दोस्तों! आज मन अलसाया था। अलसुबह उठकर टहलने से आनाकानी करने लगा। मैंने भी करवट बदला और इसे विजयीभव का आशीर्वाद दे दिया कि बेटा तुम्हारी ही इच्छा सर्वोपरि, हम भी नहीं उठने वाले। लेकिन मन तो मन, पल में तोला पल में मासा! फिर कुछ ही पल बाद इसने दिमाग को झिंझोड़कर कहा, उठने दो, हम उठ बैठे।
खैर, मन की बात चली तो "उर्वशी" में पढ़ी ये पंक्तियाँ याद आयीं -
"तन का क्या अपराध?
यंत्र वह तो
सुकुमार प्रकृति का,
सीमित उसकी शक्ति और सीमित
आवश्यकता है, यह तो मन ही है
निवास जिसमें समस्त
विपदों का ;
वही व्यग्र, व्याकुल असीम अपनी
काल्पनिक क्षुधा से
हाँक -हाँक तन को उस जल को मलिन
बना देता है,
बिम्बित होती किरण अगोचर की जिस
स्वच्छ सलिल में
जिस पवित्र जल में समाधि के सहस्रार
खिलते हैं।"
तो मित्रों! इस आलसपन के लिए अपने तन को दोष क्यों दूँ! तन तो प्रकृति की तरह निर्मल होता है, असली अपराधी तो यह विषैला मन है, जो अपनी करने के लिए बहाने ढूंढता है,
"तन का काम अमृत, लेकिन
यह मन का
काम गरल है।"
हाँ कवि के शब्दों में यह तन, मन के ही अधीन है... तन को सही राह दिखाने के लिए मन को जागृत होना पड़ता है,
"मन की लिप्सा के अधीन
उसको जगना
पड़ता है ;"
खैर अलसाया मन जागा, मैं बिस्तर से उठा, जाकर मुँह पर पानी के छींटे मारे, चप्पल में पैर डाला और घर से बाहर निकल सड़क पर आ गया ...
बरबस एक लड़के पर ध्यान गया, वह जल्दी-जल्दी पैडल पैर मारते हुए साइकिल खैंचरते बढ़ा जा रहा था। उसके पैर भी अभी पूरी तरह पैडल पर नहीं पहुंचते थे। मुझे लगा शायद वह साइकिल चलाने का अभ्यास कर रहा है..
इधर सड़क पर धीरे-धीरे आवाजाही शुरू होने लगी थी, लोग दिनचर्या के लिए गतिमान हो रहे थे... लड़के की साइकिल चलाने की हड़बड़ी में एक ज़िद थी, यह ज़िद भी काम की ही होती है तभी तो वह साइकिल चलाना सीख लेगा!
....टहलते-टहलते मैं यूँ ही काफी आगे निकल आया..देखा..एक छोटा-सा सरोवर (?) जिसमें कमल खिलने को तैयार हैं..
एक दोपहर देखा था, इसमें खिले कमल बहुत खूबसूरत लगे थे.. असल में कमल सूरज की किरणों के साथ ही खिलना शुरू होते हैं...
इस नन्हें से सरोवर में, खिले बेचारे ये कमल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते प्रतीत हुए थे.. क्योंकि यह सरोवर अतिक्रमण ही नहीं, किसी प्लाटिंग का हिस्सा बनता दिखाई पड़ा था... आगे जब यहां यह तालाब ही नहीं रहेगा, तो ये कमल भी कहाँ खिलेंगे!!
...कहते हैं कमल कींचड़ में खिलता है, इस कथन में जैसे "कींचड़" को हेय माना गया है.. जबकि कमल कीचड़ में नहीं तो और कहां खिलेंगे? पथरीली जमीन में तो खिल नहीं सकते।
....लौटते समय सड़क के किनारे भरे जल में खिली कुमुदिनियों पर निगाह गड़ गयी.. कुमुदिनी एकदम से प्रात:बेला में ही खिलती है।
वर्षा-ॠतु के तुरंत बाद प्रकृति बड़ी मनोहारी हो उठती है.. हरियाली के साथ सरोवर भी पुष्पित हो उठते हैं! वैरागी-मन ऐसी ही किसी प्राकृतिक अंचल में आश्रय खोजता है… प्रकृति में ही मुक्ति-मार्ग है, यही है वानप्रस्थ!
"जो भी अवसर निसर्ग के,
ईश्वर के भी
क्षण हैं ; धर्म साधना कहीं प्रकृति से भिन्न नहीं
चलती है"
प्रकृति में रमने वालों के लिए मुक्ति की चाह व्यर्थ है -
"पर, खोजें क्यों मुक्ति?
प्रकृति के हम
प्रसन्न अवयव हैं;
जब तक शेष प्रकृति,
तब तक हम भी
बहते जाएँगे
लीलामय की सहज, शान्त, आनंदमयी
धारा में।"
इस प्राकृतिक सौन्दर्य से युक्त धरती से...
"कितना कम स्वर्गीय स्वयं सुरपुर है इस
वसुधा से!"
खैर प्रकृति में रमता हुआ जोगी टाइप की फीलिंग में पहुँचा ही था कि अचानक सड़क की पटरी पर गंदगी के बीच पड़े प्लास्टिक के एक छोटे तिरंगे पर निगाह पहुंची..
इसे झटपट उठा लिया। लेकिन.. इस झंडे का सम्मानपूर्वक निस्तारण कैसे हो? ऊहापोह में पड़ गया! इसे सड़क पर फेंक नहीं सकता और घर से यह फिर कूड़े के साथ लौट आता…
अचानक मूर्ति-विसर्जन का ध्यान हुआ... तुरंत राष्ट्रीय प्रतीक इस तिरंगे को मरोड़ा, गोला बनाया और पास में नाले में फेंक दिया..मने मूर्ति की तरह झंडे का विसर्जन कर दिया..
वैसे ईश-मूर्ति के साथ एक लफड़ा भी है, कभी-कभी पूजा के बाद इसका विसर्जन करना पड़ता है… और विसर्जन के बाद इन मूर्तियों का हाल देखी नहीं जाती..
खैर, लौट के बुद्धू घर को आए, हमारी भी दिनचर्या शुरू हुई.. चाय बनाया, फिर चाय की छोटी-सी गिलास हाथ में थामे अखबार खोलकर बैठ गया...
"मुसलमानों के बिना हिंदुत्व भी नहीं बचेगा" यह कथन मन को भाया।
एक बात है "हिंदुत्व" कोई धर्म नहीं है, भारतीय संविधान ही हिंदुत्व की परिभाषा है।
खैर, बातें बहुत ज्यादा हो ली है, तो
#चलते_चलते
कुल बात का लब्बोलुआब यह कि प्रत्येक हेय चीज में असीम संभावनाएं छिपी हैं।
#सुबहचर्या
(19.9.2018)
विनय
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