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रविवार, 10 मई 2026

बात डर को ड्राइव करने की है

        आज सुबह साढ़े चार बजे ही मेरी नींद टूट गई। लेकिन किसी मानसिक प्रमाद में उलझा मैं देर तक बिस्तर पर पड़ा रहा। धीरे-धीरे छह बज गए, आखिर में बिस्तर छोड़ना ही पड़ा.! इधर सुबह टहलने की बजाय मैं आलस को महत्व देने लगा हूँ। जो जैसा चल रहा है, उसे वैसे ही चलने देने में मेरा विश्वास बढ़ रहा है! हो सकता है यह उम्र या आज के दौर का तकाजा हो..खैर। 

        बिस्तर छोड़ते ही शरीर में अकड़न महसूस हुई। थोड़ा वॉर्मअप करने के लिए मैं कमरों के बीच ही चकरघिन्नी-सा टहलने लगा, इस कमरे से उस कमरे और उस कमरे से इस कमरे। इन्हीं चक्करों के बीच नजर पड़ी, तीन-चार नन्हें मेंढक कमरे और गलियारे में फुदक रहे थे। मेरे पैरों की धमक पाते ही वे आसन्न खतरे की आहट पहचान लेते और फुदककर दीवार की ओर, किनारे हो जाते! 

       करीब पंद्रह मिनट की चहलकदमी में, मैं उनसे बच-बचाकर पैर धरता रहा।

         बरसात के दिन हैं.. दरवाजे बंद रहने पर भी ये नन्हें मेढक शायद फर्श और दरवाजे की पतली-सी दरार से भीतर चले आते होंगे..और..अन्य परभक्षी से सुरक्षित रहते हैं। यहाँ कमरे में बल्ब की रोशनी में मँडराते कीट-पतंगे इन्हें भोजन के रूप में आसानी से मिल जाते होंगे" नन्हें मेंढ़कों को फुदकते देख मैंने यही सोचा! 

      ध्यान दिया..मेरे पैरों की धमक पाते ही ये जिस तरह फुदककर किनारे हो जा रहे थे, यह डर के प्रति इनकी बुद्धिमत्तापूर्ण प्रतिक्रिया थी! 

     फिर मैंने सोचा, कहीं ये मेरे पैरों तले न कुचल जाएं! डर से फुदकते उन नन्हें मेढकों को मैंने बारी-बारी से अपनी मुट्ठी में समेटा और इन्हें ले जाकर झुरमुटों में छोड़ता गया..

      ... इस दौरान मेरी मुट्ठी में कैद होते मेंढ़क, स्वयं को निगले जाने की स्थिति में पाए होंगे। फिर डर के मारे अपनी अन्तिम घड़ी भी गिने होंगे! मैंने देखा, मुट्ठी से मुक्त होते ही वे झाड़ियों के बीच ऐसे फुदकते हुए भागे, जैसे जान बची तो लाखों पाए! अपने डर से मुक्त होकर वे नन्हें मेढक भीतर-ही-भीतर खुशी भी महसूस किए होंगे!! 

       वाकई! डर से मुक्त होना भीतर ही भीतर एक खुशी लेकर आता है…

      एक बात है अगर ये मेंढक लेखक होते तो निश्चित ही किसी मँझे हुए लेखक की साहित्यिक भाषा में यही लिखते कि "डर, डरने से होता है" या “डर के आगे जीत है।” 

       लेकिन यह साहित्यिक भाषा इनके लिए नहीं है! वे ठहरे मेंढक! इन्हें तो बस फुदककर किनारे ही होना है, जिससे जान बची रहे। आखिर ये घोड़ों की तरह पैरों में नाल बँधवाकर निश्चिंत होकर थोड़ी न घूम सकते हैं!! 

      ....अभी पिछले दिनों अखबारों में पढ़ा, किसी अधिकारी ने आत्महत्या कर ली। उस अधिकारी की फेसबुक प्रोफाइल खंगाला तो मुझे ताज्जुब हुआ! उसकी टैगलाइन थी -

    "it's a must win situation.. no alternative except victory" 

         इन पंक्तियों पर जरा गौर कीजिए! यहां फुदककर किनारे हो लेने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है.. “जीत के सिवा कुछ भी नहीं!” बताइए भला इस तरह का विचार किसी को कहां ले जाएगा? जीवन केवल हार-जीत में नहीं सिमटता!! जीवन भी एक कला है, जीने की कला। 

       पहले पैरों तले दबने से बचने के लिए मेंढकों का फुदककर किनारे होना, फिर मेरी मुट्ठी में होना और तड़फड़ाना, अंततः झाड़ियों में फुदकते हुए भागना… ये भी तो जीवन के हिस्से हैं!! यहां हार-जीत नहीं जीने की लालसा महत्वपूर्ण है। 

      तो, “नो अल्टरनेटिव एक्सेप्ट विक्ट्री” कितना भयानक और खतरनाक विचार है!! ऐसे विचार आत्मविनाश की ओर ही ले जाते हैं। 

     खैर..सुबह "डर" से फुर्सत मिली तो देखा पेड़ बन रहा आम का प्रफुल्लित पौधा गिरा हुआ था...यह कैसे गिरा? बंदर के दो बच्चों को वहाँ उछलते-कूदते देखा। अनुमान लगाया कि यह बंदरों का ही "खुराफात" है, अब इनका क्या! यह तो उनकी सहजवृत्ति है।

#चलते_चलते

       देखिए! क्या मेंढक, क्या आदमी! बात डर को ड्राइव करने की है.. ऑप्शन बहुत हैं…

#सुबहचर्या 

(10.10.18)

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