मैं उसके पास जाना ही चाहता था कि किसी ने कहा वह ढेले फेंक कर मार देगा...फिर मैं दूर से ही जोर से बोला था.. “मोहन...मैं स्कूल जा रहा हूँ..” मोहन ने बस मेरी ओर देखा लेकिन उसने कोई उत्तर नहीं दिया तब हम कुछ समझ नहीं पाए थे और स्कूल की ओर चल पड़े थे...! इसके बाद हमने ध्यान दिया कि मोहन जब भी किसी अनजाने से व्यक्ति को देखता तो उसे दौड़ा लेता....और अकसर रोता रहता...! पता चला कि कमली कई दिन से गायब है...उसके साथ कोई अनहोनी घट गई थी..., कुछ समय बाद किसी ने हमें बताया था कि कमली की मृत्यु भी हो गई है..! ...अब मोहन हमारी बातों का कोई उत्तर नहीं देता था....! इस घटना के तीन या चार वर्षों बाद मोहन भी इस दुनियाँ में नहीं रहा था, ...तब-तक हम कालेज भी छोड़ चुके थे....न जाने क्यों उस इमली के पेड़ को देखते-देखते स्मृतियों के मानस-पटल पर क्षण भर में ये सारी बातें सजीव हो उठी थी।
           *                                 *                                   *
          मैंने निगाह प्लेटफार्म पर दौड़ाई तथा दोनों प्लेटफार्मों को जोड़ने वाले ओवरब्रिज की ओर देखा, ‘यह तो अभी हाल ही के वर्षों में बना है’ यह सोचते हुए मेरा इस बात पर ध्यान गया कि दो भिन्न किनारों को मिलाने वाला कोई पुल तो होना ही चाहिए जिससे सुरक्षित होते हुए बिना किसी बाधा के लोग अपने-अपने गन्तव्यों के अनुसार किनारों को चुन सकें...ऐसे किनारों को जोड़ने वाले पुलों की आवश्यकता भी है क्योंकि अब यात्री और ट्रेन दोनों की भीड़ कुछ ज्यादा ही हो गई है या अनजाने में लोग किसी टकराहट से भी बच जाएँ..। ‘पहले दोनों प्लेटफार्म के सिरों पर रेलवे लाइन को क्रास करने के लिए मुश्किल से तीन या चार फीट की चौड़ाई में क्रासिंग-पथ बनाया गया था, इसी का प्रयोग लोग कभी-कभी प्लेटफार्म बदलने के लिए करते थे...इसके साथ ही ग्रामीण भी इसी रास्ते से रेलवे-लाइन को क्रास करते..हम भी प्रतिदिन स्कूल जाते समय इसी रास्ते का प्रयोग करते..
              ...ऐसे ही एक दिन मैं इस रास्ते से लाइन को क्रास कर रहा था..शायद तब मैं आठवीं में था...अकस्मात् मुझे सामने से एक लड़की आते हुए दिखाई पड़ी, वह उम्र में मुझसे थोड़ी बड़ी ही रही होगी, मैं उसे रास्ता देने के लिए इस क्रासिंग-पथ से बायीं तरफ उतर गया ठीक उसी समय वह लड़की भी मेरी ही ओर क्रासिंग पथ से नीचे उतर गयी...यह देख फिर से मैं उस क्रासिंग-पथ पर आ गया इसी समय वह भी ऊपर आ गयी..अब मैं उसे रास्ता देने के लिए दायीं ओर हुआ तो वह फिर मेरे सामने आ गयी..इस समय हम दोनों एक दूसरे के आमने-सामने खड़े थे..। अचानक मुझे अपनी गाल पर एक जोरदार तमाचे का एहसास हुआ...मैं अपना गाल सहलाने लगा था...पीछे मुड़कर देखा वह लड़की चली जा रही थी...हमें तब बहुत गुस्सा आया था...सोचा अभी दौड़कर उसके पास जाऊं और उसे झिंझोड़ कर कहूँ तुम्हें ग़लतफ़हमी हुई है..लेकिन मेरे साथी आते हुए मुझे दिखाई दिए थे...मुझे लगा वे मुझपर हँस रहे हैं...मैं भी शर्मा सा गया था और गाल सहलाते स्कूल की ओर बढ़ चला..’ इस स्मृति के साथ ही मेरा हाथ मेरे गाल पर चला गया जैसे अभी-अभी चाँटा पड़ा हो..,मेरा ध्यान भंग हुआ...मन ही मन मुस्कुराने लगा..अब-तक प्लेटफार्म यात्रियों से खाली हो गया था।
