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बुधवार, 2 सितंबर 2015

विचारों के बुलबुले मत उठाईए...बूँद बनिए सागर बन जाएगा..

            वैसे ‘हिन्दू’ शब्द मेरे लिए एक उदात्त विचारधारा है...एक दिन ऐसा ही कुछ मैंने फेसबुक पर अपने स्वयं के ‘रिलीजियस व्यू’ के सम्बन्ध में टिप्पणी की थी...मेरी इस टिप्पड़ी पर मेरे आदरणीय अग्रज शान्ति प्रकाश त्रिपाठी जी ने काँवरियों के बढ़ते हुजूम में ‘हिन्दू आतंकवाद’ का संदेह व्यक्त किया था..शायद उनके कहने का आशय यही रहा होगा कि यदि हिन्दू एक सर्वसमावेशी विचारधारा है तो इसमें यह दृश्य क्यों दिखाई दे रहा है...? उनकी इस टिप्पड़ी के विरोध में मेरे एक अन्य फेसबुक मित्र ने कई तल्ख़ टिप्पड़ियाँ की..
          
             मैं अपने उन फेसबुक मित्र को बताना चाहता हूँ कि काँवरियों के बढ़ते कारवाँ में हिन्दू आतंकवाद का रूप क्यों दिखाई देता है...? वास्तव में भैया जी (शान्ति प्रकाश त्रिपाठी) उम्र में मुझसे सात-आठ वर्ष बड़े हैं, उनकी तो छोड़िए मुझे काँवरियों के बारे में पहली जानकारी उस समय हुई जब मैं स्नातक प्रथम-वर्ष में था तब इनकी संख्या भी बहुत कम हुआ करती थी| बाद में धीरे-धीरे मैंने अखबारों के माध्यम से जाना कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मेरठ के आस-पास काँवरियों का हुज़ूम चलता है, और आजकल तो सप्ताह भर से अधिक दिन पूरा हाईवे इनकी पैदल यात्रा से बाधित रहता है यहाँ तक कि काँवरियों से भरे इन मार्गों पर वाहनों का संचालन भी बंद हो जाता है...यही प्रचलन अब पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई भागों में भी दिखाई देने लगा है|
        
           आखिर ‘हिन्दुओं’ में यह प्रचलन पहले क्यों नहीं था..? इसका कारण यही था कि हिन्दू सामूहिक उपासना पद्धति पर विश्वास नहीं करता और इसका मूल हिन्दुओं की मान्यताओं तथा इनके दर्शन में छिपा है| बचपन का मेरा अपना अनुभव है कि एक सामान्य कृषक जीवन जीता ‘हिन्दू’ कभी किसी मंदिर का मोहताज नहीं रहा है, उसके भगवान् को मैंने उसकी पोटली में ही ‘शालिग्राम’ के रूप में देखा है..! और उसे इस ‘शालिग्राम’ की पूजा भी दूसरों की निगाहों से बचकर करते हुए ही देखा है...मतलब हिन्दू ईश्वर की अराधना एकांत में ही करना चाहता है..इस हिन्दू के लिए उसका धर्म नितांत व्यक्तिगत ही रहा...मैंने इस ‘हिन्दू’ को सूर्य को अर्ध्य देता हुआ या नीम, पीपल जैसे वृक्षों पर जल चढ़ाता हुआ प्रकृति की उपासना में ही तल्लीन देखा है...यदि अधिक हुआ तो वह बिना किसी दिखावे के किसी पर्व पर नदी को पवित्र मान वहाँ स्नान करने चला गया या फिर अपने पुरखों के तर्पण हेतु गया हो आया| इस ‘हिन्दू’ को मैंने कर्म को ही पाप-पुण्य की मान्यताओं से जोड़ते हुए इसी में धर्म को खोजते देखा है...हाँ इस धर्म के लिए उसने किसी वाह्य आडम्बर को महत्त्व नहीं दिया और आम भारतीय कृषक तथा श्रमिक वर्ग धार्मिक मान्यताओं के रूप में ईश्वर उपासना हेतु स्थूल कर्मकांडों को अपने जीवन में विशेष प्रश्रय देता हुआ दिखाई नहीं पड़ता|    

            शायद यही कारण रहा है कि मेरे अपने गाँव में आज भी कोई मंदिर नहीं है...और न ही किसी मंदिर की आवश्यकता पड़ी| यही कहानी अधिसंख्य हिन्दू ग्रामीण भारत की रही है...जिसने ऐसा ‘हिन्दू जीवन’ देखा होगा उसे आज के ये काँवरिए ‘हिन्दू आतंकवादी’ ही नजर आएँगे...मेरे अपने इस अनुभव से आदरणीय अग्रज भाई जी का अनुभव तो और पुराना है; यदि उन्होंने भी ऐसा ही कहा है तो इसका कारण उनका अपना आडम्बरहीन सहज और सरल जीवन है...! ऐसे व्यक्ति के जीवन की पवित्रता और ऊँचाई किसी की नजरों की मोहताज नहीं होती तथा जब ऐसे लोग आज के इस ‘धार्मिक हुल्लड़बाजी’ को देखते हैं तो इसमें इन्हें आतंक का दिखाई देना स्वाभाविक ही है|
         
            एक बात और है मैंने स्वयं काँवरियों के रेले के बीच से गुजरते हुए अनुभव किया है कि उनकी भीड़ किसी अन्य को ‘हिन्दू’ नहीं मानती जो उनकी वेशभूषा में नहीं होता और उनके रास्ते नहीं चल रहा होता| रास्ते चलते यदि आपका वाहन उनसे थोड़ा भी छू जाए तो शायद आपकी जान पर बन आएगी...तब उन काँवरियों का ‘हिन्दूवाद’ नहीं दिखाई देगा..इसी तरह इन काँवरियों की भीड़ के आगे सड़क पर चलना अधिसंख्य ‘हिन्दुओं’ के लिए ही दुश्वार होता है, यहाँ तक कि अपने समूह में ये अराजक भी हो जाते है, समाचारों में इसे देखा जा सकता है| बात चन्द काँवरियों की उद्दंडता का भी नहीं...लेकिन बात यही है कि धीरे-धीरे ही सही आखिर हम किस मानसिकता का निर्माण करते जा रहे हैं..जो ‘कुछ’ से शुरू होकर न जाने कहाँ पहुँचेगा..? शायद इसी ‘एंगिल’ से देखने पर  इस नए-नए प्रचलन में ‘आतंक’ दिखाई देता है जो हमारी परम्पराओं में नहीं रहा है|
         
