सामने ही बस अड्डा था। जहाँ से लखनऊ के लिए मुझे बस पकड़ना था। मोबाइल का स्क्रीन ऑन किया। समय देखा, रात का सवा दस बज चुका था। बस अड्डे पर अभी भी चहल-पहल थी। काफी संख्या में यात्री अपने गंतव्य की बस की प्रतीक्षा में इधर-उधर खड़े थे। जिनके चेहरों पर प्रतीक्षा की हलकी सी व्यग्रता थी। दो बसें रवानगी के स्थान पर खड़ी थीं। इनमें से कोई एक बस लखनऊ जाएगी, मैंने सोचा। तभी एक कंडक्टर ने आवाज लगाई -’लखनऊ जाने वाले यात्री इस बस में बैठें।’ इतना सुनते ही जहाँ-तहाँ खड़े लोगों में हलचल सी हुई, लोग बस की ओर लपक पड़े। देखते-देखते बस के दरवाजे पर भीड़ जमा हो गई। बस में सीट सुरक्षित कर लेने की होड़ में दरवाजे पर लोग धक्का-मुक्की शुरू कर दिए।
यह दृश्य देख मेरी निगाह अनायास ही सड़क के उस पार स्थित टैक्सी स्टैंड की ओर उठ गई, जो बस-अड्डे से अधिक दूर नहीं था। पर वहाँ से भी लोग बस की ओर ही भाग रहे थे; इसे देख मन में एक आशंका उभरी कि अब टैक्सी को सवारी मिलने में देर हो सकती है- फिर भी ‘थोड़ी और प्रतीक्षा कर ली जाए’ - सोचकर मैं टैक्सी स्टैंड की ओर बढ़ गया।
एक टैक्सी चालक लखनऊ जाने वाली सवारियों की बाट जोहता दिखाई पड़ा। मैंने उससे लखनऊ चलने के लिए पूँछा तो वह बोला, एक-दो सवारी और मिल जाए तो तुरंत चल देंगे।’ उसके इस ‘तुरंत’ में न जाने क्यों मुझे अपनी ही उतावली की प्रतिध्वनि सुनाई दी। मैं भी उसके साथ खड़ा आने-जाने वालों में संभावित सवारियां तलाशने लगा।
मैंने उससे कहा, ‘लोग बस से जाने के चक्कर में यहां से खिसक लिए…पता नहीं लखनऊ के लिए अब सवारी कब जुटेगी।’ वह टैक्सी वाला मानो बातचीत का बहाना ही ढूँढ़ रहा था, तपाक से बोल उठा-
“ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इस रूट पर खूब सवारियां मिलती हैं लखनऊ के लिए तो मिलती ही हैं खाड़ी के देशों के लिए एयरपोर्ट जाने के लिए भी सवारियां मिल जाती हैं। मैं तो अकसर इसी रूट पर चलता हूँ…अन्यथा मेरी टैक्सी आल इंडिया परमिट वाली है, जरूरत पड़ने पर अन्य राज्यों का भी ट्रिप लगा लेता हूँ। आजकल कोविड महामारी का दौर है, पैसे वाले लोग किराए की प्राइवेट टैक्सी में ही चलना सुरक्षित मानते हैं, इससे भी सवारियों की कमी नहीं है।"
फिर मेरी जिज्ञासा यह जानने की हुई कि वह केवल ड्राइवर है या टैक्सी मालिक भी?"
"अभी बमुश्किल से छह महीना हुआ होगा यह कार लिए हुए, लेकिन साढ़े तीन लाख किलोमीटर चल चुकी है! ससुरा लोहा भी कभी पुराना होता है..बस ग्रीस-तेल-पानी और सर्विसिंग होती रहे तो चकाचक नई बनी रहे! बेचारी मेरी यह कार अभी काफी दिन साथ देगी, लोन अदा हो जाए तब बदलने की सोचेंगे..अभी तो लोन-फोन, तेल-पानी और टैक्स-फैक्स के खर्चे-वर्चे निकाल कर भी बीस हजार बच जाता है, फिलहाल यह क्या कम है! मुझे नशा-पाती, गुटखा-फुटका की लत भी नहीं है कि फालतू के पैसे खर्च हो रहे हों, अपनी टैक्सी अपना राज और अपने मन की सवारी!!”