                          *                                                     *                                                    * 
                    मैं प्लेटफार्म के पूर्व दिशा में स्थित अपने गाँव की ओर मुड़ा और धीरे-धीरे अपने कदम घर की तरफ बढ़ाने लगा... “अरे..यह क्या..! प्लेटफार्म को इतना लम्बा किया जा रहा है..” घर की तरफ आगे कदम बढ़ाते हुए प्लेटफार्म की लगभग बढ़ाई गई लम्बाई को देखकर मैंने यही सोचा..। पहले इमली के पेड़ के पास ही प्लेटफार्म की सीमा समाप्त होती थी तथा हिंदी और उर्दू में ‘बादशाहपुर’ का बोर्ड लगा होता था...तब इस नाम को उर्दू में लिखने का अभ्यास मैं इसी बोर्ड को देखकर किया करता था...लेकिन सीख नहीं पाया भूल भी जाता था...! अब यही बोर्ड पूर्वी छोर पर स्थित केबिन के पास लग गया है अर्थात प्लेटफार्म की लम्बाई वहां तक बढ़ा दी गयी है, केबिन का अस्तित्व तो कब का समाप्त हो चुका था..। हाँ..उस नवनिर्मित प्लेटफार्म पर चलते हुए मेरा ध्यान रेल की पटरियों की ओर चला गया, तब स्कूल से आते समय जैसे ही हम प्लेटफार्म से नीचे उतरते हम बच्चों में आपस में इस पटरी के ऊपर बैलेंस बनाकर चलने की प्रतियोगिता शुरू हो जाती और जिसका पैर पटरी से नीचे पहले पड़ता उसकी हार मान ली जाती.. इन्ही स्मृतियों के सहारे मैं अब उस स्थान पर पहुँच गया था जहाँ रेलवे लाइन को छोड़ अपने गाँव की ओर जाने वाली पगडण्डी को पकड़ना था...उस पगडण्डी को पहचानने की कोशिश की लेकिन वह पगडण्डी अब मिट चुकी थी...! 
                   ...किसी तरह पुरानी यादों के सहारे मैं रास्ता तलाश कर कुछ आगे बढ़ा तो मुझे सी.सी. रोड दिखाई दिया... ‘यहाँ तो अब सी.सी. रोड बन गयी है..’ इसे देख मैं अपने गाँव की दिशा की ओर इसी मार्ग पर चलने लगा| इस मार्ग के किनारे एक-दो पक्के घर भी बने हुए थे...! हाँ..पहले यहाँ ऊसरीली रेह से भरी पगडंडी हुआ करती थी, कभी-कभी मैंने धोबियों को इस पर से कपड़े धोने के लिए रेह इकठ्ठा करते हुए देखा था.. । खैर आगे करीब दो-सौ मीटर जाने के बाद इस रास्ते का अंत हो गया था, इसके किनारे पर पहुँच कर मैं खड़ा हो गया, अब आगे जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था क्योंकि पुरानी उस पगडण्डी का कोई चिह्न भी अवशेष नहीं था, वहाँ खेत बनाए जा चुके थे और उन खेत की मेड़ों को देखकर ऐसा लगा जैसे अब कोई इस रास्ते से नहीं आता...! ‘मुझे कोई बाहरी न समझ ले और एक अजनबी सा कहीं मैं टोका-टाकी का शिकार न हो जाऊं..’ मेड़ों के बीच रास्ता खोजते एक क्षण तो मैंने यही सोच लिया था..
