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शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

लिखने योग्य अच्छा काम...!!


         सुबह का वक्त था..., ट्रेन प्लेटफार्म से धीरे-धीरे खिसक रही थी...दौड़ कर किसी तरह चढ़ पाया..., बैठने के लिए सीट तलाश करने लगा...नीचे की एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी...वहां बैठना चाहा...पास में ही बैठा एक व्यक्ति बोला,
                   “नहीं-नहीं, यहाँ मत बैठो मेरी बर्थ है...|”
मैंने वहां बैठने का निर्णय बदल लिया...ट्रेन के गलियारे में, आते-जाते लोगों के धक्के खाते खड़ा रहा...तभी दूसरे बर्थ पर बैठे एक व्यक्ति को उसी बर्थ पर आराम से बैठा एक आदमी यह कहते हुए उठा रहा था,
        “अरे यहाँ से उठो, यह हमारी रिजर्व बर्थ है...”
लेकिन दूसरा उठने से रहा... बोला,
        “मैं अब बैठ गया हूँ नहीं उठूँगा..मैं रोज चलता हूँ|”
उठाने वाला भी थक-हार कर चुप हो गया...| ट्रेन अपनी पूरी गति पकड़ चुकी थी...इधर मैं भी गलियारे में खड़े-खड़े लोगों के धक्के खाते ऊब गया था...अब ऊपर के खाली बर्थ पर बैठना चाहा...जैसे ही मैंने ऊपर बैठने का प्रयास किया नीचे आराम से बैठे व्यक्ति ने टोक दिया,
       “अरे भाई इतना परेशान होकर तो हम लोग रिजर्वेशन करा पाते हैं, आप लोग इस बात को समझते नहीं...पिछली बार तो वेटिंग ही कन्फर्म नहीं हो पाई तो हम लोग गैलरी में ही लेट और बैठ कर गए थे...|”
उसने फिर कहा,
                “वहां न बैठो, मैं लेटने जा रहा हूँ...|”
मैंने उसकी बात सुनी, उससे बहस नहीं करना चाहता था फिर भी झुंझलाकर बोल उठा,
                  “समझता हूँ...|
खैर बैठने के इस प्रयास को भी मैंने छोड़ दिया और सोचने लगा...
        ...ये रेल वाले भी अजीब व्यवस्था बनाते हैं...बैठने तक की कोई ठीक व्यवस्था देते नहीं...हाँ, लेटने की पहले कर देते हैं...कहने को जनरल बोगी लगी है...लेकिन वहां भी तिल रखने की जगह नहीं होगी...शौचालय में लोग घुस कर बैठे होंगे...जनसँख्या या व्यवस्था, पता नहीं कौन जिम्मेदार है...सोचते-सोचते सीट की तलाश में दूसरे कूपे में आ गया...अचानक एक बर्थ पर खाली जगह दिखाई दी, उल्लसित हो वहां मैं बैठ गया...यहाँ भी पास ही बैठे एक व्यक्ति के सज्जनतापूर्ण प्रतिरोध का सामना करना पड़ा...फिर भी मैं ही सफल हुआ| गाड़ी कहीं रुकी थी...चल पड़ी...एक टीटी आता हुआ दिखाई दिया, मैं थोडा नर्वश सा हुआ क्योंकि टिकट तो जनरल क्लास का लिए था और बैठा स्लीपर बोगी में..., टीटीई पास बैठे व्यक्ति से उलझ गया शायद वह भी मेरे ही जैसा इस बोगी के लिए अनधिकृत था, दोनों में थोड़ी बहस होने लगी, मैं उनके बीच के वार्तालाप को ध्यान से सुनने लगा, टीटीई कह रहा था,
         “टिकट दिखाओ..|
उसके टिकट दिखाने पर टीटीई ने कहा,
         “इस बोगी में क्यों बैठ गए...यह टिकट तो जनरल क्लास का है...|” 
         “क्या करते जनरल डिब्बे में बहुत भीड़ है खड़े होने तक की जगह नहीं है” यात्री ने कहा|
         “लेकिन पेनाल्टी देनी पड़ेगीया अभी यहाँ से हटो...”
टीटीई ने थोडा हडकाते हुए से कहा| ट्रेन भागी जा रही थी..उतरना संभव नहीं था, यात्री ने पूंछा,
         “कितनी पेनाल्टी...”
इस पर टीटीई ने कोई धनराशि बताई, लेकिन यात्री उसे देने में अपनी असमर्थता जताते हुए कहा,
         “मेरे पास इतना पैसा नहीं है…|”  
इसके बाद टीटी उस व्यक्ति को थोडा अलग ले गया, वहां से वापस आकर वह यात्री मुस्कराते हुए पुन: अपनी सीट पर बैठ गया...| मुझे अपने एक मित्र की रेल यात्रा के बारे में कही एक बात याद आ गई...उन्होंने बताया था,
         “जेब में पैसा हो तो टिकट लिए हैं या नहीं या फिर किस बोगी में बैठे है इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, आपकी यात्रा सकुशल सम्पन्न हो जाएगी|”
अब मेरी बारी थी...लेकिन यह क्या...! टीटी ने एक बार मुझे देखा और आगे बढ़ गया...शायद मुझे डेली पेसेंजर समझ कर नजरंदाज कर दिया हो...जो भी हो मैंने राहत की सांस ली| तभी बैठे-बैठे मेरी नजर सामने लगे एक छोटे से पोस्टर पर पड़ी... हाँ...,वह पोस्टर किसी सामाजिक संस्था का था...उस पर लिखा था-
         “अच्छा लिखने से बेहतर है कि लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय|
मैं इस पर चिंतन-मनन करने लगा...|
        ट्रेन पुन: अपनी पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी...अचानक मेरी दृष्टि ट्रेन के गलियारे में झाड़ू लगाती एक औरत पर पड़ी...वह कृशकाय, चीथड़ों में लिपटी थी...लगभग डेढ़ साल की बच्ची को कांख में दबाए झाड़ू लगाते हुए धीरे-धीरे मेरी ओर चली आ रही थी....उसकी बच्ची को देख...मैं सोचने लगा...इस बच्ची का पिता कौन होगा...कोई अपनी पत्नी और बच्चे को इस हालात में छोड़ सकता है..! या फिर इसकी माँ किसी वहशी दरिन्दे का शिकार हुई होगी...इस अभागी बच्ची का भविष्य क्या होगा...! तब तक उस औरत का हाथ मेरी ओर बढ़ चुका था... शायद उसने अपना काम पूरा कर लिया था...मैंने उसके हाथ पर एक सिक्का रख दिया...वह आगे बढ़ चुकी थी...मैंने पुन: उस छोटे से पोस्टर की ओर देखा, दृष्टि इस वाक्य पर रुक गई, “लिखने योग्य अच्छा काम किया जाय,” मैं फिर अपनी विचारमग्नता में खो गया...पता नहीं...लिखने योग्य अच्छा काम कौन कर रहा है...यह पोस्टर..! या झाड़ू लगाती कांख में बच्ची दबाए कृशकाय यह औरत...! या लिखने के लिए मसाला तलाश रहा मैं...! या फिर टीटीई समेत हम सब को ढोती बेचारी यह ट्रेन...! और मैं...अपने इन विचारों में मगन हो गया...लेकिन...वह औरत..! वह तो...बच्ची को कांख में दबाये लोगो के सामने हाथ फैलाती आगे बढ़ी जा रही थी...|
           इस बात की चर्चा मैंने जब अपनी पत्नी से किया तो उन्होंने कहा,
           “अरे ! वह इन पैसों से जाकर समोसा खा लेगी या फिर कोई उससे भींख मगवा रहा होगा...इन सबके पीछे माफिया लोग रहते हैं..! नहीं तो इतनी सारी व्यवस्था होते हुए भी वह यह सब क्यों झेल रही है,”
पत्नी ने आगे फिर जोड़ा,
           “समय बिताने के लिए आपके पास अच्छा काम है...बस लिखने बैठ जाओ...! अगर समाजसेवा का इतना ही शौक है तो ऐसे लोगों के लिए शेल्टर होम खोलो...या फिर उन परिस्थितियों, माफियाओं से भिड़ो जिसके कारण उसके लिए यह हालात पैदा हुआ..|”
पत्नी ने ये सारी बातें एक सांस में कह डाली...मैं अपनी हदें जानता हूँ...मैंने सोचा...बस अब चुप हो जाना ही अच्छा है और मन ही मन ही..ही..करने लगा...|
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शनिवार, 10 नवंबर 2012