               काँवरियों के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण तथ्य और है...जो उम्र पढ़ने-लिखने और जीवन में परिश्रम करने की होती है उसी उम्र में इस धार्मिक आडम्बर के दिखावेपन में वे न जाने क्या तलाशते हैं..! वास्तव में युवाओं का धार्मिक आडम्बरों के प्रति ऐसा बढ़ता रुझान देश के लिए एक योग्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोंण संपन्न नागरिक का टोंटा उत्पन्न करेगा| मुझे इस सम्बन्ध में एक घटना याद आती है उन दिनों मै अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी कर रहा था..एक दिन मुझसे मिलने मेरे दूर के एक रिश्तेदार का लड़का आया जो एम.बी.बी.यस. की पढ़ाई कर रहा था...उससे हुई बातचीत में मैंने पाया कि उसके अन्दर ‘धार्मिक प्रतिक्रियावाद’ की एक तीक्ष्ण भावना घर कर गयी थी और उसके विचार एक तरह से धार्मिक उन्माद में बदल चुके थे...उसके सम्बन्ध में और एक उल्लेखनीय बात यह थी कि वह एक ऐसे क्षेत्र और ऐसे लोगों के सानिध्य में रहकर अपनी एम्.बी.बी.यस. की पढ़ाई कर रहा था जहाँ से ही वह अपने ऐसे “धार्मिक विचार” ग्रहण कर रहा था| मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ था कि एक एम्.बी.बी.यस. का छात्र धर्म के प्रति इतना दुराग्रही कैसे हो सकता है...! उस समय मुझे वह “साइको” प्रतीत हुआ था....! वास्तव में हम अपने परिवेश और जीवनशैली से ही अपनी सोच विकसित करते चले जाते हैं और इस तरह एक विशेष परिवेश में पला-बढ़ा व्यक्ति अपनी तमाम शैक्षिक योग्यताओं के बाद भी उन्मादी विचारों का हो सकता है| यहीं पर आकर आतंक धर्म-विशेष से जुड़ने लगता है जो उस ‘परिवेश’ का ‘आतंकवाद’ होता है|
          
              हाँ यह भी सच है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता लेकिन यह भी उतना ही सच है कि धर्म के नाम पर आतंकवाद कैसे पनपता है..? गणेश पूजा...दुर्गा पूजा...भारत मिलाप..काँवरियों की बढ़ती भीड़...यह सब क्या है..? दुर्गा पूजा के दिनों में किसी बाजार या कस्बे से गुजरिए तो सड़क मार्ग पर बनाए गए पूजा पांडाल तमाम रास्तों को अवरुद्ध किये रहते हैं...यही नहीं इन दिनों जीवन भी जैसे अवरुद्ध सा रहता है..हम एक अजीब से धार्मिक-आडम्बर के नशे में डूबे रहते हैं...यह आडम्बर जो हमें पंगु बनाता है वह क्या है...? यह भी एक प्रकार का आतंक है..! इन दिनों धर्म के इस आडम्बर के लिए बीच सड़क पर अवरोध खड़ा कर चन्दा वसूलने का खेल भी शुरू हो जाता है...आखिर यह सब क्या है..धर्म का आतंक ही तो है..और धीरे-धीरे बदलते ‘परिवेश’ का आतंक है!!
         
               मेरे फेसबुक मित्र ने गोपीगंज और सैदाबाद में काँवरियों को रोक कर अलविदा की नमाज बीच सड़क पर पढने देने की बात का उल्लेख यह कहते हुए किया है कि इस पर हम कुछ नहीं बोलते...मेरे भाई...मैं गोपीगंज और सैदाबाद को अच्छी तरह जानता हूँ...बचपन में ताजिये से मेरा पहला परिचय तो सैदाबाद में ही हुआ था...भीड़ में घुस कर ताजिये के जुलुस को देखा करता था...’हाय हुसैन’ की आवाज पहली बार कानों में वहीँ पड़ी थी...कभी ऐसा नहीं लगा कि यह बेगाने लोगों का धर्म है...क्योंकि वहाँ का सह-जीवन उन्हें आपस में बहुत गहरे तक जोड़ता था लगभग पूरे पूर्वांचल की यही स्थिति थी और यही कारण रहा है कि पूर्वांचल में साम्प्रदायिक संघर्ष सबसे कम हुए हैं|
         
               अब आते हैं बीच सड़क पर अलविदा की नमाज पढ़ने की बात पर...हाँ..तो..! अलविदा की नमाज़ साल भर में कितनी बार पढ़ी जाती है....? जहाँ तक मेरी जानकारी है साल में एक बार..! और वह भी ईद के पहले पड़ने वाले शुक्रवार पर ही..एक दिन..!! यह एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है...शायद नमाज़ियों की अधिक भीड़ होने के कारण ही ऐसा होता होगा...और उतने ही सलीके से..! खैर ये तो सामूहिक धार्मिक उपासना में विश्वास करने वाले लोग हैं अतः इस पर टिप्पड़ी करने की आवश्यकता मैंने कभी नहीं समझा| लेकिन आप तो ऐसे न थे...! ये हमारे हिन्दू भाई तो धर्म के नाम पर अब सड़कों का ही बेजा इस्तेमाल करने लगे हैं..और हाँ विवाह जैसे अवसर भी सडकों पर ही संपन्न किये जाते हैं..इनका बैंड-बाजा तो सड़क पर ही चलता है...| आखिर यह क्या है..? क्या सड़कें केवल आपकी हैं उनकी नहीं..?
          
               मेरे भाई इस बात को आत्मसात करना होगा कि यह देश इसके सभी निवासियों का है..जितना आपका इस पर हक़ है उतना ही इनका भी...कार्यस्थलों पर कंधे से कंधा मिलकर ये भी देश के लिए उतनी ही कुशलता से काम करते हैं जितना हम और आप करते हैं...बल्कि...मैंने तो इन्हें और ही अधिक जिम्मेदारी से काम करते हुए पाया है क्योंकि इनके ऊपर हमने एक ‘तमगा’ भी लगा रखा है...आपके अनुसार यदि काँवरियों के बीच में कुछ ‘चन्द’ सिरफिरे हो सकते हैं तो वैसे इनमें भी हो सकते हैं..लेकिन...इससे पूरी कौम बदनाम नहीं होनी चाहिए...
           
                यहाँ प्रसंगवश एक घटना का भी मैं उल्लेख करना चाहता हूँ...बात उन दिनों की है जब मैं जूनियर की कक्षा में पढ़ रहा था..एक दिन मैंने देखा एक ही ऊँची कक्षा में पढनेवाले दो छात्र आपस में झगड़ रहे थे...उनमें से एक छात्र दूसरे से लम्बाई में काफी छोटा और कमजोर था...और दूसरा उस छोटे लडके से काफी बलिष्ठ और लम्बा था...लेकिन वह छोटा लड़का बड़े पर जबदस्त ढंग से अपने मुक्कों का प्रहार किये जा रहा था...जबकि बलिष्ठ छात्र उसके वार से केवल बचने का ही प्रयास कर रहा था..हम भी रुक इस लड़ाई को देखने लगे थे..मैं आश्चर्य में था कि छोटे वाले लड़के से इतना बलिष्ठ होते हुए भी वह उस पर हाथ नहीं उठा रहा था...? हालाँकि मुझे आज भी उस बलिष्ठ लड़के की वह बात बरबस याद आ जाती है जिसे वह उस समय कहता जा रहा था.. “देखो मैं तुम्हें मारना नहीं चाहता...तुम मेरे एक हाथ का वार भी नहीं सह सकते...” बाद में किसी ने उन्हें शांत कराया था...यहाँ इस घटना के उल्लेख का आशय यही है कि शारीरिक रूप से कमजोर छात्र में अधिक आक्रामकता ‘भयवश’ थी| और वह अपनी इस ‘आक्रामकता’ को एक हथियार के रूप में भी प्रयोग कर रहा था...इसी प्रकार यह ‘असुरक्षा का मनोविज्ञान’ बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के बीच भी काम करता है...यहाँ बहुसंख्यक को कुछ अधिक ही सहनशील और जिम्मेदार भी होना चाहिए...!
        