                          मैंने अपने बाएँ देखा.. ‘अरे मंडी की चहारदीवारी यहाँ तक पहुँच गई है..’ हाँ उस चहारदीवारी के उस पार मंडी के कई भवन और शेड बन चुके थे, बचपन में इस रास्ते से स्कूल जाते समय यह मंडी नहीं बनी थी लेकिन अपना यह क़स्बा छोड़ने के कुछ वर्षों बाद ही इस ‘मंडी-समिति’ का निर्माण कराया गया था.. अब तो यहाँ काफी चहल-पहल रहती है, पहले इस क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा न होने से लोग अधिकांशतया अरहर की ही खेती करते थे और वे अरहर के खेत बहुत हरे-भरे दिखाई देते..| ‘लेकिन जब खेत ही नहीं बचेंगे तो फिर मंडी का क्या काम..’ सोचते हुए मैंने देखा कि बाजार से आनेवाली सड़क जो मंडी और मेरे गाँव से होकर आगे जाती है उसके किनारे-किनारे अब लोगों ने मकान और दूकान बना लिए हैं, जो मेरे घर तक फैलते चले गए है..! फिर भी मैं आज खेतों के बीच से गाँव जाने का अपने स्कूली दिनों का वही पुराना रास्ता तलाशने लगा, लेकिन..! अब वह रास्ता कहाँ मिलता..., शायद वह कब का मिटा दिया गया है क्योंकि स्टेशन से गाँव के बीच लोगों की आवाजाही अब सड़क से ही होने लगा है...पता नहीं क्यों मुझे इन पगडंडियों के मिटने का दुःख भी हुआ..! ‘बचपन में इन पगडंडियों से न जाने क्यों मुझे प्रेम था...घासों के बीच में पतली सी पगडंडियाँ मुझे सदैव आकर्षित किया करती थी...इन पर मैं खूब दौड़ लगाया करता था...!’ अपने इन्हीं विचारों में खोया-खोया सा मैं खेतों के टेढ़े-मेढ़े मेड़ों को ही रास्ते के रूप में प्रयोग करना आरम्भ कर दिया.
                                मेड़ों के बीच आड़े-तिरछे चलने की आदत कब की छूट चुकी है, किसी तरह सँभलता हुआ मैंने अपने दायीं ओर देखा, हाँ..वहाँ से थोड़ी दूर ‘ठाकुर की चक्की’ अब नहीं है..! तब वहाँ एक पम्पसेट भी हुआ करता था, उसके चारों तरफ गर्मी के दिनों में भी गजब की हरियाली रहा करती थी...! पपीता, शहतूत, आम, अमरुद, नीम आदि तरह-तरह के पेड़ों से घिरा हुआ पंचवटी जैसा वह स्थान हुआ करता..। कई बार हम वहाँ ‘आटा पिसाने’ या शहतूत खाने गए हैं, शहतूत जैसे पेड़ों से प्रथम परिचय मैंने वहीँ प्राप्त किया और डीजल इंजन की ‘पुक-पुक’ की मधुर आवाज दूर से कानों को बड़ी सुहावनी लगती थी...! हालांकि वहाँ की एक दुखद स्मृति भी उभर आई, उस परिवार का एक होनहार युवा, चक्की के मशीन के पट्टों में फँस कर अपनी जान गँवा बैठा था..! लेकिन आज वहाँ इन सब का कोई निशान अवशेष दिखाई नहीं दे रहा है, मैंने उस स्थान को पहचानने की कोशिश की ‘अरे वह छोटा सा मंदिर तो ठीक चक्की के बगल वाला ही हैं’ हाँ..इसी मंदिर से मैंने उस चक्की वाले स्थान को दूर से पहचाना, अब वही अकेला मंदिर बचा है...!
                          चलते हुए ही मैंने उन आम के पेड़ों को तलाशना शुरू किया जो हमारे स्कूल आने-जाने के रास्ते के ही बीच में पड़ता, ‘लेकिन अब यहाँ दो पेड़ ही बचे हैं वे भी जैसे लकड़ा गए हों; अब इनमें फल भी क्या लगते होंगे’ मन में यही विचार उठे उन दो आमों के पेड़ों को देखकर...! असल में स्कूली दिनों में वहां कई पेड़ हुआ करते थे उनमें से एक पेड़ का आम अपने कच्चेपन में भी बहुत मीठा हुआ करता...अकसर ‘टिकोरा’ लगने पर स्कूल आते-जाते हम, लोगों की आँखों से बच-बचा कर उन्हें तोड़ने का प्रयास करते थे, एक बार तो गर्मियों की छुट्टियों में अपने खानदानी चचेरे भाई के साथ भरी दोपहरी में झोले लेकर चोरी से उन कच्चे ही मीठे आमों को तोड़ने आया था..! हाँ, तब मैं कई दिनों तक इस बात से डरता रहा था कहीं मेरे बाबू यानी दादा जी को पता न चल जाए...! हालांकि दादा जी के डर के कारण ही मैं उन तोड़े गए आमों को घर नहीं ले जा सका था...इन यादों के ताजा होने पर मेरे होठों पर पुनः मुस्कान तैर गयी..