भोगा हुआ


      ...कभी-कभी प्रतीत होता है कि जीवन में सिर्फ भोगा जाता है, अनुभव किया जाता है लेकिन क्या इस प्रकृया में कोई मानक तय किया जा सकता है...! क्या स्वयं को इस पर कसा जा सकता है...! और क्या किसी अन्य के लिए भी इसे मानक के रूप में स्वीकार किया जा सकता है...? प्रत्येक व्यक्ति का भोगा हुआ उसका अपना निजी होता है, इससे उसके अपने दृष्टिकोंण विकसित होते हैं...व्यक्ति अपने भोगे हुए से ही अपने लिए उत्तर खोजता है...हमारे भोगने का स्तर हमारे अनुभव की व्यापकता पर निर्भर करता है, जो मानस पटल पर तमाम प्रश्न उकेरते हैं...यह हमारे व्यवहार को प्रभावित करता है...इन्हीं बातों कि चर्चा अपनी पत्नी से कर रहा था, तभी पत्नी बोली, “इन बातों पर इतना दिमाग खपाना व्यर्थ है, हाँ मनुष्य का व्यवहार किन्हीं बातों से प्रभावित हो सकता है इस पर ज्यादा विचार करना और इस आधार पर निष्कर्ष निकालना सनकपूर्ण सोच है|” लेकिन वह जानता आया है...,और पत्नी को समझाने सा लगा...कभी-कभी सर्वजन के भोगे हुए से सर्वमान्य नियम खोजने का प्रयास किया जाता है, इससे वैचारिक संघर्ष का भी जन्म होता है...इस वैचारिक संघर्ष से उपजे निष्कर्ष से ही मनुष्य का मानसिक, नैतिक और बौद्धिक विकास हुआ है, इसका उसके सामाजिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा है...यदि ऐसा नहीं होता तो मनुष्य इतना चेतन न होता और जीवन की तमाम कलाएँ केवल सनक या पागलपन होती...और लिखना...शायद केवल सनक मात्र...!
     वैसे मनुष्य के मानस पटल पर कुछ बातें, घटनाएँ अंकित होती जाती हैं, जो उसे संवेदनशील बनाती है...शायद चिंतन की प्रकृया भी उसी से आरम्भ होती है...वैचारिक प्रश्नशंकुलता इसी संवेदनशीलता का परिणाम है...और यह प्रश्नशंकुल मनःस्थिति, उत्तर पाने की आकुलता में, तमाम सृजनात्मक कार्य कर डालता है...साहित्य, दर्शन, विज्ञान एवं अन्य कलाओं का विकास इसी का परिणाम है...
      वह अकसर ऐसे ही कुछ न कुछ सोचता रहता है..., उसे लगता है...यह आदत उसमें बेचारगी का भाव पैदा करती है...जो उसे लोगों की निगाहों में दुखी दिखाने लगता है.....लेकिन क्या वास्तव में वह दुखी है.....उसमें बेचारगी का भाव है...? ...हालाँकि वह जनता है कि ऐसा वह नहीं है... किसी का उसके लिए यह लिखना, “जो भी प्यार से मिला तुम उसी के हो लिए” शायद उसमें उस वैचारिक प्रवाह की ओर संकेत करती हो जिसमें प्रवाहित हो वह कुछ तलाशता रहता है और इस तलाश में वह सभी चीजों को स्वीकार करता जाता है...
      लेकिन फिर भी वह स्वयं को असामाजिक सा पाता है..., सामाजिकता के ताने-बानें में उसने व्यवहारवाद का ऐसा उलझाव देखा है, जहाँ वह सदैव अपने को अनफिट पाता रहा है.... जब भी वह अपने को इसमें ढालने का प्रयास करता है उसे महसूस होता है... जैसे अपने को झुठला रहा है...कुछ अस्वाभाविक सा हो रहा है...एक छद्म आवरण के खोल में घुस रहा है....उसका व्यक्तित्व खंडित हो रहा है....इस खंडितत्व का अहसास ही उसमें अपराधबोध जगाकर उसे निरीह बना देता है....जो उदासी और बेचारगी का भाव उत्पन्न कर उसे आत्मपीड़क बना देता है....इस आत्मक्षरित व्यवस्था में जीने की विवशता ही उसे कभी-कभी दुःख और उदासी के मनोभाव में ढकेल देता है...और इसकी शुरुआत कहाँ से हुई वह सोचने लगा...