                एक बात और है....भारतीयों को आजादी के समय देश का धर्म के नाम पर हुआ विभाजन आज भी सालता है; परिणामतः आज के आतंकवाद के साये में इनकी देशभक्ति की जैसे रोज परीक्षा होती है| यह किसी के लिए निश्चित रूप से बहुत पीड़ादायी होता है जब लोग उसकी निष्ठा पर संदेह करने लगते है...! वास्तव में इस ‘संदेह’ से भी अल्पसंख्यकों में मनोवैज्ञानिक रूप से आक्रामकता पनप सकती है..लेकिन...इसका तात्पर्य यह नहीं है कि देश के प्रति उनकी निष्ठा किसी से कम है| इसका प्रमाण तो यही है कि कुछ घटनाओं तथा धार्मिक विवादों या दंगों की बातें छोड़ दी जाएँ तो भारत में सभी आतंकवादी घटनाएँ विदेशी आतंकवादियों द्वारा ही अंजाम दिए गए हैं...एक बात यहाँ और भी उल्लेखनीय है...किसी की बहुसंख्या उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकती यदि ऐसा ही होता तो मुस्लिम बहुल देश स्वयं आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित नहीं होते...!! पाकिस्तान से लेकर अरब जगत का हाल कोई भी जान सकता है| यही नहीं अगर हम अपनी संवैधानिक व्यवस्था को छोड़ दें तो हमारी अपनी स्वयं की बहुसंख्यक हिन्दू बिरादरी स्वयं अपने लोगों के लिए सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकी है...कारण..? हमारे अपने समाज में जातिवाद की एक ऐसी विचारधारा गहराई से जड़ें जमाए हुए है कि इसका दंश हम सदियों से भोगते आ रहे हैं..आज भी ग्रामीण भारत इसके अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाया है...गाँवों में दलितों के यहाँ खुले-आम खाने से हम जैसे तथाकथित उच्च जातीय समाज के लोग आज भी कतराते हैं...इसे हम अपनी तौहीन समझते हैं..इसका कारण हमारा अपना वही ‘परिवेश’ है जिसमें हम सदियों से रहते आए हैं और आखिर यह परिवेश भी तो किसी के लिए ‘आतंकवाद’ से कम नहीं है| हमारे समाज के इसी ‘परिवेश’ से ही बौद्धों और जैनों की उत्पत्ति हमारे अपने इसी ‘आतंकवाद’ की प्रतिक्रिया में हुआ था अतः इस तथ्य को भी समझना होगा कि एक धार्मिक समूह अपने लोगों के लिए सुरक्षा की गारंटी नहीं बन सकता|
         
                अकसर एक तर्क और दिया जाता है कि देखो उनकी जनसख्या बढ़ रही है फिर तो इस तरह एक दिन हम अल्पसंख्यक हो कर रह जाएंगे तब इस देश का क्या होगा..? यहाँ यह तर्क प्रस्तुत करते समय हम भूल जाते हैं कि हजारों वर्षों से हम वैसे ही हैं..बल्कि हमारे कारवाँ में बाहर से आए लोग भी जुड़ते गए...ऐसा इसलिए हो सका कि हम किसी एक विचारधारा के होकर नहीं रहे बल्कि भिन्न-भिन्न विचार समूहों से भी अपने विचारों को जोड़ते गए...इसी प्रवृत्ति को मैंने ‘हिन्दू विचारधारा’ के रूप में ग्रहण किया...तो मेरे भाई हम भविष्य की इस कोरी कल्पना में अपने को क्यों हलाकान करें..? हाँ एक बात और है...आने वाले समय में ‘विज्ञान का आतंक’ होगा और आज का यह परिवेशगत ‘धर्म’ अपनी मौत मर जाएगा..! जो समाज अधिक दक्ष होगा उसके जीवितता की उतनी ही अधिक संभावना रहेगी..ऐसे में आज के इस धर्म के आडम्बर और इसके लिए होने वाले संघर्ष का महत्त्व शनैः-शनैः अपने आप कम होता जाएगा परिणामतः बहुसंख्यक अल्पसंख्यक के तर्क का कोई अर्थ नहीं होगा और इस प्रकार प्रतिक्रियावादियों के ये तर्क भी बेमानी हैं...
         
                 एक बात मैं आप को और बता दूँ....वैसे भी मेरी आदत किसी के ‘धर्म’ पर टिप्पड़ी करने की नहीं रही है...और मैं आतंकवाद को धर्म से भी नहीं जोड़ता लेकिन जिस परिवेश में आतंकवाद प्रश्रय पाता है आतंक उसी परिवेश का माना जाएगा...अगर इस्लाम में आतंकवादी कुछ ज्यादा ही पैदा हो रहे हैं तो यह भी उनके अपने परिवेश का ही दोष है शायद इसी कारण इसे धर्म से जोड़ दिया जाता है...और उनके ‘धर्म’ ने तर्क को स्थान नहीं दिया जिसके कारण ही यह दोष उन्हें झेलना पड़ रहा है....| हाँ मैं ‘हिन्दू’ शब्द को किसी धर्म की परिधि में नहीं बाँधता और न ही इस शब्द के लिए कोई स्थिर विचार ही पाता हूँ की कह दूँ कि यही हिन्दू है...मतलब ‘हिन्दू’ शब्द में मैंने विचारों का प्रवाह पाया है जिसमें सब कुछ बहता चला जाता है...शायद यही कारण है कि हिन्दू जीवन दर्शन में ‘सेक्युलर’ या धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्द गढ़े हुए प्रतीत होते हैं....हिन्दू विचारधारा में इन शब्दों की कोई आवश्यकता भी नहीं है...लेकिन...इस जीवन दर्शन को जब मैं आडम्बर में उलझा हुआ पाता हूँ तो भयभीत हो जाता हूँ...अब अपने भोंडे प्रदर्शन से यह भी ‘धर्म’ बनने लगा है...जिसके अपने खतरे होते हैं...आतंक भी इन्ही खतरों में से एक है...क्योंकि कोई भी परिवेश लोगों को अपने ‘धर्म’ में ढालने लगता है...और यह वैचारिक प्रवाह में बाँध बन कर खड़ा हो जाता है...मेरे भाई यदि हम ही अपनी आलोचना नहीं करेंगे तो कौन करेगा...? हमारे यहाँ तो शास्त्रार्थ की संस्कृति रही है...हम विभिन्न तर्कों को ग्रहण करते हुए ही अपने धार्मिक विचार गढ़ पाए हैं...जो आज भी जारी है...यही हमारी उदात्तता है...इसी कारण हम बेधड़क हो अपने ही ऊपर लिख पाते हैं...लेकिन इसी से हमने दूसरों की आस्थाओं का सम्मान करना भी सीखा है हम तर्क कर सकते हैं लेकिन ‘तू-तड़ाक’ की शैली में दूसरों की आस्थाओं पर असम्मान व्यक्त नहीं कर सकते...!! जब तक कोई आवाज अपने अन्दर से ही नहीं आती तब-तक किसी व्यक्ति, समुदाय या धार्मिक समूहों की विसंगतियों में सुधार नहीं लाया जा सकता तथा बाहर की आवाज तो प्रतिक्रियावाद को ही जन्म देती है जिसमें आतंक और विकृतियाँ छिपी होती हैं|
         
               मेरे भाई एक बात और कहना चाहता हूँ...वैसे अपनी प्रतिष्ठा किसे अच्छी नहीं लगती लेकिन यह सब जो लिखता हूँ किसी प्रतिष्ठा की इच्छा में नहीं लिखता...क्योंकि ‘प्रतिष्ठा शुकारोविष्ठा’ जैसे वाक्य को मैंने कहीं पढ़ लिया है अब इसका अर्थ चाहे जो हो लेकिन मैंने इसका अर्थ यही ग्रहण किया है कि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा पाने की लालसा उसे उसके कर्तव्य से विमुख कर देती है...अगर मैं लिखता भी हूँ तो वे मेरे अन्दर उठने वाले विचार ही होते हैं ये किसी प्रतिष्ठा के मोहताज नहीं हैं क्योंकि ‘राजपद’ और ‘स्वर्णमुद्राओं’ की अभिलाषा में केवल ‘रीतिकाव्य’ ही रचा जा सकता है...जिसका साहित्यिक मूल्य तो हो सकता है लेकिन यह आत्मिक और सामाजिक मूल्य विहीन ही होता है...इस गुलामी को मैं पसंद नहीं करता...इसी रीतिकाल के बाद भारत राजनैतिक गुलामी के मकडजाल में भी उलझ गया था...
        