                      इन्हीं यादों में खोया हुआ मैं अपने घर की ओर आगे बढ़ चला... ‘अरे यह क्या यहाँ जो मैदान जैसा स्थान था...वह क्या हुआ...और तो और...इसी स्थान पर बहुत पहले ईंट का भट्ठा हुआ करता था... ‘एक बार जब यह भट्ठा चल रहा था, मैं बहुत छोटा था, तो ऊपर पकती ईंटों पर चढ़ गया तब मेरा पाँव जलने लगा था...’ इस स्मृति के साथ उस भट्ठे का अवशेष खोजने लगा...जिसका अब कोई नामोनिशान नहीं बचा है..! इन स्थानों की मिट्टियाँ खोद कर उन स्थलों को गड्ढे में बदल दिया गया है, शायद मिट्टी-माफिया ने यहाँ से मिटटी खोद कर बेच डाली है..| पास में थोड़ी दूर पर प्लाटिंग का भी कार्य चल रहा है..? तो क्या अब बड़े शहरों का रोग यहाँ भी लगने वाला है’ चलते-चलते अपने अगल-बगल के स्थानों को देख कर मैं यही सोचने लगा और आगे बढ़ चला....,
                 ‘यहाँ की झाड़ियाँ कहाँ चली गई...वे बेचारे खरगोश अब कहाँ छिपते होंगे..’ मैंने चलते ही उन झाड़ियों को खोजने का प्रयास किया जिसमें से स्कूल आते-जाते समय कई बार खरगोश को उनमें से निकल कर भागते हुए देखा था..., कई बार तो ऐसा भी हुआ कि जैसे ही झाड़ियों से निकल कर खरगोश भागता हम भी अपना बस्ता वहीँ पास में ही किसी पेड़ की डाली पर लटका उस खरगोश को पकड़ने उसके पीछे भाग लेते, लेकिन कुलाँचे भरता खरगोश इधर-उधर भागता हुआ आँखों से ओझल हो जाता, फिर हम लौट बस्ते ले घर की ओर चल पड़ते..। ब तो उनमें से वहां उन झाड़ियों के ही साथ कोई पेड़ भी नहीं बचा है, हाँ..वहाँ उस निर्जन स्थान पर के नीम या महुआ के पेड़ों की एक विशेष बात देखी थी..! उन पेड़ों पर अकसर कौओं के ही घोसले हुआ करते थे, लेकिन खरगोश, झाड़ियाँ और पेड़ अब इन पगडंडियों के साथ ही ओझल हो चुके हैं..!