टैक्सी वाला एक ही सांस में बोलता चला गया। बातों से वह दिलचस्प और सच्चा लगा! उसकी बातों में एक अजीब-सा आत्म-संतोष था। मुस्कुराते हुए वह फिर शुरू हो गया-
“हूँह.. कैसी-कैसी सवारियों से पाला पडता है लेकिन मुझे तो अपने धंधे से मतलब है, कुछ यात्री खंडूस भी होते हैं वे ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे टैक्सी डीजल से नहीं, उनके कुंए के पानी से चलती है और मैं उनका ज़रख़रीद गुलाम होऊँ..लेकिन इनका भी इलाज मैं जानता हूँ…जैसी सवारी वैसी बात।”
उसकी बातें सुनकर मुस्कुराते हुए मैंने बस-अड्डे की ओर देखा -
बस-अड्डे पर आने-जाने वाले लोग जैसे टैक्सी स्टैण्ड से अनजान दिखाई पड़े। विलंब के अनुमान से मेरी भाव-भंगिमा में बेचैनी आ गई। जैसे टैक्सी ड्राइवर ने इसे भाँप लिया हो! ठेकेदार पर भड़ास निकालते हुए वह बोला-
“'ये ससुरे टैक्सी-स्टैंड के ठेकेदार भी कम हरामी पीस नहीं होते... पाँच सौ खुद खाने के चक्कर में यात्री को लखनऊ का किराया दो हजार बताएंगे, गजब की गुंडागर्दी है इनकी! पता नहीं ऐसी गुंडई की गाड़ी कब पलटेगी? वैसे भी बस के डेढ़ सौ की जगह टैक्सी पर दो हजार कौन खर्चेगा? सवारी-फवारी जाए भाड़ में अब चला जाए।”
मैंने देखा, वह ठेकेदार एक टूटी कुर्सी पर विराजमान है। तभी एक बुलेरो से तीन लोग उतरकर बस की ओर लपक लिए! लेकिन कुछ क्षण बाद इनमें से दो लोग टैक्सी की ओर लौट पड़े!
ड्राइवर ने चार सवारी से कम पर चलने को घाटे का सौदा बताकर इनसे एक सवारी के आने तक प्रतीक्षा करने के लिए कहा। वाकई इस टैक्सी वाले को केवल अपने धंधे से ही मतलब है।
इसी बीच तीसरा यात्री भी वहां आ गया, मुझे लेकर अब चार सवारी हो चुकी थी। ड्राइवर को कुल आठ सौ रूपया किराया मिलना सुनिश्चित हो गया।
लेकिन चालक ने खुश होकर ड्राइविंग सीट सँभाला ही था कि वह ठेकेदार आ धमका। उसने खिड़की के भीतर हाथ बढ़ाकर चालक से डेढ़ सौ रुपए मांग लिए। मैं चालक के बगल वाली सीट पर बैठा था। जाते-जाते ठेकेदार ने मुझे नमस्कार किया। उसके जाने के बाद चालक बुदबुदाया-
“आठ सौ में डेढ़ सौ ये ले जाएगा और बचेंगे साढ़े छह सौ जिसमें से तेल के जाएंगे पाँच सौ, खैर डेढ़ सौ तो बचेंगे ही।”
तभी पीछे से एक परिचित यात्री ने कहा कि उसने ‘साहब’ का परिचय पहले दे दिया था, नहीं तो वह पाँच सौ से कम न लेता।
टैक्सी रोड पर दौड़ रही थी। चालक ने मेरी ओर देखा जैसे परखा रहा हो। कोई ‘साहबी ठाट’ न दिखाई देने पर उसे मेरे साहब होने पर संदेह हुआ होगा.. क्योंकि उससे डेढ़ सौ रूपए ठेकेदार तो ले ही गया था।
अचानक मैंने उससे पूँछ लिया कि तुम टैक्सी चलाने का यह धंधा कब से कर रहे हो?