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

पचड़ेबाज


                      सुबह हो गई थी...मैं अहाते में टहल रहा था, मेरी निगाह गुलमोहर के ऊँचे पेड़ पर गई...उसकी डालियाँ बहुत खूबसूरत ढंग से फैली हुई थी...उसके नीचे मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था...मानों वह गुलमोहर का पेड़, एक माँ की तरह अपने बच्चे को धूप या बारिश से बचाने के लिए अपने आँचल की छाया कर रखी हो...उसकी डालियों पर, पत्तियों के बीच, तोते के ही समान लेकिन उससे छोटे आकार के पक्षी उछल कूद कर रहे थे...पंखों का रंग तो हरा था लेकिन सिर पूरा लाल...देखने में सुंदर...! अपलक निहारता रहा...! तन्द्रा टूटी... जब एक गिलहरी बड़ी तेजी के साथ तने से होते हुए उन डालियों तक पहुँच गई जहाँ वे सुंदर पक्षी आपस में कलरव करते हुए इस डाल से उस डाल पर उछल-कूद कर रहे थे...तभी मिश्रा की आवाज कानों में पड़ी, “सर, चाय तैयार हो गई है.” मैंने कहा, “अच्छा पिया जाए.” तब तक मेहीलाल चाय का कप लेकर मेरे सामने हाजिर था. मैंने पूँछा, “ मेहीलाल, अख़बार आया...” “अभी नहीं” उसने उत्तर दिया. मैंने कहा, “ये तो बड़ा देर कर देता है अख़बारवाला, सात से ऊपर हो गया लेकिन अभी तक अख़बार नहीं दिया.” मेहीलाल बोला, “कल से दूसरेवाले को कह देते हैं जो थोड़ा जल्दी आता है.” तभी मिश्रा ने कहा, “सर अखबार आ गया.”
     चाय पीने के साथ मैं अखबार पढ़ने में मशगूल हो गया. सहसा मेरी नजर खबर के एक शीर्षक पर ठहर गई...कार दुर्घटना में तीन लोग मारे गए....आगे लिखा था...समय रहते यदि दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति को अस्पताल पहुँचाया जाता तो उसकी जान बचाई जा सकती थी...खबर मुझे अंदर तक झकझोर गई...फिर..एक दिन पहले की वह घटना याद आई, शायद उसी के सम्बंध में यह खबर थी...
     शाम का धुंधलका था...मैं अपने एक मित्र के साथ, जो स्वयं कार चला रहे थे...समय से अपने गंतव्य पर पहुँच जाएँ...हाईवे पर कार भगाए जा रहे थे...सामने से आ रहे वाहनों की हेडलाईट से आँखे चौंधिया रहीं थी...तभी एक हल्की सी ब्रेक लगाते हुए सामने दिख रहे ट्रक के बारे में मित्र ने कहा, “देखा...! इसने पीछे इंडिकेटर भी नहीं जला रखा है.., सम्बंधित अधिकारी भी न जाने कैसे ऐसे वाहन को चलने के लिए परमिट करते हैं...कोई देखता भी नहीं..” मैंने सहमति जताते हुए कहा. “हाँ...सभी अपने चक्कर में रहते हैं...कौन पचड़े में पड़े.”  हम लोग फिर चुप हो गए...कार भागी जा रही थी...अचानक..! दूर सड़क के किनारे कुछ हलचल सी दिखाई दी...पास जाने पर देखा...एक कार दुर्घटनाग्रस्त हो सड़क के किनारे पड़ी थी...तीन व्यक्ति उसमें फंसे हुए थे...इसे देख हमलोग अपनी कार रोक दिए...वहाँ तब तक चार पांच व्यक्ति और पहुँच चुके थे...हम लोग अपनी कार के शीशे नीचे करते हुए पास ही खड़े व्यक्ति से दुर्घटनाग्रस्त कार में फंसे व्यक्तियों के बारे में जानकारी चाही तो पता चला कि तीनों की मौत हो चुकी है, हम लोगों को समय से पहुंचना था...फिर तुरंत चल दिए...
     अख़बार की खबर से लगा...जब हम लोग उस अभागी कार के पास पहुंचे थे तो कोई उसमें से जीवित था, बेहोश होने से लोगों ने उसे मृत समझ लिया था. उसी को यदि समय पर चिकित्सीय मदद मिलती तो वह बच सकता था...कौन पचड़ेबाजी में पड़े...यही सोचकर तो हम लोग वहाँ से निकल लिए थे...खबर पढ़ने के बाद स्वयं को अपराधी महसूस करने लगा...फिर बचपन में हुए एक हादसे की स्मृतियों में खो गया...
       उस समय आठ-दस वर्ष के बीच मेरी उम्र रही होगी...मेरे घर के पास एक तालाब था...वह तालाब तो अब भी है लेकिन बचपन में देखे गए से भिन्न...क्योंकि न तो अब उसमे कुमुदिनी खिलती हैं और न तो उसमे कोई नहाने जाता है...उस तालाब में जलकुम्भी का साम्राज्य ऐसा फ़ैल चुका है कि पानी कहीं दिखता ही नहीं, कोई कह रहा था कि किसी ने उस तालाब में जलकुम्भी इसलिए डाल दिया कि धीरे-धीरे तालाब पट जाए और उसकी भूमि पर कब्जा कर लिया जाए...यही नहीं अब तो उसका आकार भी बदल गया है….गाँव के कुछ लोगों द्वारा भू अभिलेखों में परिवर्तन कराते हुए उसे पाटना प्रारंभ कर चुके हैं. नरेगा में उस तालाब की खुदाई की ऐसी योजना बनाई गई कि उस बड़े से तालाब के बीच में ही एक छोटा सा तालाब और खोद दिया गया...खैर...बचपन की स्मृतियों का वह तालाब उसके लिए बहुत ही आकर्षक और सुंदर दृश्यों की याद दिलाता है...कुमुदिनी के खिले सफेद फूलों से सजा वह तालाब बहुत ही सुंदर दिखाई देता था...खास कर हम बच्चों के लिए...! उसमे...नहाना...तैरना...घंटों उस तालाब के किनारे समय बिताना हमारी आदत बन चुकी थी...अकसर मैं बाबू की निगाहों से अपने को बचाता हुआ वहाँ पहुँच जाता था...हाँ बाबू यानि मेरे दादा...चूँकि मुझे उस समय तैरना नहीं आता था इसलिए वह मुझे उसमें नहाने और वहाँ जाने से भी मना करते थे...काफी मिन्नतों के बाद मुझे इतनी अनुमति बाबू की ओर से मिली थी कि मै तालाब के किनारे तक जा सकता था लेकिन उसमें नहा नहीं सकता था...यही मेरे लिए बहुत था...क्योंकि बच्चों को उस तालाब में तैरते...पानी में डुबकी लगाते हुए दूर तक निकलते जाना...आदि...इन अठखेलियों को देखकर मैं बहुत आनंदित होता था...गाँव के ढेर सारे बच्चे वहाँ इकट्ठे होते थे...