                     अब यहाँ से मेरे खेत दिखाई देने लगे थे, दूर से ही मैंने देखा, पकी गेहूँ की फसलें वहाँ खड़ी थी, मेरे खेतों के उस पार बगीचे पर मेरी निगाह पड़ी.. ‘पहले आम और महुआ के कितने बड़े-बड़े पेड़ थे...! अब तो आम के पेड़ों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है और ले दे के दो ही महुआ के पेड़ दिखाई दे रहे हैं और इनकी भी इतनी दूर से डालियाँ भी गिनी जा सकती हैं...! मतलब वे कभी हरियाली से झूमने वाले पेड़, अब मात्र पेड़ होने के अवशेष में बदल चुके हैं..!’ सोचते हुए मैंने देखा कि दूर से ही पूरे बाग़ में विलायती बबूल के हरे-भरे पेड़ ही अब दिखाई दे रहे हैं.., ‘तो क्या अब बच्चे यहाँ नहीं घूमते होंगे..’ बात यह है कि बचपन में हम बच्चे अकसर गर्मियों में इन्हीं आमों या महुआ के पेड़ों के नीचे भरी दोपहरी में खेलते रहते थे..| इन्हीं सब में खोया-खोया मैं अपने खेतों के बीच आ गया था, देखा, गेहूँ की पकी बालियाँ हाल ही की बेमौसम की बरसात के कारण कुछ-कुछ काली सी दिखाई दे रही थी तो कुछ गेहूं की फसल गिरी पड़ी थी, ‘प्रकृति ने भी अब अपने रंग-ढंग बदल लिए हैं, इस मौसम में बारिश..!’ मन में यही विचार कौंधा
             अपनी स्मृतियों को टटोलते-टटोलते अब मैं वहाँ पहुँच चुका था जहाँ से मेरे खेत की सीमा समाप्त हो कर बाग़ की सीमा शुरू होती है... “बचपन में यहाँ से सीधे घर तक पगडंडी लगी होती थी..और तो और...कई दिशाओं की ओर तमाम पगडंडी भी फूटती थी यहाँ से..! लेकिन अब उनमें से किसी एक का भी अस्तित्व शेष नहीं, हाँ...मन को एक अजीब से उल्लास में भर देने वाली वे पगडंडियां अब नहीं हैं, इन्हीं पगडंडियों पर बचपन के कोमल नंगे पैरों से पतझड़ में गिरे सूखे पत्तों को रौंदते हुए इसकी आवाजों में मगन, पैरों में गड़े देशी बबूल के काँटों को निकालते हुए ‘बित्ती रैया बनगो रैया..रैया..रैया..’ कहते हुए दौड़ लगाया करते थे..!” इन यादों के साथ ही मैंने देखा कि बाग़ भर में वही विलायती बबूल के पेड़ बिखरे पड़े हैं और उनके काँटे भी इस जमीन पर भरे पड़े हैं, इनके बीच से जाना भी मुश्किल है...! ‘अब सड़क से ही मुड़ कर घर तक पहुँचना होगा..’ फिर मैं पास से ही गुजरती सड़क पर हो लिया..
                      *                                                               *                                                           *
                      घर पहुँचा तो देखा, माँ और पिता मेरा इंतजार कर रहे थे..., उनके चेहरों पर वृद्धावस्था का प्रकोप कुछ ज्यादा ही बढ़ता दिखाई दे रहा था...| मुझे देखते ही माँ बोली, ‘अरे..स्टेशन से आने में इतनी देर लग गई...’ मैंने कहा, ‘बस कुछ घूमते हुए से आ रहा था...’ अब माँ ने फिर कहा, ‘बहुत अच्छा किए इस बार अपनी गाड़ी से नहीं आए..., हम लोगों का जी डरा रहता है...’ फिर माँ मेरे लिए पानी लाने चली गयीं...
                        दोपहर का हम खाना खा चुके थे, पिता से इधर-उधर की चर्चा चल रही थी..। न्होंने कहा, ‘अब सबेरे भी एक गाड़ी जाने लगी है, उससे जाने की सुविधा हो गयी है..’ यह कहते हुए जैसे मुझे सबेरे तक रुकने की बात वह कहना चाह रहे हों, मैं कुछ नहीं बोला था...! फिर कुछ देर बाद पिता जी किसी काम से कहीं चले गए थे, मुझ पर भी थकान अपना असर दिखाने लगा और मुझे झपकी सी आ गई। कुछ देर बाद आँखें खुली तो देखा माँ पास में ही बैठी थी, वह बच्चों का हाल-चाल पूंछने लगी थी, मैं भी ‘हाँ..