              अंत में एक बात और कहना चाहता हूँ...टपकती बूँदों की प्रतिक्रिया में बुलबुले तो बन जाते हैं और रंगीन भी दिखाई देते हैं लेकिन ये शीघ्र ही खो जाते हैं; जबकि यही बूँदे धीरे-धीरे समुद्र गढ़ देती हैं...तो..मेरे भाई व्यर्थ की प्रतिक्रिया में विचारों का बुलबुला न खड़ा करें बल्कि इससे बेहतर है बूँद बन जाना...! क्योंकि एक सागर बूँदों की प्रतीक्षा कर रहा होता है...हिन्दुस्तान भी तो एक सागर ही है...!!
       
        यह सब मैंने क्यों लिखा इस सम्बन्ध में फेसबुक पर कुछ दिनों पूर्व मेरे द्वारा की गई एक पोस्ट और उस पर की गयी टिप्पड़ियों को पढ़ लें जिसे मैं यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ....हो सकता है बातें कुछ-कुछ समझ में आ जाएँ......         
            
         "अपनी फेसबुक प्रोफाइल में धार्मिक दृष्टिकोण के अंतर्गत मैंने पहले अपने लिए 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग किया था...लेकिन न जाने क्यों मैंने इसे "अहिंसा परमोधर्मः" में बदल दिया था...जिसे आज पुनः मैंने "हिन्दू" में बदल दिया...हालाँकि इसे बदल देने का मन कई दिनों पहले से हो रहा था..लेकिन ऐसा नहीं कर पा रहा था...
लेकिन आज जब मैंने 'दैनिक जागरण' एक छोटी सी न्यूज़ पढ़ी "बोले मुसलमान, नेपाल को फिर से दो 'हिन्दू' पहचान"...इस समाचार का सार यह था कि 'मुसलामानों के अनुसार धर्मनिरपेक्ष नेपाल से ज्यादा महफूज वे हिन्दू नेपाल में रहेंगे| क्योंकि एक धर्मनिरपेक्ष नेपाल में धर्मपरिवर्तन का खतरा अधिक दिखाई देता है...
असल बात यह है कि..मुझे लगा कि 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग हम केवल धर्म के सन्दर्भ में ही क्यों करे...इस शब्द का अर्थ मैंने एक विचारधारा के रूप में लिया जो किसी धार्मिक विचारधारा से इतर अर्थ रखता है और जिसका मतलब है कि सभी व्यक्तियों के विचारों का सम्मान होना चाहिए चाहे आप उससे सहमत हों या न हों..वास्तव में मैंने जब अपने 'रिलीजियस व्यू' को 'हिन्दू' से बदल कर "अहिंसा परमोधर्मः" किया था तो कुछ दिनों बाद मुझे प्रतीत हुआ कि कहीं इसे लिख मैं अपनी विचारों में कट्टरता को तो प्रश्रय नहीं दे रहा..? क्योंकि 'हिन्दू' शब्द में एक विराट विचारधारा को समाहित है..जबकि 'अहिंसा' कुछ-कुछ मुझे 'हिन्दू' शब्द से कम व्यापक प्रतीत हुआ...इसी कारण इसे मैंने फिर से 'हिन्दू' कर दिया|
               वास्तव में "अहिंसा परमोधर्मः" मुझे अपने इसी हिन्दू जीवन शैली से मिला था..अतः मुझे अपने पहले बदलाव पर दुःख पहुँचा..प्रायश्चित स्वरुप मैंने इसे फिर 'हिन्दू' कर दिया"

              एक बात और है 'हिन्दू' विचारधारा में लाख कमियाँ हों लेकिन अंत में आधुनिक भारतीय राज्य व्यवस्था में "भारतीय संविधान' इसी की देन है...हमें अपनी कमियों से भी लड़ने की प्रेरणा यही 'हिन्दू विचारधारा ही देती है..'

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एक मित्र - परम् सुहृद विनय कुमार तिवारी जी सर्वोच्च न्यायलय ने भी हिन्दू की व्याख्या में एक जीवन शैली/एक विचारधारा ही पुष्ट किया है । ये हिन्दू शब्द पूरी सनातन संस्कृति का आत्मशातिकरण है। कुछ सिरफिरों/नासमझों को इस शब्द संस्कृति की स्वर्णिमता /सोंधी महक पल्ले नही पड़ती तो*****। आप के इस बौद्धिक पोस्ट ने ह्रदय को गदगद कर दिया। हार्दिक धन्यबाद।
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अग्रज- Kanwaria me Hindu atankvad ka roop hame dikhai de raha hai Aisa kyon?

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Vinay Kumar Tiwari haan aap ne theek hi kaha hai..is buraai se bhi "hindu" hi ladenge..jiska pramaan swayan aap ka prashn hai..
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एक मित्र- Bilkul sahi Vinay Kumar Tiwari ji
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एक मित्र-App logo ko lajja nahi aa rahi hai kawariyo ko hindu aatankwadi kahne me. Dub mariye apni aisi vichardhara ke sath.
·          एक मित्र- ............ kis aingal se tumhe kawariyo me hindu aatankwad dikh raha hai. Dharm nirpechhata aur apne kuch musalman dosto ki najaro me ucha uthne ke liye is star tak gir jaoge.
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एक मित्र-Abhi tak to gala fad rahe the ki aatankwad ka dharm nahi hota to fir ye hindu aatankwad kaha se ho gaya.
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Vinay Kumar Tiwari मित्र ji लगता है काँवरियों के भीड़ में से नहीं गुजरे हो अन्यथा इनके आतंक का सही अन्दाजा होता। एक बात और है धर्म जब दिखावे का रूप ग्रहण करने लगता है तो धीरे-धीरे आतंकवाद में ही बदलने लगता है, वैसे भी आपका तथाकथित हिन्दू धर्म सामूहिक ऊपासना पद्धति में विश्वास नहीं रखता और हिन्दू "धर्म " की उदारता का यही राज है।
इस सामूहिक आडंबरपूर्ण नए प्रचलन के समर्थन में पूरबिए अन्दाज से हटकर आपकी "तू-तड़ाक" की शैली हिन्दू आतंकवाद के आगमन का संकेत है
·        मित्र -Vinay tiwari ji yahi tipaddi aap us samay karte jab alvida ki namaj ke liye raste band kara diye jate hai aur tajiyo ke julus ke liya vijali ke khambho ka tar kat diya jata hai uske bad aap kawariyo par ungli uthate.
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एक मित्र Chan kawariyo ki udandata ko aap hindu aatankwad ka nam de rahe hai. Mai aap ko salah de raha hu ki aap apna dharm badal lijiye nahi to pana nahi ye hindu aatankwDi aapke sath kya karenge.