     ऐसे ही एक दिन कुछ बच्चे उस तालाब में नहाने जा रहे थे, उन लोगों ने मुझे भी साथ चलने को कहा...लेकिन बाबू ने मना कर दिया...सारे बच्चे चले गए...मैं मनमसोसकर गुमसुम हो बैठ गया...कुछ देर यूँ ही बीतने पर अचानक बाबू की निगाह मुझ पर पड़ी...उन्होंने पूँछा, “कहो का बात अहई...” मैंने कहा, “कुछ नाहीं बाबू.” बाबू ने फिर पूँछा, “त...काहे मुह फुलाए बइठा अहा...|” उन्होंने कुछ समझते हुए फिर कहा, “जा तालाब पर...लेकिन हिलअ मत...जल्दी आयअ...|” बाबू कि तरफ से इतना अनुमति मिलते ही मैं दौड़ कर तालाब के किनारे पहुँच गया. वहाँ गाँव घर के बहुत सारे बच्चे जमा थे...कोई नहा रहा था...कोई तैर रहा था...कुछ बच्चे तालाब के किनारे के पेड़ों पर चढ़ उसकी डालियों से तालाब में कूद रहे थे, तो कोई एक तालाब में ही एक टापू जैसे स्थान पर पहुँच वहां कुमुदनियों की माला बना उसे गले में पहन और उसकी फलियों को दूसरे बच्चों की ओर उछल रहा था...यह सब देखकर मुझे बड़ा मजा आ रहा था...जब तब ख़ुशी के मारे मैं ताली भी बजा देता था...मै इधर अपने में ही मस्त था कि तभी मेरे ही हमउम्र एक लड़के की आवाज कानों में पड़ी, जो तालाब में उछल-कूद कर रहा था,विने...उंहा का बइठा हया...” तब तक दूसरा बोल उठा, “अरे अपने बाबू से पहिले पूंछि लेहीं...तब..” इतना कहते ही दोनों हँसने लगे| पहला बच्चा फिर बोला, “आवा आर...तोहरे बाबू के न बतावा जाए..” मुझे प्रतीत हुआ जैसे वे मेरा मजाक उड़ा रहे हों. इधर मेरे मन में भी तालाब में सब के साथ नहाने और खेलने की तीव्र इच्छा जाग चुकी थी, अचानक बेपरवाह सा तालाब में मैं कूद पड़ा...
            तालाब के पानी में, मैं किनारे पर ही उछल-कूद रहा था, क्योंकि मुझे तैरना नहीं आता था...तभी एक लड़का मेरे पास आया और तालाब में टापू वाले स्थान की ओर इशारा करते हुए वहाँ चलने के लिए कहा. चूँकि मुझे तैरना नहीं आता था...मैंने मना कर दिया...मैंने देखा वह तालाब के बीच उस छोटे से टीले पर तब तक पहुँच चुका था...वहाँ से मुझे वह फिर बुलाने लगा...मेरा भी मन अब वहाँ जाने के लिए तैयार हो चुका था...और मेरे बालमन ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि मेरी लम्बाई उस लड़के से कम थी और वह थोड़ा बहुत तैर भी लेता था...मैंने धीरे-धीरे अपना पांव उस ओर बढ़ाने लगा...तालाब का पानी अब मेरे गर्दन के ऊपर तक पहुँच चुका था...और वह लड़का लगातार मेरा उत्साह बढ़ाते हुए मुझे पानी के बीच उस टीले तक आने के लिए प्रेरित करता जा रहा था...अरे...! यह क्या...अचानक मेरा पैर फिसल सा गया और मैं किसी गहरे गढ्ढे की  ओर जाने लगा...वहाँ से निकलना भी मेरे लिए कठिन हो गया...मैं अब डूबने लगा था...अचानक मेरा सिर पानी से बाहर आया लेकिन अगले ही पल फिर पूरी तरह मेरे सिर के ऊपर पानी हो गया...शायद मैं अब पानी में डूब रहा था...मुझे आज भी याद है जब मैंने उस एक क्षण में सोचा था... “काश..! कोई मुझे बचा ले...” जब मैंने अपनी आँखे खोली तो देखा यह छोटकऊ चाचा थे जो अपने दोनों बाँहों में मुझे उठाए हुए धीरे-धीरे सूखी जमीन पर पेट के बल लिटा रहे थे तथा मेरे पेट से पानी निकालने का प्रयास कर रहे थे...हाँ, यह छोटकऊ चाचा ही थे...उन्होंने मुझे डूबने से बचा लिया था..! वह भी अपनी परवाह न करते हुए, क्योंकि किसी डूबते हुए को बचाने में स्वयं डूबने का खतरा होता है...इस घटना के बारे में बाबू को उस समय तो कुछ पता नहीं चला, लेकिन एक दिन जब एक बड़ी सी बाल्टी को उल्टा कर मैं उस तालाब में तैरने का अभ्यास कर रहा था तो उन्होंने मेरी काफी पिटाई की थी..., हाँ...छोटकऊ चाचा... वह मुझसे चार या पांच साल बड़े थे...बचपन में हम लोग उन्हें कुछ-कुछ जिद्दी जैसा मानते थे और जब किसी बात को मनवाने में उनकी तर्कशक्ति जबाव दे देती तो लड़-भिड़ कर अपनी बात मनवाने की उनमें आदत थी...वह किसी पचड़े में भी पड़ने से नहीं डरते थे...इतना सब होते हुए भी उनमें भावुकता भी थी...
      मुझे याद है उक्त घटना के कई साल बाद...तब वह इलाहबाद में रहकर पढाई कर रहे थे...एक दिन सुबह ही मैंने देखा...छोटकऊ चाचा घर के बड़े लोगों का बारी बारी से पैर छू रहे थे...कहते जा रहे थे...ऊपर वाले ने मुझे बचा लिया...फिर अपने साथ हुई घटना के बारे में बताना शुरू किया, “हम रोज सुबह गंगा नहाई जाथ रहे...काल्हि जब हम गंगाजी में नहात रहे, अऊर गंगाजी के किनारे रहई वाले कुछ लरिकऊ नहात रहे...ओन्हन धारा के बीच में तैरि के दुसरे तरफ जाई के नहात रहइ...हमरेऊ मन भा कि हमहूँ ऊहीं जाई के नहाई..|” उनकी बात हम सब बड़े ध्यान से सुन रहे थे, उन्होंने आगे कहना शुरू किया, “हाँ त हमहूँ सोचे तैर के गंगा के बीच धारा वाले उथले रेता पर जाई...अऊर जब हम कुछ दूर नदी क धारा में पहुँचे त हम खड़ा होई क कोशिश केहे...लेकिन...इ...का.., हमरे पैर के नीचे से बलुअइ खिसकि गई...!” आगे इस प्रकार बताया...चूँकि नदी की धारा में थे इसलिए पैर टिक नहीं रहा था...फिर तैर कर किनारे आने का प्रयास किया, लेकिन नदी में तैरने का अभ्यास न होने के कारण तैरने में मुश्किल आ रही थी...उन्हें लगा कि वह डूब जाएँगे...क्योंकि तब तक वह थक चुके थे...तभी उनके दिमाग ने काम किया और नदी में पीठ के बल हो उसी की धारा के सापेक्ष तैरने की स्थिति में अपने को छोड़ दिया...उधर नदी के किनारे से लोग उनकी हिम्मत बंधा रहे थे...करीब इसी स्थिति में लगभग पांच सौ मीटर बहने के बाद वह किनारे पर नदी की धारा के बहाव के सहारे पहुँचे, वहाँ भी नदी का करार काफी ऊँचा था, उस गिरते करार में दबने का खतरा था...अंत में जैसे तैसे कर लोगों ने वहाँ से सहारा देकर निकाला...इसके बाद निढाल हो गए...! छोटकऊ चाचा किसी बड़े शहर में रहते हैं और पचड़े में पड़ कर निकलने की अपनी आदत आज भी नहीं छोड़ पाए हैं...
     न जाने क्यों उक्त छोटी सी घटनाओं को लिखने के लिए प्रेरित हुआ...हाँ...उस दिन पचड़ेबाजी में पड़ते तो किसी की जान बच सकती थी... सोचा..! यह लिखना भी तो एक पचड़ेबाजी ही है...! शायद...! किसी पचड़ेबाज को समझने का मौका मिले...!
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सोमवार, 17 सितंबर 2012