जैसे यही वह चाहता था कि कोई उससे बतियाता चले। उसने तपाक से बोला -
“मैं तो पहले दिल्ली में बड़े-बड़े नेताओं और मंत्रियों के फ्लीट की गाड़ियां चलाता था..कई मंत्रियों-नेताओं का ड्राइवर रहा हूँ…लेकिन ये बड़े लोग भी न, सब ऐसे ही हैं! ये स्वयं को समाज से ऊपर समझते हैं। नियम-कानून तो हम जैसों के लिए है। आम आदमी इनसे कितना धोखा खाता है! उसे समझ नहीं। देखने में ये एक-दूसरे के धुर विरोधी, लेकिन सांझ ढले सब आपस में गलबहियां डाले ठहाके लगाते हैं। बाकी वोटरों को जाति-धर्म के बंधन का एहसास कराते हैं। मैंने तो फाइव-स्टार होटलों में इन्हें छोड़ते और वहाँ से लाते समय इनकी कारगुजारियाँ भी देखी हैं।”
इस समय वह एक ट्रक को ओवरटेक करने की कोशिश में था लेकिन तभी सामने से तेज गति में आती एक कार की हेड लाईट से आँखें चौंधिया गई! इसपर वह बोला,
“ये देखो, साला हाई बीम मारते चला आ रहा है, इसे तो ड्राइविंग सेंस ही नहीं है! पता नहीं कैसे-कैसे लोग लाइसेंस पा जाते हैं।”
अब ड्राइवर ट्रक को ओवरटेक करने में कोई हड़बड़ी नहीं दिखा रहा था। तभी पीछे से एक यात्री अचानक भड़ककर बोला -
“बैलगाड़ी चला रहे हो क्या? तुम्हारी इस चाल पर तो मेरी फ्लाइट छूट जाएगी।”
ड्राइवर को यात्री की बात खल गई, अचानक कार को सड़क के किनारे रोककर उसने यात्री से कहा,
“तो अभी मेरी कार से उतर जाइए..” ड्राइवर थोड़े गुस्से में था।”
फिर शांत होते हुए कहा, “मै अस्सी से ज्यादा नहीं चलता। आपको समय पर एयरपोर्ट पहुँचा देंगे।”
इधर यात्री भी शांत रहा।
कुछ क्षण की शांति के बाद ड्राइवर ने कहा, “ड्राइविंग के समय गुस्सा आना ठीक नहीं।”
इसके बाद मैंने भी चुप्पी को तोड़ी, ड्राइवर से पूँछा, “तुम लोग विरोध क्यों नहीं करते ठेकेदारों का?”
मेरे इस प्रश्न पर ड्राइवर क्षण-भर की चुप्पी के बाद बोला,
“सर, माना आज आप बैठे हैं, लेकिन हमारा तो रोज़ इन्हीं से पाला पड़ेगा। कहाँ तक इनसे पंगा लेते फिरेंगे? आखिर हैं तो हम टैक्सी-ड्राइवर ही।”
फिर वह अपने अनुभव सुनाने लगा -
“साहब, मैंने तो इस टैक्सी ड्राइवरी में बहुत कुछ देखा-सुना है। एक बार एक बड़े ढाबे के कैश काउंटर पर एक शराबी को ढाबे मालिक से उलझा देखा। ढाबे मालिक से उसे पाँच हजार रुपए चाहिए था। कुछ देर ना-नुकूर के बाद मालिक ने उसे पंद्रह सौ रुपए थमाए। बाद में ढाबे के मालिक ने मुझसे यही कहा कि कौन उलझे इनसे धंधा ख़राब होता।”
इसके बाद टैक्सी ड्राइवर ने दूसरी घटना सुनाई -
“कितनी-कितनी बातें बताऊँ साहब! एक दिन तो एक आदमी जबर्दस्ती आकर मेरी गाड़ी में बैठ गया, जबकि गाड़ी पहले से ही बुक थी। उतरने को कहा तो वह उतरने को तैयार नहीं, उल्टा झगड़ा करने लगा।
थाने से सौ कदम दूर थे हम..पर उसे ज़रा भी डर नहीं लगा। कहने लगा कि ‘दारोगा और सिपाही सब उसके जान-पहचान के हैं’ जैसे-तैसे करके उसे नीचे उतारा, तो जाते-जाते सिर में मुक्का मारकर भाग गया!