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एक मित्र Maine dekha hai gopiganj aur me aur saidabad ke aage alvida ki namaj ke liye kawariyo ko 4 kimi ghuma kar bheja gaya jo nahi gaye unhe rok diya gaya.

· एक मित्र Tab aap kaha the

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एक मित्र  Jisdin hindu aatankwadi ho gaya us din aap jaise seqular logo ka nakab utar jayega

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एक मित्र Aur agar ye kawariye hindu aatankwadi hote to pradesh sarkar dwara lagaye gaye baja pratibandh ko tod dete. Lekin unhone aisa nahi kiya.

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एक मित्र Mai aap ki bahut ijjat karta tha aur aap ki sabhi tippadiya bahut hi sundar aur man ko chhune wali hoti thi lekin mujhe lagta hai ki aap bhi aapne aap ko seqular aur budhhajivi dikhane ke liye is tarah ki tippadiya kar rahe hai.


         

शनिवार, 8 अगस्त 2015

तड़फड़ाती ये नन्हीं सी मछलियाँ

        “भईया तू शहर जाएगा...?” ‘बिने’ की छोटी बहन ने जब अपने भाई से यह प्रश्न किया तो दोनों अपने गाँव के किनारे वाले भीटे पर खेल रहे थे...हरी-हरी दूब पर वे दोनों अपने में ही मगन थे कि तभी दिप्पी ने अपने से चार-पाँच साल बड़े भाई से यही प्रश्न पूँछ लिया था..उस समय बिने दूब की डंठल से सींकें बनाकर इसे चींटों के बिल में डाल कीड़े निकाल रहा था...बिल में जब कीड़ा इस सींक को पकड़ता तो उसे ऐसा लगता जैसे यह कीड़ा सींक को अपनी ओर खींच रहा हो...तब बिने सींक को धीरे-धीरे बिल से खींचने लगता...इसी के साथ वह कीड़ा भी निकल आता...! इसे देख दोनों ताली बजाते...एक बिल से दूसरे में वह यही क्रिया दुहराता जा रहा था...इस खेल में उसे बहुत मजा आ रहा था...गाँव के अन्य बच्चे भी वहीँ पास में ही नीम के पेड़ की छाया में बैठ अपनी घास चरती भैसों की रखवाली कर रहे थे कि कहीं ये किसी की फसल वाली खेतों में न चली जाएं...कुछ बच्चे वहीँ नजदीक के गड़हे में मछलियाँ भी पकड़ रहे थे...हालांकि बिने के पास चराने के लिए अपनी भैंस तो थी नहीं..! लेकिन अपने-अपने जानवर चराते बच्चों के साथ खेलना उसे बहुत अच्छा लगता...कभी-कभी तो उसका पूरा दिन ऐसे ही खेलते हुए बीत जाता...! आज उसकी छोटी बहन भी उसके साथ खेलने आई थी...खेलते-खेलते ही उसने अपने भाई से यही पूँछा था...!

         छोटी बहन दिप्पी के इस अप्रत्याशित प्रश्न पर “नहीं तो..” कहते हुए बिने सींक को वहीँ बिल में छोड़ उसकी ओर देखने लगा...! “बापू कह रहे थे भईया शहर से तेरे लिए नई फिराक लाएगा...” भाई को अपनी ओर देखते हुए दिप्पी ने फिर कहा| “कैसे शहर जाऊँगा..? छोटा हूँ...बड़े होने पर तेरे लिए फिराक लाऊंगा..!” कहते हुए बिने उठ खड़ा हुआ..लेकिन..पता नहीं क्यों अब वह थोडा उदास सा हो गया था...खेलने में उसका मन नहीं लगा..“आ घर चलें” कहते हुए उसने दिप्पी का हाथ पकड़ लिया..दोनों घर की ओर चल दिए...वैसे बिने खेलने में ही मस्त रहता है, अभी वह किसी दुनियादारी को नहीं समझता...लगभग इग्यारह-बारह साल का लड़का कुछ समझेगा भी नहीं..! लेकिन छोटी बहन के इस प्रश्न ने उसे थोड़ा विचलित जरुर कर दिया...

         आज से दो दिन पहले वह ऐसे ही खेल कर जब घर वापस आया था तो साँझ हो चली थी...माँ ने घर में अभी तक चूल्हा नहीं जलाया था..! अकसर माँ इस समय तक चूल्हा जला लेती थी...हालाँकि कभी-कभी उसे चूल्हा जलता हुआ नहीं भी मिलता था...तब पिता के आने के बाद ही माँ खाना बनाना शुरू करती थी...लेकिन माँ आज उदास थी..! उसे देखते ही वह गुस्से में बिफर पड़ी थी...और फिर...उसकी पीठ और गाल माँ की मार से लाल हो गए थे...! माँ रोते हुए अपना भाग्य भी कोसते जा रही थी “हे भगवान कहाँ से यह ‘बहीपार’ लड़का दे दिए हो..! न पढ़ाई न लिखाई...बस खेलना...एक इसी का तो आस था...यह भी...” तभी उसके पिता घर के सामने छप्पर के नीचे पड़े झिंलगी सी चारपाई पर साथ लाए छोटे से झोले को रखते हुए “का बात हइ..” कहते हुए बिने की ओर देखने लगे थे...बिने माँ से मार खा चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था....उसके पिता को समझते देर न लगी “अच्छा ये ससुर आज फिर बहीपारी किये हैं...” कहते हुए पिता ने उसे मारने के लिए हाथ उठाया...तभी बिने की माँ बोल उठी “रहई दो हमने बहुत मारा है”...और इसी के साथ पति का हाथ भी पकड़ लिया..“ससुरा हेहर हो चुका है..” कह बिने के पिता झिंलगी चारपाई की ओर दिप्पी को पुकारते हुए लौट गए...माँ से मार खाते भाई को दिप्पी भी वहीँ खड़ी होकर चुपचाप देख रही थी..पिता ने झोला दिप्पी को पकड़ाया...शायद वह मजूरी कर के आए थे..! फिर थोड़ी देर बाद ही चूल्हा भी जल चुका था...

          उस दिन पिता माँ से कह रहे थे “अधिया खेत की जोताई में कोनों फायदा नहीं..एक तो मालिक खाद-बीज, पानिऊ का नाहीं देते...कहते हैं..फसल में सब काट के बाँट लो...और फसल कैसे हो...? पानी नाहीं बरसत...! नहर के हाल ई है कि एक तो आवत नहीं औउर आवत भी है तो ई बड़कन पहिले से ही घार काट लेत हैं...पानी मिलबे क नाहीं...बोलो तो मार करई पर उतारू....कैसे खेती हो...देखो न पिछली बार कुछ पैदई नाहीं भा औउर खाद..बीज..जुताई का कर्जा ऊपर से...हाँ...एंसवऊँ का हाल इहे जान पडत है..!”