सहज प्रेम

             एक दिन मैंने देखा...मेरे घर के आगे वाले कमरे में जिसकी खिड़कियाँ अक्सर खुली रहती हैं...उसके रास्ते से...गौरैया का एक जोड़ा आकर कमरे में इधर उधर चक्कर काटने लगा...जैसे कुछ तलाश सा रहा हो... मैं कई दिनों तक जोड़े को कमरे में इसी तरह चक्कर काटते हुए देखता रहा...कभी कभी मुझे ऐसा लगता जैसे गौरैया का वह जोड़ा कुछ खोज सा रहा हो...एक दिन सुबह ही मैंने देखा...आलमारी में फ्रेम में रखी तस्वीर के पीछे की खाली जगह पर पक्षियों का वह जोड़ा बार बार आ जा रहा था...उस स्थान पर वह जोड़ा बारी-बारी से तिनके ला कर रख रहा था...कुछ दिनों तक चिड़ियों की यह क्रिया चलती रही...कुछ दिनों बाद में मैने देखा... एक खूबसूरत घोसला आलमारी में तस्वीर के पीछे बन कर तैयार हो चुका था...एक दिन एक चिड़िया उस घोसले में बैठी हुई दिखाई दी...मैंने देखा...वह इसी तरह से कई दिनों तक वहाँ बैठी रही...फिर मुझे वहाँ दो अंडे दिखे...इसके बाद वह चिड़िया वहाँ अकसर मुझे बैठी हुई दिखाई देती रही...
               कुछ दिनों बाद मैंने उस घोसले वाले स्थान पर पुनः ध्यान दिया... वहां नन्हें - नन्हें दो छोटे चिड़ियों के बच्चे नज़र आये...मैं घोसले के एकदम नज़दीक जाकर...उन चिड़ियों के बच्चों को देखने लगा...वे अपनी नन्ही-नन्हीं चोचों को मेरी ओर खोलकर चीं-चीं करने लगे...इतने में मैंने देखा...गौरैया कमरे में आकर चक्कर काटने लगी...मुझे अहसास हुआ...वह बच्चों को कुछ चुगाना चाहती थी...यह सोचकर मैं वहाँ से चला गया...मैंने ध्यान दिया...कुछ दिनों तक चिड़िया बच्चों को कभी-कभार आ कर ही चुगाती थी...और अकसर उनके पास बैठी रहती...इस तरह कुछ दिन बीत जाने पर...एक दिन मैंने देखा...चिड़िया बार-बार घोसले की तरफ आ-जा रही थी...बच्चों को चुगाती जाती...यही नहीं जोड़े के दोनों पक्षी इस काम में बराबर लगे हुए थे ...और लगातार बारी-बारी से दोनों बच्चों को बाहर मैदान से कुछ ला-ला कर चुगाते जा रहे थे...मैंने विशेष रूप से इस बात पर गौर किया कि जब चिड़िया के बच्चे बहुत छोटे एवं नवजात थे तो उन्हें भोजन की कम आवश्यकता थी और चिड़िया कभी कभार ही बच्चों को चुगाती थी ,लेकिन जैसे-जैसे बड़े होते गए वैसे-वैसे बच्चों को चुगाने की आवृत्ति बढ़ती गई...


              चिड़ियों की अपने बच्चों के प्रति प्रेम एवं सजगता आश्चर्य करने वाली थी...निःस्वार्थ भाव से चिड़ियों द्वारा अपने बच्चों की देखभाल करना प्रकृति के सहज प्रेम की अभिव्यक्ति थी....मैं मनुष्यों में इस सहज प्रवृत्ति को जैसे तलाशने लगा...!

शनिवार, 11 अगस्त 2012

नीम का दरख्त


           क्या नियमों एवं आदर्शों को व्यवहृत किया जा सकता है ! उसे इन सारे प्रश्नों का उत्तर पाना है--] इसके लिए वह क्या करे-----क्या अपना स्वयं का विश्लेषण कर डाले------! लेकिन उसका जीवन अति साधारण----! क्या इससे जीवन में उठने वाले बड़े प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है----! हाँ अब तक उसने जिन परिस्थितियों का सामना किया है वे साधारण ही तो रही हैं---हाँ तो क्या इनमें उसके मन में उठने वाले प्रश्नों का उत्तर खोजा जा सकता है------कहीं यह हास्य का विषय तो नहीं होगा-------!

          लेकिन इस जीवन में क्या तुच्छ से तुच्छ वस्तु का मूल्य नहीं है---! शायद है-----तभी तो तुच्छ से तुच्छ बातें भी होती हैं------या फिर कोई बात तुच्छ ही नहीं होती-----सब मन का भ्रम है----!

           उसके दादा जिन्हें वह बाबू कह कर सम्बोधित करता था उसके लिए एक ऐसे विशाल दरख्त के समान थे जिसकी घनी छाया में उसका बचपन निर्द्वन्द्व और निश्चिंत होकर बीता थाA हाँ-------उसी उसी विशाल नीम के दरख्त के समान जो उसके पुराने कच्चे घर के सामने दाहिनी ओर थाA वह पुरानी पुस्तैनी बखरी अब तो नहीं रही लेकिन वह नीम का दरख्त अपना वजूद बचाए हुए है हालाँकि उसकी कई विशाल डालें अपने आप गिरी और कुछ छोटी&मोटी डालों को लोगों ने काटा भीA एक बार जब उसके पक्के घर का निर्माण हो रहा था तो उसने उस घर के नक्शे में हेर&फेर करा दिया था और वह इसलिए कि नीम कि डालों को कटने से बचाया जा सकेA हाँ-------] घर के लोगों को इसका अहसास नहीं होने दिया था कि वह नीम की डालों को बचाने के लिए ऐसा कर रहा है------] शायद तब सफल न होताA

         हाँ-----]वही विशाल नीम का पेड़-----उसकी बड़ी&बड़ी डालें----टहनियाँ-----उसकी पत्तियां] उस पर----चुट-----चुट-------और दौड़ती गिलहरियां-----उसी की छाया में बीता उसका बचपन---! वह विशाल पेड़ उसके लिए कौतुहल का विषय भी थाA तभी तो छुटपन में एक बार बड़े भोलेपन से उसने अपने बाबू से उसके बारे में पूंछा था&

         ^^बाबू इ नीम क पेड़ तू लगाए रहा^^

         ^^नाहीं नन्ह्कवा इ हम नाहीं लगाए रहे^^] बाबू ने कहाA

         ^^त फिर तोहार बाबू लगाए रहा होंहि\^^ उसने फिर पूँछाA

         ^^नाहीं हमार ददा एका नाहीं लगाए रहेन^^] बाबू ने कहाA बाबू शायद अपने पिता को ^ददा^ कह कर संबोधित करते थे----A उसके बालमन की जिज्ञासा अभी शान्त नही हुई थीA उसने फिर पूँछा&