सच कहूँ तो साहब, इस देश में मेहनत करके खाने-कमाने वालों की कोई कद्र नहीं है। इज्जत-उज्जत सब बड़े लोगों के चोंचले हैं। हम लोगों की इज्जत बस इतनी है कि बिना दंद-फंद और चोरी-चकारी के अपना परिवार पाल ले…लेकिन अब उसमें भी चैन कहाँ है…"
और पुलिस? उसके पास जाओ तो लगता है उल्टा हमें ही फंसा देगी। डंडा फटकारते ही मिलती है।
कहने के लिए बहुत टीम-टाम है लेकिन हमारे लिए नहीं..हम तो राम भरोसे ही रहते हैं। वर्षों की इस टैक्सी ड्राइवरी में मैंने यही समझा है।”
टैक्सी ड्राइवर की बातें मैं बहुत ध्यान से सुन रहा था, वह फिर अपनी रौं में बहने लगा..
“उस दिन तो साहब, गजब ही हो गया था! साँझ ढल चुकी थी, एक लड़की ने टैक्सी बुक किया। दूर खड़ी होकर वह साथ जाने वाले किसी का इंतजार करने लगी थी। देर होता देख उसे इशारे से मैं बुलाने लगा तो एक पुलिसवाला आ धमका..डंडे से मेरी टैक्सी ठकठकाते हुए उसने मुझे एक भद्दी गाली दिया। फिर मुझ पर इल्जाम लगाया कि मैं गाड़ी में गलत धंधा कराता हूँ! और मुझे जेल भेजने की धमकी देने लगा। मेरी गवाही देने के लिए वहां कोई नहीं था वह लड़की भी नहीं! उस दिन तो मैं एकदम से फँस ही गया था!!
एक हजार रुपए की उस दिन की पूरी कमाई उस पुलिस वाले को रिश्वत के रूप में देना पड़ा…मुझे बहुत मलाल हुआ था इसका।”
अंत में टैक्सी ड्राइवर ने कहा -
साहब, बुरा मत मानिएगा…उस वक्त तो लगा कि इस सरकारी व्यवस्था का हर आदमी जैसे लुटेरा है।
लुटेरा!! और ये लूटनेवाले भी अजीब हुनर रखते हैं साहब!”
फिर उसने बहुत ही तल्ख़ स्वर में कहा -
“साहब जी, बुरा मत मानिएगा…लूटने में जो जितना माहिर होता है, वह उतने ही ऊँचे ओहदे पर बैठा मिलता है।”
ड्राइवर की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक मेरे मुँह से हड़बड़ी में निकल पड़ा,
“रुको… रुको, यहीं रोक दो…मुझे यहीं उतरना है!”
दरअसल हम लखनऊ के शहीद पथ पर थे। जैसे ही रमाबाई अंबेडकर पार्क नजर आया, मुझे एकदम से ध्यान आया, अरे, यहीं तो उतरना था!
टैक्सी रुक गई। मैं उतरा। टैक्सी ड्राइवर ने एक नज़र मेरी ओर देखा, जैसे वह कुछ कहना चाहता हो, पर कहा नहीं। गाड़ी आगे बढ़ा दिया।
मैं सड़क किनारे खड़ा रह गया उसके शब्द अब भी मेरे भीतर गूंज रहे थे,
“लूटने में जो जितना माहिर है…”
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