           इधर पास में ही एक टूटे पायों वाले खटोले जो शायद उसके जन्म के समय उसके पिता ने बनवाया था..उसी पर वह माँ की पिटाई से नाराज लेटा माता-पिता के बीच चल रही  वार्तालाप भी सुनता जा रहा था...“हमहूँ सोचे रहे ई तोहार लड़िका पढ़ी लेत तो कुछ कष्ट कटत...लेकिन एकर कोनऊ ठीक लच्छन नाहीं देखात बा” माँ ने ही कहा..पिता की आवाज सुनाई दी “अरे हाँ..ऊ आज तो बड़ी मुश्किल से काम मिला...हम तो निराश लौटा आवत रहे..ऊ तो गोमवा मिली गवा कहेस कि जहाँ काम कर रहा है एक मजूर की अउर जरुरत है...मुला बहुत खटई क पड़ा पूरे आठ घंटा..!” माँ सुनती रही थी...कुछ क्षण बाद लम्बी स्वाँस भरते हुए बोली, “हाँ...तो आज फिर चूल्हा जलबऊ मुश्किल होतई...” अचानक उसके पिता को जैसे कुछ याद आ गया था..बोले..“अरे हाँ..! याद आवा...गोमावा के जान-पहचान का कोई साहेब शहर में रहत हैं...उनको कोनऊ लड़िका का जरुरत है...ऊ कहत रहे कि महीना में पैसा ठीक-ठाक मिलि जावा करे...”

          फिर...उसने ने सुना...उसी को शहर भेजने की बात पिता कर रहे हैं क्योंकि वह स्कूल नहीं जाता..दिन भर खेलता रहता है..’बहीपारी’..करता रहता है...ऐसे में शहर वाले साहेब के यहाँ उसके काम करने से दो-चार पैसे मिलेंगे...चूल्हा जलने में आसानी होगी...फिर..दिप्पी के विवाह में भी उसकी कमाई काम आएगी...बिने ने माता-पिता के इस वार्तालाप को सुना भर...! इससे ज्यादा वह कुछ सोच नहीं पाया था...तभी दिप्पी की आवाज भी उसके कानों में पड़ी थी...”माँ भईया शहर जाएगा..?” माँ के गले को पकड़ लगभग झूलती सी दिप्पी ने पूँछा था.. “हाँ तेरे लिए वह शहर से फिराक लाएगा..” यह सुन उसने खटोले से ही माँ की ओर देखा था..पिता वहीं माँ के पास मोढ़े पर बैठे दिप्पी से यही कह रहे थे...रोटी सेंकती माँ झल्लाई सी दिप्पी को परे धकेल दिया था...दिप्पी आकर पिता की गोंद में बैठ गई थी...भीटे पर खेलते समय दिप्पी ने इन्हीं बातों को सुन भाई से शहर जाने वाला प्रश्न किया है|

          माता-पिता ने उसकी ‘बहीपारी’ से पहले उसे स्कूल भेजने का भी प्रयास किया था...पहले दिन तो पिता स्वयं उसे स्कूल तक लेकर गए थे..! दूसरे दिन वह स्कूल नहीं जाना चाहता था...रोने लगा था..माँ की धोती पकड़ लटक सा गया...तब..उसे खींच कर उसकी बाँह पकड़े हुए ही पिता उसे भीटे तक ले गए थे...! इस भीटे से होकर गुजरता रास्ता स्कूल तक जाता था...उस दिन तो वह रोते हुए ही अन्य बच्चों के साथ स्कूल गया था..! गाँव के इस दूर-दराज के स्कूल में अकसर मास्टर जी ही नहीं आते थे..! कभी-कभार मास्टर जी आये भी तो प्रधानाध्यापक कक्ष में ही बैठे-बैठे न जाने क्या करते रहते...वह स्कूल में यूँ ही बैठा रहता...कोई किताब खोलने के लिए भी उससे नहीं कहता..! बस स्कूली बस्ते के साथ वह आता और वैसे ही वापस फिर घर चला जाता...इस स्कूली पढ़ाई से उसका मन उचटने लगा था...ऐसे ही कुछ दिन बीतने के बाद वह स्कूल जाते रास्ते से ही खेलने के लिए मुड़ जाता...और..दिन भर इधर-उधर खेलता रहता...

         खासकर बरसात के दिनों में...! कई दिनों की बारिश के बाद जब तालाब का गँदला पानी बह जाता और चारों तरफ हरियाली फूट पड़ती तब इसके बाद होने वाली बारिशों से उफनते तालाब से साफ पानी नाले की ओर बहने लगता...! इस साफ बहते पानी में तैरती छोटी-छोटी मछलियों को बिने देर तक देखता रहता...! कभी-कभी झुण्ड में तैरती इन नन्हीं-नन्हीं मछलियों को वह अपनी छोटी-छोटी अंजुरियों में भरकर उठा लेता...अंजुरियों का पानी रिस जाने पर जब ये मछलियाँ तड़फड़ाने लगती तो वह इन्हें फिर से उसी पानी के बहाव में छोड़ देता...आड़े-तिरछे तैरकर भागती इन नन्हीं मछलियों को देख वह बहुत खुश होता...! ...और स्कूल जाने की बात भूल जाता....!

         ऐसे ही बरसात के दिनों में, बहते पानी से मछलियाँ पकड़ने के लिए वह लोगों को ‘परहा’ लगाए देखता तो स्कूल का रास्ता छोड़ वहीँ पहुँच जाता..और...घंटों उछलती-कूदती मछलियों को ‘परहे’ में फँसता देखता रहता..! ‘परहे’ में फँसी इन मछलियों को पास में ही खोदे गए एक छोटे से गड्ढे में रखा जाता...गड्ढे के थोड़े से पानी में ये मछलियाँ तड़फड़ाते हुए मरती रहती...! ऐसे ही एक दिन जब वह एक परहे के पास बैठा था...गड्ढे में रखी इन मछलियों पर उसका ध्यान गया...! आव देखा न ताव उसने झट से अपनी छोटी-छोटी अंजुरियों से गड्ढे की सारी मछलियों को बहते पानी में उलीच दिया...! ऐसा करते देख कोई चिल्लाते हुए उसकी ओर दौड़ा था...किसी तरह मार खाने से बचते हुए वह घर भाग कर पहुँचा...बाद में, पिता की खूब मार पड़ी...उस ‘परहे’ के पास से उसके छूटे हुए स्कूली बस्ते को भी पिता ही ले आए थे...! पहले से ही स्कूल से उसका मन उचटता जा रहा था लेकिन इस घटना के बाद तो उसका स्कूल जाना ही लगभग बंद हो गया...! इसके लिए कई बार मार भी पड़ी लेकिन उस पर कोई असर नहीं होता...हाँ दो दिन पहले माँ की मार से वह नाराज हो खटोले पर सो गया था...माँ ने उसे खाने के लिए बाद में जगाया था|

         भीटे से ही दिप्पी का हाथ पकडे-पकड़े जब बिने घर पहुँचा तो...चूल्हा जला हुआ था...धुएँ से घिरी माँ उसे देखते ही उठ खड़ी हुई...उसके पास आई...उसके माथे पर अपना हाथ फेरा और कुछ ऐसा ही बोली “तू इतना खेल कर भी नहीं थकता” माँ ने जैसे उसे दुलारा हो..! पिता ‘मजूरी’ से आज कुछ जल्दी आ गए थे...शायद गोमा से मिलने चले गए थे...माँ तब तक कच्ची कोठरी से एक लड्डू ले आई और आधा-आधा भाई-बहन को दे दिया...