         ^^बाबू-----तू अपने दादा जी से एह नीमी क पेडे+ के बारे म फिर नाहीं पूंछाA^^ अब बाबू थोड़ा झल्लाते हुए बोले] इ बात पूंछे अउर बाते क जड़ पूंछे!^^ बाबू ने शायद ऐसा इसलिए कहा कि उनसे वह अकसर अपने बालमन की तमाम जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए ऐसे ही प्रश्न दर प्रश्न किया करता था और कभी कभी इस प्रश्नोत्तरी के दौरान जब वह थोड़ा अन्यमनस्क होते तो उससे कहते] ^^का हरदम भुकवावत रहत ह।^^ लेकिन ऐसा कहने में उसके द्वारा पूँछे प्रश्नों के प्रति उनमें उपेक्षा का भाव नहीं होता था क्योंकि अगले पल ही वह उसके प्रश्नों का उत्तर देना प्रारम्भ कर देते थे। हाँ------ बाबू तो उसके लिए प्राथमिक पाठशाला थे---- और वह इस बात को समझते थे। उस दिन बाबू नीम के बारे में उसकी जिज्ञासाओं को पुन% शांत करना शुरू कर दिए] ^^ल बतावत हई--- हाँ--- हमार आजऊ ई नीमी क पेड़ नाहीं लगाए रहेन--- अऊर ओनहूँ नाइ जानत रहेन कि एका के लगाए रहा--।^^ फिर बोले] हाँ--- त---ई--- पेड़ अढाई तीन सउ साल पुरान जरुर होए---।^^ इतना कह वह थोड़ी देर चुप रहे] फिर एक गहरी साँस लेते हुए उस नीम के तने जैसे उसके एक बहुत पुरान्रे टूटे डाल की ओर इशारा किया] और कहने लगे&

           ^^वह देखा---- जवने में खोडर बा--- अरे--- उंहीं में----- जेहमें उल्लुआ झाँकत बा----उहई---] अरे---! उ--- बहुत मोटी डाल रही--- एह पेडे क समझा आधा उहई रहा---] हमरे बहुत लरिकाई में गिरा रहा---^^ इतना कह चुप हो गए। वह उन्हें अब बहुत उत्सुकता से सुनने लगा था] और पूँछा]

         ^^बाबू--- एतनी बड़ी डाल जब गिरा रहा त केऊ दबान नाहीं रहा---।^^

          ^^नाहीं----बेटवा---केऊ दबान नाहीं रहा---!^^ बाबू की चुप्पी टूटी।

          ^^अरे भईया---] कईसे केऊ दबातइ---एह पेड़े मं देबी क बास रहथ न---^^ उसने दृष्टि घुमाई तो देखा पंडित बबा बाबू से यह कह रहे थे] जो बाबू और उसके बीच चल रहे वार्तालाप को सुन रहे थे।

          हाँ पंडित बबा उसके दादा यानि बाबू के छोटे भाई थे] उन्हें घर और गाँव के लोग ^पंडित के नाम से पुकारते थे। उनका यह नाम क्यों पड़ा बाबू ने उसकी इस जिज्ञासा को इस प्रकार शांत किया था]

          ^^पंडित इसकूल में पढ़े रहेन इही से गाँव वालेन इनका पंडित कहै लागेन।^^ उसकी जानकारी के लिए आगे उनहोंने और जोड़ा] ^^अरे--- ये ठीक से पढ़े रहेन होतेन त आज कतऊं संसकिरत क मास्टर होतेन--।^^ उसनें पूँछा] ^^काहे ठीक से नाहीं पढ़ेन---\^^ बाबू ने बड़े आत्मीयतापूर्ण लहजे में बताया] अरे--- ये ठीक से कईसे पढ़तेन----] पढाई क नाम से त इसकूल जाईं---- और उहाँ से चला जाईं ससुरारी---^^ 
             पंडित बबा ने फिर अपनी बात पूरी करनी शुरू की] ^^केतनी बार एह नीमी क डार गिरी भईया----! आखिर कोनौ खतरा भवा----नाहीं न----^^ फिर उसकी ओर मुखातिब हुए] ^^अरे---बचवा--- बताए न---एहमें देबी माँ क निवास अहै ^^ उस विशाल वृक्ष के चारों ओर बने चबूतरे की ओर इशारा करते हुए बोले] ^^इ देबी माँ क चौरा हमहीं बनवाए रहे-^^ वह नीम की डाली पर बंधी घंटियों को दिखाते हुए पूँछा] ^^बबा घंटी काहे बांधी बा^^ पंडित बबा उत्तर दिए] ^^देबी माँ से मनौती माना रहा जेकर मनौती पूरा भ उहई बांधेस-^
            ^^पंडित---तनी----सुरती बनावा---मैदान होई आई----।^^ उसके दादा पंडित बबा के इन बातों से ऊबते हुए से बोले। पंडित बबा सुरती मलते हुए दो तीन बार उसे हथेलियों के बीच थप थप करते हुए चूने की धूल को उड़ाया। इससे उसे दो तीन जोरदार छींकें आई। यह देख पंडित बबा मुसकराते हुए बोले] ^^देखअ---भईया-----! इ---सुरती---! बहुत तेज बा----!^^ ^^हाँ हो---कहाँ से लेहे रहाअ-----।^^ बाबू ने कहा। ^^अरे--- उंहीं से-----जहाँ से तू लेथअ----सेठ एका कोने वाले डब्बावा में रख्खथेंन----।^^ पंडित बबा अपनी सुरती की तेजी पर गर्व से बोले।^^
              छींकों के बाद उसने अपना चेहरा दूसरी ओर घुमाया] अकस्मात् उसकी नजर पुनः नीम के उस कोटर की ओर गई। उसने देखा] उल्लू की दो बड़ी बड़ी आँखें कोटर में से झांक रही थी----और एक ^किलाहटी^ कोटर के पास मंडरा रही थी] दूसरी डाल के टूटे भाग पर बैठ ची&ची कर रही थी। उसे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे उल्लू को कोटर से निकालना चाहती हों----। इतने में कुछ चिड़िया शायद वे चर्खी थी वहाँ आ गई और समवेत स्वर में सभी ने ची&ची करना प्रारम्भ कर दिया----। उन सब का शोर इतना अधिक था कि पंडित बबा बोल उठे] ^^एनहूँ ससुरन क----पता नाहीं कउन हिस्सा बाँट क झगड़ा बा----कि मनईयउन----से बढ़ी गयेंन-----।^^ इतना कहते बाबू की ओर सुरती वाला हाँथ बढ़ा दिए। चुटकी में सुरती लेते हुए बाबू ने अनुभवी अन्दाज में कहा] ^^नाहीं पंडित----अब संझा होत बा न----रात में एंह कोटरे में रहई क बारी किलहटीयन क अहई----एही से एन्ह्न उल्लुआ के निकालइ बदे हल्ला मचाए अहै-----।^^ पंडित बबा मुसकुराते हुए बोले] ^^तउ---तउ---।^^ बाबू एक हाँथ में लोटा और दुसरे में सोंटा ले वन की ओर चल दिए-----।  

   
          
           



          