हूँ..’ में ही जबाव देता रहा...मुझे शाम को फिर वापस जाना था...एक अजीब सी उदासी मन में घेरे हुए थी...मन को निर्दय बनाना था...इसीलिए तो माँ से बातों में नहीं उलझना चाहता था...बार-बार मन पिता जी के वापस आने का इंतज़ार करने लगा था..क्योंकि धीरे-धीरे ट्रेन का समय हो रहा था...पिता जी कहीं मोटर साइकिल से गए थे| वह वापस आ रहे थे, उन्हें मोटर साइकिल चलाते देख मैंने सोचा, ‘अब इस उम्र में इनसे मोटरसाइकिल सँभलना मुश्किल हो रहा होगा..’ अब तक वे मोटर साइकिल खड़ी कर चुके थे, उन्होंने मुझे कपड़े पहने कहीं जाने के लिए तैयार जैसा देखा, उनकी निगाहें जैसे कुछ पूँछना चाह रही थी...मैं ही बोल पड़ा, “वो क्या है कल ही एक बहुत जरुरी काम है इसीलिए आज ही शाम वाली गाड़ी से जाना पड़ रहा है..’ इसे सुन वह कुछ नहीं बोले, मुझे देखते रहे, जैसे कहना चाह रहे हों सबेरे की गाड़ी से जाते तो क्या ठीक न होता...लेकिन वे कुछ नहीं बोले...तब-तक माँ की आवाज हमें सुनाई दी.., ‘घर में इस समय कोई लड़का नहीं हैं..बाबा..को आप ही स्टेशन छोड़ देते...’ पिता ने हामी भर दी..।
                         ...पिता मुझे स्टेशन छोड़ने के लिए मोटरसाइकिल की किक मार रहे थे कई बार की किक के बाद यह स्टार्ट हुई...‘सत्तर के ऊपर के हो चुके हैं पापा, इनसे यह मोटरसाईकिल सँभलने में अब कठिनाई हो रही है’ हाँ यही सोचते हुए मेरे मन में एक क्षण के लिए विचार आया कि मोटरसाइकिल हम उनसे ले और चलाते हुए स्टेशन तक उन्हें पीछे बैठा कर ले चलें और वहां से ये फिर वापस आ जाएँगे...लेकिन...यह मन न जाने क्यों वर्षों पुराने निहायत बचपन के दिनों में चला गया, तब स्कूटर हुआ करती थी और ऐसे ही पिता के पीछे बैठा मैं चला करता था, न जाने क्यों आज उसी बचपन को एक बार फिर जीने का मन कर गया...एक छोटे बच्चे सा पिता के साए में निश्चिन्त हो जाने का एहसास लिए मैं क्षण भर के लिए इस कठोर वर्तमान को विस्मृत कर गया और उनके पीछे मोटरसाइकिल पर उझक कर बैठ गया था...!
                       हाँ वह मोटरसाइकिल चलाते हुए ही बोले थे, ‘अब यह बहुत भारी लगने लगी है, मुझसे संभलती नहीं...’ मैं भी बोल उठा, ‘हाँ यह तो सही है..’ फिर पिता बोले, ‘अरे एक दिन तो यह गिर पड़ी थी..संयोग था..बच गए नहीं तो पैरों पर चोट लग जाती....’ इसी तरह बात करते-करते स्टेशन आ गया था, उन्होंने मोटरसाइकिल रोकी शायद किसी ने उन्हें नमस्कार किया था..हाँ वह पाकड़ के नीचेवाला चायवाला ही था...मैं मोटरसाइकिल से उतर कर उन्हें देखा...फिर मैंने प्लेटफार्म की ओर देखा, मैंने कहा, ‘लगता है अभी गाड़ी आने में देर है...घर चले जाइए नहीं तो अँधेरा गहरा जाएगा...” यह सुन उन्होंने मेरी ओर देखा जैसे कहना चाह रहे हों कि अँधेरा तो गहरा ही गया है..., इस समय मैं उनसे आँखें नहीं मिलाना चाहता था और प्लेटफार्म की ओर ही देखे जा रहा था...! अब वह मोटरसाइकिल पर बैठ उसे स्टार्ट कर चुके थे मैं भी प्लेटफार्म की सीढ़ियों की ओर बढ़ चला, अचानक मैंने अपना चेहरा पिता को देखने के लिए उनकी ओर घुमाया, देखा..! वह धीरे-धीरे चले जा रहे थे...मैं वहीँ स्थिर हो गया जैसे उन्हें भर-पूर आँखों से देख लेना चाहता था...मैं...ऐसे ही जब तक वे ओझल नहीं हो गए तब तक उन्हें देखता रहा....असहाय सा जैसे समय को क्षण-क्षण मुट्ठी से फिसलते हुए देख रहा था...अब वास्तव में अँधेरा काफी गहरा गया था...!
                             -----------------------------------विनय