        अगले दिन सबेरे बिने जब सोकर उठा तो देखा...पिता ‘मजूरी’ पर नहीं गए थे...बात यह थी कि वह नजदीक के कस्बे में एक निर्माणधीन मकान में ‘मजूरी’ कर रहे थे, कल ही उस मकान पर छत डाला गया था..वहाँ का काम अब खतम हो गया था...हाँ वह लड्डू भी छत पड़ने की ख़ुशी में उसी निर्माणाधीन मकान के मालिक ने बाँटा था...पिता ने इस लड्डू को वहाँ नहीं खाया था....जिस दिन पिता घर पर रहते उस दिन बच्चों के साथ खेलने जाना उसके लिए आफत को दावत देने जैसा होता...हालाँकि..ऐसी स्थितियों में...खेलने के चक्कर में गाहे-बगाहे पिता से मार खा जाना उसकी आदत में शुमार होता जा रहा था....

         लगातार तीन-चार दिनों की ‘मजूरी’ के बाद बिने के पिता को आज आराम करने का मौका मिल गया था...हाँ अब तक दिन भी चढ़ गया था...बिने ने देखा पिता झिंलगी खटिया पर आँखें बंदकर हुए लेटे हुए थे...माँ भी दिप्पी के साथ पड़ोस में कहीं गई थी...इधर बिने की मंडली के बच्चे अपने-अपने जानवरों को ले निकल गए थे...वह उन बच्चों के साथ खेलने के लिए बेचैन हो उठा...

          बिने इस समय अपनी पूरी ताकत के साथ दौड़ रहा था....वह जल्दी से जल्दी उन बच्चों के साथ हो लेना चाहता था...उनके साथ खेलना चाहता था....बिने दौड़ते हुए भीटे पर पहुँचा..लेकिन बच्चे वहाँ नहीं मिले...दूर उसे बाग़ के पास कुछ जानवर चरते दिखाई दिए...उसने फिर दौड़ना शुरू किया...अरे...! आज सब ‘चिल्होर’ खेल रहे है...हाँ इस खेल में उसे बहुत मजा आता है...पेड़ों पर चढ़ने का तो वह मास्टर है ही....कोई तने और डालों में ही अटका हो तब तक वह पेड़ की फुनगी छू लेता था....और उसकी यह योग्यता ‘चिल्होर’ जैसे खेल में खूब काम आती...मजाल है कि कोई बच्चा उसे छू ले..! इस डाल से उस डाल पर बंदरों की भांति उछलते-कूदते फिर धम्म से जमीन पर...और जब तक ‘चोर’ बच्चा छूने के लिए उसके पास पहुँचे वह उस दो पेड़ों के बीच गोले में रखी दो फीट की डंडी के पास पहुँच जाता...और एक टांग को उठाकर  उसके बीच से उस डंडी को ऐसा फेंकता कि दूर जाकर गिरती...जब तक ‘चोर’ बच्चा उसे उठा कर वापस उसी गोले में रखता तब तक बिने पेड़ की डालियों के बीच बैठा हँस रहा होता...उसे ‘चोर’ बनने का मौका कम ही मिलता...हाँ बच्चों के बीच उसे ‘बंदर’ की उपाधि मिली थी...

          बिने अपने प्रिय खेल ‘चिल्होर’ के इसी खेल में मगन था...अभी-अभी वह डंडी फेंककर पेड़ की डालियों के बीच आया ही था...उसके कानों में “भईया..भईया...तू...कहाँ हो...” सुनाई पड़ा...अरे ...यह तो दिप्पी की आवाज है...उसकी छोटी बहन की...! जो रूवांसी हो उसी को पुकार रही थी...वह झट से पेड़ से उतर आया...उसने देखा....दूर..दिप्पी दौड़ती चली आ रही है...! वह दौड़ कर दिप्पी के पास पहुँच गया...

          बात यह थी...जब बिने, पिता को सोता समझ खेलने के लिए चला गया था उसी के थोड़ी देर बाद ही उसकी माँ भी पड़ोस से वापस आ गई थी...आहट पा उसके पिता जाग पड़े थे...आते ही माँ ने पूँछा “बिने के बापू...बेटूवा कहाँ गवा...?” पिता ने इधर-उधर नजरें घुमाई “अरे दिप्पी की माई...! गवा होये ससुरा कहीं..बहीपारी करई...ई धोबी क कुत्ता न घर का न घाट का...” यह कहने को तो बिने के पिता ने कह दिया..लेकिन पत्नी से जैसे आँखे चुराते हुए कहा हो...तभी बिने की माँ बोल उठी “बस बहुत होई ग बिने क बापू..बेटुवा क इतना जिनि बोला...कई त लिहा अपने मन का...अबई हमार ई छोट बच्चा तू अबहीं से सयान बनइ देत हया...!” इतना कह बिने की माँ वहीँ घर के सामने नीम के पेड़ के चारों ओर बने मिट्टी के चबूतरे पर बैठ सुबकने लगी..इस घटनाक्रम से भौंचक दिप्पी सुबकते हुए माँ को देखे जा रही थी...पिता दूसरी ओर मुँह फेर जैसे अनजानी सी राहों की ओर ताकने लगे थे...
                                               
         माँ सुबक रही थी...देख...दिप्पी परेशान हो उठी...उससे नहीं रहा गया...माँ के पास पहुँची...बोली...माँ रोती क्यों हो...भईया शहर जाएगा...फिराक लाने..? हाँ...न..नहीं..हाँ...कब लेकर आएगा..? ...कल आ जाएगा न..?...नहीं...फिर मेरा फिराक कब लाएगा...? मेले में पहनुंगी...माँ कुछ नहीं बोली...माँ बता..भईया काल्हि के काल्हि के बाद फिराक ले कर आ जाएगा न...?....नहीं दीवाली पर आएगा...दीवाली पर...? माँ...एक दिन तू कह रही थी इस बार भईया और हम दोनों साथ मेला देखने जायेंगे...माँ कुछ नहीं बोली...नहीं माँ मैं फिराक नहीं लुंगी...भैया शहर न जाए...फिराक नहीं लुंगी माँ...! अब दिप्पी भी सुबकने लगी...माँ ने उसे अपनी गोंदी में बैठा लिया...अचानक दिप्पी का सुबकना बंद हो गया..धीरे से...माँ से अलग हो वहीँ से भीटे की ओर देखने लगी...वह भीटे की ओर दौड़ पड़ी...

         भीटे के चारों ओर दिप्पी ने भईया को खोजा...फिर वह तालाब की ओर गयी...बिने वहां भी नहीं दिखाई दिया..भईया..! हे भईया..!! ई भैइयवा कहाँ गवा...भईया रे...जोर से दिप्पी चिल्लाई...! दिप्पी अब बाग़ की तरफ भागी...भईया पेड़ पर चढ़ता दिखा..भईया...भईया पुकारते वह उसी ओर दौड़ पड़ी...

         पेड़ से उतर दिप्पी को पकडे-पकडे बिने बोला..“का है दिप्पी”....“भ..ई...या...ऊ..” दिप्पी हांफ रही थी कुछ क्षण की चुप्पी के बाद दिप्पी ने कुछ इसी तरह से कहा, “भईया...मैं...फ़िराक...नहीं..लुंगी..तू शहर नहीं जाएगा..” दिप्पी फिर बोली.. “चल भैया..बापू से बता दे...” बिने के कुछ समझ में नहीं आया उसने अपने पीछे खड़े बच्चों की ओर मुड़कर देखा..और...दिप्पी का हाथ पकड़ धीरे-धीरे क़दमों से घर की दिशा में चल पड़ा...बिने को कुछ-कुछ इसका अहसास हो चला था कि उसे शहर जाना है..कल रात...पिता जब गोमा के यहाँ से लौट कर आये थे तो माँ से यही कह रहे थे...गोमा के यहाँ शहर वाले साहब से बात हुई गयी है...पिता माँ से यह भी कह रहे थे कि दो दिन बाद लड़के को शहर लेकर जाना है...फिर उसे गहरी नींद आ गई थी...लेकिन रात वाली यह बात सबेरे वह भूल चुका था...और वैसे ही मस्ती में खेलने चला गया...