सोमवार, 30 जुलाई 2012

कलुई


        उस दिन वह कुत्ता गाड़ी से टकराते-टकराते कैसे बचकर भागा था बरबस वह घटना याद आ जाती है. हाँ वह तेज चलती गाड़ी के ठीक सामने जो आ गया, उसे बचाने का कोई अवसर नहीं था और उसके ऊपर से मेरी गाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ गई. ‘वोह! शायद मर गया..’,मैंने सोचा और पीछे मुड कर देखा. लेकिन यह क्या..!वह तो दिखाई ही नहीं दे रहा है...,शायद भाग गया..,लेकिन भागते हुए भी तो अगल-बगल कहीं नहीं दिख रहा है, तब तक साथ बैठे मेरे बच्चे मुझे कोसने लगे, ’नहीं गाड़ी चलाना आता तो क्यों चलते हो’..,’अब हम कभी आपके साथ गाड़ी पर नहीं बैठेंगे’..,’बेचारा कुत्ता दब गया’,आदि आदि.मैं भी थोडा चिंतित हो उठा यह सोचकर कि खामखाँ एक जान मेरे हाथ चली गई जबकि बचपन से मैं एक चींटी तक को मारना पाप समझता था. मैं गाड़ी से उतरा और चारों ओर नजर दौडाई लेकिन वह कहीं नहीं दिखा..,तभी कूँ-कूँ की धीमी आवाज सुनाई दी.., मैंने गाड़ी के नीचे झांक कर देखा, अरे..! यह क्या! मैंने देखा वह आगे की पहियों को जोड़ने वाले राड और चेचिस के बीच फंसा पड़ा है. उसे निकालने की तरकीब सोचने लगा..,मुझे लगा यदि गाड़ी को थोडा पीछे धकेला जाए तो शायद वह निकल जाए, फिर मैंने अकेले ही बोनट की ओर से धकेला, मुझे लगा अब वह नीचे गिर गया होगा और दुबारा नीचे झांककर देखा, अरे! यह क्या! वह कहाँ गया ! तब तक पास आ गए एक व्यक्ति की आवाज कानों में पड़ी, ‘वह... भागा... !’ नजर घुमाई तो देखा वह दूर खेतों में भागा जा रहा था उसे कोई गंभीर चोट नहीं लगी थी, मेरे जान में जान आई और गहरा संतोष का भाव चेहरे पर छा गया, मैं अपने बच्चों की तरफ देखकर विजयी भाव से मुस्कराने लगा...  

       न जाने क्यों मुझे उस समय ‘कलुई’ कि याद आ गई. मेरे हम-उम्र लगने वाले चाचा जो अब इस दुनियां में नहीं हैं, और दूसरा मैं. हम दोनों का कलुई से विशेष लगाव था. परिवार में एक बुजुर्ग जिन्हें हम लोग ‘ददा’ कह कर पुकारते थे, हम लोगों के ‘कलुई प्रेम’ से चिढ़ते थे..,उसी ‘कलुई’ ने जब पहली बार बच्चे दिए तो ददा ने कहा ‘सुरेशानंद और विनेकानंद’ का वंश चल गया’. वह अपने घर में अकेले ही रहते थे,क्योंकि उनका विवाह नहीं हुआ था, उनका देखभाल ह्मलोंगों के परिवार वाले ही करते थे. हाँ तो ददा जहां रहते थे वहाँ छोटी सी एक ‘गढ़हिया’ यानी एक तालाब था जो आज भी है लेकिन उसके कुछ हिस्से को पाट कर अब घर बना लिया है, हाँ तो उस तालाब के किनारे पर ही ददा का घर था. वहाँ झाडझंखार एवं चौड़े पत्तों वाले छोटे-छोटे पौधे हुआ करते थे जिन्हें हम ‘कंघी’ के नाम से जानते थे, साथ ही बांस की कोठ एवं इमली,नीम तथा कई अन्य प्रकार के पेड़ हुआ करते थे इससे वहाँ आसपास सदैव नमी बनी रहती थी और इसी नमी एवं झाडझंखार के बीच ‘महोख’ नामक कई पक्षी रहा करते थे हलांकि आज भी यदा-कदा कोई एकाध दिख जाता है. उनमें से कोई एक जब ‘पूऊत...पूऊत... पूऊत’ ‘कर बोलना शुरू करता था तो दूसरा भी उसी सुर में अपना सुर मिलाने लगता था. इस ‘पूऊत...पूऊत...’ से काफी शोर होता था और ददा इससे बहुत चिढ़ते थे तथा उन पक्षियों पर ’हड-हड ससुरे’ कह चिल्लाने लगते थे. ‘ददा’ से उनके इस चिढ़ का हम अपने तरीके से बदला भी ले लिया करते थे. हम तीन बच्चे अकसर जब वे सोए रहता थे तो उनसे कुछ दूरी पर खिड़की के पीछे खड़े हो ‘पूऊत...पूऊत... पूऊत’ तेज आवाज में बोलना शुरू कर देते थे, और ददा जग कर अपने ‘सोंटे’ को लकलकाते हुए हमारी तरफ दौड़ते थे और कभी-कभी उस डंडे को हमारी ओर फेंक कर मारने का प्रयास कर अपने गुस्से को शांत कर लिया करते थे, खैर हमारा बदला भी पूरा हो चुका होता था. लेकिन ‘कलुई’ बहुत समझदार थी घर का दरवाजा खुला होने पर भी वह घर के अंदर तक नहीं जाती थी, बाहर बैठकर ही ‘कौरे’ का इंतजार करती रहती थी. खाने के बाद हम सभी रोटी के बचे टुकड़े उसे दिया करते थे. रात में उसके भौंकने कि कुछ अदा ऐसी होती थी जिसे पहचान मेरे बाबा कहा करते थे, ’कोई बात जरूर है तभी भौंक रही है’ और उसके भौंकने का कारण पता करने पर उसे अकसर कई बार सांप या बिच्छुओं का रास्ता रोकते हुए पाया था. और जब कलुई मरी थी.....,तब हम बड़े हो चुके थे, हम लोंगों ने उसके मृत शरीर को फूलों से सजाया था..., हमने कब्र खोदी..., और दफनाया था. 

         ‘कलुई’ से संबंधित एक घटना आँखों के सामने घूम गई.उस समय मेरी उम्र ७-८ वर्ष के आस-पास रही होगी.उस दिन हम सारे बच्चे एक छोटे से पिल्ले को लेकर परेशान थे. हाँ, हम बच्चों ने  उसे ‘कलुई’ नाम दिया था क्योंकि एक तो वह मांदा थी दूसरे उसका एकदम काला  रंग ! जब मैंने उसको पहली बार देखा था तो दंग रह गया था . अरे ! क्या गजब का साहस था उसका ! नन्हीं जान!, दो-ढाई महीने की..!, अकेले..! तीन-तीन मुसदंडे कुत्तों का मुकाबला कर रही थी! हाँ, एक घर के लिए खुदे नींव के इस ओर अकेले वह और दूसरी ओर वे तीनों कुत्ते ! जो उसे देखकर भौंके जा रहें थे, वह भी उसी अंदाज में अपनी नन्हीं सी ऐंठी पूंछों के साथ निडरता से बौं-बौं किए जा रही थी. मैं बड़े ध्यान से उसे देखने लगा, मुझे लगा जैसे मैं किसी ऐसे गुरु से शिक्षा प्राप्त कर रहा हूँ जो मुझे साहसी बनने की सीख दे रहा हो. मैं धीरे से आगे बढ़ा और उसे अपनी गोंदी में उठा लिया..!