           घर पहुँच कर उसने देखा पिता वैसे ही खटिया पर पड़े थे...माँ देहरी पर उदास बैठी थी...उसे देख माँ कुछ नहीं बोली...वह जाकर पिता की खटिया पर बैठ गया...पिता को कुछ आहट हुई...देखा बिने बैठा है...वह उठ गए...बिने के सिर पर हाथ रखते हुए कहा “काल्हि” शहर चलना है आठ बजे वाली गाड़ी से...सबेरे ही नहा-धो लेना...बिने कुछ नहीं बोला..दिप्पी भी आई...पिता से बोली “बापू फिराक नहीं लेंगे..” बापू ने अनसुनी कर दिया...बिने अब वहां से उठकर दुवारे के छोटे से नीम के पेड़ की छाया में अपने टूटे हुए से खटोले पर जाकर लेट गया...वहीँ दिप्पी भी आ गयी...वह वहीँ खटोले के ही पास जमीन पर बैठ मिटटी से कुछ खेलने लगी थी...बिने शांत लेटा हुआ दिप्पी को देखते जा रहा था....

           आज बिने को शहर जाना था...पिता ने सबेरे ही उसे जगा दिया था...हाँ दिप्पी भी जाग उठी थी...दिप्पी को भी यह अहसास हो चला था कि भईया आज शहर चला जाएगा...दिप्पी बिने के पास आई..बोली...भईया चलें खेलें...बिने ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की...दिप्पी ने बिने का हाथ खींचते हुए फिर खेलने वाली बात दुहराई...बिने चुपचाप दिप्पी का हाथ पकड़ भीटे की ओर चल दिया..वहाँ घूमते हुए वह तालाब की तरफ मुड़ गया...हाँ...हाल में ही हुयी बरसात से तालाब उफन चुका था...इसका साफ़ पानी छहरते हुए धीमी गति से बहता हुआ दूर नाले में जाकर मिल रहा था...बिने ने देखा...इस छहरते पानी में नन्हीं छोटी-छोटी मछलियाँ आड़े-तिरछे तैरती चली जा रही थी...हाँ...आज वह इन्हें अपनी अंजुरियों में भरकर नहीं उठा रहा था...इन नन्हीं मछलियों को वह ऐसे ही तैरते देख बहुत खुश हो रहा था...अपने पैरों से छहर कर बहते इस पानी में..छप..छप..करते इन मटमैली...चमकीली...तैरती नन्हीं मछलियों के पीछे वह बहन के साथ भागने लगा था..दोनों भाई-बहन इसी में मगन थे तभी पीछे से पिता की आवाज कानों में पड़ी...
        

         ...माँ फटे आँचल से अपने आँसू पोंछे जा रही थी...और...दिप्पी माँ का हाथ पकड़े सुबक रही थी...बिने पिता के पीछे-पीछे चला जा रहा था...उसे शहर के लिए आज गाड़ी पकड़ना था...

              बिने को शहर आए हुए दो माह से अधिक हो चला था...शहर में दो पड़ोसनों के बीच की इन बातों को  एक पड़ोसन ने अपने पति से साझा किया...वह बात यह थी....

            "क्या कहें वह बच्चा ही तो था उसकी उम्र यही कोई दस-बारह वर्ष के बीच रही होगी...पड़ोसन के यहाँ वह नौकर के रूप में काम करने आया था...घर के सारे काम तो वह बहुत सलीके से करता था लेकिन पड़ोसन ने बताया कि उस लड़के का यहाँ शहर में उनके घर मन नहीं लगता था...उस बच्चे के पिता ने घर की आर्थिक तंगी के चलते ही उसे एक घरेलू नौकर के रूप में शहर में भेजा था लेकिन उस बच्चे को यह नहीं पता था कि वह यहाँ एक घरेलू नौकर के रूप में काम करने आया है...उस बच्चे के घरेलू काम करने के बदले मासिक ढाई हजार रूपया उसके पिता के हाथों में दे दिया जाता था...
         
               पड़ोसन यह भी कह रही थी कि...वह लड़का अकसर अपने घर और गाँव को लेकर परेशान हो उठता और कहता, “मैं यदि अपने गाँव होता तो तालाब में नहाने जाता; दिन भर तालाब में डूबा रहता...मछली मारता..पेड़ पर चढ़ आम तोड़ता..गंजी खोदता...लेकिन यहाँ क्या है..यहाँ कुछ भी नहीं है?” पड़ोसन बता रही थी कि अकसर वह इन्हीं बातों को दुहराता रहता था....एक दिन जब वह बच्चा बहुत परेशान हो उठा तो पड़ोसन ने अपना मोबाइल बच्चे को देकर अपने पिता से बात कर लेने के लिए कहा...बच्चे ने मोबाइल पकड़ते ही अपने पिता से कहना शुरू किया, “अरे बापू..! यहाँ आऊ हमको तुरन्त लियाव जाव...यहाँ न तालाब है..न गंजी के खेत हैं...न आम के पेड़ हैं...यहाँ कुछ नहीं है, हमारा मन नहीं लगता हमें लियाई जाव..” पड़ोसन ने बताया....यह बात करते समय उस बच्चे की आँखों में आंसू भी छलक पड़े थे.....फिर उस बच्चे का पिता शहर आया और उसे वापस गाँव लिवाकर चला गया.....हाँ...पड़ोसन यह कह रही थी कि यदि वह लड़का घर पर रुकता तो हम उसके महीने के पैसे और बढ़ा देती क्योंकि वह घर के कामों को बहुत होशियारी और लगन के साथ करता था...

              .....मैं सोचती हूँ...उस बच्चे का बचपना..कितना अल्हड़..रहा होगा..! एकदम निच्छल..निर्मल..! उस बच्चे को उसका पिता तो वापस लेकर चला गया, लेकिन न जाने ऐसे कितने बच्चे अपनी इस अल्हड़ता और निर्मलता को जीवन की इन कठोर चट्टानों के बीच खो देते होंगे...असमय उनके अन्दर की असीम प्रतिभाएँ मर जाती होंगी...न जाने हम क्या कर रहे हैं...बालश्रम के कानून का ढिढोरा हम अवश्य पीटते हैं..लेकिन समाज या सरकार के स्तर पर हम ऐसे बच्चों के लिए क्या कर पाते हैं..?"

                   लेकिन एक बात और थी जो इन शहरी लोगों को नहीं पता था... बिने को लेकर उसके पिता गाँव के लिए 'साहब' के घर से निकल चुके थे....थोड़ी दूर चलने पर बिने को सड़क के दोनों और कुछ दुकानें दिखाई पड़ी....बिने एक ऐसी ही दूकान देखकर ठिठक पड़ा...जब पिता ने उसे इस तरह ठिठकते हुए देखा तो बिने ने एक दूकान की ओर इशारा किया और पिता से बोला...."बापू ऊ जो फिराक टंगा है न...उसे दिप्पी के लिए खरीद लेऊ....दिप्पी खुश हो जायेगी...." पिता ने बिने को एक भर नजर देखा..! यह सोचते हुए कि "हमार बिने इतना सयान हो चुका है...?"  उस दुकान की ओर अपना कदम बढ़ा दिया... 
                                                                            -----विनय