       घर पर हम कई सारे बच्चे मिलकर उसका देख-भाल करने लगे. हम बच्चों की दिनचर्या उसी से शुरू होती थी. अल-सुबह उठते ही हम उसके पास पहुंच जाते थे और उसके साथ खेला करते थे. एक तरह से हम सब के लिए वह मनोरंजन का साधन भी थी. मेरी एक बुआ जो मुझसे दो-तीन साल बड़ी थी उसे बहुत प्यार से खाना खिलाती थी उनका भी उस ‘कलुई’ से बहुत लगाव था. हम बच्चे ‘कलुई’ को खाना खिलने की जिम्मेदारी उन्हीं को सौंप दिए थे. ऐसे ही कुछ दिन बीते थे कि एक दिन बहुत सबेरे ही कलुई....कलुई.....पुकारती आवाज कानों में पड़ी यह बुआ की आवाज थी कुछ घबड़ाहट भरी, मैं भी चौंक कर उठ गया और बुआ के पास गया यह जानने की बात क्या है. बुआ ने बताया,‘कलुई’ दिखाई नहीं दे रही है’, ‘वह कहाँ गई’....,यह सोचकर मैं भी चिंतित हो उठा. वह अभी बहुत छोटी थी..बुरे ख्याल मन में आने लगे. तब तक हम कई बच्चे इकठ्ठा हो गए, फिर हम लोंगों ने मिलकर उसे खोजना शुरू किया, दोपहर हो गया...,लेकिन वह नहीं मिली !

      मुझे याद आता है उस दिन हम सारे बच्चे बहुत दुखी थे. कितनी प्यारी थी वह..,खेलते समय वह भी हम लोंगों के साथ दौड़ा करती थी...लेकिन वह कहाँ और किस हाल में होगी फिर मिलेगी या नहीं ...,बार-बार ऐसे ख़याल मन में आ रहें थे. ऐसे ही सोचते-सोचते दोपहर के तीन-चार बज गए. तभी किसी ने आवाज दी ‘अरे ! देखो! शायद यहाँ है’ और ईख की सूखी पत्तियों के गट्ठर की ओर इशारा किया. फिर हम सभी बच्चे मिल उसे वहाँ खोजना शुरू कर दिए.सारे गट्ठर को हम लोगों ने उलट-पलट डाला लेकिन वह नहीं मिली, हाँ उसमें से एक बिल्ली निकल कर भागी. हम सभी निराश हो पास ही कुँए की जगत पर बैठ गए. वहाँ बैठे हुए कुछ ही देर हुआ होगा कोई चिल्लाया, ‘अरे ! वह देखो ! कलुई आ रही है !’ हम लोगों ने देखा दूर बाग के बीच रास्ते से वह भागी चली आ रही है, सभी बच्चे उसकी ओर दौड़ पड़े, हम सभी ने बारी-बारी से उसे अपनी गोंदी में उठाया जैसे इत्मीनान कर लेना चाहते हों कि वह हमारी ‘कलुई’ ही है......हाँ उसी प्रसन्नता की अनुभूति उस भागते कुत्ते को देख कर हुई.

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रविवार, 8 जुलाई 2012

सत्यमेव जयते


          आमिर खान के शो ’सत्यमेव जयते’ में आज जातिवाद, छुआछूत आधारित सामाजिक भेदभाव जैसी कुप्रथा को मुद्दा बनाया गया। इसे देखकर कुछ यादें ताजा हो गयी! बचपन में कपड़े सीने का काम करने वाला एक आदमी अकसर हमारे घर आया करता था। वह घर से कपड़े लेकर उन्हें सिलकर फिर घर पहुँचा दिया करता था। एक बार हमारे घर पर किसी की तेरहवीं पर भोज का कार्यक्रम था उसे भी निमंत्रित किया गया था। खाना खाने वाले लोगों की पंक्ति के बीच में बैठकर वह भी भोजन कर रहा था। उसे इस तरह लोगों के बीच पाँत में बैठकर खाना खाते हुए देखकर घर के ही एक सदस्य ने कुछ बडबडाते हुए उसकी ओर इशारा किया और फिर मैनें उन्हें उस व्यक्ति को खाने वाले लोंगों की पाँत से उठाते देखा। वह उस बेचारे को सबसे अलग बैठ कर खाने के लिए कह रहे थे क्योंकि वह तथाकथित एक दलित जाति से था। लेकिन तब उस व्यक्ति ने अपने को बहुत अपमानित महसूस किया था। फिर उसने खाना नहीं खाया और वह उठकर चला गया था। आज भी वह घटना मुझे बरबस याद आती रहती है अपमान बोध से पीड़ित वह फिर कभी हमारे घर दिखाई नहीं दिया।

       इसी तरह स्कूली दिनों का मेरा एक अन्य अनुभव रहा है। मैं इंटर प्रथम का छात्र था उन दिनों कभी-कभी मैं अपने स्कूटर से कालेज चला जाता था। मेरे गाँव का ही मेरा एक सहपाठी भी मेरे साथ मेरी ही कक्षा में पढ़ता था। अकसर मैं अपने उस सहपाठी मित्र के भी स्कूटर पर बैठाकर कालेज चला जाता था। उसे इस तरह हमारे साथ स्कूटर पर बैठ आते-जाते देख हमारी कक्षा के तथाकथित ऊँची जाति के छात्र मेरी खिल्ली उड़ाया करते थे कि मै एक दलित जाति के छात्र को अपने स्कूटर पर क्यों बैठाता हूँ।

               उक्त बातें तो मेरे अपने अनुभव का विषय रहा है लेकिन मेरे एक परिचित ने बातों-बातों में ही अपनी एक ऐसी पीड़ा को मुझसे व्यक्त किया जो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को सोचने पर विवश कर सकता है। वह सरकारी सेवा में हैं तथा उन्होंने बताया कि कैसे अनुसूचितजाति वर्ग में पैदा होने के कारण उनके बच्चों कि पढ़ाई बाधित हुई थी! 
            पहले उनके बच्चे गाँव में पढ़ते थे। जब वे सरकारी नौकरी में आए तो वह बच्चों को शहर में पढाना चाहते थे, लेकिन शहर में उन्हें किराए का घर इसलिए नहीं मिल पाया था कि वह एक दलित जाति से थे। कोई उन्हें किराये पर अपना घर देने के लिए तैयार नहीं होता था। इस कारण से उनके बच्चों की स्कूली शिक्षा तीन वर्ष पीछे हो गई थी। 

            वास्तव में जातिगत भेदभाव के मनोरोग को हम आज भी देख एवं सुन सकते हैं, शहरों में हो सकता है यह कुछ कम दिखाई दे लेकिन गाँवों में यह अपने उसी वीभत्स रूपों में आज भी है जैसा कि आमिर ने अपने शो में दिखाया। हम दलितों की इस पीड़ा को दलित हो कर ही अनुभव कर सकते हैं इस समाज के प्रति उनके विद्रोह के स्वर बेहद जायज हैं। और जब तक शेष समाज भी इस पीड़ा को उसी शिद्दत से अनुभव नहीं करता यह मनोरोग समाप्त होने वाला नहीं है। आमिर को साधुवाद !

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